पास्‍को परियोजनाः राष्‍ट्रीय वन संपदा की खुली लूट

उड़ीसा के जगतसिंहपुर में 50 हज़ार करोड़ रुपये निवेश करने वाली दक्षिण कोरिया की कंपनी पोहंग स्टील (पास्को) के आगे केंद्र और राज्य सरकार ने अपने घुटने टेक दिए हैं. पल्ली सभा (ग्राम परिषद) के विरोध के बावजूद बीती 18 मई को पोलंग गांव में भूमि अधिग्रहण के लिए पुलिस भेज दी गई है. इससे नंदीग्राम और सिंगुर की तरह पोलंग में भी ख़ूनी संघर्ष का माहौल तैयार हो चुका है. पास्को जहां भी ग्रामसभा और वनों की भूमि का अधिग्रहण कर रही है, वहां टकराव की स्थिति बनी हुई है. बीती 2 मई को वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश द्वारा पास्को प्रोजेक्ट को हरी झंडी दिखाने के बाद 18 मई को जगतसिंहपुर के बालीतूथा इलाक़े में बड़ी संख्या में पुलिस पहुंच चुकी है. यहीं से कंपनी द्वारा प्रस्तावित गांवों की भूमि का अधिग्रहण किया जाना है. पोलंग में ज़िला प्रशासन द्वारा पान एवं झींगा के खेतों, जंगल एवं आवासीय ज़मीनों पर क़ब्ज़े की कार्रवाई शुरू की जा चुकी है. धिन्किया, नौगांव एवं गड़ा कुचंगा के हज़ारों लोगों ने इस ज़बरिया अधिग्रहण के ख़िला़फ मोर्चेबंदी भी शुरू कर दी है. उनके समर्थन में अनेक सामाजिक एवं स्वैच्छिक संगठन भी लामबंद हो गए हैं. लोगों ने बालीतूथा से धिन्किया, नौगांव एवं गड़ा कुचंगा को जोड़ने वाले सभी संपर्क मार्ग काट दिए हैं. प्रशांत भूषण, अरुणा राय, अरविंद केजरीवाल एवं वंदना शिवा आदि सामाजिक कार्यकर्ताओं ने प्रधानमंत्री को लिखे अपने पत्र में इस प्रोजेक्ट के लिए हो रहे भूमि अधिग्रहण को तत्काल रोकने की अपील की है.

सबसे महत्वपूर्ण है ऐतिहासिक अन्याय की बात, जो वन क्षेत्रों में रहने वाले समुदायों पर पिछले 250 साल से किए जा रहे हैं और वनाधिकार क़ानून 2006 की प्रस्तावना में जिन्हें समाप्त करने का ज़िक्र है. पास्को परियोजना को स्वीकृति उस समय मिली थी, जब ए राजा देश के वन एवं पर्यावरण मंत्री थे. उस समय परियोजना के तहत जन सुनवाई में मानवाधिकार हनन के कई मामले सामने आने के बावजूद ए राजा द्वारा कंपनी के प्रस्ताव को आनन-फानन में स्वीकृति दे दी गई.

सबूत बताते हैं कि पास्को और सरकारी अधिकारियों के बीच आपराधिक साठगांठ है. इस प्रोजेक्ट को लेकर कई कमेटियों का गठन किया गया, जिन्होंने प्रोजेक्ट के तहत की जा रही धोखाधड़ी को देश के सामने उजागर किया. इसके बावजूद वन एवं पर्यावरण मंत्रालय द्वारा पास्को को देश की बेशक़ीमती प्राकृतिक संपदा लूटने की इजाज़त दे दी गई. हालांकि उड़ीसा हाईकोर्ट ने पास्को को वन अनापत्ति प्रमाणपत्र ज़ारी करने पर रोक लगा दी है. पास्को दुनिया के लगभग 70 देशों में इस्पात बनाने की परियोजनाएं चलाती है. पास्को परियोजना को 15 मई, 2007 को वन एवं पर्यावरण मंत्रालय से स्वीकृति मिली थी. कंपनी ने उड़ीसा सरकार के साथ 22 जून, 2005 को पांच साल के लिए करार किया था, जो अब समाप्त हो चुका है, लेकिन करार का नवीनीकरण किए बग़ैर कंपनी को पर्यावरण संबंधी अनापत्ति प्रमाणपत्र देने का अपराध किया गया. कंपनी को कुल 1621 हेक्टेयर भूमि की आवश्यकता है, जिसमें से 1253 हेक्टेयर वनभूमि है. ऐसा करके जयराम रमेश और उड़ीसा सरकार ने पल्ली सभा के प्रस्तावों की भी अवहेलना की है, जिनमें वनाधिकार क़ानून की धारा 6 के तहत पास्को को धिन्किया एवं गोबिंदपुर की ज़मीनें देने का विरोध किया गया था. उड़ीसा सरकार ने न स़िर्फ तथ्यों को दबाया, बल्कि वन एवं पर्यावरण मंत्रालय को लिखा कि पल्ली सभा के प्रस्ताव फर्ज़ी थे और उन पर धिन्किया एवं गोबिंदपुर गांव के मात्र क्रमश: 69 और 64 लोगों के हस्ताक्षर थे. जबकि धिन्किया के 2,445 ग्रामसभा सदस्यों में से 1,632 और गोबिंदपुर के 1,907 सदस्यों में से 1,265 ने पल्ली सभा में पास्को के विरोध में प्रस्ताव पारित किया था.

जिन गांवों की भूमि अधिग्रहीत की जानी है, वहां के लोगों ने ज़िलाधिकारी जगतसिंहपुर के ख़िला़फ भूमि रिकॉर्ड में हेराफेरी और झूठे तथ्य पेश करने के संबंध में एक आपराधिक मामला भी दर्ज कराया है. ज़िलाधिकारी ने बीते एक मार्च को बयान दिया कि प्रस्तावित भूमि पर 1930 से पहले कोई जंगल नहीं था. जबकि आंकड़े, जो आज़ादी से पहले के निस्तार पत्र रिकॉर्ड से लिए गए हैं, साबित करते हैं कि प्रस्तावित भूमि पर 1928 में घने जंगल थे (देखिए बॉक्स). पास्को परियोजना ज़ारी रखने पर केंद्र एवं राज्य सरकार की पूर्ण सहमति है. उड़ीसा में इसी तरह वेदांता कंपनी द्वारा किए जा रहे अवैध खनन और नियमागिरी पर्वत की प्राकृतिक संपदा की लूट के मामलों को लेकर भी केंद्र सरकार पर काफी दबाव बना था, जिसके तहत 2010 में दो सदस्यीय एन सी सक्सेना कमेटी गठित करके इस प्रोजेक्ट की समीक्षा की गई और पाया गया कि कंपनी केवल वन संरक्षण अधिनियम 1980 का ही नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण एवं वनाधिकार क़ानून 2006 का भी खुला उल्लंघन कर रही थी. नियमागिरी के मामले में ही वनाधिकार क़ानून 2006 किसी कंपनी को क्लीयरेंस देने के लिए पहली बार राष्ट्रीय बहस का मुद्दा बना. इसी समय पास्को पर भी गाज गिरी, जब केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय और अनुसूचित जनजाति मंत्रालय द्वारा वनाधिकार क़ानून की समीक्षा के लिए अप्रैल 2010 में गठित की गई संयुक्त समीक्षा समिति का पास्को द्वारा अधिग्रहीत क्षेत्र में दौरा हुआ. समिति ने इन वन क्षेत्रों में प्रोजेक्टों को मिल रही अनुमति की वैधता पर सवाल उठाए और पाया कि वनाधिकार क़ानून 2006 का सरासर उल्लंघन किया गया है.

सक्सेना कमेटी ने ऐसे तथ्यों को उजागर किया, जिनकी उम्मीद पास्को और राज्य सरकार को नहीं थी. कमेटी ने अपनी रिपोर्ट 4 अगस्त, 2010 को पेश की, जिसमें कहा गया कि इस क्षेत्र में अन्य परंपरागत वनवासी रहते हैं, जिनके दावों को क़ानून की धारा 4 (5) के तहत पूरा किए बग़ैर उक्त भूमि अधिग्रहीत नहीं की जा सकती. अन्य परंपरागत वनवासियों (दलित, गरीब एवं आदिवासी, जिन्हें अनुसूचित जनजाति का दर्जा हासिल नहीं है) के मामले पर अभी केंद्र और राज्य सरकार ख़ामोश हैं और उनके अधिकारों को मान्यता देने से आनाकानी कर रही हैं. इस वजह से आज हर वन क्षेत्र में अनुसूचित जनजाति एवं अन्य परंपरागत समुदायों के बीच तनाव और जातीय मतभेद बढ़ता जा रहा है. इन्हीं तमाम तथ्यों को सक्सेना कमेटी द्वारा उजागर किया गया. पास्को और सरकार के बीच क़रार पर हस्ताक्षर हुए पांच वर्ष से ऊपर हो गए हैं, लेकिन पास्को प्रतिरोध संघर्ष समिति के सशक्त विरोध के कारण पास्को कोई भी भूमि अधिग्रहीत नहीं कर पाई और न काम चालू कर पाई. संयुक्त समीक्षा समिति की इसी रिपोर्ट पर राजनीतिक गलियारे में हलचल मच गई. इस पर केंद्र सरकार ने 25 जुलाई, 2010 को मीना गुप्ता की अध्यक्षता में एक चार सदस्यीय कमेटी का गठन कर दिया. मीना गुप्ता कमेटी के समक्ष ग्रामीणों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, अनुसंधानकर्ताओं एवं बुद्धिजीवियों ने कई साक्ष्य पेश किए, जो बताते हैं कि कंपनी ने न केवल वनाधिकार क़ानून का उल्लंघन किया, बल्कि अन्य परंपरागत वन समुदायों के अस्तित्व को ही नकार दिया. इस संदर्भ में ज़िलाधिकारी जगतसिंहपुर द्वारा झूठा बयान दिया गया कि इस क्षेत्र में अन्य परंपरागत समुदाय रहते ही नहीं हैं, जो कि 75 वर्ष पहले से इन ज़मीनों पर क़ाबिज़ हैं और न प्रस्तावित भूमि पर 1930 से पहले कोई जंगल था. मीना गुप्ता कमेटी में तीन सदस्य ऐसे थे, जिनमें एक पूर्व डायरेक्टर जनरल वन और अन्य दो सदस्य अधिवक्ता एवं सामाजिक कार्यकर्ता थे. उन्होंने मीना गुप्ता के निष्कर्षों से अलग अपना मत बिना झिझक रखा. इस बहुमत रिपोर्ट में पाया गया कि जो तथ्य सक्सेना कमेटी के सामने आए थे, वे सही थे और उड़ीसा सरकार एवं प्रशासन ने तथ्यों के साथ छेड़छाड़ कर पास्को के हित में काम करते हुए ग्राम परिषद के दावों के संदर्भ में झूठे तथ्य पेश किए. दोनों कमेटियों की रिपोर्ट आ जाने के बाद पास्को का मामला वन सलाहाकार समिति में भी गया, जहां सदस्यों में आम सहमति बनने में लगभग एक महीने का समय लगा. समिति में अधिकांश सदस्य, जो वन विभाग के थे, वे पास्को के पक्ष में मत देना चाहते थे.

अंतत: समिति ने 25 अक्तूबर, 2010 को पास्को का वन अनापत्ति प्रमाणपत्र रद्द करने की स़िफारिश कर दी. जबकि इससे पहले ही वन विभाग के असिस्टेंट इंस्पेक्टर जनरल एच सी चौधरी ने 5 अगस्त, 2010 को पत्र संख्या एफ 8-63/2007 एफ-सी में सक्सेना कमेटी की जांच रिपोर्ट का हवाला देते हुए उड़ीसा के प्रमुख सचिव वन को पास्को को 1225.225 हेक्टेयर वन भूमि का स्थानांतरण रोकने और अनापत्ति प्रमाणपत्र रद्द करने के आदेश दे दिए थे. देश के पर्यावरण मंत्री ख़ुद इन कमेटियों द्वारा की गई जांच में पाए गए तथ्यों को स्वीकारते हुए राज्यसभा में पास्को और राज्य सरकार द्वारा ग्राम परिषद के साथ की गई हेराफेरी के बारे में उठे सवालों का जवाब दे चुके हैं. अनापत्ति प्रमाणपत्र रद्द करने के आदेश के बाद 9 अगस्त, 2010 को राज्यसभा में जयराम रमेश ने डी राजा के सवाल पर पास्को के संबंध में पूरे तथ्य रखे. उन्होंने कहा कि सक्सेना समिति ने पाया कि अधिग्रहीत किए जाने क्षेत्र में वनों में निवास करने वाले आदिवासी एवं अन्य परंपरागत वन समुदाय हैं, जिनके अधिकारों को वनाधिकार क़ानून के तहत मान्यता देने के लिए दावों को आमंत्रित करने की प्रक्रिया पूरी नहीं की गई. पास्को परियोजना को वन एवं पर्यावरण मंत्रालय से दिसंबर 2009 में जब मंजूरी मिली, उस समय वनाधिकार क़ानून 2006 पारित हो चुका था. इस क़ानून के तहत जो प्रक्रिया गांव में पूरी की जानी थी, उसे भी पूरा नहीं किया गया था. वन मंत्रालय अपने ही विभाग द्वारा पारित 3 अगस्त, 2009 के आदेश को मानने के लिए तैयार नहीं है, जिसमें कहा गया है कि अब किसी भी वन भूमि को स्थानांतरित करने से पहले यह जांचा जाएगा कि वनाधिकार क़ानून के तहत कोई दावा लंबित तो नहीं है और यह मंजूरी ग्रामसभा के फैसले के बग़ैर नहीं दी जाएगी, लेकिन अभी तक इस आदेश का स्वयं वन मंत्रालय द्वारा पालन नहीं किया गया.

उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक का अगस्त 2010 में प्रधानमंत्री से ख़ास तौर पर पास्को को लेकर मिलना उस सौदेबाज़ी को साबित करता है कि केंद्र और राज्य सरकार बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए भूमि अधिग्रहण करने को कटिबद्ध है. ग़ौरतलब है कि उसी समय उड़ीसा में कंधमाल में ईसाइयों के साथ लूट और अन्याय के ख़िला़फ जंतर-मंतर दिल्ली पर बरसी मनाई जा रही थी, लेकिन मुख्यमंत्री को दंगे के शिकार इस समुदाय की न ख़बर लेने की फुरसत थी और न उससे मिलने की. उस समय राज्य एवं केंद्र सरकार दोनों की गतिविधियों से लग रहा था कि नियमागिरी पर तो रोक लग जाएगी, लेकिन पास्को पर अभी फौरी तौर पर रोक लगाकर विवाद शांत किया जाएगा. केंद्र सरकार इसे किसी न किसी तरह बहाल करने का मन बनाए हुए थी, क्योंकि यह प्रोजेक्ट अब तक देश का सबसे बड़ा विदेशी पूंजी निवेश है. इस प्रोजेक्ट द्वारा हर वर्ष 1,95,000 करोड़ रुपये के टर्न ओवर और 65,000 करोड़ रुपये के मुना़फे का अनुमान है. यह मुना़फा केवल कैपटिव आयरन और लोहे के खदान के आधार पर होगा. यहां वनाधिकार क़ानून की प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई है. ज़िला प्रशासन द्वारा कहना कि यहां अन्य परंपरागत वन समुदाय की मौजूदगी नहीं है, बिल्कुल ग़लत है. आख़िर क्या वजह है कि पास्को को लेकर इतनी कमेटियां बनीं, इसकी वैधता पर चर्चा हुई, प्रधानमंत्री कार्यालय तक बात पहुंची और उड़ीसा के मुख्यमंत्री अगस्त, 2010 में एक हफ्ते तक दिल्ली में पड़े रहे और पीएमओ से आश्वासन लेकर ही गए कि इस कंपनी को अनापत्ति प्रमाणपत्र मिलने में किसी तरह की अड़चन नहीं आएगी. सबसे महत्वपूर्ण है ऐतिहासिक अन्याय की बात, जो वन क्षेत्रों में रहने वाले समुदायों पर पिछले 250 साल से किए जा रहे हैं और वनाधिकार क़ानून 2006 की प्रस्तावना में जिन्हें समाप्त करने का ज़िक्र है. पास्को परियोजना को स्वीकृति उस समय मिली थी, जब ए राजा देश के वन एवं पर्यावरण मंत्री थे. उस समय परियोजना के तहत जन सुनवाई में मानवाधिकार हनन के कई मामले सामने आने के बावजूद ए राजा द्वारा कंपनी के प्रस्ताव को आनन-फानन में स्वीकृति दे दी गई.

(लेखिका एन सी सक्‍सेना समिति में बतौर विशेषज्ञ सदस्‍य शामिल थीं)

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