कोस्का: खुद खोज ली जीवन की राह

देश भर के जंगली क्षेत्रों में स्व:शासन और वर्चस्व के सवाल पर वनवासियों और वन विभाग में छिड़ी जंग के बीच उड़ीसा में एक ऐसा गांव भी है, जिसने अपने हज़ारों हेक्टेयर जंगल को आबाद करके न स़िर्फ पर्यावरण और आजीविका को नई ज़िंदगी दी है, बल्कि वन विभाग और वन वैज्ञानिकों को चुनौती देकर सरकारों के सामने एक नज़ीर पेश की है. उड़ीसा की राजधानी भुवनेश्वर से मात्र 80 किलोमीटर की दूरी पर जनपद नयागढ़ में बसा यह गांव कोस्का अपने जंगल का ख़ुद मालिक है. इस गांव के लोगों ने अपने उजड़े हुए जंगल को ख़ुद आबाद किया है, वे ख़ुद इसकी सुरक्षा करते हैं और तय की गई व्यवस्था के तहत ख़ुद ही जंगल से प्राप्त होने वाली लघु वनोपज का बंटवारा भी करते हैं. ग्रामवासियों के अनुसार, 1970 के दशक तक आते-आते वन विभाग और लालची तत्वों ने यहां के जंगल को काट-काटकर बर्बाद कर दिया था. कभी बैंबू, साखू और बरगद आदि कई तरह के पेड़ों से हरा-भरा और महुआ की ख़ुशबू से महकता हुआ यहां का जंगल मात्र कटे हुए पेड़ों की जड़ों का क़ब्रिस्तान बनकर रह गया था. इस कारण यहां का भूजल स्तर काफी नीचे चला गया और मौसमी परिवर्तन भी अपना रंग दिखाने लगा. यहां पीढ़ियों से बसे कंध आदिवासी, दलित समुदाय और अन्य पिछड़े वर्गों के लोगों का जंगल और पानी के बिना जीना मुहाल हो गया था.

एक जनवरी, 2008 को देश भर में वनाधिकार क़ानून लागू होने के बाद जब उड़ीसा सरकार ने राज्य में यह क़ानून लागू कराने संबंधी आदेश जारी किए तो कोस्का में भी वनाधिकार क़ानून के क्रियान्वयन की प्रक्रिया समिति द्वारा पहल करते हुए शुरू की गई. ज़ाहिर है, यहां भी इस क़ानून के क्रियान्वयन की प्रक्रिया का हश्र वही हुआ, जो वन विभाग और सामंती सोच से ग्रस्त नौकरशाही द्वारा पूरे देश में किया जा रहा है.

इन सारी स्थितियों को देखते हुए यहां के मुखिया विश्वनाथ ने तब 18 वर्ष की छोटी सी उम्र में पहल करते हुए ग्रामवासियों के साथ मिलकर तय किया कि हम अपना जंगल ख़ुद आबाद करेंगे और उसकी सुरक्षा भी करेंगे. 1970 में उन्होंने यह क्रांतिकारी शुरुआत करते हुए कोस्का व हाथी मुंडा जंगल सुरक्षा समिति का गठन किया. यह शुरुआत भले ही कोस्का से की गई, लेकिन यहां के लोगों ने अपनी सामुदायिक शैली से जीवन जीने की मूल प्रवृत्ति का परिचय देते हुए शुरू से ही आसपास बसे दूसरे गांवों के लोगों को भी अपने साथ शामिल किया. जंगल लगाने और उसकी सुरक्षा करने के लिए उन्होंने एक व्यवस्था क़ायम की, जिसे ठेंगापाली नाम दिया गया. ठेंगापाली एक ऐसी सर्पाकार मुड़ी-तुड़ी लाठी है, जो आज जंगल की सुरक्षा का प्रतीक बन चुकी है. जंगल की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी के लिए बारी-बारी से रोज़ाना ठेंगापाली को किसी एक घर की दहलीज पर रख दिया जाता, जिसका अर्थ होता कि आज जंगल में पहरा देने की ज़िम्मेदारी उस परिवार की है. यह पहरा शुरुआत में दिन और रात दोनों समय दिया जाता था, जो कि अब केवल रात में ही दिया जाता है. 1970 में क़रीब एक हज़ार हेक्टेयर वनक्षेत्र में यह शुरुआत की गई. उस व़क्त गांव के 51 परिवारों के 51 सदस्यों की बनाई गई समिति द्वारा दी गई व्यवस्था रंग लाने लगी और कुछ ही सालों में देखते ही देखते यहां का जंगल फिर से आबाद होने लगा. जंगल आबाद होने पर समिति द्वारा तय किए गए क़ायदे के अनुसार वर्ष में तीन बार ज़रूरत के हिसाब से तय की गई मात्रा में गांव के सभी परिवारों को बैंबू, हल बनाने और जलावन के लिए लकड़ी तथा महुआ जैसी लघु वनोपज उपलब्ध कराई जाती. हल बनाने के लिए लकड़ी उसी को दी जाती, जिसे ज़रूरत होती, अन्यथा नहीं, क्योंकि यहां के लोग नाहक पेड़ काटने से हमेशा बचना चाहते थे.

हालांकि शुरुआत में इस ठेंगापाली व्यवस्था से आसपास के 16 अन्य गांव भी जुड़ गए और क़रीब 16,000 हेक्टेयर वनक्षेत्र में यह काम शुरू किया गया, लेकिन वे ज़्यादा समय तक इस व्यवस्था को क़ायम नहीं रख पाए. आज कोस्का एवं हाथी मुंडा जैसे इक्का-दुक्का गांव ही हैं, जो जंगल पर स्व:शासन स्थापित करने वाली इस ठेंगापाली व्यवस्था को न स़िर्फ अपने लिए बदस्तूर जारी रखे हुए हैं, बल्कि आसपास के दूसरे गांवों में बसे परिवारों की ज़रूरतों को भी अपने आबाद किए जंगल से पूरा करने का काम करते हैं. इसकी एवज में उनसे बाकायदा एक निर्धारित शुल्क लिया जाता है, जो जंगल सुरक्षा समिति के कोष में जमा हो जाता है. दूसरे गांव के लोगों को जंगल में पेड़ अथवा लघु वनोपज काटने के काम आने वाले औज़ार ले जाने की अनुमति भी ठेंगापाली व्यवस्था का क़ानून नहीं देता. लोगों की मांग एवं जमा किए गए शुल्क के आधार पर समिति स्वयं उनकी मांग पूरा करती है. समिति के को-आर्डिनेटर कैलाश चंद्र साहू बताते हैं कि समीपवर्ती गांवों में यहां पैदा होने वाले महुआ के फूलों की सबसे ज़्यादा मांग है, जिससे भोजन बनाने में प्रयुक्त होने वाला तेल निकाला जाता है. समिति द्वारा बनाए गए कायदे तोड़ने पर दंड का भी प्रावधान रखा गया है, जिसमें जुर्माने से लेकर गांव निकाला तक शामिल है. दंड के नाम पर किसी भी तरह का शारीरिक उत्पीड़न नहीं किया जाता. नगद जुर्माना भी जंगल को हुए नुक़सान के आधार पर तय किया जाता है. इस सामुदायिक व्यवस्था में अगर किसी परिवार को कभी अतिरिक्त आवश्यकता होती है तो उस अतिरिक्त लघु वनोपज का भी शुल्क लिया जाता है. लघु वनोपज के बदले और दंड द्वारा समिति में जमा किया गया कोष वर्ष के अंत में गांव के सभी परिवारों में बराबर-बराबर बांट दिया जाता है. यहां पूर्व में बसे 51 परिवारों, जो अब बढ़ते-बढ़ते क़रीब 80 हो गए हैं, में भले ही देसुआ कंध एवं मालवा कंध जनजातियों और अन्य जातियों के दलित-पिछड़े वर्गों के लोग निवास करते हों, लेकिन उन्हें गांव और समिति में कभी भी जातियों के आधार पर बांटकर अलग-अलग नहीं देखा जाता. ठेंगापाली व्यवस्था सभी के लिए एक जैसी रखी गई है.

एक जनवरी, 2008 को देश भर में वनाधिकार क़ानून लागू होने के बाद जब उड़ीसा सरकार ने राज्य में यह क़ानून लागू कराने संबंधी आदेश जारी किए तो कोस्का में भी वनाधिकार क़ानून के क्रियान्वयन की प्रक्रिया समिति द्वारा पहल करते हुए शुरू की गई. ज़ाहिर है, यहां भी इस क़ानून के क्रियान्वयन की प्रक्रिया का हश्र वही हुआ, जो वन विभाग और सामंती सोच से ग्रस्त नौकरशाही द्वारा पूरे देश में किया जा रहा है. लेकिन कोस्का के लोगों ने सरकारी तरीक़े से यह क़ानून लागू करने की प्रक्रिया को एक प्रकार से ठेंगा दिखा दिया है. विश्वनाथ का कहना है कि हमने तो अपने गांव में सरकार के क़ानून लागू करने से पहले ही क़ानून को लागू कर लिया है. अब जंगल हमारे नियंत्रण में है और जंगल पर कैसे हमारा मालिकाना हक़ हमें मिलेगा, यह हमारी ग्रामसभा तय करेगी. यहां के लोगों को कहना है कि अफसरशाही किसी भी तरह इस क़ानून को हमारे पक्ष में लागू नहीं करेगी, क्योंकि वह नहीं चाहती कि वन संपदा हमारे हाथ में आए. इसलिए जब यहां क़ानून के क्रियान्वयन की प्रक्रिया शुरू की गई तो देश के दूसरे हिस्सों की तरह यहां भी स्थानीय वन विभाग और प्रशासन गांव वालों को 75 वर्ष के निवास प्रमाण की अनिवार्यता के मकड़जाल में फंसा कर इनके क़ानूनी अधिकारों की प्राप्ति के रास्ते में रोड़े अटकाने लगा. 18 मार्च, 2009 को कोस्का सहित क़रीब 20 गांवों के लोगों ने अपने दावे उपखंड स्तरीय समिति के समक्ष प्रस्तुत कर दिए थे, जिन्हें समिति ने पास भी कर दिया, लेकिन डीएफओ ने यह आपत्ति लगाकर दावों को निरस्त कर दिया कि दावा की गई जंगल की ज़मीनें पहाड़ किस्म की हैं और वे वनभूमि में नहीं आतीं. जबकि लोगों का कहना है कि ये सारी ज़मीनें वन विभाग के खातों में राजस्व वन के रूप में अंकित हैं. प्रमाण प्रस्तुत करने पर इन गांवों के दावे पुन: 2009 में ही उपखंड स्तरीय समिति के पास जमा कराए गए, जो क़रीब दो वर्ष का समय बीत जाने के बाद भी अभी तक ज़िला स्तरीय समिति के पास लंबित पड़े हैं.

यह बात तो बिल्कुल साफ है कि इस गांव में वनाधिकार क़ानून को कैसे लागू किया जाना है, इसके लिए सरकार को ही इस गांव से प्रशिक्षण लेना चाहिए, क्योंकि कोस्का इस मामले में नज़ीर साबित हुआ है और एक संदेश दे रहा है कि अगर वनाधिकार क़ानून को वास्तविक रूप में लागू कराना है तो पहल समुदायों को ही करनी होगी और वह भी बिना किसी याचना के अधिकारों को स्थापित करके. दूसरी ओर यह गांव एक और नज़ीर का भी चश्मदीद है, जो वनाधिकार क़ानून की मूल मंशा वन समुदायों के साथ हुए ऐतिहासिक अन्याय से मुक्ति की धज्जियां उड़ाकर वन विभाग द्वारा एक ऐसे गांव के अधिकारों को मान्यता न देकर प्रस्तुत की जा रही है, जिसे न स़िर्फ राज्य सरकार पुरस्कृत कर चुकी है, बल्कि जिसकी ठेंगापाली वन रक्षा पद्धति फारेस्ट्री की शिक्षा पा रहे छात्रों के पाठ्यक्रम में शामिल है और जिसे विदेशों में भी एक सीख के रूप में लेते हुए अपनाया गया है. बहरहाल, पूरे देश के वनक्षेत्रों में वनाधिकार क़ानून के क्रियान्वयन की प्रक्रिया पर अगर निगाह डालें तो जो सूचनाएं मिल रहीं हैं, उनके आधार पर कहा जा सकता है कि यह क़ानून भी वहीं लागू हो पा रहा है, जहां समुदाय के लोग पहल कर रहे हैं. वरना सरकारी तंत्र तो मात्र खानापूरी करने में ही लगा हुआ है. यह सच्चाई भी खुलकर सामने आ रही है कि जो लोग संगठित और अपने अधिकारों को लेकर सचेत हैं, उन्होंने वनाधिकार क़ानून आने से पहले ही अपने अधिकारों को हासिल करना शुरू कर दिया था. उत्तर प्रदेश के जनपद सोनभद्र में वहां के वन समुदायों द्वारा महिलाओं की अगुवाई में क़रीब 20,000 एकड़ ज़मीनों पर क़ानून आने से पहले ही पुनर्दखल क़ायम करना, जिन्हें प्रदेश सरकार अब वनाधिकार क़ानून के तहत नियमित करने जा रही है, को भी एक ऐसी ही मिसाल के रूप में देखा जा सकता है.

अगर केंद्र व राज्य सरकारें वास्तव में वन समुदायों के साथ हुए ऐतिहासिक अन्याय के प्रायश्चित के रूप में वनाधिकार क़ानून लागू करना चाहती हैं तो उन्हें उड़ीसा के इस छोटे से गांव से सीख लेनी होगी, क्योंकि यहां के सीधे-सादे, लेकिन पूरी व्यवस्था को चुनौती देने वाले वन समुदाय ने अपनी ठेंगापाली पद्धति से सरकारों को ठेंगा दिखाने का काम किया है, जो कि उड़ीसा में पास्को और वेदांता बनाम आदिवासी समुदाय के सवाल पर नित नए फैसले करके लगातार अपने दोगले रुख़ को उजागर कर रही हैं.

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