आज भारत की न्यायपालिका को किन बीमारियों ने जकड़ रखा है, यह एक कठिन विषय है. सीधे-सीधे इसका जवाब हां या ना में देना संभव नहीं है. आज ज़रूरत है सच्चाई से रूबरू होने और उसका सामना करने की. न्यायपालिका का ट्रैक रिकॉर्ड या इतिहास आज़ादी के बाद से आज तक बहुत ही गौरवशाली है. हमेशा से न्यायपालिका ने एक बहुत बड़ी भूमिका अदा की है जनता के अधिकारों को बचाए रखने के संदर्भ में और यह संविधान के अनुसार न्यायपालिका की सबसे पहली ज़िम्मेदारी भी है. जब भारत की बाक़ी सभी संस्थाएं असफल हो गईं तो बार-बार न्यायपालिका ने जनता के हितों की रक्षा की. इस पृष्ठभूमि में यह प्रश्न देखा जाना चाहिए. आज न्यायपालिका अपनी सबसे महत्वपूर्ण और कठिन चुनौतियों से जूझ रही है.
जजों की नियुक्ति हो या उनका स्थानांतरण, कोई नहीं जानता कि यह सब कैसे होता है. सबसे आवश्यक जो सूचना आई, वह थी जजों के स्थानांतरण की योजना, लेकिन कोई नहीं जानता कि इस योजना को किस कोलिजियम ने बनाया. मैं ख़ुद नहीं जानता, जबकि तब मैं सुप्रीम कोर्ट में ही था. कोलिजियम के कामकाज का भी कोई रिकॉर्ड नहीं रखा जाता. इस बारे में मुझे दो वाकये याद आते हैं.
पहले यह देखना है कि बाक़ी देश में क्या हो रहा है, क्योंकि जब संविधान लागू हुआ तो न्यायपालिका के साथ दो और संस्थाएं भी आईं और वे थीं विधायिका और कार्यपालिका. आज देश के सामने सबसे बड़ी चुनौती भ्रष्टाचार की है. 1948 में जब सबसे पहला घोटाला हुआ था यानी जीप घोटाला, तबसे आज तक देश ने लगभग 50 घोटाले देखे हैं. अभी हाल में सामने आए 2-जी घोटाले ने देश में सारे रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए. यह घोटाला देश के इतिहास में सबसे बड़े घोटाले के रूप में दर्ज हुआ. इस घोटाले में इतना पैसा इधर-उधर हुआ कि कोई भी इसका अंदाज़ा नहीं लगा सकता और जो भी जैसा कहेगा, जितना बड़ी रकम आंकेगा, उसे सही माना जाएगा.
दूसरी ओर अगर ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की रिपोर्ट देखी जाए तो भारत काले धन के मामले में दुनिया में पहले नंबर पर है. भारत का 1460 बिलियन अमेरिकी डॉलर से भी अधिक धन बाहरी देशों में जमा है. वाशिंगटन पोस्ट ने जुलाई 2008 में चुनावों के बाद लिखा था कि 545 सांसदों में से एक चौथाई आपराधिक पृष्ठभूमि के हैं. साथ ही एक पूर्व मुख्य सतर्कता आयुक्त ने बताया कि भारत के 30 फीसदी लोग भ्रष्ट हैं और 50 फीसदी भ्रष्ट होने के कगार पर हैं. पहले रिश्वत ग़लत काम कराने के लिए दी जाती थी, लेकिन आज सही काम सही समय पर कराने के लिए देनी पड़ती है. कहने का मतलब यह है कि भारत आज एक बहुत ही नकारात्मक स्थिति में है, जहां जीवन का हर पहलू भ्रष्टाचार से ग्रस्त है. अब प्रश्न यह उठता है कि क्या न्यायपालिका ख़ुद को इस बीमारी से दूर रख सकती है? अगर हां तो कैसे? क्योंकि अगर न्यायपालिका ख़ुद को इस बीमारी से दूर रख पाती है तो फिर बाक़ी समस्याएं बहुत ही छोटी हैं.
यदि पूछा जाए कि न्यायपालिका में खामियां हैं कि नहीं, तो मेरी समझ से हैं, लेकिन न्यायपालिका की बीमारियां दूसरे संगठनों को देखते हुए पहली स्टेज पर हैं और इन्हें रोका जा सकता है, ठीक किया जा सकता है, यदि सभी लोग एकमत होकर प्रयास करें. आज दो ऐसे पक्ष हैं, जिनके बारे में न्यायपालिका को सोचना होगा. हमने देखा नहीं है कि न्यायपालिका में बहुत बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार हुआ हो. कहीं इक्का-दुक्का कोई एक या दो जजों के ख़िला़फ भ्रष्टाचार का मामला सामने आया, जैसे बंगाल में, लेकिन यह भी अपने आप में बहुत है. जवाबदेही का मसला बहुत महत्वपूर्ण है, ख़ासकर उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय के लिए. जस्टिस कपाड़िया ने कुछ दिनों पहले ही कहा था कि वे सारी संस्थाएं, जिनके पास अधिकार हैं, कहीं न कहीं और किसी न किसी के सामने जवाबदेह होनी चाहिए. मैं इस बात से पूरी तरह इत्ते़फाक़ रखता हूं. लेकिन सवाल है, किसके सामने और कैसे? न्यायपालिका ने अपने घर के भीतर ही ऐसा करने की कई बार कोशिश की, लेकिन असफल रही.
सबसे पहले पंजाब और हरियाणा के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रामास्वामी के ख़िला़फ अभियोग चला, लेकिन संसद में यह ढह गया. लोगों ने कहा कि न्यायपालिका असफल हो गई है, लेकिन ऐसा नहीं है. इसलिए, क्योंकि याद रखने वाली बात यह है कि यह मामला किसी व्यक्ति की याचना या शिकायत से शुरू नहीं हुआ था, बल्कि वहीं के जजों ने रामास्वामी पर आरोप लगाए थे और वहीं उन पर जांच चल रही थी, तभी उन्हें सुप्रीम कोर्ट में प्रमोशन दे दिया गया. तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जस्टिस दीवान ने ऑडिटरों की एक टीम को इन आरोपों की जांच का काम दिया और तब मामला बहुत ही संगीन हो गया, जब टीम की रिपोर्ट में सारे आरोप सही पाए गए. तब सवाल उठा कि अब क्या किया जाए? तब मुख्य न्यायाधीश जस्टिस मुख़र्जी थे और मैं उन्हें दाद देता हूं इस मामले में. उन्होंने पूछा कि अब कैसे काम होगा, जब अमुक जज पर आरोप लगे हैं. तब मैं भी सुप्रीम कोर्ट में था. इस पर बहुत चर्चा चली और एक सुबह पता चला कि जस्टिस रामास्वामी का मामला खुली अदालत में सुना जाएगा, सबके सामने, अधिवक्ताओं के सामने, जनता के सामने. जस्टिस मुख़र्जी ने जस्टिस रामास्वामी से सारा न्यायिक कार्य छीन लेने का आदेश दिया और जजेज इंक्वायरी एक्ट के तहत तीन जजों की एक समिति बनाई कि यह इस मामले की तफ्तीश करेगी. यानी न्यायपालिका अपना कर्तव्य निभाने में नहीं चूकी. इस समिति ने सारे आरोप सही ठहराए और तब यह मसला संसद के सामने गया. और उसके बाद जो हुआ, वह जाना-माना इतिहास है. संसद में क्या हुआ और रामास्वामी को क्यों नहीं निकाला जा सका, मैं इस बात में नहीं जाना चाहता. लेकिन एक बात है, जस्टिस मुख़र्जी इन हाउस क़ानून बना सकते थे, इस तरह की बातों से निपटने के लिए, लेकिन वह कुछ ही समय बाद स्वर्गवासी हो गए. यह तरीक़ा, जिसके तहत एक मुख्य न्यायाधीश किसी भी जज से सारे कार्यभार ले लेता है, इसके बाद कभी भी ठीक से लागू नहीं किया गया. इस तरह कभी भी न्यायपालिका ख़ुद अपने भीतर ही जवाबदेही का कोई सिस्टम नहीं बना सकी.
दूसरे जज के मामले के बाद सारी शक्तियां न्यायालय को ही दे दी गईं सरकार से वापस लेकर और वह जजमेंट जस्टिस वर्मा ने ही लिखा था. तभी से न्यायपालिका अपने यहां होने वाली नियुक्तियों और बाकी बातों के लिए ज़िम्मेदार है. दो दशक हो गए हैं, लेकिन आज तक न्यायपालिका अपने भीतर जवाबदेही का कोई सिस्टम तैयार नहीं कर सकी है. अगर सरकार जजों की जवाबदेही के लिए कोई क़ानून लाना चाहती है तो उसका स्वागत होना चाहिए. न्यायपालिका में जवाबदेही परमावश्यक है. दूसरा जो बहुत आवश्यक पक्ष है, वह है पारदर्शिता. कोई भी नहीं जानता है कि जजों का कोलिजियम कैसे काम करता है. यह सब बहुत ही रहस्यमयी है. जजों की नियुक्ति हो या उनका स्थानांतरण, कोई नहीं जानता कि यह सब कैसे होता है. सबसे आवश्यक जो सूचना आई, वह थी जजों के स्थानांतरण की योजना, लेकिन कोई नहीं जानता कि इस योजना को किस कोलिजियम ने बनाया. मैं ख़ुद नहीं जानता, जबकि तब मैं सुप्रीम कोर्ट में ही था. कोलिजियम के कामकाज का भी कोई रिकॉर्ड नहीं रखा जाता. इस बारे में मुझे दो वाकये याद आते हैं. पहला, जब मैं और वर्मा जी कोलिजियम में थे, तब कोलिजियम स़िर्फ तीन जजों का बन पाया था. एक सुबह मैंने अख़बारों में पढ़ा कि केरल में किसी जज को मुख्य न्यायाधीश बनाया गया है, जो वरिष्ठता में आठवें नंबर पर था. मैं अवाक रह गया कि यह कैसे हो सकता है और मेरे कोलिजियम में रहते किसी ने मुझसे पूछा क्यों नहीं. मैंने वर्मा जी को फोेन किया तो उन्होंने कहा कि यह तो मैं सबसे पहले आपसे ही सुन रहा हूं. हम दोनों चीफ जस्टिस के पास गए और वहां जो हुआ, मैं बताना नहीं चाहता. वैसे जो हुआ, वह नहीं होना चाहिए था, मैं यही कह सकता हूं. दूसरी घटना भी तभी की है. एक मुख्य न्यायाधीश के सामने मैंने और वर्मा जी ने तीन नाम दिए, जिन्हें प्रमोट करना था सुप्रीम कोर्ट के लिए. उन्होंने कहा कि उनके सेवानिवृत्त होने में केवल कुछ ही महीनों का समय था तो उनके बाद आने वाला ही यह काम करे तो ठीक है. बात सही थी. उनके बाद जो आए, उन्हें भी हमने कोलिजियम में होने के नाते नाम दिए, लेकिन उन्होंने कोलिजियम के विरुद्ध जाकर एक नियुक्ति अपने मन से कर दी. सबसे बड़ी बात है कि सरकार ने भी इस पर ध्यान देने से इंकार कर दिया. इसलिए पारदर्शिता भी न्यायपालिका के लिए उतनी ही आवश्यक है, जितनी जवाबदेही.
(लेखक सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश हैं)
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