अन्ना हजारे दूसरे गांधी के रूप में उभर रहे हैं. हर अख़बार उनके स्तुतिगान से लबरेज है. लोकपाल बिल का मसौदा तैयार करने वाली समिति में सिविल सोसायटी के प्रतिनिधियों को शामिल करने की अन्ना की मांग यूपीए सरकार ने मंजूर कर ली. यूपीए सरकार के इतने घोटाले उजागर हो चुके हैं कि उसके सामने यह मांग मंजूर करने के अलावा कोई चारा नहीं था. अन्ना के आमरण अनशन को सभ्य समाज का भारी समर्थन मिला. टूजी और कॉमनवेल्थ खेल घोटालों के आरोपों से घिरी सरकार पहले से दबाव में थी, इसलिए वह आसानी से झुक गई. अगर ऐसा न होता तो अन्ना को इतनी आसानी से जीत हासिल न होती. अन्ना इस समय देश की आंखों का तारा हैं. वह सामाजिक कार्यकर्ताओं और सभ्य समाज के आदर्श बन गए हैं. इन्हें अन्ना पर गर्व है. भ्रष्टाचार के विरुद्ध इस लड़ाई को दूसरा स्वाधीनता संग्राम बताया जा रहा है. ये प्रतिक्रियाएं त्वरित एवं भावनात्मक हैं. भ्रष्टाचार जैसे गंभीर मुद्दे का हल भावनाओं में बहकर नहीं निकाला जा सकता. क्या यह सचमुच इतनी महान नैतिक विजय है, जितना बताया जा रहा है? क्या इस आंदोलन के दूरगामी प्रभावों पर विचार किया जाना ज़रूरी नहीं है? अन्ना और उनके आंदोलन को गांधीवादी बताया जा रहा है, इसलिए सबसे पहले हमें यह समझना होगा कि गांधीवादी मूल्य क्या हैं और गांधीवादी आंदोलन कैसा होना चाहिए. गांधीवादी संघर्ष के तीन मुख्य तत्व हैं, जिन पर कोई समझौता नहीं हो सकता है- सत्य, अहिंसा और अत्यंत सादा जीवन. इन तीनों में से एक तत्व अन्ना के आंदोलन में निश्चित रूप से मौजूद था, वह है अहिंसा. बाक़ी दोनों तत्व मौजूद थे या नहीं, यह बहस का विषय हो सकता है. कोई भी आंदोलन लंबे समय तक अहिंसक तभी रह सकता है, जब वह सत्य और केवल सत्य पर आधारित हो. सादा जीवन जीने वाले नेता ही सत्य पर आधारित और अहिंसक आंदोलन चला सकते हैं. यही कारण है कि यह देश दूसरा गांधी पैदा नहीं कर सका.
जो अध्यापक सभी बच्चों को एक साथ बैठाने की जुर्रत करता है, उसका तबादला कर दिया जाता है. अन्ना शायद इन कटु सच्चाइयों से वाक़ि़फ नहीं हैं. अन्ना की भ्रष्टाचार विरोधी लड़ाई स्वागत योग्य है. वह निश्चय ही प्रशंसा के पात्र हैं. यदि वह इस लड़ाई को जारी रखना चाहते हैं तो उन्हें अपने साथियों-सहयोगियों की छंटनी करनी होगी
अन्ना के आंदोलन को किन तबकों का समर्थन मिला? पहला तबका था मध्यम वर्ग, जिसका सादगी से कोई लेना-देना नहीं है. बड़े उद्योगपतियों की तरह मध्यम वर्ग अपना काम निकालने के लिए रिश्वत देने में कोई संकोच नहीं करता. मध्यम वर्ग के यात्री टीसी की मुट्ठी गरम कर ट्रेन में बर्थ पाने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं. अवैध निर्माण को नज़रअंदाज़ करने के बदले सरकारी कर्मचारियों को रिश्वत देने में उन्हें कोई संकोच नहीं होता. इस वर्ग के लोग अपने लड़के-लड़कियों को अच्छे स्कूलों-कॉलेजों में भर्ती कराने के लिए मोटी कैपिटेशन फीस चुकाते हैं. सरकारी कार्यालयों, पुलिस थानों और अदालतों में जो लोग रिश्वत देते-लेते हैं, क्या वे आसमान से उतरे हैं? यही मध्यम वर्ग इस समय अन्ना के आंदोलन का जोर-शोर से समर्थन कर रहा है. इस वर्ग को भ्रष्टाचार के ख़िला़फ आवाज़ उठाने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है. जिस दूसरे तबके का समर्थन अन्ना को मिला, वह था राजनीतिज्ञों का एक हिस्सा. यद्यपि रणनीतिक कारणों से यह वर्ग खुलकर सामने नहीं आया. इसका उद्देश्य था यूपीए सरकार को कमज़ोर करना. इसके इरादे पवित्र नहीं थे. जो तीसरा वर्ग अन्ना के साथ जुड़ा, वह उनका था जो सिद्धांत और व्यवहार दोनों में भ्रष्टाचार से संघर्ष करना चाहते थे. यह वर्ग गांधीवादी मूल्यों और विचारधारा के सबसे नज़दीक था. अन्ना समर्थकों में इसके सदस्यों की संख्या सबसे कम थी. अन्ना और गांधी में अंतर को समझना ज़रूरी है. अन्ना गांधी तो कतई नहीं हैं. उन्हें गांधीवादी कहा जा सकता है. उन्हें यह श्रेय दिया जा सकता है कि उन्होंने आंदोलन का गांधीवादी रास्ता चुना. गांधी जी का चिंतन मौलिक था, उनकी समझ बहुत गहरी थी, उनके इरादे एवं लक्ष्य पवित्र थे और वह अपनी अंतरात्मा की आवाज़ सुनते थे. अंतरात्मा की आवाज़ वही सुन सकते हैं, जिनका दिलोदिमाग कलुषता से सर्वथा मुक्त हों. अन्ना की न तो मुद्दों पर पकड़ है और न वह गांधी जैसी मेधा-विद्वता के धनी हैं.
अन्ना ने कभी सांप्रदायिक हिंसा की भर्त्सना नहीं की. गुजरात कत्लेआम के दौरान वह चुप्पी साधे रहे. गुजरात कत्लेआम भारत के इतिहास का एक काला अध्याय है. अगर गांधी जीवित होते तो वह बिना एक क्षण की भी देरी के आमरण अनशन शुरू कर देते. वह इसकी कतई परवाह नहीं करते कि उन्हें सभ्य समाज का समर्थन प्राप्त है या नहीं. गांधी के लिए अहिंसा जीवन दर्शन थी, रणनीति नहीं. अन्ना ने तो नरेंद्र मोदी के विकास मॉडल की तारी़फ कर डाली. क्या हम विकास के नाम पर किसी समाज में व्याप्त हिंसा और अन्याय को नज़रअंदाज़ कर सकते हैं? क्या ऐसा विकास प्रशंसनीय हो सकता है, जिससे समाज के वंचित समूहों को कोई लाभ न पहुंचे? गांधी जी की दृष्टि में सच्चा विकास वही है, जिससे समाज की अंतिम पंक्ति में खड़ा आख़िरी आदमी भी लाभांवित हो. मोदी का विकास मॉडल केवल उच्च और उच्च-मध्यम वर्ग को धनी बना रहा है. अन्ना से जब गुजरात कत्लेआम के बारे में पूछा गया तो पहले वह चुप्पी साधे रहे, फिर बाद में केवल इतना बोले कि वह सांप्रदायिक सद्भाव के पक्षधर हैं. अन्ना ने यह काफी बेमन से कहा और वह भी सहयोगियों के दबाव में. अन्ना के आंदोलन के लिए सभ्य समाज का समर्थन जुटाने में आरएसएस ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. भाजपा और बाबा रामदेव जैसे दक्षिणपंथी धार्मिक नेताओं ने भी भीड़ जुटाओ अभियान में भागीदारी की. अब बाबा रामदेव दु:खी हैं कि उन्हें लोकपाल बिल की मसौदा समिति में शामिल नहीं किया गया. दक्षिणपंथी राजनीतिक-धार्मिक ताक़तों का गठजोड़ देश के धर्मनिरपेक्ष चरित्र के लिए ख़तरा बन सकता है. जय प्रकाश नारायण के आंदोलन का यही नतीजा हुआ था. नरेंद्र मोदी इसी आंदोलन से उभरे थे. यहां यह कह देना प्रासंगिक होगा कि जय प्रकाश नारायण अन्ना से कहीं बेहतर और प्रतिबद्ध नेता थे. जय प्रकाश नारायण और वी पी सिंह द्वारा किए गए आंदोलन असफल रहे. यदि सफल हो गए होते तो आज हमारे देश में भ्रष्टाचार का बोलबाला न होता. इन दोनों की तुलना में अन्ना कहीं नहीं ठहरते. इसलिए अन्ना की विजय को दूसरे स्वाधीनता संग्राम की सफलता घोषित करना अर्थहीन है. अन्ना के आंदोलन के असर को बढ़ा-चढ़ाकर बताने के पीछे मीडिया के अपने लक्ष्य हैं. अन्ना एंड कंपनी मोदी के विकास मॉडल की समर्थक है और यह मॉडल बड़े औद्योगिक घरानों के हित में है. मीडिया का एक बड़ा हिस्सा इन घरानों के नियंत्रण में है, इसीलिए वह अन्ना को गांधी बनाने पर तुला हुआ है. गुजरात के जाने-माने गांधीवादी चिंतक चुन्नी भाई वैद्य ने मोदी द्वारा किए गए ग्रामीण विकास की तारी़फ करने के लिए अन्ना को सार्वजनिक रूप से लताड़ा कि कहां है वह ग्रामीण विकास, जिसकी अन्ना बात कर रहे हैं. अगर गांवों में सचमुच विकास हो रहा होता तो पिछले 10 वर्षों में 10 प्रतिशत ग्रामीण आबादी शहरों में पलायन न कर गई होती. वैद्य की यह टिप्पणी 2011 की जनगणना के आंकड़ों पर आधारित है. वह पूछते हैं कि ग्रामीण विकास के मामले में मोदी से सीखने के लिए क्या है? मल्लिका साराभाई ने भी अन्ना की निंदा की है. उनका कहना है कि मोदी के राज में गांवों में ज़रा भी विकास नहीं हुआ, उल्टे गांवों की चरनोई और सिंचित कृषि भूमि मोदी सरकार ने चोरी-छुपे उद्योगपतियों को दे दी और वह भी मिट्टी के मोल. साराभाई के अनुसार, मोदी शासन में ग्रामीणों ने बहुत तकलीफें झेली हैं. साराभाई की मानें तो मोदी के कार्यकाल में भ्रष्टाचार के सारे रिकार्ड ध्वस्त हो गए. 1700 करोड़ रुपये का सुजलाम-सुफलाम जल संरक्षण घोटाला, 600 करोड़ रुपये का मत्स्य पालन घोटाला और 100 करोड़ रुपये का बोरीबंद चेक डेम घोटाला मोदी राज की देन हैं. उद्योगपतियों को उपकृत करने की नीति के कारण राज्य क़र्ज़ के बोझ तले दब गया है.
महात्मा गांधी ग्रामीण विकास पर बहुत जोर देते थे. वहीं दूसरे गांधी यानी अन्ना उस मुख्यमंत्री की तारी़फ कर रहे हैं, जिसने उद्योगपतियों को फायदा पहुंचाया. गांधी जी ने जीवन भर छुआछूत और जाति-पांत के विरुद्ध संघर्ष किया और अन्ना उस राज्य की प्रशंसा कर रहे हैं, जहां सरकारी स्कूलों में दलित और सवर्ण बच्चों को मध्यान्ह भोजन के लिए अलग-अलग बैठाया जाता है. जो अध्यापक सभी बच्चों को एक साथ बैठाने की जुर्रत करता है, उसका तबादला कर दिया जाता है. अन्ना शायद इन कटु सच्चाइयों से वाक़ि़फ नहीं हैं. अन्ना की भ्रष्टाचार विरोधी लड़ाई स्वागत योग्य है. वह निश्चय ही प्रशंसा के पात्र हैं. यदि वह इस लड़ाई को जारी रखना चाहते हैं तो उन्हें अपने साथियों-सहयोगियों की छंटनी करनी होगी. भ्रष्टाचार में गले तक डूबे सैनिकों की सेना, चाहे उसका कमांडर कितना ही ईमानदार क्यों न हो, कभी भ्रष्टाचार के दानव को परास्त नहीं कर सकती. गांधी जी कहा करते थे, साधन की पवित्रता उतनी ही महत्वपूर्ण है, जितनी साध्य की.
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