निशाने पर खिलाडी़

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यह बिल्कुल वैसा है कि मंदिरों के नाम पर देश भर में दंगे होते हैं और भगवान को सच्चे मन से मानने वाला कोई नहीं मिलता. सब उनका नाम अपने-अपने स्वार्थ सिद्ध करने के लिए इस्तेमाल करते हैं. तीज-त्योहारों पर उनके नाम का हल्ला शुरू कर देते हैं. ऐसा ही कुछ हमारे देश में खेल प्रतिभाओं के साथ हो रहा है. हमारे देश में खेल को किसी धर्म से कम नहीं आंका जा सकता है. खिलाड़ियों की लोकप्रियता ऐसी है कि लोगों का जुनून देखते ही बनता है. सचिन जैसे खिलाड़ी को क्रिकेट के भगवान तक का दर्जा हासिल है और उनके नाम से महाराष्ट्र में बाकायदा मंदिर का निर्माण तक कराया गया है, लेकिन वास्तविकता के धरातल पर खिलाड़ियों की सुरक्षा को लेकर हमेशा संदेह बना रहता है.जहां एक तऱफ खेल और खिलाड़ियों का क़द इतना बढ़ा है, वहीं दूसरी ओर एक कड़वी सच्चाई यह भी है कि इन्हीं खिलाड़ियों के साथ ऐसा सुलूक किया जाता है कि विश्वास ही नहीं होता है कि इसी देश में खेल और खिलाड़ियों के पीछे लोग पागलपन की हद तक जान लुटाते हैं.

हाल में राष्ट्रीय स्तर की फुटबाल एवं वॉलीबाल खिलाड़ी अरुणिमा सिन्हा उर्फ सोनू के साथ जो दुर्घटना हुई, वह इस बात की तस्दीक करती है कि हम इनके साथ किस तरह से पेश आते हैं. स़िर्फ अरुणिमा ही नहीं है, जिसके साथ इस तरह का हादसा हुआ है. याद कीजिए मेरठ की वह घटना, जिसमें अंडर-19 के युवा क्रिकेटर गगनदीप सिंह की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी.

अभी हाल में राष्ट्रीय स्तर की फुटबाल एवं वॉलीबाल खिलाड़ी अरुणिमा सिन्हा उर्फ सोनू के साथ जो दुर्घटना हुई, वह इस बात की तस्दीक करती है कि हम इनके साथ किस तरह से पेश आते हैं. स़िर्फ अरुणिमा ही नहीं है, जिसके साथ इस तरह का हादसा हुआ है. याद कीजिए मेरठ की वह घटना, जिसमें अंडर-19 के युवा क्रिकेटर गगनदीप सिंह की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी. ग़ौरतलब है कि गगनदीप मेरठ में सी के नायडू टूर्नामेंट के लिए गया था. उसी दौरान जब वह अपने दो साथियों के साथ होटल में था, तभी एक अज्ञात बंदूक़धारी ने मैनेजर से किसी बात पर हुए विवाद को लेकर गोली चला दी. इसमें एक गोली गगनदीप को भी लगी, जिससे उसकी मौत हो गई. इसके बाद बहुत सी ख़बरें आईं, जिनमें बताया गया कि अपराधी पकड़ लिया गया है, लेकिन कोई ठोस परिणाम सामने नहीं आया. ऐसा ही वाकया अरुणिमा के साथ भी हुआ. कुछ बदमाशों ने उनके गले में पड़ी सोने की जंजीर खींचने की कोशिश की, लेकिन अरुणिमा ने उनका विरोध किया. इस पर बदमाशों ने उन्हें चलती टे्रेन से धक्का दे दिया. पटरी पर गिरी अरुणिमा का पैर एक दूसरी ट्रेेन के नीचे आकर कट गया. ताज्जुब की बात यह है कि उन्हें देखने के लिए रेल मंत्री ममता बनर्जी के पास थोड़ा सा भी व़क्त नहीं था. कुछ लोग यह भी कह रहे हैं कि यह दुर्घटना उत्तर प्रदेश में हुई है, पश्चिम बंगाल में नहीं. अगर वहां किसी राष्ट्रीय स्तर की खिलाड़ी के साथ ऐसा होता तो दीदी की ममता देखते ही बनती. हालांकि बाद में रेल मंत्रालय हरकत में आया. अरुणिमा सिन्हा उर्फ सोनू फुटबाल और वॉलीबाल की खिलाड़ी हैं, लेकिन एक पैर गंवाने के बाद उनका खेल में करियर समाप्त हो चुका है, इस कड़वे सच से सभी वाक़ि़फ हैं. रेल मंत्रालय ने उन्हें नौकरी देने की घोषणा की है. इसके अतिरिक्त केंद्रीय खेल मंत्री, उत्तर प्रदेश सरकार, राजनेताओं और युवराज सिंह एवं हरभजन सिंह जैसे क्रिकेट खिलाड़ियों ने अरुणिमा को वित्तीय सहायता की घोषणा की है. रेलवे में मिली नौकरी से अरुणिमा का भविष्य सुरक्षित है और अब वह अपने सपनों को सुरक्षित करना चाहती हैं. इसलिए उनका विचार खेल अकादमी खोलने का है. यह अकादमी वह वित्तीय सहायता स्वरूप प्राप्त धनराशि से खोलना चाहती हैं. यहां एक और बात ग़ौर करने वाली है कि एक राष्ट्रीय स्तर की खिलाड़ी ट्रेन की जनरल बोगी में सफर कर रही थी. वर्ल्डकप जीतने पर अरबों रुपये के ईनाम देने वाली विभिन्न संस्थाओं, खेल अकादमियों, राज्य सरकारों और राजनेताओं के खेल प्रेम की असलियत भी यहां ज़ाहिर हो जाती है कि राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ियों को इस तरह जनरल बोगी में सफर करना पड़ता है. क्या क्रिकेट के अलावा अन्य खेलों के खिलाड़ी इस देश में कभी सम्मान से रह पाएंगे? अरुणिमा सिन्हा भी रेल और खेल मंत्रालय की तऱफ से दी गई कुल 30 हज़ार रुपये की शर्मनाक सहायता राशि पर बिफर पड़ीं. उन्होंने कहा कि उनका मज़ाक बनाया गया है, यह सहायता राशि उनके लिए भीख के समान है. अरुणिमा के मामले में दो पहलुओं को विश्लेषित करने की आवश्यकता है. पहला यह कि रेलवे की सुरक्षा व्यवस्था. अकेले यात्रा करती महिलाओं के भय, सहयात्रियों की उदासीनता और बदमाशों के बेख़ौ़फ रवैये ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं. दूसरा पहलू राष्ट्रीय स्तर की महिला खिलाड़ी के साथ हुए बर्ताव का है. रेलवे की सुरक्षा व्यवस्था उसके सारे दावों को मुंह चिढ़ाती नज़र आती है. हर बार रेल बजट पेश करते समय सुरक्षा का विशेष ज़िक्र किया जाता है, लेकिन साल दर साल हालात बिगड़ते जा रहे हैं. यात्रा के दौरान लूटपाट, ज़हरखुरानी और महिलाओं से छेड़छाड़ आम बात हो गई है. स्टेशनों पर और रेल के भीतर सुरक्षा के कोई इंतज़ाम नहीं हैं. आप अपने सामान की सुरक्षा स्वयं करें और अपनी भी. रेलवे पुलिस की कहीं कोई ज़िम्मेदारी नहीं बनती. जिस तरह बदमाशों ने अरुणिमा के साथ व्यवहार किया, उससे लगता है कि उनके मन में ऐसा कोई डर नहीं था कि पुलिस आ सकती है या सहयात्री किसी तरह का विरोध कर सकते हैं. अकेली लड़की बदमाशों से जूझ रही थी और लोग गूंगे-बहरे बने तमाशा देख रहे थे, यह हिंदुस्तान की हक़ीक़त है. खिलाड़ियों के साथ दुर्व्यवहार स़िर्फ देश में ही नहीं, बल्कि इससे बाहर भी होता है. आपको वह घटना याद होगी, जब भारतीय एथलीटों ने हमलावरों को ही पीट डाला था. यह वाकया आस्ट्रेलिया का था. ग़ौरतलब है कि आस्ट्रेलिया में नस्लीय हिंसा के दौरान युवकों के एक गुट ने मेलबर्न के एक स्टेडियम से बाहर आ रहे भारतीय एथलीटों पर हमला करके उनकी कार क्षतिग्रस्त कर दी थी. पुलिस ने घटना की पुष्टि करते हुए कहा था कि कार में सवार एथलीटों की मदद के लिए उनके सहयोगी आगे आए तो हमलावर भागने लगे. इनमें से दो को पकड़ कर उनकी पिटाई की गई. पुलिस के अनुसार, वे लोग भारतीय एथलीटों को अपशब्द कह रहे थे. ऐसी ही एक घटना ब्रिसबेन टाइम्स ने भारतीय एथलीट टिम सिंह के हवाले से बताई थी कि वह अपने साथियों के साथ मेलबर्न के अंतरराष्ट्रीय एथलेटिक्स स्टेडियम से कबड्डी खेलकर लौट रहे थे, तभी कुछ लोगों ने उनकी कार पर हमला करके शीशे तोड़ दिए और उनके ख़िला़फ टिप्पणी की. इसके बाद दोनों पक्षों में मारपीट शुरू हो गई. भारतीय शूटरों के साथ भी अपमानजनक व्यवहार हुआ था. बाद में भारत की ओर से ज़बरदस्त आपत्ति दर्ज कराने के बाद आईएसएसएफ वर्ल्डकप शूटिंग टूर्नामेंट की आयोजन समिति ने उन सभी भारतीय शूटरों से माफी मांग ली थी, जिनसे ट्रांसपोर्ट विभाग के अधिकारियों ने बदसलूकी की थी. आपको बता दें, भारतीय शूटरों का आरोप था कि उन्हें शूटिंग रेंज तक ले जाने के दौरान ट्रांसपोर्ट विभाग के कर्मचारियों ने उनके साथ बदसलूकी की. मानवजीत का कहना था कि उनके पूरे करियर में इतना अपमान कभी नहीं हुआ.

कहानी यहीं ख़त्म नहीं होती. किसी ने कभी यह नहीं सोचा था कि भारतीय महिला हॉकी टीम की खिलाड़ियों को यौन उत्पीड़न का भी सामना करना पड़ता है, लेकिन एक समय ऐसा भी आया, जब यह कड़वा सच दुनिया के सामने खुलकर आया. यह ख़बर शर्मसार करने वाली थी कि भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान-सम्मान दिलाने वाली महिलाओं की इज़्ज़त सुरक्षित नहीं है. आपको याद होगा कि भारतीय हॉकी टीम की एक खिलाड़ी ने टीम के वीडियोग्राफर बासवा राजा पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था. महिला खिलाड़ी ने बताया कि उसे राजा द्वारा यौन उत्पीड़न का शिकार होना पड़ा. उसने हॉकी इंडिया को दी गई अपनी लिखित शिकायत में कहा कि टीम कोच कौशिक और वीडियोग्राफर राजा ने उससे शारीरिक संबंध बनाने की पेशकश की थी. बाद में मामले पर लीपापोती करते हुए नरेंद्र बत्रा ने कहा था कि यह बहुत चौंकाने वाली बात है, अगर वीडियोग्राफर दोषी पाया गया तो उसके ख़िला़फ सख्त कार्रवाई की जाएगी. अब वह मामला किसी को भी याद नहीं है. तब दिग्गज एथलीट पीटी ऊषा ने हॉकी और भारोत्तोलन को झकझोरने वाले सेक्स स्कैंडल को भारतीय खेलों के लिए धब्बा क़रार देते हुए कहा था कि पीड़ितों को कर्णम मल्लेश्वरी की तरह मौक़े का इंतज़ार करने के बजाय तुरंत इसकी रिपोर्ट करनी चाहिए.

यह तो स़िर्फ कुछ ऐसे चुनिंदा मामले हैं, जो रोशनी में आ गए, वरना चकाचौंध, पैसे और ग्लैमर से भरपूर खेलों के खिलाड़ियों की असल हैसियत क्या है, यह कोई नहीं जानता. उपरोक्त तमाम घटनाओं से एक बात तो साफ है कि स्टार खिलाड़ियों के साथ सरकार और जनता, दोनों का रवैया उदासीन है. आज अगर राष्ट्रीय स्तर की खिलाड़ी के साथ चलती ट्रेन में इतनी भीड़ के सामने ऐसी वारदात हो सकती है तो आने वाली नई प्रतिभाओं का भविष्य कैसा होगा, यह एक सोचनीय विषय है.

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