अतिक्रमण की आग और झारखंड

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अतिक्रमण हटाओ अभियान ने राज्य में खासी उथल-पुथल मचा दी है. राजधानी रांची हो या औद्योगिक नगरी जमशेदपुर, बोकारो हो या देवघर, हर तऱफ इस अभियान ने अमन-चैन को ख़तरा पैदा कर दिया है. इस मामले में सियासी रोटियां भी जमकर सेंकी जा रही हैं. बीते 27 अप्रैल को धनबाद भी अचानक दहक उठा. चारों तऱफ आगजनी, पथराव, लाठीचार्ज, अश्रुगैस का छिड़काव और अंत में अंधाधुंध फायरिंग से निरीह लोगों की मौत ने शहर की शांति व्यवस्था भंग कर दी. बीसीसीएल (भारत कोकिंग कोल लिमिटेड) के बचकाने फैसलों और पुलिस की बर्बरता ने जनसामान्य को बहुत कुछ सोचने के लिए मजबूर कर दिया है. अपना आशियाना छीनने का विरोध कर रहे लोगों पर पुलिस द्वारा की गई बर्बर कार्रवाई एवं उससे उत्पन्न तनाव ने बीसीसीएल प्रबंधन और ज़िला प्रशासन के साथ-साथ राज्य सरकार को भी कठघरे में खड़ा कर दिया है. घर नहीं तो बेघर नहीं के मुद्दे पर बीसीसीएल प्रबंधन, पुलिस और कथित अवैध क़ब्ज़ाधारियों के बीच चल रहे संघर्ष ने अचानक भीषण रूप अख्तियार कर लिया. धनबाद के कुसुंडा, केंदुआ, कुस्तौर, गोधर, झरिया, लोदना, बोर्रागढ़, बस्ताकोला, अलकुसा एवं भौंरा में जमकर हिंसा हुई, जिसमें पांच लोगों की मौत हो गई और दो दर्जन से अधिक लोग घायल हुए. सौ से अधिक वाहन, दर्जनों कार्यालय, आवास, अस्पताल एवं चेकपोस्ट फूंक दिए गए. एसपी, डीएसपी, बैंक मोड़ थाना प्रभारी, जोगता थाना प्रभारी और पुलिस के कई जवानों सहित कुछ नेता भी जख्मी हुए. घटना के बाद धनबाद नगर निगम क्षेत्र और बाघमारा में बीसीसीएल एरिया एक, दो एवं तीन में कर्फ्यू लगा दिया गया.

यह सच है कि विभिन्न कोलियरी इलाक़ों में बीसीसीएल की ज़मीनों और आवासों पर लोगों के अवैध क़ब्ज़े हैं, लेकिन इन इलाक़ों की कई कालोनियां और बस्तियां बीसीसीएल के जन्म के पहले से वजूद में हैं. उन्हें भी अतिक्रमण के घेरे में डाल दिया गया है. अतिक्रमण हटाने के दौरान पुलिस का जो रवैया रहा, उससे लोगों में काफी आक्रोश है. सरेआम गोलियां चलाने और लोगों को घरों से निकाल-निकाल कर पीटने का अधिकार पुलिस को किसने दिया? ऐसा लगा कि जैसे पुलिस क़ानून व्यवस्था बरक़रार रखने के लिए नहीं, बल्कि उसे बिगाड़ने के लिए सड़कों पर उतर आई. लोगों को देखते ही गोली मारने का आदेश आख़िर क्या साबित करता है?

बीते 27 अप्रैल की सुबह कुसुंडा में अवैध क़ब्ज़े हटाने के लिए पुलिस बल कोल बोर्ड कॉलोनी के समीप पहुंचा तो कार्रवाई से आक्रोशित लोग भी मटकुरिया चेकपोस्ट पहुंच गए. भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पुलिस ने अश्रुगैस छोड़ी और फिर हवाई फायरिंग भी की. थोड़ी देर बाद वहां विभिन्न राजनीतिक दलों एवं ट्रेड यूनियनों के नेता भी पहुंच गए, जिनके नेतृत्व में भीड़ कॉलोनी की ओर बढ़ चली. तभी अचानक पत्थरबाज़ी शुरू हो गई. यह देख पुलिस ने लाठीचार्ज कर दिया, कई चक्र गोलियां भी चलाईं. फलस्वरूप भगदड़ मच गई और उग्र भीड़ ने वाटर कैनन, वज्रवाहन, चेकपोस्ट और मोटरसाइकिलों को आग के हवाले कर दिया. मौक़े पर पहुंचे पुलिस कप्तान रविकांत धान और जोगता थाना प्रभारी जख्मी हो गए. चार घंटे तक पुलिस और इलाकाई लोगों के बीच जमकर संघर्ष हुआ. जैप-3, सशस्त्र पुलिस बल और सीआईएसएफ के जवानों से पूरा क्षेत्र पट गया. उपायुक्त सुनील वर्णवाल भी घटनास्थल पर पहुंचे. इस बीच कुसुंडा क्षेत्र में लोगों ने एक एंबुलेंस, दो जीपों, सात कारों, दो जेनरेटरों और दो मोटरसाइकिलों में आग लगा दी. यहां स्थिति पर नियंत्रण पाने के लिए पुलिस ने 17 चक्र गोलियां चलाईं, जिसमें तीन लोग घायल हुए. केंदुआ में डीसी के काफिले पर पथराव किया गया. पुलिस ने एक बार फिर फायरिंग और लाठीचार्ज का सहारा लिया. क्षेत्र में धारा 144 लागू कर दी गई. देखते ही गोली मारने के आदेश के साथ ही लाउडस्पीकर के माध्यम से लोगों को घरों में ही रहने की चेतावनी दी गई. आंदोलनकारियों के आक्रोश का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि बीसीसीएल के लगभग हर क्षेत्र में उपद्रव हुआ, जिसमें करोड़ों का नुक़सान हुआ. अतिक्रमण हटाओ अभियान की चपेट में आने वाले लोगों ने अपना गुबार जमकर निकाला. उन्होंने गोधर स्थित 26 नंबर कार्यालय जला डाला. कुस्तौर क्षेत्रीय अस्पताल, जीएम एस पी सिंह और कुसुंडा एरिया के पूर्व जीएम ए के सेनगुप्ता के आवासों पर भी हमला हुआ. अलकुसा चेकपोस्ट के पास एक टैंकर जला दिया गया. पीबी एरिया के जीएम जे पी गुप्ता एवं कुसुंडा के पूर्व एजीएम अशोक राव के घरों पर भी पत्थरबाज़ी हुई. लोयाबाद वर्कशॉप में खड़ी पोकलेन, पेलोडर एवं शॉवेल आदि मशीनों को आग के हवाले कर दिया गया.

मालूम हो कि बीते 8 अप्रैल को झारखंड उच्च न्यायालय ने लोक उपक्रमों के आवासों को अवैध क़ब्ज़ों से मुक्त कराने का आदेश दिया था. मुख्य न्यायाधीश भगवती प्रसाद एवं न्यायमूर्ति पूनम श्रीवास्तव ने एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान आदेश दिया कि सावर्र्र्र्जनिक क्षेत्र की कंपनियों (बोकारो स्टील लिमिटेड, हेवी इंजीनियरिंग कॉरपोरेशन, सेंट्रल कोल फील्ड्‌स लिमिटेड एवं भारत कोकिंग कोल लिमिटेड) की ज़मीनों और क्वार्टरों, जिन पर अवैध क़ब्ज़े हैं, को मुक्त कराया जाए. हाईकोर्ट के आदेश पर बीसीसीएल प्रबंधन ने ऐसे आवासों को मुक्त कराने के लिए कमर कस ली. अवैध क़ब्ज़ाधारियों को एक निश्चित समय सीमा के भीतर घर खाली करने और ज़मीन छोड़ने का नोटिस थमा दिया गया, लेकिन अधिकांश लोगों ने उस पर अमल नहीं किया. इस पर बीसीसीएल प्रबंधन ने पुलिस का सहारा लेकर अतिक्रमण हटाओ अभियान शुरू कर दिया, जिससे एक बहुत बड़े विवाद ने जन्म ले लिया. क्षेत्र के हर ख़ास-ओ-आम का कहना है कि बीसीसीएल और पुलिस की नासमझी ने इतनी बड़ी घटना को अंजाम दिया. हाईकोर्ट के आदेश का हवाला देकर लोगों से उनकी छत छीनना कहां तक उचित है? जहां तक बात अवैध क़ब्ज़े की है, अभी तक बीसीसीएल प्रबंधन क्या कर रहा था? यही नहीं, इस मुद्दे को लेकर पिछले एक पखवारे से माहौल काफी गर्म था, लेकिन हाईकोर्ट का आदेश आते ही बीसीसीएल और ज़िला प्रशासन ने क़ानून व्यवस्था की परवाह किए बगैर अतिक्रमण विरोधी अभियान शुरू कर दिया. यह सच है कि विभिन्न कोलियरी इलाक़ों में बीसीसीएल की ज़मीनों और आवासों पर लोगों के अवैध क़ब्ज़े हैं, लेकिन इन इलाक़ों की कई कालोनियां और बस्तियां बीसीसीएल के जन्म के पहले से वजूद में हैं. उन्हें भी अतिक्रमण के घेरे में डाल दिया गया है. अतिक्रमण हटाने के दौरान पुलिस का जो रवैया रहा, उससे लोगों में काफी आक्रोश है. सरेआम गोलियां चलाने और लोगों को घरों से निकाल-निकाल कर पीटने का अधिकार पुलिस को किसने दिया? ऐसा लगा कि जैसे पुलिस क़ानून व्यवस्था बरक़रार रखने के लिए नहीं, बल्कि उसे बिगाड़ने के लिए सड़कों पर उतर आई. लोगों को देखते ही गोली मारने का आदेश आख़िर क्या साबित करता है? ऐसे नाज़ुक हालात में पुलिस को संयम से काम लेना चाहिए था, लेकिन यह नहीं हुआ. पीपुल्स फ्रेंडली पुलिस का नारा डस्टबीन में फेंक दिया गया.

अदालती आदेश की आड़ में सरकार का खेल

हाईकोर्ट के आदेश की आड़ लेकर अतिक्रमण हटाओ अभियान पर रोक लगाने के प्रति सरकार विवशता जता रही है, लेकिन मामला कुछ और है. अदालत ने स़िर्फ राजधानी रांची सहित चार प्रमुख औद्योगिक शहरों के भीड़भाड़ वाले इलाक़े में यातायात व्यवस्था सामान्य बनाने के लिए सड़क के दोनों किनारों से अतिक्रमण हटाने का आदेश दिया था. राज्य सरकार के अधिवक्ता ने एक क़दम आगे बढ़कर अदालत को बताया कि सरकार अतिक्रमण हटाने का निर्णय ले चुकी है और संबंधित ज़िलों के उपायुक्तों को निर्देश दिए जा चुके हैं. अदालत को इसमें कोई आपत्ति नहीं थी. उसकी इसी स्वीकृति को आदेश बताकर दूसरा खेल खेला जाने लगा.सच यह है कि ग़रीबों को लाठी-गोली के बल पर जबरन बेघर करने का आदेश अदालत ने नहीं दिया था. यह राज्य सरकार का अपना निर्णय था. रांची, धनबाद एवं बोकारो में जो हिंसक घटनाएं हुईं, उनकी पृष्ठभूमि राज्य सरकार ने ख़ुद तैयार की थी.

हाईकोर्ट ने उजाड़े गए लोगों के पुनर्वास के संबंध में सरकारी प्रयासों के बारे में जानने की कई बार कोशिश की, लेकिन अभी तक इस संबंध में स़िर्फ संकल्प ही दोहराए जा रहे हैं. राज्य सरकार ने नगर विकास विभाग को राहत शिविरों के लिए एक करोड़ रुपये की राशि देने की घोषणा की है, लेकिन अब तक किसी शहर में शिविर नहीं लगा. शहरी क्षेत्र के बाहर टेंट लगाने का प्रयास किया गया तो स्थानीय लोगों के विरोध के कारण सफलता नहीं मिली. उजाड़े गए लोग अपने परिवार के साथ कहां, किन हालात में रह रहे हैं, इसकी सुध लेने की ज़रूरत भी नहीं समझी गई. दूसरी बात यह कि सरकार स़िर्फ बीपीएल परिवारों के पुनर्वास की बात कर रही है. बीपीएल कार्ड निर्गत करने में जो अनियमितताएं बरती गई हैं, वे जगज़ाहिर हैं. पुनर्वास के नाम पर भी सरकार की नीयत सा़फ नहीं है. यदि पुनर्वास की एक ठोस योजना बनाकर अभियान चलाया जाता तो कहीं भी हिंसक टकराव की नौबत न आती. दरअसल उजाड़े गए लोगों का पुनर्वास सरकार के एजेंडे में न कभी था, न अब है. शहरी इलाक़ों की भीड़भाड़ वाली  सड़कों के दोनों किनारों का अतिक्रमण हटाने में कुछ विशेष परेशानी नहीं हुई. अधिकांश लोगों ने ख़ुद अतिक्रमित हिस्सा तुड़वा दिया. हालांकि इसका दायरा प्रभावशाली लोगों तक नहीं पहुंच पाया. सरकार ने अपना पूरा ध्यान उन मलिन बस्तियों को उजाड़ने पर केंद्रित कर दिया, जिनकी ज़मीन आज क़ीमती हो चुकी है. ज़ाहिर है कि अदालती आदेश की आड़ में सरकार रीयल स्टेट के महारथियों के स्वागत के लिए ज़मीन तैयार कर रही है.

प्राइम लोकेशन के खाली कराए गए सभी भूखंड अतिक्र्रमित नहीं थे. कुछ की वैधानिकता जानबूझ कर संदिग्ध की गई. झारखंड विधानसभा की याचिका समिति में विधायक विनोद कुमार सिंह द्वारा रांची कचहरी मार्केट के संदर्भ में दायर याचिका की सुनवाई के दौरान यह बात सामने आई कि वह ज़मीन बाज़ार समिति द्वारा चालीस वर्ष पहले 155 दुकानदारों के नाम आवंटित थी. उनका पट्टा कटा था और बंदोबस्ती की गई थी. हर वर्ष बंदोबस्ती का नवीनीकरण होता था. इस वर्ष बंदोबस्ती की अवधि 31 मार्च को पूरी हो रही थी. ज़िला प्रशासन ने सरकार से परामर्श किया कि बंदोबस्ती का नवीनीकरण किया जाए या नहीं. सरकार का गुप्त एजेंडा इसे खाली कराना था. इसलिए नवीनीकरण की जगह मात्र 72 घंटे का नोटिस देकर वहां बुलडोज़र दौड़ा दिया गया. याचिका समिति ने इस मार्केट को उजाड़ने से संबंधित अदालत के आदेश की प्रति मांगी तो ज़िला प्रशासन कोई जवाब नहीं दे सका. उसने स़िर्फ पुनर्वासित करने की बात कही. याचिका समिति इस जवाब से संतुष्ट नहीं हुई और उसने 18 मई को संतोषजनक जवाब के साथ उपस्थित होने का आदेश दिया.

यही स्थिति एचइसी के क्वार्टरों से कर्मचारियों के आश्रितों को उजाड़ने से बचाने के लिए विधायक विनोद कुमार सिंह की याचिका पर सुनवाई के दौरान उत्पन्न हुई. अध्यक्ष ने जानना चाहा कि 18 अप्रैल को जब अदालत मामले की सीबीआई जांच का आदेश दे चुकी है तो उसकी रिपोर्ट आने से पहले बस्तियों को उजाड़ने की बात कितनी न्यायसंगत है. इस पर एचइसी के नगर प्रशासक का कहना था कि झारखंड सरकार ने उन्हें निर्धारित पैकेज देने के लिए 320 एकड़ ज़मीन मुहैया कराने की शर्त रखी है. अध्यक्ष ने उन्हें जमकर फटकार लगाई और अगली तिथि को माकूल जवाब के साथ हाजिर होने को कहा. यानी वहां भी बुलडोज़र चलाने की पृष्ठभूमि अदालत नहीं, सरकार तैयार कर रही है. बहरहाल आने वाले समय में यह मामला कौन सा रंग लाएगा, इस पर अभी स़िर्फ क़यास लगाए जा सकते हैं, लेकिन इतना तो सा़फ है कि अतिक्रमण अभियान की इस कहानी में कई पेंच हैं.

श्रमिक कालोनी भूली फिर खतरे में

छह हज़ार से भी अधिक आवासों वाली एशिया की सबसे बड़ी श्रमिक कालोनी भूली पर एक बार फिर उजड़ने का ख़तरा मंडराने लगा है. हालांकि इस बार स्थिति कुछ भिन्न है. झरिया मास्टर प्लान के तहत बीसीसीएल को इसे खाली कराने की इच्छा पहले से रही है. बताया जाता है कि 1998 में पहली बार बीसीसीएल ने भूली को खाली कराने का प्रयास किया था, परंतु लोगों के विरोध के चलते कंपनी ने अपने पैर पीछे कर लिए थे. 2005 में भी बीसीसीएल के तत्कालीन कार्मिक निदेशक द्वारा भूली को खाली कराने की रूपरेखा बनाई गई थी, लेकिन बाद में वह योजना स्थगित हो गई. 2009 में बीसीसीएल ने एक बार फिर भूली टाउनशिप खाली कराने की तैयारी की. उस समय यह बात सामने आई कि झरिया मास्टर प्लान के तहत पुनर्वास के लिए भूली को खाली कराना ज़रूरी है. उस समय राज्य में राष्ट्रपति शासन चल रहा था. राज्यपाल के तत्कालीन सलाहकार टी पी सिन्हा ने यहां तक कह दिया था कि 100 दिनों के भीतर भूली को खाली करा लिया जाएगा. उच्च न्यायालय से आदेश मिलने के बाद अब एक बार फिर बीसीसीएल भूली को खाली कराने का प्रयास करेगी. इस बार वही आवास खाली कराए जाएंगे, जिन पर अवैध क़ब्ज़ा है. भूली निवासी कपिलदेव पांडेय कहते हैं, 1986 से 1998 तक हमसे किराया वसूला जाता रहा. 1998 में बीसीसीएल प्रबंधन ने मनमाने ढंग से भाड़ा बढ़ाकर 2525 रुपये कर दिया. हम लोगों ने जब विरोध किया तो कंपनी ने हमें अवैध घोषित कर दिया. पार्षद अशोक यादव कहते हैं, बीसीसीएल प्रबंधन ने हाईकोर्ट को गुमराह करने वाली रिपोर्ट सौंपी है. जब यहां के निवासी पानी, बिजली और आवास का किराया देने के लिए तैयार हैं तो फिर प्रबंधन आख़िर क्यों अड़ियल रुख़ अपनाए हुए है.

भूली टाउनशिप प्रशासन (बीटीए) ने 600 लोगों को अतिक्रमणकारी के रूप में चिन्हित करते हुए आवास खाली करने के लिए नोटिस जारी कर दी है. बीसीसीएल के इस क़दम से नाराज़ अधिकांश लोगों ने नोटिस ही फाड़ डाली. विभिन्न राजनीतिक दलों के नेता भी इस मामले में कूद पड़े हैं. धनबाद के विधायक मन्नान मल्लिक एवं धनबाद नगर निगम के डिप्टी मेयर नीरज सिंह ने भूली को खाली कराने की कार्रवाई को गलत बताते हुए इसे रोकने की मांग की. सांसद पशुपतिनाथ सिंह ने बीसीसीएल के सीएमडी टी के लाहिड़ी से इस मुद्दे पर बातचीत भी की, लेकिन कोई हल नहीं निकल पाया है. सांसद ने कहा कि भूली में सभी लोग अतिक्रमणकारी नहीं हैं. ज़्यादातर आवासों में बीसीसीएल के कर्मचारी रहते हैं. बीसीसीएल ने ही उन्हें आवास आवंटन किया है. कुछ आवासों के आवंटन सीएमडब्ल्यू (कोल माइंस वेलफेयर आर्गनाइजेशन) के समय से हैं. इसलिए केवल भाड़ा संबंधी विवाद के कारण उन्हें अतिक्रमणकारी नहीं कहा जा सकता. सांसद ने सीएमडब्ल्यू के कोल इंडिया में विलय के समय हुए इकरारनामे की प्रति भी सीएमडी को सौंप दी. जहां तक मामला भूली पर मालिकाना हक़ का है तो अदालत में बीसीसीएल अभी तक यह साबित करने में नाकाम रही है कि भूली उसकी है. भूली में आवास खाली कराने के आदेश के ख़िला़फ छह लोगों ने जुलाई 2010 में धनबाद कोर्ट में याचिका दायर की थी. बीसीसीएल ने उन छह आवासों पर अवैध क़ब्ज़े का आरोप लगाते हुए भूली ओपी में मामला दर्ज कराया था. इस मामले में प्रथम श्रेणी न्यायिक दंडाधिकारी की अदालत ने फैसला सुनाते हुए कहा था कि बीसीसीएल यह साबित नहीं कर सकी है कि आवासों पर अवैध क़ब्ज़ा है. यही नहीं, कंपनी भूली पर अपने क़ानूनी हक़ के संबंध में कोई महत्वपूर्ण काग़ज़ात भी कोर्ट को दिखाने में असमर्थ रही थी.

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