दस साल पहले हुआ था ओसामा का सौदा

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ओसामा के मारे जाने के बाद अटकलों का बाज़ार काफी गर्म हो गया है. लगभग रोज़ ही कोई न कोई नई कहानी पता चलती है. इसी क्रम में हाल में जनता को बताया गया कि ओसामा का सौदा आज से दस साल पहले ही तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बुश और तत्कालीन पाकिस्तानी राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्ऱफ के बीच हो चुका था. इस सौदे में अमेरिका ने यह साफ़-साफ़ कह दिया था कि जब भी ओसामा का पता चलेगा, भले ही वह पाकिस्तान में ही क्यों न हो, तो भी उसे यह अधिकार होगा कि वह पाकिस्तानी धरती पर बिना वहां के सैन्य संगठनों को शामिल किए अपने आप ही ओसामा को मार गिराएगा. अब यह मान लेना कि स़िर्फ इतनी ही बात हुई थी, बहुत सारे सवालों को जन्म देता है. आख़िर इस सौदे में पाकिस्तान को क्या मिला? अमेरिका ने यह तो कह दिया कि वह ओसामा को पाकिस्तानी धरती पर भी अकेले ही मारेगा, लेकिन यह नहीं बताया कि बदले में पाकिस्तान को किस तरह की मदद मिलेगी. यह प्रश्न इसलिए भी और ज़रूरी हो जाता है, क्योंकि यह बात सर्वमान्य है कि पाकिस्तान को मिलने वाली ज़्यादातर मदद को वह भारत विरोधी कामों में ही लगाता है. वैसे ओसामा की मौत से पाकिस्तान पर लगे सवालिया निशानों के मद्देनज़र अगर यह बात देखी जाए तो भी कई ऐसे प्रश्न खड़े हो जाते हैं, जो पाकिस्तान और अमेरिकी साठगांठ के काले सच के  बारे में सोचने पर मजबूर कर देते हैं. इस कारण इस बात पर विश्वास करने में कठिनाई होती है.

जिस तरह ओसामा को मारा गया, उसे ओबामा की शक्ति और संकल्प का उदाहरण बताया जाने लगा. ओबामा को ऐसे दृढ़ निश्चयी नेता के रूप में पेश किया गया, जो निडर ही नहीं, बल्कि देश की अस्मिता को बचाने के लिए दुस्साहस की भी सीमा तक जा सकने में सक्षम हैं और वह असामान्य फैसले लेने से भी पीछे नहीं हटते.

इस संदर्भ में सबसे बड़ी बात यह है कि अगर इस बात को अक्षरशः मान लिया जाए तो बराक ओबामा की छवि को गहरा धक्का लगता है. जिस तरह ओसामा को मारा गया, उसे ओबामा की शक्ति और संकल्प का उदाहरण बताया जाने लगा. ओबामा को ऐसे दृढ़ निश्चयी नेता के रूप में पेश किया गया, जो निडर ही नहीं, बल्कि देश की अस्मिता को बचाने के लिए दुस्साहस की भी सीमा तक जा सकने में सक्षम हैं और वह असामान्य फैसले लेने से भी पीछे नहीं हटते. इसके पीछे की सोच यह थी कि जनता को बताया जाए कि पाकिस्तान के भीतर घुसकर, मतलब कि एक स्वतंत्र देश की प्रभुसत्ता का उल्लंघन करके भी ओसामा को मार गिराने का बड़ा फैसला लेने से भी ओबामा पीछे नहीं हटे. जबकि दूसरी ओर अगर ओसामा वहां नहीं मिलता तो ओबामा की किरकिरी की कोई सीमा नहीं रहती. इस ख़तरे को उठाते हुए ओबामा ने यह ऐतिहासिक फैसला लिया. अगर ओसामा अमेरिका के हमले में न मिलता या भाग जाता तो ओबामा को आगामी चुनाव में हार से कोई नहीं बचा सकता था, क्योंकि वैसे भी पिछले कुछ सालों में ओबामा की छवि बहुत धूमिल हो गई थी और इसी कारण जनता के बीच उनकी लोकप्रियता बहुत घट गई थी. बावजूद इसके ओबामा ने ऐसा ख़तरनाक, लेकिन निर्णायक फैसला लिया. ओबामा की लोकप्रियता इस कारण भी बहुत बढ़ गई, क्योंकि पिछले दिनों अ़फग़ानिस्तान में अमेरिकियों पर हुए हमलों की जानकारी भी सीआईए को नहीं मिल पाई थी. सीआईए पिछले दस सालों से ओसामा का पता-ठिकाना खोजने में विफल रही थी. अब ऐसी चिंताजनक स्थिति में भी ओबामा ने यह फैसला लेने का क़दम उठाया तो यह बड़ी बात थी. ऐसा भी हो सकता था कि इस बार भी सीआईए की सूचना ग़लत होती और फिर वही होता, जो ऊपर कहा गया है. तो जब ओबामा की छवि इस बात से धूमिल होती है कि यह फैसला उनका न होकर बुश की दूरदर्शिता का परिणाम है तो फिर ऐसा कहा ही क्यों गया? इसके पीछे बहुत बड़े अंतरराष्ट्रीय कारण हैं और अमेरिका की दूरदृष्टि भी है. अमेरिका अपने भविष्य के लक्ष्यों पर ध्यान देते हुए ही कोई काम करता है. तो फिर प्रश्न यह है कि इस कथन का अमेरिका के दूरगामी लक्ष्यों से क्या लेना-देना है?

यह बयान असल में पाकिस्तान की वर्तमान सरकार और सैन्य तंत्र को ओसामा के पाकिस्तान में मिलने की घटना से बचाने के लिए दिया गया हो सकता है. इसका मतलब यह है कि अमेरिका पाकिस्तान में अपने पिट्ठूओं को बचाने की कोशिश कर रहा है, क्योंकि अमेरिका को अ़फग़ानिस्तान में चल रहे अपने युद्ध में इन लोगों की ज़रूरत है. लेकिन क्यों? वजह यह है कि ऐसा करने से पाकिस्तान के जेहादी वहां के वर्तमान तंत्र को ओसामा की मौत की ज़िम्मेदारी से मुक्त कर देंगे और पाकिस्तान अपनी ही धरती पर अपने ही बनाए दानव का कोपभाजन बनने से बच जाएगा. इसका दूसरा फायदा यह है कि ऐसा बयान जारी करने से मुशर्ऱफ पर ओसामा के ख़ून का इल्ज़ाम डाला जा सकता है, ताकि उनके पाकिस्तान वापस आने के सारे रास्ते बंद हो जाएं, जो कि इसलिए ज़रूरी बन गया है, क्योंकि वह पाकिस्तान वापस ही नहीं लौटना चाहते, बल्कि आगामी चुनाव भी लड़ना चाहते हैं. अब उनके  चुनाव लड़ने से पाकिस्तान की वर्तमान व्यवस्था में भूचाल आ सकता है, क्योंकि मुशर्ऱफ बहुत से ऐसे राज़ जानते हैं, जो अगर खुल जाएं तो पाकिस्तान के शासकों को दिक्कत हो सकती है. वैसे तो पाकिस्तान के राजनेताओं एवं सैन्य प्रमुखों में हमेशा ही लड़ाई चलती रहती है, लेकिन इस बात पर शायद दोनों ही एकमत हैं. ऐसा इसलिए भी है, क्योंकि पाकिस्तान का प्रजातंत्र वर्तमान में हाशिए पर ही है. ऐसा इसलिए है, क्योंकि पाकिस्तानी सेना हमेशा लोकतंत्र पर हावी रही है और हमेशा ही प्रजातंत्र ने सेना के सामने घुटने टेके हैं. मुशर्ऱफ ख़ुद भी सेना प्रमुख थे और फिर तानाशाह बन बैठे. उनके पहले भी पाकिस्तान में आज तक के इतिहास में अधिकतर समय सेना का ही शासन रहा है. दूसरी वजह, हाल में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऐसा देखा गया है कि अमेरिका और यहां तक की भारत ने भी पाकिस्तान के साथ अपने संबंधों के संदर्भ में पाकिस्तानी नेताओं और सेना को अलग-अलग संपर्क साधना शुरू कर दिया है. ऐसा इसलिए, क्योंकि पाकिस्तान में सेना हावी है.

अगर पाकिस्तान जेहादियों की बंदूक़ के निशाने पर आ जाता है तो अमेरिका को अपनी अ़फग़ान योजना में बहुत सी कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है. इसलिए एक अस्थिर पाकिस्तान अमेरिका के लिए उपयुक्त नहीं है. वैसे भी यह बयान और पाकिस्तान के लिए उसके निहितार्थ एवं आशय एक बात की ओर साफ़-साफ़ इशारा करते हैं कि ओसामा को पाकिस्तान के सैन्य शासकों ने अमेरिकी हाथों बेच दिया, ताकि पाकिस्तान को अ़फग़ानिस्तान में अधिक से अधिक फायदेमंद भूमिका मिले, क्योंकि अमेरिका ने अपनी सेनाओं को अ़फग़ानिस्तान से हटाने का फैसला कर लिया है. इस परिदृश्य में पाकिस्तान के लिए अ़फग़ानिस्तान पर अपनी पकड़ मज़बूत करना ज़रूरी हो जाता है, क्योंकि तभी वह भारत को अस्थिर रख सकता है, अपनी प्रासंगिकता बरक़रार रख सकता है और अफग़ानिस्तान के तालिबान को पोषित कर सकता है. साथ ही वह पुराने दिनों की तरह अ़फग़ानिस्तान में बड़े पैमाने पर अफीम की खेती कर सकता है और उस पैसे से अपना आतंकी नेटवर्क चला सकता है. वैसे पाकिस्तान ने ओसामा के अपने यहां पाए जाने की बात पर उमड़े जनाक्रोश को मोड़ने के प्रयास में बहुत सी दलीलें दी हैं. सबसे बड़ी तो यह कि अमेरिका ने उसकी संप्रभुता और आधिपत्य को भंग किया है. लेकिन यथार्थवाद यह कहता है कि वैसे भी तो पाकिस्तान कोई अपनी आर्थिक वजह से ज़िंदा है नहीं. पाकिस्तान बस अपनी भौगोलिक स्थिति के सामरिक और कूटनीतिक महत्व की वजह से अलग-अलग देशों से पैसा खा रहा है और इसी कारण जिंदा है. यदि अंतरराष्ट्रीय जनमत यह मान भी ले कि पाकिस्तान ने ही ओसामा को बचा रखा था तो उस स्थिति में भी पाकिस्तान को कौन सा नुक़सान होने वाला है. पूरा विश्व तो पहले से ही जानता है कि पाकिस्तानी धरती ही आतंकवाद की सबसे बड़ी जननी है, जहां से अलग-अलग आतंकी संगठन अपनी गतिविधियां चलाते हैं. ऐसे में ओसामा के वहां मिलने से पाकिस्तान पर कौन सी आफत आ सकती है? पाकिस्तान अभी भी अमेरिका और चीन के लिए प्रासंगिक है और उसे वहां से पैसा मिलता रहेगा. यह कोई पहली बार तो है नहीं कि अमेरिका को पाकिस्तान की दोमुंही राजनीति का पता चला है.

भारत में भी बहुत से लोग इसे पाकिस्तान के मुंह पर कालिख पुतने जैसी घटना मानते हैं, लेकिन यह तभी भारत के लिए लाभदायी है, जब वह इसे अमेरिका एवं बाक़ी विश्व के सामने भुना पाए और ओसामा का घर होने के नाते पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय समाज में अलग-थलग कर पाए तथा पाकिस्तान पर दबाव बनाकर ज़ाकिर रहमान लखवी सरीखे आतंकियों को सज़ा दिलवाए. लेकिन ऐसा करने के लिए एक सोची-समझी, दूरदर्शी और साथ ही एक आक्रामक विदेश नीति होनी आवश्यक है, जो भारत के पास नहीं है. भारत के नेताओं के पास ऐसा दृढ़ निश्चय भी नहीं है. जबसे ओसामा प्रकरण हुआ है, हम सिर्फ अमेरिका के सामने गिड़गिड़ा रहे हैं कि वह पाकिस्तान के होश ठिकाने लगाए. हम यह क्यों नहीं समझते या समझना नहीं चाहते कि पाकिस्तान अमेरिका के लिए भी ज़रूरी है. अ़फग़ान मसला तो पहले ही बताया जा चुका है, लेकिन पाकिस्तान अमेरिका के लिए प्रासंगिक इसलिए भी है, ताकि वह भारत को परेशान कर सके, जिससे भारत को अमेरिका के साथ अपनी दोस्ती क़ायम रखनी पड़े. अमेरिका को इस दोस्ती से भारत की बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था के दोहन का मौक़ा मिलता है. चीन भी पाकिस्तान को चाहता है, ताकि भारत अस्थिर रहे और विकास की सीढ़ियों को उससे तेज़ न चढ़ पाए, जिससे चीन की एशिया में प्रभुसत्ता कायम रहे. समय की मांग यह है कि भारत अपनी शक्ति को समझे और पाकिस्तान में अमेरिका जैसी कार्रवाई करने की बयानबाज़ी में न फंसकर अमेरिका और विश्व समुदाय को इस बात के लिए मजबूर करे कि पाकिस्तान को दी जाने वाली मदद ख़त्म हो, क्योंकि पाकिस्तान अलक़ायदा और तालिबान का पितामह है.

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