भारत के महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट ने देवभूमि उत्तराखंड की भाजपा सरकार के लिए परेशानी खड़ी कर दी है. कैग ने अपनी रिपोर्ट में महाकुंभ में की गई गड़बड़ियों के साथ-साथ सरकार द्वारा आपदा प्रबंधन के प्रति बरती गई ढिलाई की भी कलई खोलकर रख दी. कैग ने अपनी जांच में एकीकृत योजना का अभाव, सरकारी विभागों के मध्य समन्वय की कमी एवं कुप्रबंधन जैसी खामियां पाई हैं. महाकुंभ में ठेकेदारों की मनमानी के अलावा इस सरकार ने धर्म-संस्कृति और जनता के साथ ख़ूब छल किया. स्पर्श गंगा का ढिंढोरा पीटने वाली निशंक सरकार की उदासीनता के कारण महाकुंभ के दौरान 75 प्रतिशत गंदे जल की निकासी गंगा में की गई. देश-विदेश से आए लाखों श्रद्धालुओं को पावन गंगाजल की जगह गंदगी मिश्रित जल से स्नान करना पड़ा. पर्याप्त धन होने के बावजूद सरकार में इच्छाशक्ति की कमी के कारण लाखों श्रद्धालुओं गंदे पानी से स्नान करना पड़ा. कैग का मानना है कि इस अवसर पर बिना किसी शोधन के 73.94 एमडी सीवेज गंगा में सीधे छोड़ा गया, जिससे पुण्य की लालसा से आई जनता के साथ छल हुआ.
नेता प्रतिपक्ष हरक सिंह रावत ने जेपीसी की तर्ज पर विधानसभा समिति गठित करने की मांग की है. उन्होंने सिटूर्जिया एवं हाइड्रो प्रोजेक्ट्स मामलों में भी सरकार को घेरते हुए उसे घोटाले की सरकार बताया. रावत का आरोप है कि स्पर्श गंगा के नाम पर सरकार ने अपनी पार्टी की सांसद हेमामालिनी को लाभ दिलाने के लिए एक ओर गंगा का ब्रांड अंबेसडर बनाया, वहीं दूसरी ओर देश-विदेश से कुंभ में आई जनता के प्रति राज्य सरकार एक ईमानदार कोशिश नहीं कर सकी, जिसके चलते श्रद्धालुओं को गंदे जल में डुबकी लगानी पड़ी.
रिपोर्ट में इस बात का खुलासा हुआ कि सरकार के मेला प्रशासन एवं पेयजल निगम के मध्य आपसी समन्वय की कमी से पूर्व में बिछाई गई पाइप लाइनों का प्रयोग नहीं किया गया. इससे 77 लाख रुपये के व्यय का कोई लाभ जनता को नहीं मिला. इस कुंभ को घोटाले का महाकुंभ बनाने में इस सरकार के अफसरों ने कोई कोर कसर नहीं छोड़ी. इसका जीता-जागता उदाहरण तब देखने को मिला, जब मेला प्रशासन एवं 11 विभागों ने शासन की स्वीकृति के बिना ही 19.39 करोड़ रुपये के फालतू काम कराकर सरकारी धन का बंदरबांट कर लिया. मेला प्रशासन राजस्व वसूली के मामले में पूरी तरह फिसड्डी सिद्ध हुआ. उसने पार्किंग, टीन-टेंटेज एवं जल प्रभाग की उगाही न कराकर सरकार को 3.85 करोड़ रुपये के राजस्व की हानि पहुंचाई. ठेकेदारों को लाभ दिलाने के लिए मेला प्रशासन द्वारा बिना मोलभाव किए उनकी मनमानी शर्तें स्वीकार करते हुए टीन-फर्नीचर के लिए 4.77 करोड़ रुपये का अतिरिक्त ख़र्च किया गया. मेला अधिकारियों ने कमीशनखोरी के चलते जमकर ख़रीददारी की और चालीस लाख रुपये का अपव्यय कर दिया. 11.64 करोड़ रुपये के सड़क निर्माण कार्य और सुदृढ़ीकरण पर तीन करोड़ रुपये का ख़र्च ग़ैर ज़रूरी होने के बावजूद किया गया. कैग ने ऐसी कई कमियां पकड़ीं. मेला प्रशासन ने कई काम काग़ज़ों पर ही करके सरकारी धन का बंदरबांट कर डाला. जांच के दौरान पाए गए दस्तावेजों में जनता की सुविधा के लिए इक्कीस शौचालय बनाने का दावा किया था, जबकि मौक़े पर मात्र दस शौचालय बने मिले.
कैग की रिपोर्ट ने आपदा प्रबंधन में भारी ढिलाई का ख़ुलासा करके निशंक सरकार के जनसेवा के थोथे नारे पर स्याही उड़ेल दी. रिपोर्ट में बताया गया कि रुद्रपुर की जनता के नाम पर लाई गई 85 लाख रुपये की जीवनरक्षक मशीनें प्रयोग न होने के कारण बर्बाद हो गईं. इस रिपोर्ट में यह भी ख़ुलासा हुआ कि ट्रामा सेंटर जैसी महत्वपूर्ण सुविधाओं के अभाव में लोगों की तात्कालिक चिकित्सा पर ध्यान नहीं दिया गया. विद्यालय सुरक्षा कार्यक्रम में कोताही बरतते हुए 39 प्रतिशत भवन नजरअंदाज कर दिए गए. कैग ने ख़ुलासा किया कि राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण अक्टूबर 2007 से ही अकार्यशील था, जिसकी चेतावनी प्रणाली एवं संचार व्यवस्था भी दुरुस्त नहीं पाई गई. आपातकालीन परिचालन केंद्रों में अधिकारियों-कर्मचारियों की भारी कमी ने सरकार की कलई खोल दी. केवल चार पर्वतीय ज़िलों में ही मार्क ड्रिल कराई गई. 22.55 करोड़ रुपये व्यय करने के बाद दूसरी किस्त जारी नहीं हो सकी, जिससे निर्माण कार्य अपूर्ण रहे. योजना के मानदंडों का उल्लंघन करते हुए आपदा राहत निधि से 41.77 करोड़ रुपये अस्वीकार्य निर्माण कार्य के लिए स्वीकृत किए गए. पुनर्वास एवं पुनर्स्थापना नीति के अभाव के कारण 80 चिन्हित गांव पुनर्वासित नहीं किए गए. कंक्रीट कटर, स्टील कटर स्प्रेडर और हाइड्रोलिक जैसे खोल एवं बचाव उपकरण केवल आठ ज़िलों में ही उपलब्ध कराए गए.
रिपोर्ट में कहा गया कि उत्तराखंड जल विद्युत निगम ने स्वच्छ विकास प्रणाली के तहत रजिस्ट्रेशन नहीं कराया, जिससे वह 24,24,062 टन कार्बनडाई ऑक्साइड की बचत के बदले मिलने वाले राजस्व से वंचित रह गया. कैग ने अधिकारियों की मनमानी के चलते सरकारी राजस्व को क्षति पहुंचाने वाले कई कामों का ख़ुलासा करके सरकार को कठघरे में खड़ा किया. उसने अपनी रिपोर्ट में अल्मोड़ा ज़िले में अपूर्ण पंपिंग जलापूर्ति योजना में 2.79 करोड़ रुपये के बेवजह ख़र्च का ख़ुलासा किया और कहा कि अल्मोड़ा पंपिंग योजना के लिए जिस स्रोत का चयन किया गया, वहां पर पानी की उपलब्धता पर्याप्त नहीं थी. यह जानते हुए भी सरकार ने इसे स्वीकृत किया और 2.79 करोड़ रुपये की परियोजना दिसंबर 2008 में उत्तराखंड जल संस्थान के मत्थे मढ़ दी गई. इसके साथ ही रिपोर्ट में राज्य सरकार के 16 अन्य अविवेकपूर्ण कार्यों को भी चिन्हित किया गया, जिनमें जनता की गाढ़ी कमाई का जमकर दुरुप्रयोग हुआ. पथरी प्रोजेक्ट में हुए नवीनीकरण की असाधारण देरी के कारण उसकी लागत में 11.58 करोड़ रुपये की बढ़ोत्तरी हुई, मनेरी-भाली परियोजना का काम समय पर पूरा न होने के कारण उसकी लागत में 1074.15 करोड़ रुपये की बढ़ोत्तरी हुई. वहीं न्यूनतम मानकों से कम अल्कोहल के उत्पादन से 8.67 लाख रुपये के राजस्व की हानि हुई.
विलंब से कर जमा होने के कारण 1.34 करोड़ रुपये का अर्थदंड नहीं लिया जा सका. चार वर्षों बाद भी वैट नियमावली को अंतिम रूप नहीं दिया जा सका. ज़िला समाज कल्याण अधिकारी ने बहादराबाद के अस्तित्वहीन स्कूलों को 1.07 लाख रुपये बंदरबांट के लिए सौंप दिए. वन विभाग की अनुमति के बिना चमोली के नैन साकरी में विद्यालय का निर्माण शुरू किया गया, जिसे बाद में वनकर्मियों ने रुकवाया. मोरी मोताड़ मोटर मार्ग में अपूर्ण पुल बनाने से 2.03 करोड़ रुपये का नुक़सान हुआ. दुगड्डा में विवादित भूमि पर बिना स्पष्ट स्वामित्व के अवैध काम कराने पर 11.02 करोड़ रुपये की हानि हुई. राजधानी देहरादून में सीवर लाइन के निर्माण पर 97.51 लाख रुपये खर्च किए गए, जो निरर्थक सिद्ध हुए. लोक निर्माण विभाग ने महंगी निर्माण सामग्री का प्रयोग किया, जिसके कारण 42.78 लाख रुपये का नुकसान हुआ. निर्माण कार्य की देरी पर 18.4 करोड़ रुपये का आर्थिक दंड नहीं वसूला गया. पंचवर्षीय योजना में 720 मेगावॉट की तुलना में 306 मेगावॉट का ही उत्पादन शुरू हो सका. कैग ने अपनी रिपोर्ट में लोनिवि प्रांतीय खंड लैसडाउन द्वारा ग़लत विश्लेषण करके ठेकेदारों को अनुचित लाभ दिलाने का खुलासा किया है. पेयजल निगम अल्मोड़ा के अधिशासी अभियंता- निर्माण खंड ने एक अपूर्ण योजना पर 2.79 करोड़ रुपये का अविवेकपूर्ण व्यय किया. एसजीएसवाई के दिशानिर्देशों का उल्लंघन करके 95.24 लाख रुपये का अनियमित भुगतान किए जाने का मामला प्रकाश में लाकर कैग ने राज्य सरकार की कथनी-करनी में अंतर का ख़ुलासा कर दिया. इस तरह कुंभ-2010 घोटाले का महाकुंभ साबित हो गया है.
इस मामले को लेकर सूबे के प्रमुख विपक्षी दलों के सदस्यों ने सदन का बहिष्कार किया. नेता प्रतिपक्ष हरक सिंह रावत ने जेपीसी की तर्ज पर विधानसभा समिति गठित करने की मांग की है. उन्होंने सिटूर्जिया एवं हाइड्रो प्रोजेक्ट्स मामलों में भी सरकार को घेरते हुए उसे घोटाले की सरकार बताया. रावत का आरोप है कि स्पर्श गंगा के नाम पर सरकार ने अपनी पार्टी की सांसद हेमामालिनी को लाभ दिलाने के लिए एक ओर गंगा का ब्रांड अंबेसडर बनाया, वहीं दूसरी ओर देश-विदेश से कुंभ में आई जनता के प्रति राज्य सरकार एक ईमानदार कोशिश नहीं कर सकी, जिसके चलते श्रद्धालुओं को गंदे जल में डुबकी लगानी पड़ी. इसके लिए प्रदेश की जनता इस सरकार को कभी माफ नहीं करेगी. रावत का आरोप है कि निशंक सरकार राज्य के पावन धामों की गरिमा के साथ भी खिलवाड़ कर रही है, इसका जीता-जागता उदाहरण शीतकालीन चारधाम यात्रा की शुरुआत है.
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