फर्ज़ कीजिए कि अगर ओसामा बिन लादेन पाकिस्तान के ऐबटाबाद में नहीं, दिल्ली में मारा गया होता तो जनता क्या करती? जवाब यह है कि हमारे हाथ नेताओं के गिरेबानों तक होते और सरकार को इस्तीफ़ा देना पड़ता. लेकिन, पाकिस्तान में ऐसा कुछ नहीं है, क्योंकि वहां लोकतंत्र तो है, पर उसके पास न अधिकार हैं और न देश के लोगों का समर्थन. हुक्मरान अपने आक़ाओं के सामने बेबस हैं, जिनका नाम पाकिस्तानी सेना और आईएसआई है. पाकिस्तान हाशिए पर तो था ही, अब ऐसा न हो कि वह दूसरा अ़फगानिस्तान बन जाए. दुनिया का सबसे बड़ा आतंकवादी ओसामा बिन लादेन, जिसने अमेरिका जैसी विश्वशक्ति को नाकों चने चबवा दिए, कहीं और नहीं, बल्कि पाकिस्तान के ही एक खुशनुमा शहर ऐबटाबाद में मारा गया.
पाकिस्तानी जनता को समझ में नहीं आ रहा है कि वह किस पर विश्वास करे और किस पर नहीं. वह आश्चर्यचकित है कि ओसामा जैसा शख्स उसके बगल में पिछले दस सालों से मौजूद था और उसे भनक तक नहीं लगी. याद रखने की बात है कि पाकिस्तानी जनता भी पिछले कुछ समय से आतंकवाद की शिकार है.
अमेरिकी सैनिकों ने उसे ऑपरेशन जेरोनिमो के तहत रात के अंधेरे में मार गिराया. सैन्य शब्दों में कहें तो एक गोली माथे पर और एक छाती में. ऐबटाबाद पाकिस्तान का कोई क़बायली सीमांत इलाक़ा नहीं है, बल्कि वह राजधानी इस्लामाबाद से मात्र कुछ कोसों की दूरी पर है. जिस मकान में ओसामा मारा गया, उसमें वह पिछले पांच सालों से रह रहा था. करोड़ों की लागत से बने इस आलीशान मकान के चारों ओर 12-18 मीटर ऊंची दीवार का घेरा था. मकान से कुछ ही दूरी पर स्थित है पाकिस्तान सैनिक प्रशिक्षण अकादमी. मतलब यह कि जिस ओसामा को अमेरिका अ़फगानिस्तान-पाकिस्तान सीमा पर क़बायली इलाक़ों, पथरीली खाइयों और कंदराओं में ढूंढ रहा था, उसे अंत में अमेरिकी ख़ुफ़िया एजेंसी सीआईए ने पाकिस्तान के दिल में पाया. अमेरिका विश्वशक्ति है और इसी का फायदा उठाते हुए उसने पाकिस्तान के घर में घुसकर ओसामा को मार गिराया. मतलब, पाकिस्तान का यह कहना कि वह खुद आतंकवाद का शिकार है और इस वजह से वह अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद के िखला़फ अमेरिकी मुहिम में एक विश्वसनीय साथी है, कोरा झूठ है. पाकिस्तान की क़लई विश्व समुदाय के सामने खुल गई है. उसे मुंह छुपाने की जगह नहीं मिल रही है. कहते हैं, खिसयानी बिल्ली खंभा नोचे. यही हाल आज पाकिस्तान का है. उसने एक बार फिर भारत विरोध की धुन छेड़ दी है, ताकि जनता और अमेरिका का ध्यान बंटकर भारत-पाकिस्तान संबंधों पर केंद्रित हो जाए. इस घटना ने पाकिस्तान को सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया है. ऐसे सवाल, जो उसके वजूद पर ही उंगली उठाते हैं. पाकिस्तान में एक शब्द बहुत प्रचलित है-डीप स्टेट यानी सेना और ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई. इन्हें ऐसा इसलिए कहा जाता है, क्योंकि यहां सतह पर तो प्रजातंत्र नज़र आता है, लेकिन देश का सही मायने में संचालन सेनाध्यक्ष और आईएसआई प्रमुख के हाथों में है. देश की आंतरिक और विदेश नीति बनाने-चलाने का काम भी यही लोग करते हैं. एक बार पूर्व आईएसआई प्रमुख दुर्रानी ने कहा भी था कि आतंकवाद तो पाकिस्तान की नीति है, जिसके सहारे वह अपने उद्देश्यों की पूर्ति करता है. उनका कहना था कि पाकिस्तान को यह बात स्वीकारने में कोई शर्म भी नहीं आनी चाहिए, न तो भारत के सामने और न अमेरिका के. यह भी अजीब बात है कि एक तऱफ तो पाकिस्तान आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई में खुद को अमेरिका का दोस्त बताता है और दूसरी ओर आतंकवाद को अपनी मान्यता प्राप्त नीति भी कहता है. वैसे अंतरराष्ट्रीय संबंधों में यह कोई नई बात नहीं है. यथार्थवादी अमेरिकी नीतिकारों ने पाकिस्तान को यह सब जानते हुए भी इसलिए पोस रखा है, क्योंकि पाकिस्तान उनकी अ़फगान योजना का हिस्सा है और जो कि उसके आतंकवाद के विरुद्ध युद्ध का सबसे बड़ा क्षेत्र है. पाकिस्तान को भी यह पता है, इसलिए उसने एक तऱफ भारत और अ़फगानिस्तान में आतंकियों को सहारा दे रखा है और दूसरी तऱफ अमेरिका के साथ खड़ा है. मतलब यह कि आज तक आईएसआई ने अमेरिका को एक तरह से अ़फगान युद्ध की वजह से बंधक बना रखा था, लेकिन अब वस्तुस्थिति बिल्कुल अलग हो गई है. पिछले दस सालों से अ़फगान युद्ध प्रमुखतः अलक़ायदा और ओसामा के विरोध में चल रहा था, लेकिन सीआईए जैसी ख़ुफ़िया एजेंसी भी ओसामा को खोजने में नाकाम रही. इसीलिए जब इस बार ओसामा का पता चला तो अमेरिका ने कोई ग़लती नहीं की और उसके मारे जाने के बाद सीआईए के प्रमुख लीओन पनेटा ने साफ़ कहा कि पाकिस्तान को इस कार्यक्रम की जानकारी नहीं दी गई, क्योंकि हर बार की तरह अमेरिका को डर था कि कहीं पाकिस्तानी ख़ुफ़िया अधिकारी इसकी सूचना लादेन को न दे दें. पनेटा के इस बयान से भी अंतरराष्ट्रीय पटल पर पाकिस्तान की बहुत किरकिरी हुई. पाकिस्तान के डीप स्टेट को लगता था कि वह ओसामा को बचाने का घिनौना खेल आगे भी खेलता रहेगा, लेकिन अमेरिका ने उसके मुंह पर कालिख पोत दी है. अब तक स़िर्फ शक होता था कि पाकिस्तान आतंकियों को शरण देता है, लेकिन ओसामा के मारे जाने और पाकिस्तान को इसकी भनक न लगने की बात ने इसकी पुष्टि भी कर दी है. इस खिचड़ी में कुछ ऐसे पक्ष हैं, जिन पर साफ़ तौर पर कुछ कह पाना मुश्किल है. जैसे, क्या पाकिस्तान ने अ़फगानिस्तान में अपनी एक बड़ी भूमिका और दायित्व के लिए अमेरिका के हाथों ओसामा को बेच दिया? वजह, हाल में ही अमेरिका ने अ़फगानिस्तान से अपने सैनिकों को वापस बुलाने की बात कही थी और यह सभी जानते हैं कि पाकिस्तान पहले की तरह अ़फगानिस्तान को अपनी गोद में रखना चाहता है. इसीलिए उसने हमेशा भारत द्वारा अ़फगानिस्तान में चलाई जा रही सामाजिक योजनाओं का विरोध किया. वैसे पाकिस्तान अब अपने ही पैदा किए जेहादियों और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दिए गए झूठे बयानों के बीच फंस गया है. अगर वह अपनी साख बचाने के लिए कहता है कि उसे अमेरिका की योजना के बारे में पता था तो जेहादी इसे इस्लाम के प्रति विश्वासघात समझेंगे और पाकिस्तान के दोस्त ही उसके दुश्मन बन जाएंगे. अगर पाकिस्तान यह कहता है कि उसे कुछ मालूम ही नहीं था तो उसकी बेइज्ज़ती होती है और अमेरिका से उसके संबंधों में दरार आती है. ऐसे में वह भारत सरीखे देशों के भी निशाने पर आ जाता है, जो हमेशा से कहते आ रहे हैं कि पाकिस्तानी धरती से ही पूरे विश्व में आतंकवाद की आपूर्ति होती है.
उधर पाकिस्तानी जनता इन अलग-अलग बयानों से आहत और हक्की-बक्की है. पाकिस्तानी मीडिया भी जनता को सही बात बता ही नहीं रहा है. कुछ अ़खबार जेहादियों की, कुछ अमेरिका और कुछ पाकिस्तानी सेना एवं आईएसआई की बात कर रहे हैं. सबसे ज़्यादा चोट पहुंची पाकिस्तान के लोकतंत्र को, जो पहले ही सेना और ख़ुफ़िया तंत्र के हाथों की कठपुतली बना हुआ है और कोशिश में है कि गले में पड़े इस फंदे को कसने से किसी तरह रोका जाए. अब जबकि एक बाहरी मुल्क, जो भले ही खुद को दोस्त कहता है, ने बिना पूछे पाकिस्तानी धरती पर हमला कर दिया, ऐसे में जनता के बीच नेताओं की रही-सही साख भी मिट्टी में मिल गई है. जनता आक्रोशित है, क्योंकि उसे लगता है कि यह देश की अस्मिता और अक्षुण्णता पर हमला है. वैसे ओसामा की मौत के ड्रामे में पाकिस्तानी ख़ुफ़िया तंत्र का हाथ होना इसलिए भी लाज़िमी लगता है, क्योंकि उसे पता है कि इसका सबसे बड़ा असर देश के लोकतंत्र और नेताओं पर पड़ेगा, जिन्हें सेना पहले से ही कमज़ोर करने पर आमादा है. पाकिस्तानी जनता को समझ में नहीं आ रहा है कि वह किस पर विश्वास करे और किस पर नहीं. वह आश्चर्यचकित है कि ओसामा जैसा शख्स उसके बगल में पिछले दस सालों से मौजूद था और उसे भनक तक नहीं लगी. याद रखने की बात है कि पाकिस्तानी जनता भी पिछले कुछ समय से आतंकवाद की शिकार है. अब तो अमेरिकी कांग्रेस पाकिस्तान का खून मांग रही है. उसने साफ़ कर दिया है कि अमेरिका अभी तक हुए विश्वासघात का बदला पाकिस्तान से ज़रूर लेगा. उसने पाकिस्तान को दी जाने वाली आर्थिक सहायता बड़े पैमाने पर काटने का मन बना लिया है. मतलब यह कि अब पाकिस्तानी सेना के अफसर अपने ही पैदा किए आतंकियों के बदले अमेरिका से पैसे नहीं ऐंठ पाएंगे. अमेरिकी पैसे के बिना न तो आतंकवाद को बढ़ावा दिया जा सकता है और न पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था चलाई जा सकती है. इस पूरे परिदृश्य में यह खास बात उभर कर सामने आई कि भारत की पाकिस्तान नीति किस तरह विफल रही है. सवाल यह उठता है कि जब पाकिस्तान अमेरिका का दोस्त बनते हुए भी उसके सबसे बड़े दुश्मन को अपने यहां पाल-पोस सकता है तो फिर भारत तो उसका दुश्मन है. इसलिए यह सोचना अपने आप में बहुत बड़ी भूल है कि पाकिस्तान 26/11 के दोषियों को सज़ा देगा या उन्हें भारत को सौंपेगा. दिल्ली में यथार्थवादियों से लेकर आदर्शवादियों तक को यह बात समझ में आ गई है कि भारत आतंकवाद के मुद्दे पर पाकिस्तान से किसी भी मदद की उम्मीद नहीं कर सकता और मनमोहन सिंह की क्रिकेट कूटनीति नाकाम हो गई है. भारत ने हमेशा अपने पक्ष में बने माहौल को गंवा दिया, लेकिन इस बार ऐसा करना बहुत हानिकारक होगा. यही मौक़ा है भारत के पास, जबकि वह पूरे विश्व में उभरे पाकिस्तान विरोधी स्वरों को अपने हितों के लिए इस्तेमाल करे. पाकिस्तान को उसका आतंकी तंत्र तोड़ने के लिए मजबूर करने का इससे बेहतर मौक़ा हाथ नहीं आएगा. दिल्ली में बैठे नेताओं को याद रखना चाहिए कि पाकिस्तान के विदेश सचिव कह चुके हैं कि भारत को 26/11 की बात अब नहीं करनी चाहिए, क्योंकि यह मामला अब बासी हो गया है.
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