अफीम से महकते खेत

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अफग़ानिस्तान की वादियां ही अ़फीम के फूलों से नहीं महकतीं, अब तो भारत में भी ब़डे पैमाने पर अ़फीम की खेती हो रही है. केंद्रीय नारकोटिक्स ब्यूरो (सीबीएन) के मुताबिक़, देश में क़रीब दस लाख लोग अ़फीम की खेती से ज़ुडे हुए हैं. देश के विभिन्न राज्यों के 6900 गांवों के एक लाख 70 हज़ार परिवार अ़फीम की खेती कर रहे हैं. इन सभी को सरकार ने लाइसेंस दे रखा है. ये तो स़िर्फ वे आंकड़े हैं, जो सरकारी दस्ताव़ेजों में दर्ज हैं. इसके अलावा उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, बिहार, झारखंड, हरियाणा, पंजाब और महाराष्ट्र आदि राज्यों में भी अ़फीम की खेती अवैध रूप से होती है. कुल अ़फीम का 50 फीसदी उत्पादन उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान में होता है. देश में अ़फीम उत्पादन का निर्धारित कोटा 12 सौ मीट्रिक टन है. इसमें 870 मीट्रिक टन निर्यात, 130 मीट्रिक टन घरेलू इस्तेमाल और 200 मीट्रिक टन स्टॉक के लिए है. भारतीय बाज़ार में एक किलो अ़फीम की क़ीमत डेढ़ लाख रुपये है, जबकि एक किलो हेरोइन की क़ीमत डे़ढ करो़ड रुपये है. अ़फीम से ब्राउन शुगर भी बनाई जाती है. अ़फीम में 12 फीसदी मा़र्फीन पाई जाती है. अ़फीम नशीली होती है और इसके सेवन से नींद आने लगती है. अ़फीम एक औषधीय पौधा है और दर्द निवारक समेत कई दवाओं में इसका इस्तेमाल किया जाता है. इसके अलावा अ़फीम नशे के भी काम आती है.

अ़फीम की खेती को लेकर सरकार दोहरे मापदंड अपना रही है. एक तऱफ तो सरकार अ़फीम उत्पादन को ब़ढावा देने के नाम पर विदेशी कंपनियों को आमंत्रित कर रही है, वहीं दूसरी तऱफ भारतीय किसानों को लाइसेंस देने की शर्तों को क़डा कर दिया गया है. लाइसेंस की एक शर्त के मुताबिक़, किसान को प्रति हेक्टेयर 53 किलो अ़फीम देनी होती है. अ़फीम का लक्ष्य पूरा न होने पर बीते फरवरी माह में उत्तर प्रदेश के बाराबंकी ज़िले के 300 किसानों ने 80 हेक्टेयर क्षेत्र में ख़डी फसल तबाह कर दी थी. उनका मानना था कि ऐसा करने से उनका लाइसेंस तो बच जाएगा.अ़फीम की खेती को लेकर सरकार दोहरे मापदंड अपना रही है. एक तऱफ तो सरकार अ़फीम उत्पादन को ब़ढावा देने के नाम पर विदेशी कंपनियों को आमंत्रित कर रही है, वहीं दूसरी तऱफ भारतीय किसानों को लाइसेंस देने की शर्तों को क़डा कर दिया गया है. लाइसेंस की एक शर्त के मुताबिक़, किसान को प्रति हेक्टेयर 53 किलो अ़फीम देनी होती है. अ़फीम का लक्ष्य पूरा न होने पर बीते फरवरी माह में उत्तर प्रदेश के बाराबंकी ज़िले के 300 किसानों ने 80 हेक्टेयर क्षेत्र में ख़डी फसल तबाह कर दी थी. उनका मानना था कि ऐसा करने से उनका लाइसेंस तो बच जाएगा.

भारत अ़फीम की वैध खेती कराने वाला दुनिया का पहला देश है. सरकार ने देश में अ़फीम के उत्पादन की व्यवस्था में बदलाव करने का फैसला किया है. इसके तहत ब्रिटेन की जॉनसन मैथी, स्पेन की अलकैलिबर, ऑस्ट्रेलिया की टीपीआई और हंगरी की एल्कलोइडा आदि कंपनियों के साथ मिलकर सन फार्मा ने अ़फीम प्रसंस्करण का एक काऱखाना लगाने का ठेका हासिल करने के लिए बोली लगाई है. यह ठेका हासिल करने वाली विदेशी कंपनी को भारत में पांच हज़ार हेक्टेयर में अ़फीम की खेती करने की सुविधा भी मिलेगी. सरकार का मानना है कि भारतीय किसान आज भी पारंपरिक तरीक़े से खेती कर रहे हैं. इसके तहत पहले पोस्त के फल में चीरा लगाया जाता है और फिर उससे निकलने वाले द्रव्य को इकट्ठा कर लिया जाता है. इसके बाद उसे काऱखानों को बेच दिया जाता है. इस प्रक्रिया में अ़फीम का का़फी हिस्सा बर्बाद हो जाता है, जबकि आधुनिक तकनीक में फल से क़रीब आठ इंच नीचे चीरा लगाया जाता है और फिर खजूर के पे़ड से रस निकालने की विधि की तरह उसकी पेराई कर द्रव्य इकट्ठा किया जाता है. अ़फीम की खेती का व़क्त दिसंबर से फरवरी तक है. फसल तैयार होने पर मार्च में इसकी कटाई शुरू कर दी जाती है. इसकी खेती के लिए पर्याप्त सिंचाई जल की ज़रूरत होती है. ग़ौरतलब है कि वित्त मंत्रालय हर साल अ़फीम की खेती से संबंधित लाइसेंस की नीति जारी करता है. सरकार अ़फीम की खेती करने वाले किसानों को बीमे की सुविधा भी देती है. यह योजना केंद्रीय नारकोटिक्स ब्यूरो (सीबीएन) द्वारा जारी लाइसेंस के तहत अधिसूचित क्षेत्रों में अ़फीम की खेती करने वाले किसानों के लिए लागू होती है. नारकोटिक्स ब्यूरो पर्यवेक्षण के अधीन की जा रही अ़फीम की खेती में प्राकृतिक आपदाओं जैसे बाढ़, चक्रवात, तू़फान की वजह से फसलों के उखड़ने, पाला, कीट एवं अन्य रोगों से होने वाले नुक़सान के लिए बीमा सुरक्षा प्रदान की जाती है. बीमा बुवाई से फसल काटने की प्रथम प्रक्रिया शुरू करने के तुरंत पहले की तारी़ख तक होता है.

अ़फग़ानिस्तान अ़फीम का सबसे ब़डा उत्पादक है. यहां एक लाख 31 हज़ार हेक्टेयर क्षेत्र में अ़फीम की खेती होती है. अ़फग़ानिस्तान के  किसानों ने 2010 में क़रीब चार हज़ार टन अ़फीम का उत्पादन कर 60 करोड़ डॉलर की कमाई की है, जो 2009 के मुक़ाबले 38 फीसदी ज़्यादा है. हालांकि यह उत्पादन 2003 के मुक़ाबले सबसे कम है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में अचानक अ़फीम की क़ीमतों में बढ़ोत्तरी के कारण किसानों को फायदा हुआ. तालिबान की आमदनी का मुख्य ज़रिया भी अ़फीम की खेती है. बताया जाता है कि इस व़क्त तालिबान ने क़रीब 12 हज़ार टन अ़फीम की जमा़खोरी कर रखी है. दुनिया की 90 फीसदी हेरोइन अ़फगानिस्तान से ही अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों में पहुंचती है. यहां 2007 में 8200 टन और 2008 में 7700 टन अ़फीम का उत्पादन हुआ. संयुक्त राष्ट्र मादक द्रव्य नियंत्रण कार्यक्रम की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, दुनिया भर में सालाना 400 अरब डॉलर से अधिक मूल्य के नशीले पदार्थों का अवैध व्यापार होता है. नशीले पदार्थों का धंधा लोहे, इस्पात और कारों के अंतरराष्ट्रीय व्यापार से ज़्यादा और कपड़े के निर्यात के बराबर है. इन नशीले पदार्थों के धंधे में इतना ज़्यादा फायदा है कि तस्कर इसके लिए बड़े से बड़ा जोखिम उठाने को तैयार रहते हैं. मादक पदार्थों के कारोबार के दो लोकप्रिय रूट हैं. एक है गोल्डन ट्रायंगल, जिसमें म्यांमार, थाईलैंड और लाओस शामिल हैं और दूसरे रूट गोल्डन क्रिसेंट में अ़फग़ानिस्तान और पाकिस्तान आते हैं. भारत भी मादक पदार्थों के कारोबार का गढ़ बन चुका है. भारत में नाइजीरियाई मादक पदार्थों का कारोबार चला रहे हैं. भारत में हर साल एक हज़ार किलो हेरोइन और 120 किलो कोकीन की खपत होती है. नशे का इंजेक्शन लेने वाले उत्तर-पूर्व के लोगों में से क़रीब 78 फीसदी लोग संक्रामक बीमारियों के शिकार हैं. कोकीन का कारोबार दक्षिण अमेरिकी देश कोलंबिया से संचालित होता है. कोलंबिया के अलावा ब्राज़ील और मैक्सिको से भी यह कारोबार चलता है. कोलंबिया में सबसे ज़्यादा कोकीन तैयार की जाती है. इस मामले में पेरू दूसरे और बोलीविया तीसरे स्थान पर है. दुनिया भर में कोकीन का सेवन करने वालों की तादाद क़रीब डेढ़ करोड़ है. कोकीन का कारोबार कोलंबिया से शुरू होकर अमेरिका, ब्रिटेन, स्पेन, हांगकांग और पुर्तगाल के रास्ते पूरी दुनिया में फैलता है.

भारत में 1985 में नारकोटिक्स ड्रग एंड साइकोट्रॉपिक सब्सटांस एक्ट (एनडीपीएस) बनाया गया था. यह क़ानून अ़फीम पैदा करने से लेकर विभिन्न क़िस्म के नशे के सेवन और उनके अवैध कारोबार से जु़डे हर अपराध की सज़ा निर्धारित करता है. इसकी द़फा आठ के मुताबिक़, अवैध रूप से अ़फीम की खेती करते हुए पक़डे जाने पर 10 से 20 साल तक क़ैद और दो लाख रुपये तक के जुर्माने की सज़ा है. 1989 में इसमें एक नया अध्याय 5-ए जोड़ा गया, जिससे पुलिस को यह अधिकार दिया गया कि वह अ़फीम के अवैध कारोबार के ज़रिए बनाई गई संपत्ति को ज़ब्त कर सकती है. क़ानून में कोई भी नशीली दवा बेचने, बांटने, अपने पास रखने और उनके आयात-निर्यात में शामिल होने आदि की सज़ा निर्धारित की गई है. इसकी सज़ा 10 से 20 साल तक हो सकती है. दूसरी बार इसी तरह के अपराध में पकड़े जाने पर सज़ा 30 साल तक हो सकती है और साथ में जुर्माना भी हो सकता है, लेकिन यह क़ानून अपने इस्तेमाल के लिए नशीली दवा रखने और बिक्री करने के अपराधों में ही फर्क़ करता है. अगर आरोपी यह साबित करने में कामयाब हो जाए कि उसके पास मिलीं नशीली दवाएं खुद के इस्तेमाल के लिए हैं तो उसे केवल छह माह से एक साल तक की सज़ा होगी. इसके लिए ज़रूरी है कि बरामद दवाओं की मात्रा कम हो. यह मात्रा अलग-अलग नशीले पदार्थों के लिए अलग-अलग तय की गई है.

भारत में नक्सली भी अ़फीम की खेती को ब़ढावा दे रहे हैं. वे अ़फीम के बदले चीन, नेपाल एवं बांग्लादेश से हथियार और विस्फोटक लेते हैं. नारकोटिक्स ब्यूरो के अधिकारी समय-समय पर छापामारी करके अ़फीम की अवैध खेती करने वालों के खिला़फ कार्रवाई करते हैं. इस दौरान अ़फीम के लहलहाते खेतों को तबाह कर दिया जाता है. अ़फीम की खेती करने वाले किसानों का आरोप है कि ब्यूरो उन्हें लाइसेंस नहीं देता. झारखंड के अमूमन सभी ज़िलों में अ़फीम की खेती हो रही है. नारकोटिक्स ब्यूरो ने माना है कि राजधानी रांची समेत, हज़ारीबाग़, चतरा, दुमका, खूंटी, कोडरमा, गिरिडीह, लातेहर, साहेबगंज, बोकारा और धनबाद में अ़फीम की खेती से किसान मोटी कमाई कर रहे हैं. इसके अलावा जामता़डा, पाकु़ड, गुमला और पलामू में भी अ़फीम की खेती होती है. खास बात यह है कि आम किसान ही नहीं, बल्कि गांव के मुखिया भी अ़फीम की खेती करते हुए पक़डे गए हैं. बीते फरवरी माह में पश्चिम बंगाल के वीरभूम और वर्द्धमान ज़िले में पुलिस ने 150 एक़ड भूमि पर लगी अ़फीम की फसल को तबाह किया. इसी तरह बीते अप्रैल माह में हिमाचल प्रदेश पुलिस ने मुहिम चलाकर अ़फीम के क़रीब 10 लाख पौधे नष्ट किए. नारकोटिक्स ब्यूरो की टीम ने उत्तराखंड के 44 ऐसे गांवों की पहचान की है, जहां अवैध रूप से अ़फीम की खेती होती है. टीम ने मोता़ड, बैनोल, देई, राजूगांव, बदाऊ , बन्नूगा़ड और बागी आदि गांवों में छापा मारकर अ़फीम की फसल नष्ट की. हरियाणा के कैथल ज़िले में भी बीते मार्च माह में अ़फीम की खेती पक़डी गई. इसी दौरान पुलिस ने महाराष्ट्र के अहमदनगर में भी अ़फीम की अवैध खेती पक़डी.

अ़फीम की खेती को लेकर सरकार दोहरे मापदंड अपना रही है. एक तऱफ तो सरकार अ़फीम उत्पादन को ब़ढावा देने के नाम पर विदेशी कंपनियों को आमंत्रित कर रही है, वहीं दूसरी तऱफ भारतीय किसानों को लाइसेंस देने की शर्तों को क़डा कर दिया गया है. लाइसेंस की एक शर्त के मुताबिक़, किसान को प्रति हेक्टेयर 53 किलो अ़फीम देनी होती है. अ़फीम का लक्ष्य पूरा न होने पर बीते फरवरी माह में उत्तर प्रदेश के बाराबंकी ज़िले के 300 किसानों ने 80 हेक्टेयर क्षेत्र में ख़डी फसल तबाह कर दी थी. उनका मानना था कि ऐसा करने से उनका लाइसेंस तो बच जाएगा. नारकोटिक्स ब्यूरो ने तस्करी के मद्देनज़र किसानों पर सख्ती करते हुए उनसे उपज का ब्योरा लेना शुरू कर दिया है. किसानों का कहना है कि मौसम अनुकूल न होने एवं अन्य कारणों से उत्पादन घटने, कृषि लागत ब़ढने और नारकोटिक्स ब्यूरो के सख्त रवैये के कारण अ़फीम उत्पादकों का इससे मोहभंग होने लगा है. हालत यह हो गई थी कि 2006-07 में स़िर्फ सात किसानों ने ही अ़फीम की खेती का लाइसेंस लिया था. बाद में इन किसानों ने भी अ़फीम की खेती से तौबा कर लाइसेंस वापस कर दिए. इसके चार साल बाद किसानों ने अ़फीम की खेती को अपनाया, लेकिन पर्याप्त उत्पादन न होने की वजह से उन्हें मायूसी ही हाथ आई. सनद रहे कि नारकोटिक्स ब्यूरो के अधिकारियों ने ज़िले के जैतपुर, हैदरग़ढ और सुबेहा में हेरोइन की तस्करी करने वाले गिरोह के कई सदस्यों को पक़डा था, तबसे यहां के किसानों के साथ सख्ती शुरू कर दी गई.

मध्य प्रदेश के भवानी मंडी के किसानों को भी खासी परेशानी का सामना करना प़ड रहा है. उनका कहना है कि लगातार गिरते भूजल स्तर का असर अ़फीम के उत्पादन पर प़डा है. उत्पादन घटने से उनकी आमदनी इतनी कम हो गई है कि घर-परिवार का गुज़ारा करना मुश्किल हो गया है. उन्हें इस बात का भी मलाल है कि जहां बाज़ार में अ़फीम की क़ीमतें आसमान छू रही हैं, वहीं इस हिसाब से सरकार ने उनकी फसल के दाम नहीं ब़ढाए हैं. क़रीब ढाई दशक पहले यहां के किसानों के पास 25 हज़ार पट्टे थे, मगर अब यह घटकर स़िर्फ छह सौ रह गए हैं. क़ाबिले ग़ौर है कि अ़फीम के मुद्दे पर उन्नीसवीं सदी के मध्य में चीन और ब्रिटेन के बीच दो ल़डाइयां भी हो चुकी हैं, जिन्हें अ़फीम युद्ध के नाम से जाना जाता है. दरअसल, ब्रिटेन के चीन के साथ कारोबार में आई कमी और ब्रिटेन द्वारा भारत से चीन में कराई जा रही अ़फीम की तस्करी को लेकर दोनों देशों में जंग के हालात बन गए. पहली जंग 1839 से 1842 और दूसरी जंग 1856 से 1860 तक चली. दोनों ही जंगों में चीन की हार हुई और उसे अ़फीम तस्करी के मुद्दे पर खामोश रहने के लिए मजबूर होना प़डा. उस व़क्त चीन में अ़फीम के आयात पर पाबंदी थी. इस जंग में फ्रांस ने ब्रिटेन का साथ दिया था.

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One Response to “अफीम से महकते खेत”

  • kranti Patel says:

    औशाध्के कम आनेवाली वनस्पति हमारे देशमे होतिथि आजभी हमें पर्देश्से मंगवानी न पड़े तो अच्छा ही है.
    क्रांति पटेल
    कनाडा

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