उत्तर प्रदेश: माओवादियों की दस्तक

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सोनभद्र एवं चंदौसी के बाद अब माओवादी कौशांबी, फतेहपुर, चित्रकूट एवं महोबा आदि जनपदों में भी दस्तक देने लगे हैं. चित्रकूट में जल, जंगल और ज़मीन पर दबंगों के क़ब्ज़े के कारण हालात गंभीर हो गए हैं. सरकार की भूमिका बड़े जमीदारों जैसी हो गई है. सरकार ने सीलन एक्ट को शहरी क्षेत्र में अप्रभावी बनाकर उद्योगपतियों को भूमि लूटने की खुली छूट दे रखी है. बड़े-बड़े उद्योगपति कृषि भूमि को औने-पौने दामों में ख़रीद कर देश की खाद्यान्न सुरक्षा पर चोट पहुंचाने के साथ ही लाखों हाथों को बेरोज़गार करके समाज में अराजकता पैदा कर रहे हैं. बड़े पैमाने पर उपजाऊ भूमि शहरीकरण के नाम पर नीलाम हो चुकी है. दिल्ली से आगरा तक चार टाउनशिप बनाने के नाम पर ज़मीन हड़पने का खेल जिस तरह हो रहा है, वह बहुत ख़तरनाक है. इन क्षेत्रों में नक्सलवाद-माओवाद पनपने की वजहों को समझना बहुत ज़रूरी है. नौकरशाह उद्योगपतियों के नौकर बन गए हैं. यह लूट रोकने के लिए स़िर्फ भूमि अधिग्रहण क़ानून बदलने से काम नहीं चलेगा.

भारतीय किसान संघ कृषि भूमि और कृषि के प्रति अंतरराष्ट्रीय साजिशों के प्रति जनता को आगाह करने का प्रयास कर रहा है. संघ प्रतिनिधि एम जे ख़ान, देहात मोर्चा के केसरी सिंह गुज्जर एवं राष्ट्रीय किसान संगठन की प्रीति सिंह ने बताया कि केंद्र सरकार की उदासीनता के चलते कृषि क्षेत्र के सामने चुनौती दिनोंदिन बढ़ती जा रही है. केसरी सिंह ने कहा कि डॉ. स्वामीनाथन कमीशन की रिपोर्ट लागू नहीं की जा रही है.

भारतीय किसान संघ कृषि भूमि और कृषि के प्रति अंतरराष्ट्रीय साजिशों के प्रति जनता को आगाह करने का प्रयास कर रहा है. संघ प्रतिनिधि एम जे ख़ान, देहात मोर्चा के केसरी सिंह गुज्जर एवं राष्ट्रीय किसान संगठन की प्रीति सिंह ने बताया कि केंद्र सरकार की उदासीनता के चलते कृषि क्षेत्र के सामने चुनौती दिनोंदिन बढ़ती जा रही है. केसरी सिंह ने कहा कि डॉ. स्वामीनाथन कमीशन की रिपोर्ट लागू नहीं की जा रही है. अगर कृषि भूमि का अधिग्रहण इसी रफ्तार में होता रहा तो लाखों लोग भूख से मरने के लिए मजबूर हो जाएंगे. अंग्रेजों द्वारा भूमि अधिग्रहण स़िर्फ सड़क, बांध एवं अन्य सरकारी कामों के लिए होता था, लेकिन भारतीय सरकार अंग्रेजों से भी बदतर साबित हो रही है. वह प्रॉपर्टी डीलर बन गई है. 35 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि ख़त्म कर दी गई. इसे लेकर पिछले तीन माह से आंदोलन चल रहा है. एनसीआर से आगरा तक चार टाउनशिप बनाने का ठेका दिया गया है. इसकी आड़ में किसका भला हो रहा है? इससे किसानों और आम आदमी पर असर पड़ेगा. देश की खाद्यान्न सुरक्षा ख़त्म हो जाएगी. आज एक लाख से अधिक परिवार नोएडा में सड़कों पर आ गए हैं, जो भुखमरी के कारण अपराध करने से भी पीछे नहीं हटते. 40 प्रतिशत युवा कृषि कार्य छोड़ना चाहते हैं. बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हित साधने के लिए अपने ही लोग देशद्रोही बन गए हैं. वे बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए सीड बिल लाने हेतु लॉबिंग कर रहे हैं, ताकि किसान बीज स्वयं न तैयार कर सकें और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के पेटेंट बीजों का उपयोग करें. विदेशी संगठन देश में किसानों के हितों के विपरीत कार्य करने वाले एनजीओ को फंड मुहैया कर रहे हैं. आरटीआई के माध्यम से पता चला कि यूरोपियन यूनियन ने दिल्ली स्थित एनजीओ सेंटर फॉर साइंस एंड इन्वायरमेंट (सीएसई) को 56 करोड़ रुपये दिए हैं.

किसान संगठनों की मांग है कि 5000 करोड़ रुपये की आय बीमा योजना लांच की जाए, ताकि किसानों को मूल्य में उतार-चढ़ाव और फसल न होने की स्थिति में राहत मिल सके. यह मांग उत्पाद का उचित मूल्य मिलने की है, न कि किसी तरह की सब्सिडी, जो किसानों के लिए हानिकारक है. अधिकतम समर्थन मूल्य का विस्तार अन्य फसलों तक भी किया जाए, विशेषकर बागवानी की फसलों को. किसान प्रतिनिधियों ने 2011-12 के बजट को भी निराशाजनक बताया, क्योंकि इसमें कृषि विकास के लिए कोई कार्यक्रम नहीं है. उन्होंने कहा कि किसी भी किसान संगठन को बजट से पूर्व या बाद में चर्चा के लिए नहीं बुलाया गया, स़िर्फ कुछ एमएनसी प्रायोजित किसानों को बुलाया गया. भूमि अधिग्रहण के विरोध के बावजूद सरकार प्रॉपर्टी डीलर के रूप में काम करना नहीं छोड़ रही है. किसानों को अपनी भूमि के लिए न्यूनतम 75 प्रतिशत बाज़ार दर मिलनी चाहिए. यदि भूमि अधिग्रहण बिल किसानों को संतुष्ट करके पारित नहीं किया गया तो टकराव थमने वाला नहीं है. जल, जंगल और ज़मीन की लड़ाई अब आमने-सामने की लड़ाई बनती जा रही है. वनों पर आधारित आदिवासी समुदाय एवं वनटगिया लामबंद होने लगे हैं. उनके वनाधिकारों को मान्यता देने वाला अनुसूचित जनजाति एवं अन्य परंपरागत वननिवासी क़ानून-2006 एक जनवरी, 2008 से देश भर में लागू किया जा चुका है. उत्तर प्रदेश में भी सरकार द्वारा इसे लागू करने के निर्देश जारी किए गए हैं, लेकिन वन विभाग और प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा राज्य सरकार के निर्देशों का अनुसरण नहीं किया जा रहा है. साथ ही लगातार इस विशिष्ट क़ानून के क्रियान्वयन की प्रक्रिया को बाधित करने का काम किया जा रहा है. वनाधिकार क़ानून के तहत वन समुदायों को अधिकार सौंपने के बजाय उन्हें जंगल से बेदख़ल किया जा रहा है. वनवासियों द्वारा प्रस्तुत दावों को नियम विरुद्ध तरीक़े से निरस्त किया जा रहा है, सामुदायिक अधिकारों की बात पर एकदम चुप्पी है, लोगों को लघु वनोपज के अधिकार से वंचित किया जा रहा है. जंगल में अपनी ज़रूरत का सामान लेने गए लोगों को लकड़ी काटने और शिकार का आरोप लगाकर झूठे मुक़दमों में फंसाया जा रहा है. यह वनाधिकार क़ानून का सीधा उल्लंघन है, जिससे देश के विभिन्न वन क्षेत्रों में संवैधानिक संकट पैदा हो रहा है.

प्रदेश सरकार ने अक्टूबर 2010 में जनपद सोनभद्र में 7000 मुक़दमे वापस लेने की घोषणा की थी, लेकिन स्थानीय स्तर पर वन विभाग और प्रशासन द्वारा इन सब मामलों में लोक अदालत लगाकर आदिवासियों एवं अन्य परंपरागत समुदायों को पैसा देकर उनसे अपराध स्वीकार कराया जा रहा है और उनका आपराधिक इतिहास बनाया जा रहा है, जिससे वनाधिकार क़ानून सही ढंग से लागू न हो सके और विभाग एवं प्रशासन की मनमानी चलती रहे. इस जन सुनवाई में ऐसे कई गंभीर मामले जूरी सदस्यों के समक्ष प्रस्तुत किए गए, जिनमें जनपद सोनभद्र, चंदौली एवं मिर्जापुर में वन विभाग और पुलिस द्वारा आदिवासियों को माओवादी बनाकर उन पर झूठे मुक़दमे दर्ज हुए थे. इन्हीं जनपदों से वनाश्रित समुदाय के विरुद्ध दर्ज क़रीब 10,000 फर्ज़ी मामलों की सूची भी जूरी के समक्ष रखी गई. इन मुक़दमों में 80 फीसदी संख्या महिलाओं की है. साथ ही प्रदेश के सात जनपदों के टांगिया गांवों के मामले भी इनमें शामिल हैं. ये गांव आज भी वन विभाग के अधीन हैं, जिन्हें अंग्रेजी शासनकाल में वन लगाने के लिए बंधुआ मज़दूरों की तरह इस्तेमाल किया गया था. ये गांव अभी तक अपने संवैधानिक अधिकारों से वंचित हैं और इस देश के नागरिक नहीं कहलाते. इन्हें वोट देने का अधिकार नहीं है.

प्रदेश के मुख्य सचिव द्वारा इन गांवों को राजस्व ग्रामों का दर्जा देने का आदेश जारी किए जाने के बाद भी वन विभाग द्वारा अड़ंगा लगाया जा रहा है. जनपद खीरी में जंगलों में रहने वाले कई थारू आदिवासियों पर वन्य जंतुओं का शिकार करने के झूठे मामले दर्ज किए गए और उनमें से कई को जेल भेज दिया गया. वहीं वन विभाग की मिलीभगत से तस्करों द्वारा आएदिन वन्यजीव-जंतुओं का शिकार किया जाता है, लेकिन उस तऱफ किसी का ध्यान नहीं है. खीरी जनपद की मोहम्मदी तहसील के दिलावर नगर में सरकार द्वारा बसाए गए बाढ़ पीड़ित परिवारों को वन विभाग ने बड़ी बर्बरता के साथ भगा दिया. उनके घरों को आग लगा दी गई, लोगों को पीटा गया और महिलाओं के साथ अभद्रता की गई. यह तब किया गया, जबकि इन परिवारों के पास हाईकोर्ट का आदेश था कि इन्हें उजाड़ा न जाए. इसी तरह पलिया तहसील और खीरी की नेपाल सीमा से जुड़े फिक्सड डिमांड होल्डिंग गांव गौरी फंटा को उजाड़ने के लिए वन विभाग द्वारा पूरा माहौल बनाया जा रहा है, जबकि ये गांव वनाधिकार क़ानून के तहत बसाए जाने चाहिए. मिर्जापुर, चित्रकूट एवं बांदा में भी वनाधिकार क़ानून लागू करने की प्रक्रिया न के बराबर है.

सबसे बड़ी समस्या इन क्षेत्रों में बसे आदिवासी कोल समुदाय को अनुसूचित जनजाति का दर्जा न मिलना है, जिसकी वजह से वनाधिकार क़ानून के अनुरूप उन्हें 75 वर्ष का प्रमाण देने के लिए बाध्य किया जा रहा है. हालांकि प्रदेश सरकार ने 50 साल तक के साक्ष्यों को आधार मानते हुए मालिकाना हक़ देने की बात कही है, लेकिन वन विभाग और ज़िला प्रशासन कुछ भी सुनने को तैयार नहीं है और मनमानी पर आमादा है. दिलावर नगर में वन विभाग द्वारा 2007 में घरों व फसलों को जलाना, पल्हनापुर टांगियां में वनाधिकार क़ानून की प्रक्रिया को लंबित करना, खीरी के थाना पलिया, ग्राम बसही और चंदन चौकी सीमा क्षेत्र में वन्यजीव-जंतु संरक्षण अधिनियम की आड़ में आदिवासियों का उत्पीड़न, गौरी फंटा गांव को नोटिस, ग्राम ढकिया जनपद पीलीभीत में बेदखली, सहारनपुर-गोरखपुर-महराजगंज-खीरी के टांगियां गांवों को वनाधिकार क़ानून के तहत राजस्व ग्राम का दर्जा न देना, गोंडा जनपद के पांच टांगियां ग्रामों में वनाधिकार क़ानून लागू होने के बाद भी ग्रामीणों के खेतों में गड्‌ढे खोदना और बंधुआ मज़दूरी प्रथा ज़ारी रखना, चंदौली में गोंड एवं अन्य आदिवासियों को अनुसूचित जनजाति की श्रेणी में शामिल न करना, मगरदह टोला एवं सत्तद्वारी जनपद सोनभद्र में वन विभाग द्वारा आदिवासियों के घरों-फसलों को जलाना, राष्ट्रीय वन-जन श्रमजीवी मंच के कार्यकर्ता रामशकल गोंड को माओवादी बताकर जेल भेजना, भैसइया नाला में वन विभाग द्वारा घर-फसल जलाना, चित्रकूट में डबल एंट्री, सोनभद्र में वन विभाग और पुलिस द्वारा आदिवासियों एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं पर फर्जी मुक़दमे लादना आदि मामलों को जूरी के सामने रखने के लिए हज़ारों लोग राजधानी लखनऊ की इस जन सुनवाई में मौजूद थे. ज़ूरी के सदस्य मन्नुलाल मरकाम (रिटायर्ड न्यायाधीश जबलपुर एवं सदस्य, राष्ट्रीय वनाधिकार संयुक्त समीक्षा समिति), रवि किरण जैन (वरिष्ठ अधिवक्ता, इलाहाबाद उच्च न्यायालय), स्मिता गुप्ता (सदस्य, वनाधिकार क़ानून ड्राफ्ंटिंग कमेटी) एवं मणिमाला (निदेशक, गांधी स्मृति दर्शन, नई दिल्ली) आदि ने जल, जंगल और ज़मीन से ज़ुडे इन तमाम मामले सुने और पीड़ितों की बात आगे तक ले जाने का आश्वासन दिया.

दरअसल बात यह है कि बांध, जलाशय एवं सड़क निर्माण और उद्योगों के नाम पर किसानों को भूमिहीन करने का सिलसिला पूरे देश में चल रहा है. आवास विकास परिषद और विकास प्राधिकरण नए जमीदारों के रूप में जबरन और छल-प्रपंच से भूमि अधिग्रहीत करके उसे अधिक दामों में बेचने का कार्य कर रहे हैं.

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