छत्तीसगढ़ः हवाओं में प्रदूषण का ज़हर

छत्तीसगढ़ ने राज्य बनने के बाद पिछले दस सालों में खूब तरक्क़ी की है. आज छत्तीसगढ़ की कई योजनाएं राष्ट्रीय स्तर पर सराही जा रही हैं. हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ सरकार के पीडीएस सिस्टम को सभी राज्यों में लागू करने की सलाह दी है, लेकिन दूसरी ओर प्रदूषण के मामले में भी छत्तीसगढ़ धीरे-धीरे अव्वल नंबर पर पहुंचता जा रहा है. राजधानी रायपुर सहित कोरबा व रायगढ़ जैसे शहर, जहां सबसे ज़्यादा उद्योग लगे हुए हैं, प्रदूषण के लिहाज़ से खतरनाक होते जा रहे हैं. हवा में प्रदूषण के कण के संबंध में शोध करने वाले रविशंकर विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों का कहना है कि रायपुर दुनिया के सबसे ज़्यादा प्रदूषित शहरों में शामिल हो गया है, लेकिन विश्वविद्यालय द्वारा किए गए अध्ययन और प्रदूषण निवारण मंडल के आंकड़ों में भी अंतर है. ठंड की तुलना में राजधानी का प्रदूषण स्तर इस समय कम है, लेकिन संयत्रों के आसपास रहने वाले लोगों पर इसका खासा प्रभाव पड़ रहा है.

चिंता की एक बात यह है कि अब छत्तीसगढ़ की राजधानी ध्वनि प्रदूषण से भी त्रस्त होने लगी है. खबरें बताती हैं कि केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने रायपुर को देश के उन 35 शहरों में शामिल किया है, जहां अगले वर्ष रियल टाइम व्यापक शोर निगरानी नेटवर्क तैयार किया जाएगा. यह रायपुर में ध्वनि प्रदूषण की उच्च मात्रा को देखते हुए किया गया है.

वैज्ञानिकों का कहना है कि हाल के सालों में प्रदूषण के स्तर का लगातार बढ़ने का कारण स्पंज आयरन संयंत्र बहुत बड़े कारक हैं. आयरन और कोक के मेल्ट होने के बाद संयंत्रों की चिमनियों से कार्बन डाईआक्साइड व कार्बन मोनोऑक्साइड का डिपाजिट निकलना शुरू हो जाता है. साथ ही भारी मात्रा में ब्लैक कार्बन निकलने लगता है. प्रदूषण का स्तर हवा की गति पर निर्भर करता है. हवा की गति तेज़ होने पर प्रदूषण फैलाने वाले पार्टिकल हवा के साथ कई किमी दूर चले जाते हैं, दूसरी ओर गति कम होने पर पार्टिकल जमने लगते हैं. यही वजह है कि ठंड में प्रदूषण का स्तर सबसे अधिक व बारिश में सबसे कम रहता है. इस साल गर्मी के दौरान भी पार्टिकल प्रति माइक्रो मीटर का स्तर का़फी अधिक बढ़ गया है. रविशंकर विश्वविद्यालय के रसायन के प्रोफेसर डॉ. खगेश्वर पटेल राजधानी के प्रदूषण स्तर पर शोध कर रहे हैं. उनके अनुसार राज्य बनने के बाद स्पंज आयरन इंडस्ट्री की बाढ़ ने राजधानी को देश के सबसे अधिक प्रदूषित शहरों की सूची में ला दिया है. हाई थर्मल प्रोसेस से चलने वाले इंजन, बर्निंग यूनिट, इंडस्ट्री व स्टील प्लांट से पीएम-10 व पीएम 2.5 माइक्रो मीटर के डस्ट पार्टिकल निकलते हैं. ठंड के दिनों में हवा की गति का़फी कम हो जाती है. मौसम विशेषज्ञों के मुताबिक़ ठंड में दो किमी प्रति घंटे की रफ्तार से हवा चलती है, इस वजह से धूल के कण हवा में अधिक दूर तक नहीं जा पाते हैं. साथ ही धुंध होने के कारण यह कण उसमें लिपटे रहते हैं. इस वजह से ही पीएम-10 का स्तर 600 से अधिक हो जाता है. यह मानने में कोई हिचक नहीं कि छत्तीसगढ़ में भाजपा सरकार के क़ाबिज़ होने के बाद से अर्थात 2003 के बाद से ही यहां औद्यौगिक प्रगति ने तेज़ रफ्तार पकड़ी है. भाजपा शासन के इन 7 वर्षों में यदि उद्योग के क्षेत्र में ज़बर्दस्त प्रगति हुई है और इस्पात बनाने वाली 20 कंपनियों ने छत्तीसग़ढ में 427.61 अरब रुपए के निवेश के लिए राज्य सरकार के साथ सहमति पत्र पर हस्ताक्षर किए हैं, लेकिन औद्योगिक प्रगति के पीछे का हाल यह है कि रायपुर, कोरबा व रायगढ़ देश के सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में शामिल हैं. राजधानी से सटे औद्योगिक क्षेत्रों में स्थित फैरो एलायज के संयंत्रों की चिमनियां इतनी राख एवं धुंआ उगलती हैं कि आसपास खेतों में महीन काली धूल की मोटी परत जम गई है. किसानी चौपट है और किसान परेशान.

वैज्ञानिकों का कहना है कि हाल के सालों में प्रदूषण का स्तर  लगातार बढ़ने का कारण स्पंज आयरन संयंत्र हैं. आयरन और कोक  के मेल्ट होने के  बाद संयंत्रों की चिमनियों से कार्बनडाई आक्साइड और कार्बन मोनोऑक्साइड का डिपाजिट निकलना शुरू हो जाता है. साथ ही भारी मात्रा में ब्लैक कार्बन निकलने लगता है.

देवजी पटेल छत्तीसगढ़ में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के विधायक हैं और औद्योगिक प्रदूषण के ख़िलाफ़ अपनी ही सरकार से लड़ाई लड़ रहे हैं. उनका कहना है कि सरकार को अब बातों से तौबा करनी चाहिए और प्रदेश को औद्योगिक प्रदूषण से मुक्त करने का कोई ठोस उपाय करना चाहिए. पटेल कहते हैं कि वे पिछले पांच वर्षों से अनवरत औद्योगिक प्रदूषण के खिला़फ आवाज़ उठाते रहे हैं, परंतु उनकी अपनी भाजपा सरकार के कान पर जूं तक नहीं रेंगी, जिसकी वजह से प्रदेश के उद्योगपति खुलेआम पर्यावरण के नियमों की धज्जियां उड़ा रहे हैं. पटेल इस बात से भी हैरान हैं कि उनके औद्योगिक प्रदूषण विरोधी आंदोलन के जगज़ाहिर होने के बावजूद न तो कभी मुख्यमंत्री और न ही पर्यावरण मंत्री ने उनसे इस विषय में वार्तालाप करने की ज़रूरत महसूस की, जबकि वे अपनी तऱफ से सरकार को प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों पर लगाम कसने के लिए समय-समय पर सचेत करते रहे हैं.

इधर वन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि औद्योगिक प्रदूषण कीरोकथाम के लिए राज्य शासन के वृक्षारोपण जैसे जनजागरण अभियान में प्रदेश के गिने-चुने उद्योग ही दिलचस्पी दिखाते हैं. अधिकारी बताते हैं कि राज्य सरकार द्वारा प्रदेश के 14 विभिन्न उद्योग प्रबंधनों को वर्ष 2008 मे सड़कों के किनारे दिए गए 814 किलोमीटर वृक्षारोपण के लक्ष्य को हासिल करने के लिए इन उद्योगों ने शुरुआत तो बड़े ज़ोरशोर से की, लेकिन उनका उत्साह केवल 123 किलोमीटर क्षेत्र में पौधे लगाने के पश्चात का़फूर हो गया. इससे पहले भी इन्हीं उद्योगों को वर्ष 2006 में सड़क के किनारे 800 किलोमीटर वृक्षारोपण का लक्ष्य दिया गया था, परंतु वे 56 किलोमीटर से अधिक पौधे रोपित नहीं कर पाए. यही हाल वर्ष 2007 का रहा, जब राज्य शासन ने फिर भरोसा जताते हुए इन उद्योगों को 391 किलोमीटर वृक्षारोपण का लक्ष्य दिया, लेकिन वे महज़ 110 किलोमीटर की लंबाई तक ही वृक्षारोपण कर सके. इधर औद्योगिक नीति वर्ष 2009-14 के क्रियान्वयन एवं प्रदेश में औद्योगिक निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए अनेक योजनाएं संचालित की जा रही हैं. राज्य सरकार के वर्ष 2011-12 के बजट में उद्योगों को ब्याज़ अनुदान हेतु 46 करोड़, औद्योगिक इकाइयों को लागत पूंजी अनुदान के लिए 4 करोड़ 50 लाख, नए औद्योगिक क्षेत्रों की स्थापना के लिए 20 करोड़ तथा औद्योगिक पार्कों के लिए 10 करोड़ का प्रावधान किया गया है. इसके अतिरिक्त राज्य स्तरीय मेला प्रांगण के निर्माण हेतु 10 लाख का प्रावधान किया गया है, लेकिन पर्यावरण सुधारने के लिए बजट में कितनी रक़म का रखी गई है, यह विधानसभा में बजट पेश करते समय मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह उल्लेख नहीं कर पाए. हालांकि राज्य के पर्यावरण को लेकर उनकी चिंता और गंभीरता सर्वविदित है. उनकी मंशा पर सवाल खड़े नहीं किए जा सकते. वहीं राज्य के आवास व पर्यावरण मंत्री कहते हैं कि प्रदूषण के मुद्दे पर कोई समझौता नहीं किया जा सकता. राज्य सरकार इस मुद्दे पर गंभीर है और समय-समय पर प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों पर कार्रवाई करती है. वहीं ईएसपी लगने के बाद भी उद्योगों से काला धुआं निकल रहा है, इस पर उद्योगपति स़फाई देते हैं कि ईएसपी चालू व बंद होने के 10 मिनट तक काला धुंआ निकलता है, जबकि राजधानी रायपुर से सटे औद्योगिक इलाक़े उरला-सिलतरा के ग्रामीणों की मानें तो अधिकतर उद्योग शाम सात बजे के बाद से ईएसपी बंद कर देते हैं जो कि सुबह तक बंद ही रहता है. ऐसे में कहां से प्रदूषण रुकेगा. इस मुद्दे पर आवास एवं पर्यावरण मंत्री खुद कभी-कभी आकस्मिक रूप से औद्योगिक क्षेत्रों का दौरा करते हैं. कुछ महीने पहले ही उन्होंने ऐसे ही आकस्मिक निरीक्षण के दौरान प्रदूषण फैलाने वाले तीन उद्योगों को बंद करने के निर्देश दिए. श्री मूणत के निर्देश पर पर्यावरण संरक्षण मंडल ने सिलतरा औद्योगिक क्षेत्र स्थित मेसर्स-देवी आयरन एंड पावर प्रा.लि., मेसर्स- इंडियन स्टील एंड पावर प्रा.लि., चरौदा, और मेसर्स अग्रवाल स्पंज प्रा.लि., को तत्काल उत्पादन बंद करने के आदेश दिए थे.

चिंता की एक बात यह भी है कि अब छत्तीसगढ़ की राजधानी ध्वनि प्रदूषण से भी त्रस्त होने लगी है. खबरें बताती हैं कि केन्द्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने रायपुर को देश के उन 35 शहरों में शामिल किया है, जहां अगले वर्ष रियल टाइम व्यापक शोर निगरानी नेटवर्क तैयार किया जाएगा. यह रायपुर में ध्वनि प्रदूषण की उच्च मात्रा को देखते हुए किया है.

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