महाराष्‍ट्रः शीतयुध्‍द थमने के आसार नहीं

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राज्य के वर्तमान परिदृश्यों को देखकर बिल्लियों से जुड़े दो किस्से याद आते हैं. पहला किस्सा है दो बिल्लियों का जो रोटी के लिए आपस में झगड़ा कर रही थीं. जब दोनों में सहमति नहीं बनी तो वे पड़ोसी बिल्ले के पास इस अपेक्षा के साथ गईं कि वह दोनों के बीच रोटी बराबर-बराबर बांट देगा, लेकिन बिल्ला बड़ा चालाक था. उसने रोटी को बराबर होने नहीं दिया और जब वह टुकड़े-टुकड़े करके पूरी रोटी खा गया, तब बिल्लियों की समझ में आया कि वे चालाक बिल्ले के चक्कर में फंसकर अपनी रोटी गंवा चुकी हैं. दूसरा किस्सा है, भाग्य से छींका टूटा. एक बिल्ली छींके में टंगी दूध की हंडिया पाने के लिए बहुत उछल-कूद करती है, पर असफल रहती है, किंतु जब हार मानकर वहां से जाने की सोचती है, तभी छींका टूट जाता है और हंडिया नीचे गिरकर फूट जाती है, दूध बिखर जाता है. बिल्ली बिखरे दूध को चाटकर ख़ुश होती है. इनमें से पहली कहानी सत्तारूढ़ गठबंधन पर लागू होती है तो दूसरी विपक्ष पर. सत्तारूढ़ गठबंधन की दोनों बड़ी भागीदार कांग्रेस-राकांपा में जिस तरह तनातनी चल रही है, उससे नहीं लगता कि यह शीतयुद्ध शीघ्र थमने वाला है. दोनों की इस तनातनी से विपक्ष खुश है और उसे यह लग रहा है कि अगली बार सत्ता पर उसका क़ब्ज़ा होगा. जबसे राज्य सहकारी बैंक के संचालक मंडल को बर्खास्त करके प्रशासक बैठाया गया है, तबसे कांग्रेस और राकांपा के बीच पड़ी दरार को भरने के सारे प्रयास विफल ही साबित हुए हैं. पूरे फॉर्म में चल रही राकांपा की गति को एकदम से लगाम लग गई है. राकांपा के वरिष्ठ नेता एवं उप मुख्यमंत्री अजीत पवार इसके लिए सीधे-सीधे कांग्रेस को ज़िम्मेदार मानते हैं. मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण सहित कांग्रेस के अन्य वरिष्ठ नेताओं द्वारा बार-बार सफाई देने के बाद भी अजीत यह मानने को तैयार नहीं हैं कि यह कार्रवाई रिजर्व बैंक ने की है.

रिपब्लिकन पार्टी अपने नेताओं के अहम के चलते विभाजित है. रिपब्लिकन नेता आपसी एकता की बात तो करते हैं, पर उनके दिल कभी एक नहीं होते. रामदास आठवले जहां शिवसेना-भाजपा से यारी बढ़ाने में लगे हैं, वहीं प्रकाश अंबेडकर राज्य में तीसरा मोर्चा बनाने की बात कर रहे हैं. इन हालात में कांग्रेस-राकांपा के बीच जारी कलह को विपक्ष भले यह मान रहा हो कि उसके भाग्य से छींका टूटा है, वह फूटी हंडिया से गिरे दूध को सहजता से आपस में बांट पाएगा, यह संभव नहीं लगता.

दरअसल, उनकी नाराज़गी की मुख्य वजह यह है कि उन्हें राज्य सहकारी बैंक पर हुई कार्रवाई की भनक तक नहीं लगने दी गई. मुख्यमंत्री चव्हाण को इसके लिए वह ज़िम्मेदार मानते हैं. यही कारण है कि उन्होंने मुख्यमंत्री द्वारा मई के पहले पखवाड़े में बुलाई गई मंत्रिमंडल की बैठक में भी शिरकत करने की ज़रूरत नहीं समझी. उनकी पार्टी के कई मंत्री भी उनका अनुसरण करते हुए बैठक में नहीं गए और अंतत: बैठक रद्द हो गई. राजभवन में आयोजित कार्यक्रम का भी अघोषित बहिष्कार किया गया, क्योंकि वहां मुख्यमंत्री शिरकत करने वाले थे. राकांपा प्रमुख शरद पवार और मुख्यमंत्री चव्हाण के बीच मामले का पटाक्षेप करने के लिए सहमति बनने के बाद भी अजीत मानने को तैयार नहीं हैं.

दिल्ली में आयोजित योजना आयोग की बैठक में भाग लेने जाने से पहले दोनों ने औपचारिक विचार-विमर्श करने की ज़रूरत भी नहीं समझी, जबकि चव्हाण राज्य के मुखिया हैं और पवार वित्त एवं नियोजन मंत्री हैं. दिल्ली भी दोनों अलग-अलग गए. वहां भी पवार की नाराज़गी क़ायम रही और बैठक कक्ष में ही दोनों एक-दूसरे के सामने आए. यह अलग बात है कि केंद्र सरकार ने दरियादिली दिखाते हुए मांग से कहीं अधिक 42,000 करोड़ की भारी-भरकम रकम दे दी, मगर राज्य के शीर्ष पद पर बैठे दो नेताओं के आपसी तनाव से जनता का उद्धार कैसे होगा? उधर विपक्ष ख़ुश है, वह चाहता है कि लड़ाई और बढ़े. दोनों के बीच कटुता जितनी बढ़ेगी, विपक्ष को उतना फायदा होगा. यह बात अजीत पवार को समझ में नहीं आ रही है कि दो लोगों की लड़ाई का फायदा तीसरे को मिलता है, जबकि दोनों को रहना साथ है.

राज्य के बिखरे विपक्ष को अब यह ख़ुशफहमी होने लगी है कि भविष्य में उसकी सरकार बनने का रास्ता साफ होने लगा है. कांग्रेस और राकांपा के बीच की कलह उनके लिए सुनहरा ख्वाब बनकर आई है. विपक्ष जानता है कि दोनों के बीच शुरू हुआ यह द्वंद्व जितना लंबा चलेगा, उसे उतना अधिक फायदा होगा. इस लड़ाई के चलते उसकी सत्ता की ओर जाने की डगर आसान होगी. सोने पे सुहागा यह हुआ कि इसी दरम्यान पेट्रोल के दाम में पांच रुपये का इज़ा़फा हो गया. इसी के मद्देनज़र शिवसेना प्रमुख बालासाहब ठाकरे ने हुंकार भरी कि यह बढ़ोत्तरी राज्य सरकार को भस्म कर देगी. उनके उत्साहित होने के दो कारण हैं, पहला, सत्तारूढ़ गठबंधन में जारी कलह, दूसरा रिपब्लिकन नेता रामदास आठवले का उनकी गोद में बैठ जाना. ध्यान रहे कि जब शिवसेना-भाजपा की सरकार को अपदस्थ कर 1999 में कांग्रेस-राकांपा की सरकार बनी थी तो उसे छह माह में गिराने की घोषणा बालासाहब ठाकरे ने की थी, लेकिन कुछ नहीं कर पाए थे. उसके बाद 2004 के चुनाव में कांग्रेस-राकांपा गठबंधन ने सत्ता में जो वापसी की, उसकी वजह भी विपक्ष का बिखरा होना था. इस बार भी विपक्ष बिखरा हुआ है. शिवसेना के साथ ही भाजपा एवं मनसे को भी को लगता है कि सारे घटनाक्रम का फायदा आने वाले दिनों में उनको मिलेगा. विधानसभा एवं लोकसभा चुनाव तो अभी दूर हैं, पर इसका फायदा कुछ समय बाद होने वाले मुंबई, ठाणे, पुणे, पिंपरी-चिचवड एवं नासिक महानगर पालिका चुनावों में उठाया जा सकता है. मगर विपक्ष जिस तरह बिखरा हुआ है, उससे उसकी सत्ता में वापसी आसान नहीं लगती. विपक्ष अपने सारे प्रयासों के बाद भी सत्तारूढ़ गठबंधन को कभी संकट में नहीं डाल सका है.

शिवसेना विधायकों के तेवर पहले से ढीले हैं. पार्टी नेतृत्व के इशारे के बिना वे सिर तक नहीं हिला सकते. भाजपा में भी अंदरूनी गुटबाज़ी हावी है. उसमें भी विपक्ष का तीखापन नज़र नहीं आता. गोपीनाथ मुंडे और भाजपा अध्यक्ष गुट के बीच के मतभेद जगज़ाहिर हैं. शिवसेना से भी उसके रिश्ते पहले जैसे सहज नहीं हैं. दोनों के नेता एक-दूसरे की टांग खींचने में ज़रा भी देर नहीं लगाते. रिपब्लिकन पार्टी अपने नेताओं के अहम के चलते विभाजित है. रिपब्लिकन नेता आपसी एकता की बात तो करते हैं, पर उनके दिल कभी एक नहीं होते. रामदास आठवले जहां शिवसेना-भाजपा से यारी बढ़ाने में लगे हैं, वहीं प्रकाश अंबेडकर राज्य में तीसरा मोर्चा बनाने की बात कर रहे हैं. इन हालात में कांग्रेस-राकांपा के बीच जारी कलह को विपक्ष भले यह मान रहा हो कि उसके भाग्य से छींका टूटा है, वह फूटी हंडिया से गिरे दूध को सहजता से आपस में बांट पाएगा, यह संभव नहीं लगता. जहां तक मनपा चुनाव की बात है तो सत्तारूढ़ और विपक्षी गठबंधन के दल ही एक-दूसरे के ख़िला़फ कमर कसे हुए हैं. पुणे में राकांपा शिवसेना के साथ मिलकर कांग्रेस को सत्ता से बाहर करने का फार्मूला ईजाद कर चुकी है. पिंपरी-चिचवड में भी यही हालात राकांपा द्वारा पैदा किए जा रहे हैं. कई जगह शिवसेना और भाजपा के भी आमने-सामने होने के आसार हैं.

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