भारत की न्यायपालिका पर काम का बोझ बहुत है, जिसकी वजह से बहुत सारी परेशानियों ने जन्म लिया है. आज ज़रूरत इस बात की है कि हम इसका तोड़ निकालें. साथ ही ज़रूरत है कुछ और विषयों पर सोचने की, जैसे उच्च स्तर पर न्यायपालिका में पारदर्शिता. इसी से जुड़ा हुआ मुद्दा है न्यायपालिका की जवाबदेही का. न्यायपालिका देश में किसी और संस्था से बिल्कुल अलग नहीं है, बल्कि यह वैसी ही है, जैसी बाकी संस्थाएं हैं और न ही न्यायपालिका में काम करने वाले लोग कहीं बाहर से आयात किए हुए लोग हैं. इस कारण जो भी समस्याएं हमारे समाज के सामने हैं, वही समस्याएं न्यायपालिका के साथ भी हैं. इसलिए यह एक बड़ा और विस्तृत मुद्दा है. न्यायपालिका ने बहुत सारी परंपराएं बचाकर रखी हैं और मुझे लगता है कि ये परंपराएं अब न्यायपालिका को कमज़ोर कर रही हैं. इसे आंतरिक व्यवस्था की असफलता कहा जा सकता है.
कुछ दिनों पहले जस्टिस कपाडिया ने भी कहा था कि न्यायिक सक्रियता तभी तक और उन्हीं मामलों में वैधानिक है, जिनमें उदाहरण मौजूद हों या जिनमें पूर्व उदाहरणों के मार्फ़त नए न्यायिक नियम निकाले जा सकते हों. बहुत बार ऐसा होता है कि न्यायालय के सामने नीतिगत मामले भी आते हैं. इन मामलों में जब तक अदालत नीति विशेष के न्यायिक पक्ष की समालोचना करती है, तब तक तो वह अपने अधिकारों की उचित सीमा में है. लेकिन जैसे ही वह उनके परे जाती है तो यह बात गलत हो जाती है.
मैं न्यायपालिका से सीधे जुड़ा रहा, एक जज की हैसियत से ज़्यादा और एक वकील की हैसियत से कम. मैं न्यायपालिका को अंदर और बाहर दोनों ही तरह से देख रहा हूं. चूंकि पिछले कई सालों से मैं न्यायपालिका को बाहर से बैठा देख रहा हूं, इस वजह से मैं न्यायपालिका का आकलन ज़्यादा अच्छी तरह कर सकता हूं. बाहर रहने की वजह से मैं दूसरों से बहुत सी बातें सुनता रहता हूं और खासकर उन लोगों की, जो न्यायपालिका की समस्याग्रस्त स्थिति से सीधे प्रभावित हुए हैं. यदि मैं कहूं कि न्यायपालिका में कोई खामी नहीं है तो यह सच नहीं होगा. मैं मानता हूं कि खामियां हैं, लेकिन मैं नितांत आशावादी हूं और ऐसा नहीं है कि इस बाबत कुछ नहीं किया जा सकता. सुधार का समय अभी बाकी है. अभी हाल में जनता भ्रष्टाचार के मुद्दे पर सरकार के विरुद्ध एकजुट होकर खड़ी हो गई थी. इस जन संवेदना को सही दिशा दिखाने की ज़रूरत है, ताकि यह विध्वंसक रूप न ले ले. मेरा मानना है कि सारी बीमारियों को ठीक करने के लिए सही तरीका इस्तेमाल होना चाहिए, ताकि मरीज़ इलाज के बाद स्वस्थ रूप में आ जाए, न कि इलाज से ही मर जाए. अलेक्जेंडर हैमिल्टन ने सदियों पहले यह कहा था कि न्यायपालिका राज्य का सबसे कमज़ोर तंत्र होती है, क्योंकि न्यायपालिका के पास न तो पैसा होता है और न ही तलवार. पैसे के लिए न्यायपालिका को संसद पर आश्रित रहना होता है और अपने दिए गए फैसलों के क्रियान्वयन के लिए उसे कार्यपालिका पर निर्भर रहना होता है. अब यदि आज यह तंत्र सबसे कमज़ोर न रहकर सबसे सशक्त तंत्र बन गया है तो इसके कुछ कारण तो ज़रूर होंगे. इसका सबसे बड़ा कारण है न्यायपालिका में जनता का अटूट विश्वास. देश, प्रजातंत्र और स्वयं न्यायपालिका का हित इसी में है कि यह विश्वास कभी टूटे नहीं. आज अगर न्यायपालिका की खामियां चिंता का विषय बन गई हैं तो वह इसलिए, क्योंकि जनता का विश्वास कहीं न कहीं कम हो गया है. यदि आज लोग एक लोकपाल बिल के लिए इतनी शिद्दत से खड़े हो गए हैं तो यह एक उत्साहजनक बात है, क्योंकि यह दिखाता है कि आज भी लोगों का क़ानून व्यवस्था के प्रति विश्वास बना हुआ है, जबकि वे भी जानते हैं कि केवल एक क़ानून पास कर देने से सारी समस्याएं ख़त्म नहीं हो जाएंगी. यही मेरी समझ में सबसे बड़ा कारण है कि हमें जल्दी से जल्दी न्यायपालिका की खामियों को पहचान कर उन्हें दूर करने की कोशिश शुरू कर देनी चाहिए. आज न्यायपालिका की तीन सबसे बड़ी खामियां सामने आई हैं. पहली समस्या है जजों की कमी. इसी वजह से लाखों मुकदमे लंबित हैं. दूसरी समस्या है, न्यायपालिका द्वारा अपने क्षेत्राधिकार की सीमा का उल्लंघन और तीसरा विषय है न्यायपालिका की जवाबदेही और उच्च स्तर पर पारदर्शिता. ऐसा नहीं है कि न्यायपालिका इन बातों से बेखबर है, लेकिन मैं इस बाबत बहुत कुछ नहीं कहना चाहता, क्योंकि अब मैं रिटायर हो चुका हूं. मैं बात करना चाहता हूं न्यायपालिका के हस्तक्षेप की. मैं उस तरह के मामलों में नहीं जाना चाहता, जहां न्यायपालिका ने अपने क्षेत्राधिकार का उल्लंघन किया, लेकिन उन घटनाओं की बात करना चाहता हूं, जबकि न्यायपालिका ने उचित रूप से सकारात्मक हस्तक्षेप किया है. ऐसा क्यों हुआ कि न्यायपालिका को हस्तक्षेप करना पड़ा. ऐसा तब हुआ, जब जनता का भरोसा सरकारी तंत्र से उठ गया, जब शासन से जनता उदास हो गई या जब किसी दूसरे ही तंत्र और संस्थान ने अपने वैधानिक कर्तव्यों का पालन ठीक से नहीं किया. जब ऐसा ही कोई हताश व्यक्ति खुद या किसी के मार्फ़त अदालत के सामने आता है तो अदालत को उसकी बात सुननी पड़ती है, नहीं तो फिर वह कहां जाएगा.
यहां यह जरूर बताना चाहूंगा कि मैं न्यायपालिका के सकारात्मक हस्तक्षेप को कैसे परिभाषित करता हूं. मेरी समझ से यह तब तक सकारात्मक और वैधानिक है, जब तक न्यायपालिका किसी दूसरी संस्था के अधिकारों को अधिग्रहीत नहीं कर रही, जब तक न्यायपालिका निरंकुश तरीके से काम नहीं कर रही. मैंडमस की रिट उन सभी मामलों में पास की जा सकती है, जब किसी सरकारी अधिकारी ने अपने कर्तव्यों का वैधानिक रूप से पालन नहीं किया हो. यह वैध, कानूनी और न्यायिक कार्य है. जब तक अदालत किसी भी सार्वजनिक संस्था को अपना काम करने के लिए बाध्य कर रही है, तब तक अदालत अपनी वैधानिक सीमा के भीतर ही है. लेकिन अगर वहीं अदालत उस संस्था के कार्यों और अधिकारों को अधिग्रहीत कर ले और स्वयं वह कार्य और अधिकार प्रयोग करने लगे तो यह अनुचित हो जाता है. इसीलिए भूमि अतिक्रमण के विषय में सुप्रीम कोर्ट द्वारा खुद ही अतिक्रमण हटवाने के कार्य को मैं अनुचित मानता हूं. अदालत संस्थाओं को काम करने के लिए बाध्य कर सकती है, लेकिन वह खुद वही काम करने लगे, यह ठीक नहीं है. कुछ दिनों पहले जस्टिस कपाडिया ने भी कहा था कि न्यायिक सक्रियता तभी तक और उन्हीं मामलों में वैधानिक है, जिनमें उदाहरण मौजूद हों या जिनमें पूर्व उदाहरणों के मार्फ़त नए न्यायिक नियम निकाले जा सकते हों. बहुत बार ऐसा होता है कि न्यायालय के सामने नीतिगत मामले भी आते हैं. इन मामलों में जब तक अदालत नीति विशेष के न्यायिक पक्ष की समालोचना करती है, तब तक तो वह अपने अधिकारों की उचित सीमा में है. लेकिन जैसे ही वह उनके परे जाती है तो यह बात गलत हो जाती है. यहीं पर मैं लक्ष्मण रेखा खींचता हूं और यहीं मैं न्यायिक सक्रियतावाद को देखता हूं.
जहां तक न्यायपालिका की पारदर्शिता की बात है, मैं इस बात का बड़ा हिमायती हूं और मेरे लिए इसका कारण बहुत ही साधारण और स्पष्ट है. न्यायपालिका का सबसे प्रथम कार्य है जनता के सामने खुले न्यायालय में किसी भी मामले को सुनना और सभी के सामने अपना फैसला सुनाना, ताकि जनता इन फैसलों को अपने कानों से सुने, अपनी आंखों के सामने होते देखे और उचित टीका-टिप्पणी भी करे. जब किसी भी अदालत का सबसे पहला काम ही इतना पारदर्शी है तो बाकी के काम भी पारदर्शी क्यों न हों. मेरा मानना है कि अगर उच्चतम न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश ने किसी जज को नियुक्त किया है तो उस प्रक्रिया से संबंधित एक-एक बात जनता के सामने रखी जाए और वह खुद देखें कि इस विषय में कोई धांधली या पक्षपात हुआ है या नहीं. इसी तरह जजों द्वारा अपनी संपत्ति की घोषणा के मामले में भी पारदर्शिता होनी चाहिए. सुप्रीम कोर्ट ने 1997 में ही यह बात स्वीकार कर ली थी. जब पारदर्शिता होगी, तभी हमें जनता का पूरा विश्वास और साथ मिलेगा, जो हमारे ही हित में है. जहां तक जवाबदेही की बात है तो किसी भी जनतंत्र में ऐसी कोई भी सार्वजनिक संस्था या व्यवस्था नहीं हो सकती, जो जवाबदेह न हो. यह जवाबदेही बनती है देश की जनता के प्रति. अब जवाबदेही के लिए बनी व्यवस्था अलग-अलग स्तरों के लिए अलग-अलग हो सकती है. अनुच्छेद 235 में यह नियत किया गया है कि निचले स्तर की न्यायपालिका को उच्च न्यायालय के मार्फ़त अनुशासित किया जा सकता है. अनुच्छेद 50 में यह व्यवस्था है कि सरकार के तीनों अंग एक-दूसरे से भिन्न रहेंगे. यह सही बात है कि निचले स्तर के जज भी अपने काम में उतने ही स्वतंत्र हैं, जितना कि भारत का मुख्य न्यायाधीश. लेकिन समस्या है, अनुच्छेद 124 और 217 हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों के लिए बने हैं, जिनमें इनको हटाने का प्रावधान है. इसलिए ये जज भी उन्मुक्त और गैर जिम्मेदार नहीं हैं, लेकिन आज इसके ठीक उलट सोचा जा रहा है. इन बातों से न्यायपालिका भी अनजान नहीं है और आंतरिक रूप से बहुत से प्रयोजन किए भी गए हैं. न्यायपालिका की इन सारी समस्याओं को जल्द से जल्द दूर करना होगा और ऐसा करना सबके हित में होगा, न्यायपालिका, जनतंत्र और उस मूल तत्व के, जिसे कानून व्यवस्था कहते हैं और जिस पर जनतंत्र टिका हुआ है.
(लेखक सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश हैं)
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