महाभारत का युद्ध पांडवों ने जीता तो सही, लेकिन इसके लिए उन्होंने कई विवादित दांवों और गंदी चालों का इस्तेमाल भी किया. ऐसा करने के पीछे उनके पास पर्याप्त तर्क थे. चूंकि कौरवों ने उनके साथ बुरा व्यवहार किया था, उन्हें उनके अधिकारों से वंचित कर दिया था और जुआ जैसे खेल में बेईमानी से हराया था. शायद तभी युधिष्ठर ने अश्वथामा के बारे में गुरु द्रोण से झूठ बोला था. अर्जुन ने कर्ण को तब मारा, जब वह अपने रथ के फंसे पहिए को बाहर निकालने की कोशिश कर रहा था. भीम ने दुर्योधन का वध उसकी जंघा पर प्रहार करके किया था, जो युद्ध नियम के विरुद्ध था. और, यह सब कुछ हुआ कृष्ण के निर्देश पर.
हालांकि यह तब की बात थी, लेकिन क्या आज हमें फिर एक वैसे ही युद्ध की ज़रूरत है? 9 अप्रैल को जब अन्ना हजारे ने अपना अनशन ख़त्म किया, तब लोकतांत्रिक भारत द्वारा ज्वाइंट कमेटी गठन के ऐतिहासिक निर्णय पर हर किसी को गर्व हो रहा था. ज्वाइंट कमेटी एक नई सोच थी, जिसने सिविल सोसायटी को आवाज़ दी, लेकिन दु:ख की बात है कि इसके बाद दोनों पक्षों (ज्वाइंट कमेटी में सरकार और सिविल सोसायटी के सदस्यों) ने जो कुछ भी किया, वह निराशाजनक रहा. बेवजह 15 अगस्त की समय सीमा तय कर दी गई. अब हम देख रहे हैं कि किस तरह कांग्रेस ने हमला किया और हजारे टीम के सदस्यों की छवि धूमिल कर रही है. हजारे टीम के सदस्यों को लेकर 9 अप्रैल से पहले भी सवाल उठ रहे थे. संदेह व्यक्त किया जा रहा था कि यह वास्तव में एक जनांदोलन है या महज़ मीडिया की वजह से एकत्र एक भीड़. लेकिन जैसे ही 9 अप्रैल बीता, कांग्रेस के उकसावे पर कुछ लोगों ने भूषण पिता-पुत्र और अन्य सदस्यों पर आरोप लगाने शुरू कर दिए.
बहरहाल, एक भारतीय के रूप में जब बात नैतिकता की आती है तो हम महाभारत की ओर देखते हैं. संदेश स्पष्ट है. यदि आप जीतने के लिए धोखा देने की ज़रूरत समझते हैं तो ऐसा करें, यही धर्म है. लेकिन यह 21वीं शताब्दी है. हमने अन्य स्रोतों से भी नैतिकता के पाठ सीखे हैं, जैसे बौद्ध, जैन, ईसाई, सिख, इस्लाम एवं पारसी धर्म इत्यादि. मान लीजिए कि भूषण पिता-पुत्र के ख़िला़फ अभियान चलाने वाले लोग अपने मक़सद में सफल हो जाते हैं और उन्हें कमेटी से बाहर निकलवा देते हैं तो क्या यह स्थिति सरकार के लिए अच्छी होगी? क्या ऐसा नहीं लगेगा कि सरकार शासन से जुड़े कुछ कठिन सवालों से बचने की कोशिश कर रही है. मान लीजिए, ईमानदार और अच्छा होने के कांग्रेस के पैमाने पर (ये पैमाने स़िर्फ दूसरों के लिए लागू होते हैं, ख़ुद कांग्रेस के लिए नहीं) सिविल सोसायटी के स़िर्फ तीन लोग ही खरे उतरते हैं तो क्या इसके बाद जो लोकपाल बिल निकल कर सामने आएगा, उससे उसकी विश्वसनीयता बढ़ जाएगी अथवा यह स्थिति 42 सालों में एक प्रभावी बिल पास न करा सकने की कड़ी में एक क़दम और आगे बढ़ने जैसा होगा. और ऐसा क्यों है कि स़िर्फ कांग्रेस ही यूपीए की ओर से मोर्चा संभाल रही है. क्या कोई ऐसी बात है, जिससे वह इस पूरी प्रक्रिया से भयभीत है. कांग्रेस अपनी सुरक्षा में इन ग़ैर सरकारी लोगों के प्रति इतनी आक्रामक क्यों है? क्या यह उचित नहीं होगा कि अपने रवैये में थोड़ी सी नरमी लाई जाए, ताकि नए भारत के साथ मिलकर नया इतिहास रचा जाए. पंडित नेहरू भाषाई आधार पर राज्यों के गठन की मांग के ख़िला़फ थे, फिर भी उन्होंने इस मामले पर सहमति दिखाते हुए इसे सुलझाया. अब ऐसी कौन सी आफत आ गई है? लोकपाल बिल को लेकर कुछ नया, कुछ अद्भुत कर सकने की काफी गुंजाइश है. यह कोई रामबाण नहीं है और भी बहुत सारे बिल पास करने होंगे, लेकिन यह एक प्रतीकात्मक शुरुआत है. युवाओं की एक पूरी पीढ़ी (टि्वटर जेनरेशन) एक साथ आगे आकर लोकपाल के लिए धरना-प्रदर्शन कर रही है. उसकी आशाओं को दबाने या कुचलने की कोशिश नहीं होनी चाहिए, बल्कि कांग्रेस को आगे बढ़कर इस बदलाव के दौर में ख़ुद को बदलने की कोशिश करनी चाहिए. साथ ही यह सोचना चाहिए कि इस बदलाव से कैसे फायदा उठाया जाए. सब जानते हैं कि मैं धार्मिक नहीं हूं. मैं किसी विवादित मुद्दे पर बार-बार लोगों को यह याद करने की नसीहत नहीं देना चाहता कि ईसा मसीह ने क्या कहा था. उन्होंने कहा था कि तुम सब में से जिसने कभी कोई पाप नहीं किया हो, वही पहला पत्थर फेंक सकता है. ज़ाहिर है, किसी ने उनकी बात नहीं सुनी और उन्हें सूली पर चढ़ा दिया गया.
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