लीबिया के हालात अभी भी गंभीर बने हुए हैं. न तो देश की जनता का विश्वास खो देने वाले मुअम्मर ग़द्दा़फी पीछे हटने को तैयार हैं और न जनता की तऱफ से सत्ता परिवर्तन के लिए लड़ रहे लड़ाके. इस बीच संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव से लैस नाटो की सेनाएं भी लड़ाकों के साथ मिलकर गद्दा़फी की सत्ता पलटने में जुट गई हैं. यह परिस्थिति अपने आप में विस्मयकारी है. ऐसा इसलिए है, क्योंकि यह एक ऐसी स्थिति है, जिसके भीतर बहुत सारे विरोधाभास उठ खड़े हुए हैं. सबसे बड़ा प्रश्न इस बात पर उठ रहा है कि नाटो की सैन्य मदद किस हद तक जायज़ है. कई विश्लेषक मानते हैं कि ग़द्दा़फी विरोधी लोगों में बहुत बड़े पैमाने पर जिहादी भी शामिल हैं और जो इस आपातकालीन दुर्व्यवस्था का लाभ उठाकर कट्टरपंथ और उग्रवाद को लीबिया में जड़ें देना चाहते हैं. यह बात बहुत ठीक नहीं दिखाई पड़ती. कारण यह है कि अभी तक लीबिया में ऐसा कुछ देखने को नहीं मिला है और देश की जनता ने बड़ी मुस्तैदी के साथ गद्दा़फी के ख़ूनी इरादों पर पानी फेरा है. दूसरी बात यह है कि अपने समय में ग़द्दा़फी ने ख़ुद ही बहुत सारी आतंकवादी घटनाओं की पैरोकारी की थी, जिनमें लोकार्बी धमाके और म्यूनिख ओलंपिक में इज़रायली खिलाड़ियों पर हमले शामिल हैं.
पश्चिमी देशों और अमेरिका को समझना होगा कि काठ की हांडी बस एक बार ही चढ़ती है. दोहरे मानदंड हमेशा अपने और दूसरों के लिए समस्याएं पैदा करते हैं. यह भी कि दूसरे देशों की जनता कोई भेड़-बकरी नहीं है कि अपने छोटे-छोटे हितों के लिए उसे क़ुर्बान कर दिया जाए. लीबिया के लोगों को ग़द्दा़फी से छुटकारा मिलना चाहिए, लेकिन इसके रास्ते क्या होंगे, यह तय करने की ज़रूरत है.
विदेशी दख़ल को लेकर पूरा विश्व दो खेमों में बंटा नज़र आ रहा है. एक खेमा ऐसा है, जो मानता है कि लीबिया में नाटो का हस्तक्षेप नाजायज़ है, वहीं दूसरा खेमा मानता है कि यह लीबिया की जनता के लिए हितकारी है और ग़द्दा़फी के कहर से जनता को अभी तक बचाए हुए है. देखा जाए तो यह स्थिति बहुत सारे विरोधाभासों से भरी हुई है. सबसे पहले तो बात आती है कि आख़िर नाटो समूह, अमेरिका एवं संयुक्त राष्ट्र ने यमन और बहरीन में ऐसा हस्तक्षेप करने का फैसला क्यों नहीं लिया. दोनों ही देशों की जनता आंदोलन कर रही है और वहां भी मुद्दा वही है, जो लीबिया या मिस्र में था. लोगों का मानना है कि ऐसा इसलिए है, क्योंकि उक्त दोनों देश अमेरिका और यूरोप के दोस्त हैं और अमेरिका की ईरान विरोधी नीति में ख़ास सहभागी. याद रखने की बात है कि बहरीन अमेरिका की नौसेना के पांचवें बेड़े का लंगर स्थान है, जो कि ख़ास ईरान के विरोध में वहां पर तैनात है. इन हालात में नाटो और संयुक्त राष्ट्र दोनों के ही मंसूबे सवालों के दायरे में आ जाते हैं. ये दोहरी नीति से प्रेरित दिखाई देते हैं. साथ ही यदि सऊदी अरब को देखा जाए तो मामला और भी संगीन हो जाता है. सऊदी अरब ने बहरीन में जनांदोलन को दबाने के लिए अपने सैनिक भेजे. आख़िर यह ग़लत नहीं था क्या? बहरीन की जनता क्या जनता नहीं है? क्या उन्हीं देशों की जनता को जनता का दर्जा प्राप्त है, जहां पश्चिमी देशों और अमेरिका के सामरिक एवं राजनीतिक स्वार्थ सिद्ध होते हैं? ये सारे प्रश्न बहुत गंभीर हैं.
देखने की बात यह है कि नाटो के भीतर भी बहुत से ऐसे देश हैं, जो नाटो की इस हरकत को ठीक नहीं मानते. उनका बिल्कुल भी विचार नहीं था कि सैन्य सहायता दी जाए. वैसे संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद का इतिहास इस मामले में बहुत ही ख़राब रहा है. विश्व के किसी भी देश में मानवीय त्रासदी को बचाने के लिए सबसे पहले 1973 में संयुक्त राष्ट्र ने सहमति जताई थी. उसके अनुसार, यदि दुनिया के किसी भी देश में ऐसी स्थिति पैदा हो जाए कि वहां की जनता की जान और माल को भारी क्षति पहुंचने लगे तो संयुक्त राष्ट्र के घटक देश वहां पर राष्ट्रीय अथवा सामूहिक रूप से दख़ल दे सकते हैं. लेकिन याद रखने वाली बात यह है कि इस समझौते में कहीं भी सक्रिय सैन्य दख़लंदाज़ी का कोई प्रावधान नहीं था. दरअसल, इस समझौते को पश्चिमी देशों ने अमेरिका के साथ मिलकर अपना उल्लू सीधा करने का एक ज़रिया बना लिया. ऐसा कहा गया कि इस प्रावधान की कोई सटीक परिभाषा न होने के कारण मामला दर मामला परिभाषित किया जाएगा. अब यह अपने आप में इतना खुला हुआ पैमाना है कि विश्व ने इराक और अ़फग़ानिस्तान जैसे उदाहरण देखे, जहां अपना उल्लू सीधा करने की नीयत से बहुत सारा बखेड़ा पैदा किया गया और अंतत: आज स्थिति यह है कि इन देशों में एक तरीक़े की अराजकता हटाकर दूसरे किस्म की अराजकता पैदा कर दी गई है.
इस सैन्य सहायता की असलियत अगर भीतर से देखी जाए तो भी यह अनुमान लगाया जा सकता है कि अंतर्कलह और वैचारिक मतभेदों की वजह से यह सैन्य सहायता पूरे दिल से नहीं दी जा रही है, जिसके चलते बहुत से स्वतंत्रता सैनिक मारे जा रहे हैं और मिसराता जैसे शहर में ग़द्दा़फी की सेना आगे बढ़ती चली आ रही है. इससे देश की जनता में रोष बढ़ रहा है. सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस नाटो कार्यक्रम में अमेरिका ने अगुवाई नहीं की है, बल्कि ब्रिटेन और फ्रांस सबसे आगे हैं. ऐसा क्यों? ओबामा के क़रीबी लोगों का कहना है कि लीबिया की स्थिति को लेकर राष्ट्रपति के सामने एक बहुत बड़ी चुनौती खड़ी हो गई. अगर ओबामा अपने आपको इससे दूर रखते तो लगता कि उनके और पश्चिमी यूरोप के देशों के बीच दो फाड़ हो गया है. ऐसा भी होता कि लोग उन्हें कमज़ोर समझ लेते और अमेरिका की साख को धक्का लगता. ओबामा अपने में उलझे इसलिए थे कि कहीं नेता बनने के चक्कर में अमेरिका की मिट्टी पलीद न हो जाए, जिस तरह इराक और अ़फग़ानिस्तान में हो गई. अब इस ऊहापोह की स्थिति में बीच का रास्ता यह था कि हस्तक्षेप तो किया जाए, लेकिन नेता बनकर नहीं. इस बार अमेरिका ने इसीलिए दूसरे दर्जे को अपनाया है. मतलब यह कि अमेरिका इस लड़ाई में आधे-अधूरे मन से शामिल हुआ है. इसका सीधा प्रभाव अब देखने को मिल रहा है. अमेरिका ने कहा था कि लीबिया में वह अपनी ओर से और विमान देगा, जो कि लीबियाई स्थिति में अधिक कारगर साबित हो सकते हैं, लेकिन अभी भी अमेरिका ने अपना वादा पूरा नहीं किया है. इस वजह से जहां एक तऱफ फ्रांस और ब्रिटेन की वायुसेना कमज़ोर हो गई है, वहीं दूसरी ओर इन कारणों से मिसराता को बचाए रखने में अब बहुत सारी दिक्कतें आ रही हैं. याद रखने वाली बात यह है कि अगर मिसराता में ग़द्दा़फी की सेना घुस गई तो बड़ी तादाद में क़त्लेआम हो सकता है.
असल में अभी तक नाटो सेनाएं यह तय नहीं कर पाई हैं कि उनका लक्ष्य क्या है. उन्हें स़िर्फ लोगों की जान और माल की हिफाज़त करनी है या ग़द्दा़फी की सेना से लड़ाई भी. ऐसा इसलिए है कि यह दख़लंदाज़ी तो की गई है राजनीतिक कारणों से प्रेरित होकर, लेकिन अभी तक इतनी तादाद में उपकरण और हवाई जहाज़ नहीं उपलब्ध हुए हैं कि कुछ ख़ास किया जा सके. असल में फ्रांस, ब्रिटेन और अमेरिका अपने ही फंदे में फंस गए हैं. सुरक्षा परिषद में यह तो तय हो गया कि विद्रोहियों को सैन्य सहायता दी जाएगी, लेकिन यह भी तय हुआ कि नाटो देशों की सैन्य कार्रवाई केवल हवाई हमलों तक ही सीमित रहेगी और ज़मीन पर सैनिक नहीं उतारे जाएंगे. इसी वजह से नाटो ने यह निश्चय किया कि वह विद्रोहियों को सैनिक उपकरण और सैन्य शिक्षा देगा. लेकिन सोचने वाली बात यह है कि सैन्य प्रशिक्षण कोई दस दिनों में तो दिया नहीं जा सकता, तब यह सब कहने और करने का क्या फायदा. ऊपर से हवाई कार्रवाई में बहुत सारे निर्दोष लोगों की भी जान चली गई, जिसके चलते नाटो देश दुनिया को मुंह नहीं दिखा पा रहे हैं. इसी कारण सऊदी अरब भी नाटो से दूरी बना रहा है.
वैसे यह बात विश्व के राजनीतिक दार्शनिकों को ठीक से पता है कि किसी भी देश में बाहरी तत्वों और बाहरी मदद या विदेशी सैन्य कार्रवाई से स्थापित लोकतंत्र हमेशा विफल रहा है. आज विश्व में जितने सफल लोकतंत्र हैं, वे वही हैं जिन्होंने अपनी लड़ाई ख़ुद लड़ी, न कि बाहरी देशों द्वारा स्थापित किए गए. ऐसा इसलिए है, क्योंकि विदेशी दख़लंदाज़ी हमेशा उनके अपने उद्देश्यों के लिए ही होती है जो कि लोगों से प्रायः छुपे होते हैं. लेकिन जब यह छुपे मुद्दे सामने आते हैं तो जनता समझ जाती है कि दूसरे देशों ने उसे अपने हितों के लिए मूर्ख बनाया है. ऐसा होने पर देश के नए नवेले लोकतांत्रिक तंत्र की नैतिक वैधता समाप्त हो जाती है और देश एक बार फिर अलगावादी और अराजक तत्वों के हाथों में चला जाता है. एक दुर्व्यवस्था दूसरी दुर्व्यवस्था में बदल जाती है और जनता फिर से निढाल और बेबस हो जाती है. ऐसा ही अफगानिस्तान और इराक में भी हुआ. यह कहना आवश्यक नहीं कि इराक में सद्दाम और अफगानिस्तान में तालिबान ने लोगों का जीना दुश्वार कर दिया था. ये दोनों अपने आप में निरंकुश और ज़ालिम सत्ता के पर्याय बन गए थे, लेकिन जिस तरीके से इन्हें हटाया गया और जिस तरीके से इन देशों में लोकतंत्र को ऊपर से बैठाया गया, वह बिल्कुल ग़लत निकला और आज स्थिति यह है कि उक्त दोनों देश अमेरिका और पश्चिमी देशों के गले की फांस बन गए हैं. अ़फग़ानिस्तान में तालिबान आज भी जीवित है और अपना आतंकवादी संगठन चला रहा है. इराक में अलगाववादी ताक़तें दिनोंदिन मज़बूत होती जा रही हैं और देश नस्लीय एवं कबीलाई हिंसा में उलझता जा रहा है. पश्चिमी देशों और अमेरिका को समझना होगा कि काठ की हांडी बस एक बार ही चढ़ती है. दोहरे मानदंड हमेशा अपने और दूसरों के लिए समस्याएं पैदा करते हैं. यह भी कि दूसरे देशों की जनता कोई भेड़-बकरी नहीं है कि अपने छोटे-छोटे हितों के लिए उसे क़ुर्बान कर दिया जाए. लीबिया के लोगों को ग़द्दा़फी से छुटकारा मिलना चाहिए, लेकिन इसके रास्ते क्या होंगे, यह तय करने की ज़रूरत है. ऐसा न हो कि कल जनता हाथ मलती रह जाए और लीबिया भी एक और अ़फग़ानिस्तान-इराक बन जाए.
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