उपेक्षा की शिकार पुजारी अन्ना की राह पर

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उत्तराखंड देवभूमि होने के कारण पर्यटन प्रधान राज्य के रूप में विश्वविख्यात है. इसी राज्य में प्रसिद्ध बद्रीनाथ धाम एवं पावन केदारनाथ धाम भी हैं, जहां मोक्ष की कामना लेकर प्रति वर्ष लाखों श्रद्धालु हाजिरी लगाने आते हैं. आगामी 8 मई को पावन केदारनाथ धाम के पट श्रद्धालुओं के लिए खुलेंगे. ठीक एक दिन बाद यानी 9 मई को नारायण धाम के रूप में विख्यात बदरीनाथ धाम के पट खुलेंगे. तीर्थयात्रियों को लुभाने के लिए राज्य सरकार, पर्यटन विभाग एवं मंदिर समिति की ओर से आएदिन नई-नई सुविधाओं की घोषणा की जाती है, इस वर्ष भी करोड़ों रुपये के बजट को ख़र्च करने की तैयारी कर ली गई है. मंदिर समिति के अध्यक्ष एवं पदाधिकारियों का कार्यकाल भी पट खुलने के साथ ही आठ मई को समाप्त हो जाएगा. वहीं इन पवित्र धामों के डेढ़ सौ से अधिक कर्मचारियों को इस बार भी निराशा ही हाथ लगेगी, जो तंगहाली का जीवन जी रहे हैं. वर्ष 2006 से इन कर्मचारियों को किसी तरह की वेतन बढ़ोत्तरी अथवा सुविधाओं का लाभ नहीं मिला है. इन पावन धामों में कार्यरत पुजारियों को सुबह चार बजे से रात 11 बजे तक सेवा ड्यूटी बजानी पड़ती है. महंगाई की मार से तंगहाल पुजारियों ने अपनी बात सरकार के कानों तक पहुंचाने के लिए अन्ना हजारे का रास्ता अपनाते हुए भूख हड़ताल करने का निर्णय लिया है. पुजारियों द्वारा भूख हड़ताल की घोषणा से राज्य सरकार के हाथ-पैर फूलने लगे हैं.

सरकार यात्रियों की सुविधा के नाम पर तो अरबों रुपये ख़र्च कर रही है, लेकिन इन पावन धामों के पुजारियों-कर्मचारियों की ओर उसका ध्यान रंचमात्र नहीं है. राज्य सरकार ने 99 चिकित्सा इकाइयों की स्थापना, 116 प्री फैब्रीकेटेड व 283 स्थायी शौचालयों एवं 356 मूत्रालयों के निर्माण तथा करीब 66 एंबुलेंस की व्यवस्था करने की घोषणा की है. वहीं इन मंदिरों के पुजारी-सेवाकर्मी दिनोंदिन बदहाल होते जा रहे हैं. एक सौ से अधिक स्वयंसेवक भी समान काम के साथ समान वेतन की मांग कर रहे हैं. प्रत्येक वर्ष इन पवित्र धामों के विकास के लिए भारत सरकार से करोड़ों रुपये का अनुदान प्राप्त होता है.

बद्री-केदार कर्मचारी समिति ने प्रदेश शासन पर धाम से जुड़े पुजारियों-कर्मचारियों की घोर उपेक्षा का आरोप लगाते हुए भूख हड़ताल की धमकी दी है. समिति से जुड़े पंडा-पुरोहितों का कहना है कि इन धामों में तमाम विषम परिस्थितियों में इतने अधिक समय तक काम करने के बावजूद सरकार उनकी मांगों पर ध्यान नहीं दे रही है. अपनी तीन सूत्रीय मांगों का एक ज्ञापन भी समिति के पदाधिकारियों ने मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक को भेजा है, जिसमें कहा गया है कि राज्य के अन्य कर्मचारियों की तरह इन धामों के पुजारियों-कर्मचारियों को भी वेतन वृद्धि और पेंशन का लाभ दिया जाए. मंदिर के कर्मचारियों को राज्य कर्मचारियों की तरह वेतनमान दिया जाए. विपरीत मौसम में काम करने के लिए उन्हें अतिरिक्त भत्ता दिया जाए. समिति के अध्यक्ष दरबान सिंह कहते हैं कि इन धामों से जुड़े पुजारियों-कर्मचारियों को छह माह तक दुर्गम स्थलों और विकट भौगोलिक परिस्थितियों में काम करना पड़ता है. इन सभी से समय के मानक के विपरीत आठ घंटे से अधिक सेवा ली जाती है. राज्य सरकार को चार धाम यात्रा और तीर्थस्थलों से भारी आय होती है. मंदिर के पुजारियों-कर्मचारियों का वेतन राज्य कर्मचारियों के मुक़ाबले काफी कम है. रोजाना बढ़ रही महंगाई की मार से इनकी हालत ख़राब हो गई है. छह वर्ष से इनके वेतन में किसी तरह की बढ़ोत्तरी नहीं हुई. सरकार यात्रियों की सुविधा के नाम पर तो अरबों रुपये ख़र्च कर रही है, लेकिन इन पावन धामों के पुजारियों-कर्मचारियों की ओर उसका ध्यान रंचमात्र नहीं है. राज्य सरकार ने 99 चिकित्सा इकाइयों की स्थापना, 116 प्री फैब्रीकेटेड व 283 स्थायी शौचालयों एवं 356 मूत्रालयों के निर्माण तथा करीब 66 एंबुलेंस की व्यवस्था करने की घोषणा की है. वहीं इन मंदिरों के पुजारी-सेवाकर्मी दिनोंदिन बदहाल होते जा रहे हैं. एक सौ से अधिक स्वयंसेवक भी समान काम के साथ समान वेतन की मांग कर रहे हैं. प्रत्येक वर्ष इन पवित्र धामों के विकास के लिए भारत सरकार से करोड़ों रुपये का अनुदान प्राप्त होता है. राज्य सरकार ने पर्यटन मंत्रालय के जरिए केंद्र सरकार से हेमकुंड साहब फूलों की घाटी के विकास के लिए दो अरब रुपये की मांग की है. केंद्र सरकार ने पिछले दिनों अकेले गंगोत्री धाम के विकास के लिए पचास करोड़ रुपये का बजट स्वीकृत किया है, फिर भी इन धामों के पुजारियों-कर्मचारियों के साथ राज्य सरकार सौतेला बर्ताव कर रही है. मांगों पर ध्यान देने के बजाय स़िर्फ आश्वासन दिया जा रहा है.

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