उत्तराखंडः कांग्रेस पर गुटबंदी हावी

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देश में पांच राज्यों के चुनाव संपन्न होने के साथ ही उत्तराखंड में भी राजनीतिक तपिश तेज हो गई है. राज्य की पांच संसदीय सीटों पर क़ब्ज़े के बाद से ही कांग्रेसी नेताओं की बांछें खिली हुई हैं. आठ माह बाद होने वाले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को व्यापक जन समर्थन मिलने की उम्मीद के चलते संगठन में गुटबंदी तेज हो गई है. पार्टी के पांच पांडव के रूप में विख्यात शीर्ष नेता चुनावी समर जीतने की रणनीति बनाने के बजाय एक-दूसरे की टांग खींचने और मुख्यमंत्री पद की दौड़ में सबसे आगे बने रहने में ही अपनी ऊर्जा खपा रहे हैं. मालूम हो कि हरीश रावत, विजय बहुगुणा, इंदिरा हृदयेश, हरक सिंह रावत एवं यशपाल आर्या को राज्य में कांग्रेस के पांच पांडव के रूप में जाना जाता है. सूबे की राजनीति पर पकड़ रखने वालों का मानना है कि अगर उक्त पांचों नेता एकजुट होकर चुनाव मैदान में उतर जाएं तो कोई भी ताक़त राज्य में कांग्रेस को हरा नहीं सकती, लेकिन उसी एकजुटता का सवाल कांग्रेस के लिए चुनौती बना हुआ है, क्योंकि उक्त पांचों दिग्गज अपनी ढपली-अपना राग वाले रास्ते पर चल रहे हैं. इनमें से हर कोई ख़ुद को मुख्यमंत्री पद का हकदार मान रहा है.

कांग्रेस के पांचों पांडव अपनी जनसेवा के लिए विख्यात हैं, लेकिन आपस में एकता न होने के कारण पार्टी की चुनावी तैयारियां परवान नहीं चढ़ पा रही हैं. राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि अगर इनमें आपसी समझ स्थापित हो जाए तो कांग्रेस इस बार के विधानसभा चुनाव में शानदार प्रदर्शन कर सकती है. वहीं भाजपा ने अल्पसंख्यकों एवं दलितों को अपने पाले में खींचने के लिए प्रयास तेज कर दिए हैं. मुख्यमंत्री निशंक ने तो पार्टी की ओर मुस्लिम प्रत्याशी उतारे जाने की घोषणा भी कर दी है. कांग्रेस के साथ दलितों के जुड़ाव ने भाजपा हाईकमान के माथे पर चिंता की लकीरें उकेर दी हैं.

एक ओर पार्टी के पांच पांडव आपसी फूट की वजह से कोई ठोस चुनावी रणनीति बनाते नहीं दिख रहे, वहीं दूसरी ओर जयराम संस्थाओं के अध्यक्ष एवं वरिष्ठ कांग्रेसी ब्रह्मस्वरूप ब्रह्मचारी इस बार चुनाव में पार्टी के सारथी की भूमिका निभाने का मन बनाए बैठे हैं. जानकारों का कहना है कि पार्टी हाईकमान भी यही चाहता है. ब्रह्मस्वरूप ब्रह्मचारी की दस जनपथ से निकटता किसी से छुपी नहीं है. ब्रह्मचारी ने ही जयराम संस्थाओं के केंद्रीय प्रांगण में सोनिया गांधी का हिंदू सनातन परंपरा के अनुसार स्वागत-अभिनंदन करते हुए मंदिरों में उनके प्रवेश का रास्ता प्रशस्त किया था और आरएसएस समेत विभिन्न नेताओं को करारा जवाब देकर उनकी बोलती बंद कर दी थी. तभी से ब्रह्मस्वरूप ब्रह्मचारी को दस जनपथ द्वारा बेहद पसंद किया जाता है. दिल्ली दरबार की पहल पर ही नारायण दत्त तिवारी ने उन्हें प्रदेश के पहले संस्कृत विश्वविद्यालय का कुलपति और राज्य संस्कृत अकादमी का उपाध्यक्ष बनाया था. छात्र जीवन से ही संघ के धुर विरोधी होने के साथ-साथ उनकी समाजसेवा के कारण उन्हें एक निष्ठावान कांग्रेसी के रूप में जाना जाता है.

राज्य में कांग्रेस की वापसी के संकेतों के चलते पार्टी के दिग्गज मुख्यमंत्री बनने की अपनी चाहत छुपा नहीं पा रहे हैं. उधर हाईकमान किसी को मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट करके चुनाव लड़ने के पक्ष में नहीं है. बावजूद इसके हर बड़ा नेता यत्र-तत्र-सर्वत्र ख़ुद को मुख्यमंत्री पद का दावेदार साबित करने में जुटा हुआ है. इस काम में हरिद्वार के सांसद एवं केंद्रीय मंत्री हरीश रावत सबसे आगे चल रहे हैं. उनका मानना है कि हाईकमान ने पिछली बार उनके हक़ पर कुठाराघात करके नारायण दत्त तिवारी को मुख्यमंत्री बनवा दिया था, लेकिन इस बार उनका स्वाभाविक हक़ बनता है. मुख्यमंत्री बनने के बाद नारायण दत्त तिवारी को घेरने का काम विपक्ष ने कम, हरीश रावत ने ज़्यादा किया था. दूसरे पांडव टिहरी के सांसद विजय बहुगुणा हैं, जो पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय हेमवती नंदन बहुगुणा के पुत्र हैं. वह भी सूबे का मुखिया बनने का सपना संजोए बैठे हैं. तीसरे नंबर पर हैं इंदिरा हृदयेश, जो तिवारी मंत्रिमंडल के वरिष्ठ सदस्यों में शामिल थीं. वह भी हर तरह से ख़ुद को योग्य बताते हुए इस दौड़ में शामिल हैं. चौथे स्थान पर हैं हरक सिंह रावत, जिन्होंने राज्य की भाजपा सरकार के ख़िला़फ आंदोलन में अहम भूमिका निभाकर राहुल गांधी की मंडली के बीच ख़ुद को चर्चित कर लिया है. हरक ख़ुद को भावी मुख्यमंत्री बताते हैं.

पांचवे पांडव प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष यशपाल आर्या हैं, जिन पर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी भी भरोसा जता चुकी हैं. आर्या कांग्रेस के दलित चेहरे हैं. उनके प्रयासों के चलते सूबे में बसपा का हाथी कांग्रेस को नहीं रौंद सका. दलित वोटों के बल पर ही लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को आशा से अधिक सफलता मिली और उसने सभी पांचों सीटें जीत लीं. आर्या इस राज्य की ब्राह्मण-क्षत्रिय राजनीति को संतुलन प्रदान करने वाले नेता सिद्ध हुए हैं. इसीलिए तमाम विरोधों को दरकिनार करके सोनिया ने एक बार पुन: उन पर भरोसा किया है. उनके मन में भी सीएम बनने की चाह हिलोरे ले रही है. आर्या पूर्व मुख्यमंत्री तिवारी की भी पहली पसंद हैं. इसी के साथ सूबे की आधी से अधिक सीटों पर पहाड़ी मानुस और मैदानी मानुस का मुद्दा भी जोर पकड़ने लगा है. हरीश रावत भी पहले पहाड़ से चुनकर आते थे, लेकिन इस बार वह मैदानी क्षेत्र हरिद्वार से सांसद चुने गए हैं. उनका मानना है कि वह पहाड़ में जितने लोकप्रिय हैं, उतने ही मैदान में भी हैं. हरीश पहाड़ी-मैदानी जंग में ख़ुद को एक सेतु की भूमिका में मानते हैं. सच तो यह है कि भाजपा द्वारा ऐन मौक़े पर प्रत्याशी बदलने का लाभ कांग्रेस को मिल गया था और हरीश चुनाव जीत गए थे.

कांग्रेस के पांचों पांडव अपनी जनसेवा के लिए विख्यात हैं, लेकिन आपस में एकता न होने के कारण पार्टी की चुनावी तैयारियां परवान नहीं चढ़ पा रही हैं. राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि अगर इनमें आपसी समझ स्थापित हो जाए तो कांग्रेस इस बार के विधानसभा चुनाव में शानदार प्रदर्शन कर सकती है. वहीं भाजपा ने अल्पसंख्यकों एवं दलितों को अपने पाले में खींचने के लिए प्रयास तेज कर दिए हैं. मुख्यमंत्री निशंक ने तो पार्टी की ओर मुस्लिम प्रत्याशी उतारे जाने की घोषणा भी कर दी है. कांग्रेस के साथ दलितों के जुड़ाव ने भाजपा हाईकमान के माथे पर चिंता की लकीरें उकेर दी हैं. भाजपा कांग्रेस के अंदरखाने में फूट डालकर अपना मिशन-2012 सफल बनाना चाहती है. इधर कांग्रेस हाईकमान ने चौधरी वीरेंद्र सिंह को प्रभारी बनाकर उन्हें बेलगाम नेताओं पर काबू पाने का काम सौंप दिया है. चौधरी ने भी देहरादून पहुंच कर पहली बैठक में ही ऐसे नेताओं को संदेश दे दिया है कि वे पार्टी विरोधी गतिविधियों से बाज आएं. समस्या तो यह है कि अभी चौधरी को भी समझ में नहीं आ रहा है कि राज्य में पार्टी के पक्ष में बन रही हवा को बरक़रार कैसे रखा जाए और बड़बोले नेताओं पर अंकुश कैसे लगाया जाए. चौधरी अगर अपनी कोशिशों में कामयाब रहे तो इस बार उत्तराखंड में कांग्रेस की सरकार बनना लगभग तय है. लेकिन इसके लिए वरिष्ठ नेताओं को अपनी महत्वाकांक्षा पर काबू पाना होगा, अन्यथा वही होगा कि सावधानी हटी, दुर्घटना घटी.

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