वर्ष 2007 में चौथी बार मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने वाली मायावती का आग़ाज़ जितना अच्छा था, अंजाम उतना ही ख़राब लग रहा है. उनकी सरकार के चार साल पूरे हो गए हैं, अगले साल चुनाव है, लेकिन उनके पास कोई ऐसी उपलब्धि नहीं है, जिसके बल पर वह जनता से वोट मांग सकें. इन चार सालों में मायावती अर्श से फर्श पर आ गई हैं. इस संबंध में आ रही रिपोर्ट और जनता में उभरते आक्रोश से ऐसा आकलन किया जा रहा है, लेकिन आकलन हमेशा सही नहीं होते. हो सकता है कि जनता की नज़रों में मायावती सरकार की छवि उत्तम हो. लेकिन स़िर्फ एक साल और, इसके बाद जनता स्वयं तैयार करेगी मायावती सरकार का रिपोर्ट कार्ड. मायावती की छवि ठीक वैसी है, जैसी विरोधी दल प्रचार कर रहे हैं या फिर उनके कामकाज से जनता संतुष्ट है, इस बात का फैसला 2012 में हो जाएगा. बसपा ने पांच सालों में क्या खोया और क्या पाया, इसका फैसला तो होगा ही, सत्ता के लिए घात लगाए बैठे सपा, कांग्रेस एवं भाजपा सहित विभिन्न दलों के दावों की कलई भी जनता खोलकर रख देगी. जनता हिसाब लेना जानती है, यह बात सभी दलों के नेता समझते हैं. इसीलिए वे ख़ुद को सुपर दिखाने के चक्कर में एक-दूसरे की पोल खोलने में पूरी ताक़त लगाए हुए हैं. पोल खोलो अभियान से विपक्षी दलों को तो कोई खास नुक़सान नहीं हो रहा है, लेकिन बसपा की समस्या बढ़ गई है. राज्य सरकार और मायावती का अधिकांश समय भ्रष्टाचार, बिगड़ती क़ानून व्यवस्था और तानाशाही रवैये के आरोपों का जवाब देते गुज़र जाता है. कभी पत्थर प्रेमी तो कभी दौलत की बेटी जैसी उपमाओं से नवाजी जाने वाली मायावती पर आरोप लगते रहे कि अपने स्वार्थ के कारण उन्होंने प्रदेश के विकास पर कोई ध्यान नहीं दिया. कांग्रेस से राजनीतिक बढ़त बनाए रखने की कोशिश में केंद्र सरकार के साथ उनके संबंध कभी अच्छे नहीं रह पाए, जिसका ख़ामियाजा जनता को भुगतना पड़ा. मनरेगा में भ्रष्टाचार और अनाज घोटाले के चलते भी उनकी सरकार मुश्किल में घिरी रही. पार्टी नेताओं के कारनामों से भी उन्हें शर्मसार होना पड़ा.
दो दिग्गज मंत्रियों नसीमुद्दीन सिद्दीक़ी और बाबू सिंह कुशवाहा के बीच जारी प्रतिस्पर्धा ने भी सरकार की छवि को नुक़सान पहुंचाया. बाबू सिंह को अपनी लालबत्ती तक गंवानी पड़ी. ज़मीन की लड़ाई में नंद गोपाल नंदी पर हुए जानलेवा हमले ने प्रदेश की क़ानून व्यवस्था का जमकर मज़ाक उड़ाया. आख़िरी साल में बरेली और मेरठ सहित कुछ अन्य जगहों हुए सांप्रदायिक दंगों ने सरकार की छवि को ठेस पहुंचाई.
दो दिग्गज मंत्रियों नसीमुद्दीन सिद्दीक़ी और बाबू सिंह कुशवाहा के बीच जारी प्रतिस्पर्धा ने भी सरकार की छवि को नुक़सान पहुंचाया. बाबू सिंह को अपनी लालबत्ती तक गंवानी पड़ी. ज़मीन की लड़ाई में नंद गोपाल नंदी पर हुए जानलेवा हमले ने प्रदेश की क़ानून व्यवस्था का जमकर मज़ाक उड़ाया. आख़िरी साल में बरेली और मेरठ सहित कुछ अन्य जगहों हुए सांप्रदायिक दंगों ने सरकार की छवि को ठेस पहुंचाई. नौकरशाही को अपने हिसाब से चलाने की नाकाम कोशिश भी मायावती को सताती रही. इस दौरान कई बार अदालत का आदेश न मानने के कारण सरकार को कोर्ट की फटकार भी सहनी पड़ी. चार साल पूरे होने के ठीक पहले इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने बसपा सरकार द्वारा नगर निकाय चुनाव एक्ट में किए गए संशोधन को अवैध क़रार देते हुए चुनाव पुरानी परंपरा के अनुसार पार्टी सिंबल पर ही कराने का आदेश जारी करके एक और झटका दे दिया. नगर निकाय चुनाव किसी भी दशा में पार्टी सिंबल पर न होने देने की कोशिश में लगी मायावती सरकार अब सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाने जा रही है. प्रदेश में बसपा को छोड़कर कोई भी दल नहीं चाहता कि नगर निकाय चुनाव पार्टी सिंबल पर न हों. किसानों की दशा में भी कोई सुधार नहीं आया. उनकी ज़मीनें अमीरों को लुभाती रहीं और सरकार हमेशा अमीरों के साथ खड़ी दिखी. शराब के खेल में सरकार ने ख़ूब बढ़त हासिल की. चुनाव की आहट होते ही मायावती ने अपने रणबांकुरों को चौकन्ना कर दिया है. विभिन्न विधानसभा क्षेत्रों से प्रत्याशियों की घोषणा करके उन्हें को-आर्डिनेटर बनाकर मैदान में उतार दिया गया है.
13 मई, 2007 का दिन मायावती के लिए का़फी अहम था. इसी दिन चौथी बार (पहली बार पूर्ण बहुमत के साथ) उनके हाथ सत्ता आई थी. न कोई गठजोड़, न किसी का अहसान. हाथी ने सबको रौंद दिया था. चौखाना चित्त विपक्ष सदन में बौना बनकर लौटा था. बीती 13 मई को मायावती सरकार ने अपने चार साल पूरे कर लिए. इस दौरान मायावती का स़फर बहुत अच्छा नहीं रहा. वह जनता से किए वादे पूरे नहीं कर पाईं, विकास के मामले में प्रदेश पिछड़ता गया और घोटालों-भ्रष्टाचार की ख़बरों से जनता की नींद उड़ी रही. सत्ता संभालते ही मायावती ने सबसे पहले अपने उन रहनुमाओं को तरजीह दी, जिनके बल पर वह मुख्यमंत्री जैसी कुर्सी पर विराजमान हो सकीं. उनके नाम थे कांशीराम और भीमराव अंबेडकर. मायावती ने दलित पुरोधाओं की मूर्तियां लगवा कर दलित जनता का दिल जीत लिया. कांशीराम स्मारक स्थल बनवाने के लिए उन्हें ऐतिहासिक जेल और आलीशान कालोनी गिराने में कोई संकोच नहीं हुआ. मायावती ने हर वह स्थल चमकाया, जहां कांशीराम और अंबेडकर का नाम आया. पार्टी फंड जुटाने के लिए उनके कुछ विश्वासपात्र नेता उद्योगपतियों एवं व्यापरियों से मेलजोल बढ़ाते दिखे. इस बीच पार्टी को राज्यसभा, विधानसभा एवं विधान परिषद के उपचुनावों का भी सामना करना पड़ा, लेकिन हर चुनाव में विपक्षी दल खेत रहे. पंचायत चुनावों में भी बसपा समर्थित प्रत्याशियों का डंका बजा.
जब क़रीब साढ़े तीन साल गुजर गए तो मायावती ने पार्टी को सभी उपचुनावों से दूर कर लिया. शायद वह पूरा ध्यान शासन करने पर लगाना चाहती थीं. मौक़ा पड़ने पर उन्होंने तेज़तर्रार अफसरों को भी चलता करने में देर नहीं लगाई, इसका उदाहरण आईएएस विजय शंकर पांडेय रहे. उन पर जैसे ही हसन अली को लेकर आरोप लगे, मुख्यमंत्री ने उन्हें सभी महत्वपूर्ण पदों से हटा दिया. सर्वजन हिताय की बात करने वाली मायावती का पूरा ध्यान दलितों के हित साधने में लगा रहा. साम-दाम-दंड-भेद की नीति और चतुर सलाहकारों के चलते इस बार मायावती की बेलौस टिप्पणियां सुनने को नहीं मिलीं. चार सालों में कोई ऐसा अवसर नहीं आया, जब उन्होंने लिखा भाषण न पढ़ा हो. 13 मई, 2007 से लेकर अब तक उन्होंने कई झंझावात देखे और झेले, लेकिन उनके हौसलों की उड़ान जारी रही. मज़बूत इच्छाशक्ति के बल पर मायावती ने विरोधियों को अर्दब में रखा, साथ ही पार्टी और सरकार को अंदर-बाहर से मज़बूती देती रहीं. अपनी ताक़त बढ़ाने के लिए उन्होंने कई ऐसे फैसले लिए, जो हिट और फिट रहे. उनके कार्यकाल का काला अध्याय यह रहा कि न चाहते हुए भी वह अपने दुश्मनों की संख्या लगातार बढ़ाती गईं. मुलायम सिंह से उनकी दूरी जगज़ाहिर थी, सत्ता संभालते ही कांग्रेस और केंद्र सरकार से भी उनकी दूरियां बढ़ती गईं. एक तऱफ कांग्रेस और राहुल गांधी को कोसना और दूसरी तऱफ कांग्रेस के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार को बाहर से समर्थन देने का अजूबा मायावती जैसा नेता ही कर सकता है. लोकसभा चुनाव में मनमाफिक नतीजे न आने से मायावती का़फी आहत दिखीं. वहीं आय से अधिक संपत्ति का मामला और उनका मूर्ति प्रेम कई परेशानियां लेकर आया. केंद्र सरकार भी उन्हें सीबीआई के माध्यम से आंखें दिखाती रही.
मायावती के अधिकांश फैसले वोट बैंक को ध्यान में रखकर लिए गए. लोकसभा चुनाव के दौरान भाजपा के वरुण गांधी पर रासुका लगाने का फैसला मुस्लिमों को ख़ुश करने के लिए लिया गया, वहीं जब प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रीता बहुगुणा ने मायावती पर उंगली उठाई तो न केवल उन पर मुक़दमों की झड़ी लगा दी गई, बल्कि उनका घर तक फूंक दिया गया. एक तऱफ वरुण गांधी और रीता बहुगुणा को मायावती के ख़िला़फ ज़हर उगलने के कारण अदालत के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं, वहीं मायावती को राहुल गांधी का उत्तर प्रदेश में उठना-बैठना रास नहीं आता. राहुल कहीं बसपा के वोट बैंक में सेंध न लगा दें, इसलिए वह अक्सर मायावती और उनकी पार्टी के निशाने पर रहते हैं. मायावती केंद्र से अपने रिश्ते भुनाने के लिए आतुर रहीं. जब ज़रूरत हुई तो वह कांग्रेस के साथ खड़ी हो गईं और जब लगा कि कांग्रेस मुसीबत बन सकती है तो उसे कोसने-काटने में भी उन्होंने देर नहीं लगाई. महिला आरक्षण मुद्दे पर जब उन्हें लगा कि नुक़सान हो सकता है तो वह कोटे के अंदर कोटे की बात करने लगीं. पदोन्नति में आरक्षण के मामले में जब इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला उनके ख़िला़फ आया तो वह सुप्रीमकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाने को आतुर दिखीं. महंगाई के मुद्दे पर बसपा लगातार कांग्रेस से दो-दो हाथ करती रही, लेकिन जब भाजपा संसद में कट मोशन लाई तो मायावती कांग्रेस गठबंधन सरकार के पक्ष में खड़ी हो गईं. ऐसा ही उसके सदस्यों ने लोक लेखा समिति की बैठक में किया. समिति की रिपोर्ट पर जब प्रधानमंत्री और पीएमओ घिरते नज़र आए तो बसपा ने कांग्रेस का हाथ मज़बूत करना बेहतर समझा. मायावती को लगा कि आय से अधिक संपत्ति सहित कई मामलों में केंद्र उनकी मदद कर सकता है. हुआ भी यही, मनमोहन सिंह सरकार के पक्ष में वोट करते ही सीबीआई ने लगाम ढीली छोड़ने में ज़रा भी देर नहीं की. फिर मायावती को जैसे लगा कि उनकी छवि कांग्रेस समर्थित बन रही है तो उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश के साथ कांग्रेस सौतेला व्यवहार कर रही है. बीते साल बसपा की 25वीं वर्षगांठ के मौक़े पर मायावती ने हज़ार रुपये के नोटों की क़रीब सात मीटर लंबी और दो फुट व्यास की माला धारण की, जिसकी क़ीमत करोड़ों रुपये बताई गई. इसे लेकर विवाद भी हुआ, लेकिन मायावती पर कोई असर नहीं पड़ा.
जनता ने जब मायावती को प्रदेश की बागडोर सौंपी थी, तब वह तत्कालीन मुलायम सिंह यादव सरकार की कार्यप्रणाली से ऊब चुकी थी. हर ओर लूटखसोट का राज था. जनता की कहीं भी सुनवाई नहीं हो रही थी. ऐसे में मायावती का यह कहना कि अगर उनकी सरकार बनी तो वह मुलायम सिंह को जेल भेज देंगी, जनता को रास आ गया. जनता पहले भी मायावती की कार्यशैली देख चुकी थी. इसलिए उसने चुनाव में मायावती पर भरोसा जताया और बसपा को बहुमत मिल गया. क़रीब बीस साल बाद प्रदेश में बहुमत वाली सरकार आई, लेकिन जनता के इसी फैसले ने मायावती को अहंकारी बना दिया. बहुमत के कारण सरकार निरकुंश हो गई और नौकरशाही बेलगाम. जिन्हें जेल में होना चाहिए, उनके लिए बसपा के दरवाज़े खुल गए. मायावती अपराधियों को ग़रीबों का मसीहा बताने लगीं. जिन अपराधियों को वह जेल भेजने की बात करती थीं, वे उनके बगलगीर हो गए. कई को लालबत्ती मिल गई. मुख्तार अंसारी, आनंद सेन, शेखर तिवारी, गुड्डू पंडित, अरुण कुमार शुक्ला उ़र्फ अन्ना जैसे अपराधी बसपा की शोभा बढ़ाने लगे. मायावती विपक्ष को सबक सिखाने में लग गईं. सपा के क़रीबी निर्दलीय विधायक रघुराज प्रताप सिंह, जो मायावती की आंखों की हमेशा किरकिरी बने रहे, उन्हें अबकी बार भी जेल भेजने का मौक़ा मायावती ने नहीं गंवाया. उधर अदालत ने औरैय्या के विधायक शेखर तिवारी सहित दस लोगों को इंजीनियर मनोज गुप्ता की हत्या के जुर्म में उम्रकैद की सज़ा सुनाकर बसपा को आईना दिखाने का काम किया. अब बसपा विधायक आनंद सेन को भी अदालत ने उम्रकैद की सज़ा सुना दी है. उन पर साकेत महाविद्यालय अयोध्या की विधि छात्रा शशि की हत्या की साज़िश में शामिल होने का आरोप था. बांदा के बसपा विधायक पुरुषोत्तम पर भी एक लड़की को बंधक बनाकर उसके साथ बलात्कार करने का मामला अदालत में चल रहा है.
मायावती एक साथ दो नावों पर पैर रखकर चलना चाहती थीं. अपराधियों के लिए बसपा शरणगाह बनी हुई थी, लेकिन मायावती नहीं चाहती थीं कि उन पर कोई दाग़ लगे. इसीलिए वह चुनिंदा अपराधियों के ख़िला़फ मुहिम चलाकर अपना दामन दाग़दार होने से बचाती रहीं. मायावती की यह दोरंगी राजनीति जनता भले नहीं समझ पा रही थी, लेकिन ऐसे लोगों की कमी नहीं थी, जो इस खेल का पर्दाफाश करने में लगे थे. धीरे-धीरे मायावती की असलियत उजागर होने लगी, लेकिन तब तक वह सत्ता की काफी मलाई मार चुकी थीं और जनता के बीच जाने का समय नज़दीक आने लगा. तभी एक हादसा हुआ. गोंडा में एक जनसभा के दौरान मंच पर एक अपराधी एवं कथित बसपा नेता की गोली मारकर हत्या कर दी गई और बसपा पर विपक्ष कीचड़ उछालने लगा. बाद में बसपा ने मारे गए नेता को अपनी पार्टी का न बताकर मामले से पल्ला झाड़ लिया. मौक़े की नज़ाकत भांपकर मायावती ने बाहुबली विधायक मुख्तार अंसारी और उनके सांसद भाई अफजाल अंसारी को बाहर का रास्ता दिखा दिया. मायावती का अब पहले वाला रसूख नहीं रह गया है. इसीलिए न अपराधी उनसे डर रहे हैं और न नौकरशाह. नौकरशाही ने मायावती की नब्ज़ पकड़ ली है. जनता से मायावती की दूरियां बढ़ गई हैं. जब सांसद और विधायक मुख्यमंत्री से नहीं मिल पाते तो आम आदमी का हाल सहज ही समझा जा सकता है. पहले मायावती अपने सांसदों और विधायकों से मिलने में का़फी दिलचस्पी दिखाती थीं. इससे उन्हें सरकारी योजनाओं की जमीनी सच्चाई मालूम हो जाती थी और नौकरशाही सहमी रहती थी, लेकिन अब नौकरशाही ने सोची-समझी रणनीति के तहत मुख्यमंत्री को जन प्रतिनिधियों और जनता से दूर कर दिया है. नौकरशाह शासन का कामकाज अपनी मर्जी से चला रहे हैं.
महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना (मनरेगा) भ्रष्टाचार और लूटखसोट की भेंट चढ़ गई है. मनरेगा में सबसे ज़्यादा फर्ज़ीवाड़ा उत्तर प्रदेश में चल रहा है. जॉब कार्ड एवं मस्टररोल में गड़बड़ी, अपात्रों का चयन, निर्धारित दर से कम भुगतान, ग्राम प्रधान और अधिकारियों की मनमानी जैसी शिकायतें आम हैं. 2009-10 में केंद्र ने इस योजना के लिए 750 करोड़ रुपये आवंटित किए, लेकिन कोई ऐसा ज़िला नहीं, जहां इसे लेकर लूट न मची हो. राज्य सरकार ने जो वार्षिक रिपोर्ट केंद्र को भेजी, उसके अनुसार केवल 18 करोड़ कार्यदिवसों का ही सृजन हो पाया यानी 57 करोड़ कार्यदिवसों का पैसा अधिकारियों के पेट में चला गया. इससे पहले 2008-09 में केंद्र ने 5500 करोड़ रुपये और उससे भी पहले 4800 करोड़ रुपये दिए थे.
2009-10 में 1600 करोड़ रुपये खर्च करके महीने भर के भीतर बुंदेलखंड में 10 करोड़ पेड़ लगा दिए गए, लेकिन जब केंद्रीय रोज़गार गारंटी परिषद के सदस्य संजय दीक्षित ने टीम के साथ जांच की तो वहां एक भी पेड़ नहीं मिला. प्रदेश के मुख्य सचिव ने भी मौक़े का मुआयना किया, किंतु वह भी कुछ नहीं कर सके. बीते 30 अप्रैल को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह बुंदेलखंड दौरे पर आए और उन्होंने दो सौ करोड़ रुपये देने की घोषणा की, लेकिन इससे पहले दिए गए पैसों का हिसाब भी उन्होंने बसपा सरकार से मांगा. बीते 27 अप्रैल को अमेठी से लौटते समय राहुल गांधी ने अचानक लखनऊ में राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन की राज्य इकाई में पहुंच कर जननी सुरक्षा योजना और ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन की मदों और ख़र्च का ब्योरा सूचना अधिकार अधिनियम के तहत मांगा तो लोगों को समझते देर नहीं लगी कि उनका निशाना कहां पर है.
मायावती अपने ख़िला़फउठने वाली किसी भी आवाज़ को दबाने के लिए धरना-प्रदर्शन तक पर रोक लगाने की कोशिश में हैं. राज्य सरकार ने एक आदेश जारी करके कहा है कि कोई भी दल या संगठन तब तक धरना-प्रदर्शन नहीं कर सकता, जब तक प्रशासन से इसकी इजाज़त नहीं मिल जाती. इस फरमान से विपक्षी दल बौखला गए. 27 अप्रैल को जारी नए दिशानिर्देशों में सार्वजनिक अथवा निजी संपत्ति के नुक़सान की भरपाई आयोजकों से कराए जाने के प्रावधान को विपक्षी दलों ने अघोषित आपातकाल की संज्ञा दी. मामला चाहे अफसरशाही की अपनी टीम का हो या फिर किसी महत्वपूर्ण पद पर तैनाती का, मायावती ने अपने चहेतों को रेवड़ियों की तरह पद बांटे. योग्यता की जगह जाति अच्छी नियुक्ति का पैमाना बन गई. बसपा ने विभिन्न आयोगों में अपने ख़ास सिपहसालारों को अध्यक्ष बनाकर अप्रत्यक्ष रूप से उन पर क़ब्ज़ा कर लिया है. यही हाल पंचम तल पर तैनात उनकी टीम का है. जिस अधिकारी ने उनकी हां में हां मिलाने से मना किया, उसे तत्काल वहां से हटा दिया गया. पिछले शासनकाल के दौरान जो अधिकारी सरकार के बहुत खासम़खास हुआ करते थे, उन्हें इस बार न तो महत्वपूर्ण विभाग मिला और न पंचम तल पर जगह. खीज कर कई क़ाबिल अफसर दिल्ली चले गए. मायावती के कोप के शिकार एक जाति विशेष (ब्राह्मण) के ही नौकरशाह बन रहे हैं. मुख्यमंत्री सचिवालय से लेकर ज़िलों तक महत्वपूर्ण पदों पर तैनात ब्राह्मण नौकरशाहों को किनारे किए जाने से बसपा से जुड़े ब्राह्मण नेताओं के भी कान खड़े हो गए हैं.
सारे विकास कार्य अंबेडकर गांवों तक ही सीमित रहे. सरकार प्रदेश भर में चार हज़ार अंबेडकर सामुदायिक केंद्रों का निर्माण करा रही है. इसके लिए उसने 327.80 करोड़ रुपये भी जारी कर दिए हैं. दलितों के लिए कांशीराम योजना के तहत मकानों का निर्माण कराया जा रहा है. मायावती नहीं चाहतीं कि दागी नेताओं के कारण उन्हें जनता को जवाब देने में मुश्किल आए और विपक्ष को मौक़ा मिल जाए. इसलिए वह अपना दामन सा़फ करने में जुटी हैं, लेकिन ऐसा करते समय वह अपने पैरों पर कुल्हाड़ी भी नहीं मारना चाहतीं. यही वजह है कि अभी तक मुख्तार को छोड़कर बसपा से ऐसे किसी भी शख्स को नहीं निकाला गया है, जो अपराधी होने के साथ-साथ जनता का नुमाइंदा भी हो. दलितों, जिन्होंने बसपा को एक बड़ी ताक़त के रूप में खड़ा किया, का भी मोह मायावती से भंग होता दिख रहा है. वजह, कहीं पर उनकी सुनवाई नहीं हो रही है और उन पर अत्याचार बढ़ते जा रहे हैं.
समाजवादी पार्टी के प्रमुख मुलायम सिंह यादव कहते हैं कि प्रदेश में जंगलराज चल रहा है. अदालत के आदेश पर बसपा विधायकों के ख़िला़फ मुक़दमे दर्ज हो रहे हैं. महिला मुख्यमंत्री के शासनकाल में महिलाओं के साथ ही सबसे अधिक ज़्यादती हो रही है. भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष सूर्य प्रताप शाही ने मायावती को ग़रीबों की दुश्मन और पूंजीपतियों की हिमायती बताते हुए कहा कि बसपा सरकार ने प्रदेश को चालीस साल पीछे ले जाकर छोड़ दिया है. भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि केंद्र सरकार मायावती के कारनामों को छिपा रही है. भाजपा के वरिष्ठ नेता एवं सांसद लाल जी टंडन कहते हैं कि मायावती ने लखनऊ को पत्थर और मूर्तियों का शहर बना डाला. भाजपा के युवा नेता वरुण गांधी मायावती सरकार को बहुसंख्यक विरोधी और सांप्रदायिक क़रार देते हैं. उत्तर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रीता बहुगुणा को इस बात का दु:ख है कि मायाराज में महिलाओं को अपनी अस्मत की रक्षा के लिए घरों में क़ैद होकर रहना पड़ रहा है. राज्य कांग्रेस के मुख्य प्रवक्ता सुबोध श्रीवास्तव का कहना है कि बसपा के जन प्रतिनिधि ही जनता पर अत्याचार कर रहे हैं. राष्ट्रीय लोकदल के चौधरी अजीत सिंह कहते हैं कि सबसे अधिक अत्याचार और उत्पीड़न का सामना किसानों को करना पड़ रहा है. उन्हें न तो समय से खाद मिल रही है और न बीज.
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