जरुर पढेंसमाजसाहित्य

पुराने तथ्य, नई किताब

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कुछ दिनों पहले ही हिंदी-अंग्रेजी में एक साथ प्रकाशित वेबसाइट फेस एंड फैक्ट्स के  प्रबंध संपादक जयप्रकाश पांडे का बेहद गुस्से में फोन आया. उन्होंने बताया कि न्यूयॉर्क टाइम्स के पूर्व कार्यकारी संपादक जोसेफ लेलीवेल्ड ने महात्मा गांधी का अपमान करते हुए एक किताब लिखी है-ग्रेट सोल: महात्मा गांधी एंड हिज स्ट्रगल विद इंडिया. उसमें गांधी को समलैंगिक क़रार दिया गया है. जब मैंने पूछा कि उन्हें यह बात कहां से पता चली तो उन्होंने कहा कि ब्रिटेन के अख़बार डेली मेल ने एक लेख छापा है, जिसका शीर्षक है -गांधी लेफ्ट हिज वाइफ टू लिव विद मेल लवर. यह लेख जोसेफ लेलीवेल्ड की नई किताब के  हवाले से छापा गया था. उन्होंने तत्काल मुझसे प्रतिक्रिया मांगी, ताकि उसे प्रकाशित किया जा सके . चूंकि मैंने न तो किताब पढ़ी थी और न डेली मेल का लेख पढ़ा था, इसलिए मैंने गांधी से जुड़ी एक कहानी सुना दी. एक बार गांधी ट्रेन से सफर कर रहे थे. किसी स्टेशन पर जब गाड़ी रुकी तो उन्होंने देखा कि एक आदमी उनसे मिलने की कोशिश कर रहा है और उनके समर्थक उसे रोक रहे हैं. वह लगातार मिन्नतें कर रहा है, लेकिन लोग उसे उन तक पहुंचने नहीं दे रहे हैं. गांधी ने लोगों से मामले की जानकारी चाही. उन्हें बताया गया कि जो आदमी उनसे मिलने की जिद कर रहा है, दरअसल वह एक लेखक है और उसने उन्हें केंद्र में रखकर एक किताब-ठजॠणए जऋ खछऊखअ लिखी है. वह उस किताब पर उनके दस्तख़त चाहता है. लोगों को लग रहा था कि जिस किताब का शीर्षक ही इतना अपमानित करने वाला है, उसमें भीतर तो और भी विषवमन होगा. इस वजह से उसे गांधी से मिलने से रोका जा रहा था. गांधी को जब पूरी बात पता चली तो उन्होंने उसे अपने पास बुलाया, प्यार से बैठाया और हाल-चाल पूछने के बाद उसकी लिखी किताब पर हस्ताक्षर करके उसे वापस लौटा दिया. उसके जाने के बाद गुस्साए समर्थकों ने बापू से पूछा कि उन्होंने उस व्यक्ति की किताब पर हस्ताक्षर क्यों किए, जो उन्हें ठजॠणए जऋ खछऊखअ बता रहा है. गांधी ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया कि सबको अपनी राय बनाने और उसे व्यक्त करने का हक़ है.

1906 में गांधी ने बह्मचर्य अपना लिया था और उसके बाद वह अपनी कामेच्छाओं के बारे में खुलकर लिखते-बोलते थे और अपनी निजता का त्याग कर चुके थे. मालिश कराने के उनके शौक को लेलीवेल्ड ने कामेच्छा से जोड़ने की कोशिश की है, लेकिन उन्हें याद दिलाने की ज़रूरत है कि मालिश कराना और एनीमा लेना गांधी की दिनचर्या में उनकी ज़िंदगी के आख़िर तक बना रहा. स़िर्फ इन बातों को आधार बनाकर गांधी के सेक्स जीवन की इस गलीज व्याख्या के लिए लेलीवेल्ड को जीवनी लिखने की ज़रूरत नहीं थी. अगर गांधी पर लिखी अन्य जीवनियों से इस किताब की तुलना करें तो यह एक बेहद कमज़ोर कृति है.

यह कहानी सुनाकर मैं उस व़क्त तो निकल गया, लेकिन मेरे मन में गांधी पर लिखी लेलीवेल्ड की किताब पढ़ने की इच्छा बढ़ने लगी. दो-तीन दुकानों पर फोन करने पर पता चला कि यह किताब अभी भारत में उपलब्ध नहीं है. फिर मैंने डेली मेल का लेख पढ़ा. उसे पढ़ने के  बाद पूरा तो नहीं, लेकिन माजरा कुछ-कुछ समझ में आने लगा. इस बीच मुंबई के एक अख़बार ने डेली मेल के लेख के हवाले से यह ख़बर छाप दी कि एक जर्मन व्यक्ति गांधी का सीक्रेट लव था. यह लेख छपने के बाद बवाल मचना था, सो मचा. बग़ैर पढ़े-देखे, आनन-फानन में गुजरात विधानसभा ने सूबे में किताब पर पाबंदी लगाने के  प्रस्ताव को मंजूरी दे दी. महाराष्ट्र में भी ऐसी ही मांग उठी कि लेलीवेल्ड की किताब पर प्रतिबंध लगा दिया जाए. केंद्र सरकार के मंत्री भी इसमें राष्ट्रपिता का अपमान देखने लगे. यह सब कुछ स़िर्फ एक लेख की बिना पर होने लगा, बग़ैर किताब पढ़े. लेकिन अब यह किताब भारत में उपलब्ध है. मुझे लग रहा था कि गांधी के बारे में इस किताब में कुछ नया ख़ुलासा होगा, लेकिन पढ़ने के बाद निराशा हुई और लगा कि डेली मेल का लेख बेहद सनसनीख़ेज़ और सत्य से परे था.

दरअसल पश्चिमी देशों में किताब को हिट कराने का यह घिसा-पिटा फॉर्मूला है. किताब के बाज़ार में आते ही उसके बारे में उत्सुकता का ऐसा वातावरण तैयार किया गया और प्रकाशक या फिर लेखक के  रणनीतिकारों ने बिक्री बढ़ाने के लिए गांधी की इस जीवनी के कुछ चुनिंदा अंश लीक किए, ताकि मीडिया में ख़बर बन सके और वे ऐसा करने में कामयाब भी हो गए. गांधी और हरमन कैलेनबाख के संबंधों के बारे में उनके कुछ पत्रों को इस तरह प्रचारित किया गया कि लेखक लेलीवेल्ड ने कोई महान खोज कर डाली हो. गांधी के बारे में कोई ऐसा सत्य उद्घाटित कर दिया हो, जो पहले से ज्ञात नहीं था. गांधी के जिन पत्रों को आधार बनाकर लेलीवेल्ड ने कुछ बातें की हैं, वे सालों से राष्ट्रीय अभिलेखागार और साबरमती आश्रम में मौजूद हैं. जब गांधी और कैलेनबाख के संबंधों को आधार बनाकर अख़बारों में लेख छपे, समीक्षाएं छपीं तो दुनिया भर में गांधी के प्रशंसकों ने इसका विरोध शुरू कर दिया. यह विरोध जितना तीव्र होता गया, किताब की बिक्री उतनी ही बढ़ती चली गई.

आधुनिक भारत अथवा कहें कि बीसवीं शताब्दी के विश्व इतिहास में महात्मा गांधी एक ऐसे शख्स हैं, जिसके व्यक्तित्व की गुत्थी सुलझाना विद्वानों के लिए एक बड़ी चुनौती है. उनके व्यक्तित्व के इतने आयाम हैं कि एक को पकड़ो तो दूसरा छूट जाता है. गांधी विश्व के इकलौते ऐसे शख्स हैं, जिनकी मृत्यु के साठ साल बाद भी उन पर एवं उनके विचारों-लेखन पर लगातार शोध और लेखन हो रहा है. न्यूयॉर्क टाइम्स के पूर्व कार्यकारी संपादक ने भी गांधी और उनके व्यक्तित्व को अपने तरीक़े से उद्घाटित करने का असफल प्रयास किया है. साठ के दशक में लेलीवेल्ड भारत में न्यूयॉर्क टाइम्स के प्रतिनिधि थे. चूंकि वह भारत को नज़दीक से देख-समझ चुके थे, इसलिए उनसे गांधी और उनके पत्रों के आधार पर ऐसे सनसनीख़ेज़ निष्कर्षों की उम्मीद नहीं थी. अगर जोसेफ लेलीवेल्ड की किताब के कुछ अंशों पर नज़र डालें तो लेखक की मंशा साफ हो जाती है. गांधी अगर प्रेम में नहीं थे तो भी वह आर्किटेक्ट हरमन कैलेनबाख के प्रति आकर्षित थे. 1909 में लंदन से भेजे एक पत्र में गांधी ने कैलेनबाख को लिखा था, तुम्हारी तस्वीर मेरे शयनकक्ष में मैंटलपीस पर रखी है, जो मेरे बिस्तर के ठीक सामने है. वह आगे लिखते हैं, रुई के फाहे और वैसलीन नियमित तौर पर याद दिलाते हैं. मुद्दा तुम्हें और मुझे यह दिखाने का है कि तुमने कितनी पूर्णता से मेरे शरीर पर क़ब्ज़ा कर लिया है, यह एक प्रतिशोधपूर्ण गुलामी है (पृ-89). अब हम क़ब्ज़ा शब्द का क्या अर्थ निकालें या फिर पेट्रोलियम जेली के इस्तेमाल का, जो आज की तरह उस व़क्त भी मरहम के तौर पर उपयोग में आता था. विश्वसनीय अनुमान तो यह हो सकता है कि लंदन के  होटल के कमरे में वैसलीन एनीमा के लिए रही होगी, जो गांधी की नियमित दिनचर्या में शामिल था या फिर यह किसी और उमंग के पहले की छाया रहा हो, जो उत्साह गांधी ने बूढ़े होने पर मालिश के लिए दिखाया था. मालिश के प्रति उनका लगाव सर्वविदित था और देश भर के दौरों के बीच वह महिलाओं से मालिश कराने में रुचि रखते थे. मालिश की उनके जीवनकाल में काफी चर्चा होती थी, जो कभी ख़त्म नहीं हुई.

तक़रीबन दो वर्ष बाद विनोदी स्वभाव के गांधी ने अपने दोस्त से समझौते के लिए एक अर्द्ध सहमति पत्र बनाया था, जिसमें वैसे नामों का प्रयोग किया गया था, जिसे हम मज़ाकिया कह सकते हैं. वह उम्र में दो वर्ष छोटे कैलेनबाख को लोअर हाउस और ख़ुद को अपर हाउस कहते थे. कैलेनबाख के यूरोप दौरे के पहले 29 जुलाई, 1911 को आपसी सहमति पत्र में अपर हाउस ने लोअर हाउस से यह वादा कराया था कि उनकी ग़ैरहाज़िरी में कोई विवाह नहीं करेगा और न किसी महिला की ओर ललचाई नज़रों से देखेगा. इसके बाद दोनों हाउसों ने आपस में ज़्यादा प्रेम एवं फिर और ज़्यादा प्रेम का वादा किया. यह उस व़क्त की बात है, जब 1908 में गांधी की जेल यात्राओं और 1909 में उनकी लंदन यात्रा की अवधि छोड़कर साथ रहते हुए तक़रीबन तीन वर्ष बीत चुके थे. यहां यह बात स्मरणीय है कि हमारे पास स़िर्फ गांधी के पत्र हैं, जो हमेशा से डियर लोअर हाउस से शुरू होते हैं. हम अगर उन पत्रों में लिखे गए अन्य संदर्भों और घटनाओं को छोड़ दें तो उनसे ही दोनों के बीच के प्रेम के सूत्र निकलते हैं. पत्रों की व्याख्या हमेशा दो तरह से की जा सकती है. एक तो हम अनुमानों के समंदर में डूब-उतरा सकते हैं और दूसरा तरीक़ा, यह देखें कि दो व्यक्ति अपनी यौन इच्छाओं के दमन के लिए अपने प्रयासों के बारे में क्या कहते-सोचते हैं.

लेलीवेल्ड ने इन्हीं पत्रों को आधार बनाकर गांधी के सेक्स जीवन के बारे में लिखा है, लेकिन लिखते व़क्त वह भूल गए कि गांधी में अपनी कामुकता को लेकर सार्वजनिक रूप से बात करने का अद्वितीय साहस था. 1906 में गांधी ने बह्मचर्य अपना लिया था और उसके बाद वह अपनी कामेच्छाओं के बारे में खुलकर लिखते-बोलते थे और अपनी निजता का त्याग कर चुके थे. मालिश कराने के उनके शौक को लेलीवेल्ड ने कामेच्छा से जोड़ने की कोशिश की है, लेकिन उन्हें याद दिलाने की ज़रूरत है कि मालिश कराना और एनीमा लेना गांधी की दिनचर्या में उनकी ज़िंदगी के आख़िर तक बना रहा. स़िर्फ इन बातों को आधार बनाकर गांधी के सेक्स जीवन की इस गलीज व्याख्या के लिए लेलीवेल्ड को जीवनी लिखने की ज़रूरत नहीं थी. अगर गांधी पर लिखी अन्य जीवनियों से इस किताब की तुलना करें तो यह एक बेहद कमज़ोर कृति है. दरअसल यह कृति गांधी की सही मायने में जीवनी भी नहीं है और न गांधी के बारे में जानने की इच्छा रखने वाले पाठकों के लिए उपयोगी है. किताब पढ़ते व़क्त महसूस होता है कि लेखक यह मानकर चल रहा है कि पाठक को गांधी और उनके क्रियाकलापों के बारे में जानकारी है. अंत में स़िर्फ इतना कहा जा सकता है कि लेलीवेल्ड ने अपने तरीक़े से गांधी के पुरुष मित्रों के संबंधों को व्याख्यायित किया है और इसका उन्हें हक़ भी है. किताब पर पाबंदी लगाने की कोई आवश्यकता नहीं है. ख़ुद गांधी भी अगर जीवित होते तो इस पर पाबंदी के ख़िला़फ होते.

(लेखक आईबीएन से जुड़े हैं)

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