सुशासन के बावजूद नक्‍सलवाद हावी

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  • पिछले दस सालों में 2252 मुठभेड़
  • पिछले पांच सालों में नक्सली वारदातों में ज़बरदस्त इज़ा़फा
  • 918 आम नागरिकों एवं सुरक्षाबलों के 176 जवानों की मौत
  • उम्रकैद की सज़ा पाए 1693 नक्सली जमानत पर जेल से बाहर

विकास और नक्सलवाद के बीच क्या संबंध हो सकता है? सरकारी जवाब तो यही होता है कि नक्सलवादी विकास की राह में सबसे बड़ी बाधा हैं, लेकिन चौथी दुनिया की तहक़ीक़ात से एक आश्चर्यजनक सत्य का ख़ुलासा होता है. वैसे तो देश के क़रीब 12 राज्य और लगभग 200 ज़िले नक्सलवाद की गिरफ़्त में हैं. बिहार के भी अधिकांश ज़िले नक्सलवाद की चपेट में हैं. बावजूद इसके जिस तरह से पिछले 6-7 सालों में नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री रहते बिहार में नक्सलवादी घटनाएं बढ़ी हैं, उससे नक्सलवाद को लेकर सरकारी बयानों की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े होते हैं. जैसे कि अगर नक्सलवादी विकास के दुश्मन हैं तो पिछले 7 सालों में बिहार में कथित तौर पर सुशासन कैसे आया? केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय से मिले कुछ दस्तावेज़ों के मुताबिक़, पिछले दस सालों में देश के बाक़ी राज्यों के साथ-साथ बिहार में भी नक्सली वारदातों, सुरक्षाबलों के साथ मुठभेड़ों और उस दौरान मरने वालों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि हुई. सबसे गंभीर बात तो यह कि 2005 से 2010 के बीच जहां बाक़ी राज्यों में नक्सली वारदातों में कमी आई, वहीं बिहार में ऐसी वारदातें बढ़ती ही चली गईं.

बिहार में जब नीतीश कुमार ने सुशासन की बागडोर संभाली थी, तब सूबे के 38 ज़िलों में से महज़ 18 ज़िले ही नक्सलवाद की समस्या से प्रभावित थे और वर्ष 2006 में राज्य के स़िर्फ 14 ज़िले ही एसआरई (सिक्योरिटी रिलेटेड एक्सपेंडीचर) योजना के तहत आए. जबकि वर्ष 2009 में इसमें एक ज़िले का इज़ा़फा हो गया और मुंगेर समेत कुल ज़िलों की संख्या 15 हो गई.

बिहार में जब नीतीश कुमार ने सुशासन की बागडोर संभाली थी, तब सूबे के 38 ज़िलों में से महज़ 18 ज़िले ही नक्सलवाद की समस्या से प्रभावित थे और वर्ष 2006 में राज्य के स़िर्फ 14 ज़िले ही एसआरई (सिक्योरिटी रिलेटेड एक्सपेंडीचर) योजना के तहत आए. जबकि वर्ष 2009 में इसमें एक ज़िले का इज़ा़फा हो गया और मुंगेर समेत कुल ज़िलों की संख्या 15 हो गई. पटना प्रमंडल के बक्सर को छोड़कर बाक़ी 5 ज़िले पटना, नालंदा, रोहतास, भभुआ कैमूर एवं भोजपुर, मगध प्रमंडल के सभी पांच ज़िले गया, जहानाबाद, अरवल, नवादा एवं औरंगाबाद, तिरहुत प्रमंडल के 3 ज़िले पश्चिमी चंपारण, पूर्वी चंपारण एवं सीतामढ़ी और मुंगेर प्रमंडल के मुंगेर एवं जमुई नक्सलवाद प्रभावित ज़िले घोषित हैं. कथित तौर पर सुशासन सरकार में राज्य के 38 ज़िलों में से 31 जिले नक्सलवाद की चपेट में आ चुके हैं. यही वजह है कि दिन हो या रात, यहां अर्द्धसैनिक बलों, स्पेशल टॉस्क फोर्स और सैप के जवान इन प्रभावित इलाक़ों में गश्त देते रहते हैं. यह बात एकदम साफ है कि अन्य राज्यों की तुलना में नक्सलवादी घटनाएं बिहार में अपेक्षाकृत ज़्यादा हुई हैं और अभी भी लगातार बढ़ती जा रही हैं. आंकड़े बताते हैं कि बिहार में वर्ष 2005 में 186, 2006 में 107, 2007 में 135, 2008 में 164, 2009 में 232 और 2010 में 163 बार नक्सलियों से मुठभेड़ हुई. कुल मिलाकर पिछले 11 सालों में 2252 मुठभेड़ हुईं, जिनमें 918 आम नागरिकों एवं सुरक्षाबल के 176 जवानों को अपनी जान गंवानी पड़ी.

नीतीश सरकार के बाबू अपने पंचवर्षीय रिपोर्ट कार्ड में बताते हैं कि स्पीडी ट्रायल के अंतर्गत वर्ष 2006 में 6839, 2007 में 9853, 2008 में 12,007, 2009 में 13,146 और 2010 में (मार्च तक) 3622 को मिलाकर कुल 49,612 लोगों को सज़ा हुई, जिनमें 7953 को आजीवन कारावास की सज़ा मिली. चौथी दुनिया की तहक़ीक़ात से पता चला कि बिहार की 55 जेलों में से 25 में 5242 कैदियों को उम्रकैद की सज़ा मिली हुई है.

बिहार सरकार के बाबू अपने पंचवर्षीय रिपोर्ट कार्ड में बताते हैं कि स्पीडी ट्रायल के अंतर्गत वर्ष 2006 में 6839, 2007 में 9853, 2008 में 12,007, 2009 में 13,146 और 2010 में (मार्च तक) 3622 को मिलाकर कुल 49,612 लोगों को सज़ा हुई, जिनमें 7953 को आजीवन कारावास की सज़ा मिली. चौथी दुनिया की तहक़ीक़ात से पता चला कि बिहार की 55 जेलों में से 25 में 5242 कैदियों को उम्रकैद की सज़ा मिली हुई है. इनमें से 2808 जेल में हैं और शेष 2434 अपील जमानत पर हैं. महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि इनमें 1693 कैदी बिहार के प्रमुख नक्सलवादी हैं और स़िर्फ पटना प्रमंडल के हैं. यानी उम्रकैद की सज़ा पाए 53 प्रतिशत कैदी जेल में हैं और 47 प्रतिशत अभी भी सुशासन सरकार में जेल से बाहर हैं. मुंगेर के सामाजिक कार्यकर्ता एवं अधिवक्ता ओेम प्रकाश पोद्दार चौथी दुनिया से बातचीत में कहते हैं कि नक्सलवाद को लेकर बिहार पुलिस कितनी सजग है, इसका अंदाजा इसी बात से लग जाता है कि हाल में मुंगेर ज़िले में एसपी के क्राइम रीडर मो. सलीम को नक्सलवादियों तक खुफिया सूचनाएं पहुंचाने और उनकी मदद करने के आरोप में गिरफ़्तार किया गया, वहीं दूसरी ओर बारूदी सुरंग विस्फोट के ज़रिए मुंगेर के एसपी सुरेंद्र बाबू सहित 6 पुलिसकर्मियों की हत्या में शामिल दो नक्सलवादी साक्ष्य के अभाव में न्यायालय से दोषमुक्त हो गए.

केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय से मिले कुछ दस्तावेज़ों के मुताबिक़, पिछले दस सालों में देश के बाक़ी राज्यों के साथ-साथ बिहार में भी नक्सली वारदातों, सुरक्षाबलों के साथ मुठभेड़ों और उस दौरान मरने वालों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि हुई. सबसे गंभीर बात तो यह कि 2005 से 2010 के बीच जहां बाक़ी राज्यों में नक्सली वारदातों में कमी आई, वहीं बिहार में ऐसी वारदातें बढ़ती ही चली गईं.

29 नवंबर, 2010 को हिरणमार दियारा थाना बरियारपुर मुंगेर में एक ग्रामीण सहित 12 नक्सलवादियों की हत्या अत्याधुनिक हथियारों से लैस एक आपराधिक गिरोह द्वारा कर दी गई. पुलिस मुख्यालय से इस मामले में मुंगेर के तत्कालीन एसपी एम सुनील नायक पर निर्दोष ग्रामीणों की गिरफ़्तारी के लिए दबाव बनाया गया, लेकिन उन्होंने इस दबाव को अस्वीकार कर दिया और लंबी छुट्टी पर चले गए. विदित हो कि 15 दिनों तक चले अभियान में न शव मिले और न हथियार. 30 जनवरी, 2011 को घटनास्थल के क़रीब ही नौ कंकाल बरामद हुए, जिनमें एक कंकाल बच्चे का है. बाक़ी की पहचान नक्सलियों के रूप में हुई, क्योंकि वे नक्सली वर्दी में थे. ज़ाहिर है, जनकल्याणकारी योजनाओं, इंदिरा आवास आवंटन एवं मनरेगा में अनियमितता, बेरोज़गारी, न्याय में अनावश्यक विलंब और पुलिस की मनमानी के चलते राज्य में नक्सलवाद को बढ़ावा मिल रहा है. केंद्रीय गृह मंत्रालय से मिली जानकारी के मुताबिक़, वर्ष 2006 में केंद्र सरकार ने 9 राज्यों के 76 ज़िलों को नक्सलवाद प्रभावित घोषित करते हुए वहां एसआरई के तहत विशेष जनकल्याणकारी योजनाएं चलाई थीं. इनमें आंध्र प्रदेश के 16, झारखंड के 16, बिहार के 14, उड़ीसा के 9, छत्तीसगढ़ के 8, महाराष्ट्र के 4, उत्तर प्रदेश, पश्चिमी बंगाल और मध्य प्रदेश के 3-3 ज़िले शामिल थे. जबकि इन योजनाओं के चलाए जाने के बाद यानी 2009 में नक्सल प्रभावित ज़िलों की संख्या 76 से बढ़कर 83 हो गई. जनवरी 2000 से दिसंबर 2005 तक 8489 नक्सली वारदातों में 3339 लोगों की मौत हुई, जिनमें 2668 नागरिक और 664 सुरक्षाकर्मी थे. जबकि 10 वर्ष 07 माह में यानी जनवरी 2000 से जुलाई 2010 तक 16,464 नक्सली वारदातों में 6865 लोगों की मौत हुई, जिनमें 5044 नागरिक और 184 सुरक्षाकर्मी शामिल थे.आंकड़ों पर ग़ौर करें तो वर्ष 2000 से 2004 के बीच हर चार नागरिकों की मौत के मुक़ाबले एक सुरक्षाकर्मी शहीद हुआ, जबकि 2005 से 2009 के बीच हर पांच नागरिकों की मौत के मुक़ाबले 2 सुरक्षाकर्मी शहीद हुए.

 

राज्य

नक्सली घटनाएं/मुठभेड़ मारे गए नागरिक मारे गए सुरक्षाकर्मी
आंध्र प्रदेश 3173 840

134

बिहार

2252 918 178
झारखंड 4328 1339

387

छत्तीसग़ढ

4235 1209 704
महाराष्ट्र 855 231

105

उड़ीसा

823 138 158
उत्तर प्रदेश 119 59

19

पश्चिम बंगाल

586 305

76

 

(वर्ष 2000 से जून 2010 तक)

- राजेश एस. कुमार

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One Response to “सुशासन के बावजूद नक्‍सलवाद हावी”

  • vaibhav vishal says:

    मैंने आपका दो-चार लेख पढ़ा जैसे की भागलपुर दंगा और मेरठ दंगा के बारे में,मुझे तकलीफ होती है की इन दंगो में मारे गए हिन्दू समुदाय के लोगे के बारे में कोई क्यों नही लिखता,भागलपुर दंगा में एक छात्रावास में घुसकर मुस्लिम लोगो ने बहुतो हिन्दू लडको को मौत का घाट उतार दिया,क्या हिन्दू माता-बहन को अपने बेटे और भाई के मरने का दुःख नही होता है!क्या मेरठ दंगे में हिदू लोग नही मारे गये थे,क्या उनका कोई दर्द नही है,लेखक समाज के लोगो के लिए पिता जैसा होता है अगर वही पिता अपने दो बेटो में से किसी एक को ज्यादा मानता है तो दूसरा बेटा बिद्रोही हो जाता है लेकिन बाद में समाज के लोग कोसते है बेचारे उस अबला को जो पिता के कारन गलत रास्ते पर चला जाता है,क्या आप भी उसी पिता की भूमिका में रहना चाहते है?

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