दिल्ली का बाबूः चतुराई भरी चाल

वित्त मंत्रालय में विशेष सचिव जी सी चतुर्वेदी का नाम सरकार ने नए पेट्रोलियम सचिव के रूप में प्रस्तावित क्या किया, इस पर कई लोगों की भौंहे तन गईं. पीएमओ में कुछ रुकावट के बाद अंतत: चतुर्वेदी की फाइल पर हस्ताक्षर तो हो गए, लेकिन इस बीच दिल्ली में सरगर्मियां तेज रहीं. जबसे कैबिनेट में फेरबदल हुआ था और मुरली देवड़ा की जगह जयपाल रेड्डी को लाया गया था, तभी से यह अफवाह जोरों पर थी कि पेट्रोलियम मंत्रालय के सचिव एस सुदर्शन को भी बाहर का रास्ता दिखा दिया जाएगा. आखिरकार, ऐसा ही हुआ और सुदर्शन को अब भारी उद्योग मंत्रालय में भेज दिया गया है. चतुर्वेदी को अपनी नई जिम्मेदारी के तौर पर कुछ कठिन चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा. मसलन, विश्व स्तर पर क्रूड ऑयल की बढ़ती कीमत और उस वजह से आम आदमी पर पड़ने वाला असर, कारपोरेट मर्जर और गैस उत्पादन में आ रही कमी. उन्हें ओएनजीसी के लिए एक पूर्णकालिक चेयरमैन भी तलाशना है.

पीएसी के निशाने पर बाबू

पीएसी चीफ के रूप में फिर से नियुक्त मुरली मनोहर जोशी ने 2-जी घोटाले पर दी गई अपनी रिपोर्ट में यूपीए के बड़े-बड़े नामों को शामिल करके राजनीतिक तूफान खड़ा कर दिया था, लेकिन ऐसा लगता है कि इस रिपोर्ट में बाबुओं के रोल पर जो कुछ लिखा गया है, उसे बेहतर समर्थन मिल सकता है. जोशी की अगुवाई वाले पैनल ने बाबुओं को लेकर जो सिफारिशें की हैं, उनमें यह सिफारिश भी शामिल है कि रिटायरमेंट के बाद कम से कम तीन साल के भीतर किसी भी वरिष्ठ बाबू को किसी ट्रिब्यूनल या निजी क्षेत्र की कंपनी ज्वाइन करने से रोका जाना चाहिए. जाहिर है, यह पैनल इन सिफारिशों के जरिए कुछ ऐसे वरिष्ठ बाबुओं की ओर इशारा कर रहा है, जिनके बयानों से ऐसा लग रहा था कि वे दूरसंचार नीति के समर्थन में हैं और जिसकी वजह से 2-जी जैसे घोटाले ने जन्म लिया. क्या उक्त सिफारिश बाबुओं को मान्य होगी? ज़ाहिर है, यह इस बात पर भी निर्भर करेगा कि पीएसी की रिपोर्ट पर राजनीतिक हवा का रु़ख कैसा होगा?

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