सूरमा देश का पहला वनग्राम बनाः अब बाघ और इंसान साथ रहेंगे

उत्तर प्रदेश के खीरी ज़िले का सूरमा वनग्राम देश का ऐसा पहला वनग्राम बन गया है, जिसके बाशिंदे थारू आदिवासियों ने पर्यावरण बचाने की जंग अभिजात्य वर्ग द्वारा स्थापित मानकों और अंग्रेज़ों द्वारा स्थापित वन विभाग से जीत ली है. बड़े शहरों में रहने वाले पर्यावरणविदों, वन्यजीव प्रेमियों, अभिजात्य वर्ग और वन विभाग का मानना है कि आदिवासियों के रहने से जंगलों का विनाश होता है, इसलिए उन्हें बेदख़ल कर दिया जाना चाहिए. जबकि वैज्ञानिक दृष्टिकोण और सांस्कृतिक रूप से देखा जाए तो आदिवासियों और वनों के बीच अटूट रिश्ता है. वन हैं तो आदिवासी हैं. आदिवासी हैं तो दुर्लभ वन्यजीव-जंतु भी हैं. वनग्राम सूरमा और गोलबोझी के आदिवासियों ने आख़िर वनाधिकार क़ानून 2006 के सहारे यह साबित कर दिया कि वन्यजीव-जंतुओं की तरह वे भी वनों के अभिन्न अंग हैं, जिसे दुर्भाग्यवश वन विभाग और अभिजात्य वर्ग समझने में असमर्थ है. सूरमा वनग्राम को इस क़ानून के तहत देश में किसी नेशनल पार्क के कोर ज़ोन में मान्यता पाने वाले पहले गांव का गौरव प्राप्त हुआ. बीते 8 अप्रैल को ज़िलाधिकारी खीरी ने स्वयं इन गांवों में जाकर 347 परिवारों को मालिकाना हक़ सौंपा.

सूरमा गांव का इतिहास 1861 में वन विभाग की स्थापना के बाद बनी इस क्षेत्र की विभिन्न कार्य योजनाओं में मिलता है. उनमें बताया गया है कि यह गांव 1857 से भी पूर्व से बसा है, जब ब्रिटिश हुक़ूमत ने वन विभाग की स्थापना भी नहीं की थी. यहां थारुओं के 37 गांव थे, जो बर्दिया गांव के नाम से जाने जाते थे.

सत्तर के दशक से राष्ट्रीय उद्यान के अंदर वन विभाग और वन्यजीव-जंतु प्रेमियों द्वारा गांव की मौजूदगी का जमकर विरोध किया जाता रहा है, जिसके चलते पिछले तीस सालों के दौरान देश के विभिन्न राष्ट्रीय उद्यानों से हज़ारों परिवारों को संविधान के अनुच्छेद 21 की मंशा के ख़िला़फ और बिना कोई वैकल्पिक व्यवस्था किए बेरहमी से बेदख़ल किया गया, लेकिन 2006 में बने वनाधिकार क़ानून ने वनों में रहने वाले समुदायों के साथ हुए अन्याय को दूर करते हुए राष्ट्रीय उद्यानों को संकटग्रस्त वन्यजीव-जंतु आवास क्षेत्र घोषित करने की योजना में वहां रहने वाले ग्रामीणों की भागीदारी को स्वीकारा और उन्हें वनों के अंदर रहने की अनुमति प्रदान की. देखने में आ रहा है कि जहां लोग संघर्ष कर रहे हैं, वहां तो वनाधिकार क़ानून के सहारे ग्रामीणों द्वारा सरकार और वन विभाग का दोहरापन सामने लाने की कोशिश की जा रही है. राष्ट्रीय पार्कों में वनाधिकार क़ानून लागू न करके वन विभाग द्वारा लोगों को दस लाख रुपये का लालच देकर गांव खाली करने के लिए फुसलाया जा रहा है. कई जगहों पर वन विभाग की मनमानी अब भी क़ायम है, वहां वनों से लोगों की बेदखली बदस्तूर ज़ारी है. सूरमा का संघर्ष तमाम थारू क्षेत्र की गरिमा का सवाल था. यह केवल कुछ परिवारों के अस्तित्व का संघर्ष नहीं था, बल्कि इन परिवारों के साथ जुड़ी सांस्कृतिक धरोहर के रूप में वनों एवं वन्यजीव-जंतुओं को बचाने का भी संघर्ष था. आज़ादी के बाद से ही दुधवा के अंदर वनों का अंधाधुंध दोहन शुरू हो गया. वन विभाग, पुलिस एवं सशस्त्र सीमाबल की साठगांठ से वन्यजीव-जंतुओं की बड़े पैमाने पर तस्करी के लिए राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय गिरोह सक्रिय हुए. आदिवासियों के लिए वन उनकी जीविका का साधन होते हैं, इसलिए वनों का विनाश उनके लिए नुक़सानदायक था. बाघों के साथ उनका जीवन सहज ही था. बाघ और मनुष्य में किसी प्रकार का बैर नहीं था, लेकिन वनों को राजस्व प्राप्ति का साधन मान लिए जाने के कारण स्थानीय लोगों-आदिवासियों को वनों का दुश्मन क़रार दे दिया गया.

सूरमा गांव का इतिहास 1861 में वन विभाग की स्थापना के बाद बनी इस क्षेत्र की विभिन्न कार्य योजनाओं में मिलता है. उनमें बताया गया है कि यह गांव 1857 से भी पूर्व से बसा है, जब ब्रिटिश हुक़ूमत ने वन विभाग की स्थापना भी नहीं की थी. यहां थारुओं के 37 गांव थे, जो बर्दिया गांव के नाम से जाने जाते थे. 28 फरवरी, 1879 को ये नेपाल सीमा के रिजर्व फारेस्ट घोषित कर दिए गए. यह इलाका उस समय अवध प्रांत की खैरीगढ़ रियासत का हिस्सा था, जिसे महारानी खैरीगढ़ ने 1904 में हुए एक करारनामे पर हस्ताक्षर करके वन विभाग के अधीन कर दिया था. यह गांव कब राजस्व गांव से वनग्राम बन गए, यह पूरी कहानी वन विभाग के दस्तावेज़ों में अंकित है. वनग्राम बनाने का मतलब था इन गांवों के तमाम अधिकारों का खात्मा और इनसे वनों के अंदर बेगार कराना. ये वन विभाग की संपत्ति बना दिए गए. 1978 तक ये गांव वन विभाग के नियंत्रण में रहे. दुधवा नेशनल पार्क की घोषणा के बाद 37 में से 35 थारू गांव राजस्व विभाग को सौंप दिए गए, जबकि सूरमा और गोलबोझी को वन विभाग के अधीन छोड़ दिया गया. 2 फरवरी, 1978 को विख्यात वन्यजीव-जंतु प्रेमी बिली अर्जन सिंह द्वारा इस वन क्षेत्र को दुधवा राष्ट्रीय उद्यान बनाए जाने के प्रस्ताव को केंद्र सरकार की मंजूरी मिल गई. दुधवा नेशनल पार्क बना, लेकिन आज़ाद भारत में थारुओं के तमाम संवैधानिक अधिकार छीन लिए गए और इन्हें वन विभाग का गुलाम बना दिया गया. यह वही बिली अर्जन सिंह हैं, जिन्होंने 12 साल की उम्र में बाघ का शिकार किया था. बिली ने इस नेशनल पार्क के अंदर और बाहर 400 एकड़ भूमि पर क़ब्ज़ा भी कर लिया, जिसमें से 80 एकड़ भूमि अभी हाल में बसपा सरकार द्वारा ज़ब्त की गई. इन जंगलों में बिली अर्जन सिंह द्वारा बाघों का शिकार किया गया. उन्होंने एक बाघिन को पालतू बनाकर रखा था, जो नरभक्षी हो गई थी. बाघिन ने 80 के दशक में एक विदेशी पर्यटक के बच्चे को अपना शिकार बना लिया, लेकिन कोई कार्यवाही नहीं हुई. एक तऱफ शिकारियों को प्रोत्साहन मिला और दूसरी तऱफ थारू आदिवासियों को उपेक्षा एवं तिरस्कार.

घने जंगलों में बसे, विकास की हर किरण से दूर और हिकारत भरी नज़रों से देखे जाने वाले सूरमा गांव के निवासियों ने जीवन का सूर्य कभी अस्त नहीं होने दिया. वे बिना किसी सरकारी मदद के अपने बलबूते पर मिट्टी के घरों में आबाद रहे, खेती नहीं छोड़ी और बच्चों पढ़ाया भी. इन जंगलों में बाघों के लिए करोड़ों रुपये का बजट आता था, लेकिन विडंबना यह थी कि वनों में रहने वाले बाघ उपेक्षित थे और थारू भी. नेशनल पार्क बनने के बाद बाघों की तस्करी धड़ल्ले से होने लगी और अपराधी ठहराए जाते सूरमा में रहने वाले आदिवासी. अन्याय और उत्पीड़न की इंतहा कर दी गई. एक बारह वर्षीय स्कूली बच्चे को वन विभाग के कर्मचारियों ने पकड़ कर जेल मे ढाई साल तक सड़ाया. जवाहर नामक ग्रामवासी को शेर की खाल रखने के झूठे आरोप में छह महीने तक जेल में रखा गया, स़िर्फ इसलिए कि वह वन विभाग की पोल जानता था और उसके द्वारा की जा रही चोरी के ख़िला़फ आवाज़ उठाता था. आज से महज़ चार वर्ष पहले कोई सोच भी नहीं सकता था कि किसी राष्ट्रीय उद्यान के कोर ज़ोन के अंदर किसी गांव को मालिकाना हक़ भी प्राप्त हो सकता है. यह तभी संभव हो पाया, जब 2006 में अनुसूचित एवं अन्य परंपरागत वन निवासी (वनाधिकारों को मान्यता) अधिनियम पारित हुआ और वनों में रहने वाले आदिवासियों एवं अन्य परंपरागत वन समुदायों को अंग्रेज़ों के ज़माने से स्थापित वन विभाग की गुलामी से मुक्ति मिली. हम कह सकते हैं कि सूरमा को 15 अगस्त, 1947 के बजाय 8 अप्रैल, 2011 को आज़ादी मिली.

इस गांव को वन विभाग द्वारा उजाड़ने की पूरी रणनीति बन चुकी थी, लेकिन जनसंगठनों, राष्ट्रीय वन-जन श्रमजीवी मंच, थारू आदिवासी महिला मज़दूर किसान मंच और मीडिया के सक्रिय सहयोग के सहारे सूरमा ने अपना संघर्ष ज़ारी रखा. वनों में रहने वाले अन्य गांवों को साथ लेकर एक सशक्त संगठन बनाया गया. अपना अस्तित्व बचाने के लिए सूरमा पिछले 33 वर्षों से लगातार संघर्ष कर रहा था. दुधवा नेशनल पार्क बनने के बाद इन दोनों गांवों को बेदखली के आदेश जारी कर दिए गए थे. सूरमा की कुल क़रीब 1250 एकड़ ज़मीन के बदले क़रीब 550 एकड़ ज़मीन 6 खंडों में बांटकर देने का प्रस्ताव किया गया, लेकिन इन 6 खंडों में भी पहले से ही अन्य थारू आदिवासी परिवार बसे हुए थे. सूरमा के लोगों ने इस प्रस्ताव को स्वीकार न करते हुए 1980 में उच्च न्यायालय की शरण ली. 23 सालों तक चले इस मुक़दमे का निर्णय 2003 में आया. अपने फैसले में उच्च न्यायालय ने भी पार्क प्रशासन के आदेशों को दोहराते हुए सूरमा को अपनी जगह से हटने का आदेश जारी किया. पार्क प्रशासन द्वारा गांव हटाने के लिए तमाम तरह की कार्रवाइयां की गईं, जिनमें हथियारबंद कार्रवाई भी शामिल थी. बावजूद इसके यहां के लोगों ने अपना संघर्ष ज़ारी रखा. सूरमा का आंदोलन रंग लाया और 2002 में राष्ट्रीय वन-जन श्रमजीवी मंच के घटक संगठन के रूप में थारू आदिवासी महिला मज़दूर किसान मंच का गठन करके संघर्ष और तेज़ कर दिया गया. 2005 में राष्ट्रीय मंच ने राष्ट्रीय ग्रामीण विकास संस्थान हैदराबाद के साथ सूरमा, ध्यानपुर, पटिहन, बसंतापुर कलां और मकनपुर आदि पांच गांवों का अध्ययन किया. अक्टूबर 2007 में इस अध्ययन की रिपोर्ट के आधार पर यहां के ब्लॉक पलिया कलां में एक जन सुनवाई हुई, जिसमें सूरमा के मुद्दे को प्रमुखता से उठाया गया. 15 दिसंबर, 2006 को संसद में वनाधिकार क़ानून पारित होने और एक जनवरी, 2008 को इसके लागू हो जाने के बाद संघर्ष ने और भी तेज़ी पकड़ ली.

इस क़ानून के तहत गठित राज्य निगरानी समिति में जब सूरमा का मामला उठा, तब जाकर सरकार जागी. पड़ताल करने पर राज्य निगरानी समिति ने पाया कि उच्च न्यायालय में वन विभाग द्वारा जो तथ्य पेश किए गए थे, वे झूठे थे. इसलिए अब नया क़ानून आने के बाद सूरमा के विषय में पुन: विचार किया जा सकता है. सूरमा का मामला चूंकि राष्ट्रीय उद्यान के कोर ज़ोन का मामला था, इसलिए इसे राज्य निगरानी समिति द्वारा न्याय विभाग को सौंपा गया, जिसने अंतत: दिसंबर 2010 में इस गांव को पार्क क्षेत्र में वनाधिकार क़ानून के तहत बसाए जाने की स़िफारिश की. वनाधिकार क़ानून की धारा 4 (2) एवं 4 (5) और राज्य सरकार द्वारा 13 मई, 2005 के पूर्व अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लोगों के क़ब्ज़े वाली ज़मीनों को नियमित करने के आदेशों को भी ध्यान में रखते हुए यह घोषणा की गई. इस तरह तमाम क़ानूनी प्रक्रियाएं पूरी होने के बाद सूरमा को 8 अप्रैल, 2011 को आज़ादी मिल गई. यह एक ऐतिहासिक जीत थी, जो न स़िर्फ सूरमा या खीरी या उत्तर प्रदेश के लिए, बल्कि पूरे देश के वन क्षेत्रों में रहने वाले वनाश्रित समुदायों और जन संगठनों के आंदोलनों की जीत है. हालांकि उत्पीड़न की इंतहा ने यहां के लोगों के सामने हथियारबंद आंदोलन का रास्ता खोल दिया था, लेकिन उन्होंने जनवादी तरीक़े से अपनी आवाज़ बुलंद की. अब सूरमा जैसी नज़ीर पैदा हो जाने के बाद देश के अन्य नेशनल पार्कों में स्थित ऐसे कई गांवों को ताक़त मिलेगी. वे अब वन विभाग की विस्थापन की चाल कामयाब नहीं होने देंगे, वे अब जंगलों को बचाएंगे और वन्यजीव-जंतुओं को भी.