उत्तराखंडः भाजपा में घमासान

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देवभूमि उत्तराखंड में भारतीय जनता पार्टी का चुनाव चिन्ह कमल संगठन में व्याप्त गुटबाज़ी के कीचड़ में लथपथ होता जा रहा है. सूबे के मुख्यमंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक अपने साथियों की लगातार उपेक्षा कर पूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी की राह पर चलने के लिए मन बना चुके हैं. वह जनरल खंडूरी एवं कोश्यारी जैसे ज़मीन से जुड़े नेताओं से दूरी बनाकर और तिवारी से नज़दीकियां बढ़ाकर ख़ुद को श्रेष्ठ नेता साबित करने की कोशिश कर रहे हैं. निशंक इन दिनों पूरे राज्य में घूम-घूमकर ताबड़तोड़ शिलान्यास और घोषणाएं कर रहे हैं और यह सब नारायण दत्त तिवारी के पदचिन्हों पर चलने का संकेत है. तिवारी ने भी जाते-जाते कुछ ऐसा ही किया था, जो कांग्रेस के लिए अपशकुन सिद्ध हुआ था. निशंक की तेजी ने भी जनता के कान खड़े कर दिए हैं. वैसे मुख्यमंत्री की यह भूल भाजपा के मिशन-2012 के लिए आत्मघाती सिद्ध होगी.

जनता अफसरशाही के भ्रष्टाचार से कराह रही है, राहत के नाम पर उसे अफसरों की लूट का शिकार होना पड़ रहा है. कांग्रेस निशंक सरकार को घेरने और उसकी हवा निकालने में जुटी है. केंद्रीय मंत्री हरीश रावत कहते हैं कि चार वर्ष का समय खो चुके मुख्यमंत्री निशंक अब शिलान्यास के ज़रिए प्रायश्चित कर रहे हैं. नेता प्रतिपक्ष हरक सिंह रावत का मानना है कि निशंक राज्य के भ्रष्ट मुख्यमंत्रियों की सूची में पहले स्थान पर पहुंच चुके हैं.

मुख्यमंत्री निशंक की ग़लत नीतियों के चलते भारतीय जनता पार्टी यहां कई गुटों में बंट गई है. पार्टी हाईकमान भी संगठन में लगातार बढ़ रही अनुशासनहीनता पर अंकुश लगाने में ख़ुद को अक्षम पा रहा है. अनुशासनहीन नेता इसका जमकर फायदा उठा रहे हैं. वे ख़ुद को दल से ऊपर समझते हैं और अपनी मर्जी से क्षेत्रों का दौरा और अनर्गल बयानबाज़ी करके पार्टी की छवि में बट्टा लगा रहे हैं. संगठन में अपनी ढपली-अपना राग वाली प्रवृत्ति दिनोंदिन बढ़ती जा रही है. प्रदेश भाजपा अध्यक्ष बनते ही बिशन सिंह चुफाल ने अनुशासन की लक्ष्मण रेखा खींचते हुए घोषणा की थी कि कोई भी नेता उनकी इजाज़त के बग़ैर न तो आधिकारिक भ्रमण करेगा और न बयानबाज़ी. लेकिन पार्टी के दिग्गज नेता ही उनके निर्देशों की अनदेखी कर रहे हैं. इससे कार्यकर्ताओं के बीच एक ग़लत संदेश यह जा रहा है कि प्रदेश अध्यक्ष कमज़ोर नेता हैं. वैसे तो प्रदेश कांग्रेस में भी कई गुट हैं, लेकिन हाईकमान एक है. वहीं भाजपा में जितने गुट सूबे में हैं, उतने ही उच्च स्तर पर हैं. कोई गडकरी को अपना आका मानता है, कोई सुषमा स्वराज को तो कोई राजनाथ सिंह को. शीर्ष स्तर पर व्याप्त गुटबंदी ही राज्य भाजपा संगठन में गुटबंदी की मुख्य वजह है, जो निशंक सरकार के लिए भी सिरदर्द सिद्ध हो रही है.

भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी चाहते हैं कि निशंक मुख्यमंत्री बने रहें और विधानसभा चुनाव उन्हीं के नेतृत्व में लड़ा जाए. जबकि कुंभ प्रकरण में कैग की रिपोर्ट आने के बाद लालकृष्ण आडवाणी, राजनाथ सिंह एवं सुषमा स्वराज जैसे शीर्ष नेता चाहते हैं कि विधानसभा चुनाव किसी बेदाग़ व्यक्ति के नेतृत्व में लड़ा जाए. शीर्ष स्तर पर इस दो फाड़ ने भी प्रदेश संगठन में गुटबाज़ी को हवा दे रखी है. विधानसभा चुनाव में अभी आठ माह का समय शेष है, लेकिन मुख्यमंत्री पद के लिए दौड़ शुरू हो गई है. निशंक के अलावा भुवन चंद्र खंडूरी, मदन कौशिक, प्रकाश पंत और राज्य सरकार में मंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने अपनी कोशिशें तेज कर दी हैं. त्रिवेंद्र को पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी का समर्थन हासिल है, वहीं निशंक ख़ुद को दौड़ में बनाए रखने के लिए ताक़त लगा रहे हैं. खंडूरी को अपने कार्यकाल की उपलब्धियों पर भरोसा है. मालूम हो कि बतौर मुख्यमंत्री खंडूरी की अच्छी कार्यशैली के चलते वर्ष 2007 में हुए एक सर्वे में उत्तराखंड को देश के दस प्रमुख राज्यों में पहला स्थान हासिल हुआ था. 2008 के सर्वे में भी उत्तराखंड तीसरे स्थान पर रहा था.आज श्रेष्ठता सूची में स्थान की बात कौन करे, उल्टे राज्य की छवि लगातार दागदार होती जा रही है. स्थिति यह है कि जब राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा केंद्र की यूपीए सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाती है तो मीडिया उत्तराखंड में उसकी सरकार की ओर इशारा करने लगता है और पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को जवाब नहीं सूझता.

सूबे की राजनीति को करीब से जानने-समझने वाले कहते हैं कि भाजपा हाईकमान निशंक को अपना कमाऊ पूत मानते हुए उनके अवगुणों को चित्त में न धरने की भयंकर भूल कर रहा है, लेकिन उसे यह बात जान लेना चाहिए कि कमाऊ पूत जिताऊ नहीं हो सकता. जनरल भुवन चंद्र खंडूरी ने अटल विहारी वाजपेयी के शासनकाल में बतौर केंद्रीय जल भूतल परिवहन मंत्री चतुर्भुज सड़क योजना में जिस ईमानदारी से काम किया था, उसे आज भी याद किया जाता है. इधर पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव संपन्न होने के साथ ही यहां एक बार फिर राजनीतिक तपिश बढ़ गई है. क्षेत्रीय दल उत्तराखंड क्रांति दल अंदरखाने उभरी कलह के चलते कमज़ोर हो चुका है. बसपा-सपा जैसे राजनीतिक दल यहां अपना वजूद बचाने की कोशिश में हैं. विधानसभा चुनाव में मुख्य मुक़ाबला भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के बीच होना है. राज्य के तमाम कर्मचारी संगठन आंदोलन की डगर पकड़ चुके हैं. मुख्यमंत्री को अपने द्वारा शिलान्यास वाले फोटो छपवाने-देखने से ही फुर्सत नहीं है. जनता अफसरशाही के भ्रष्टाचार से कराह रही है, राहत के नाम पर उसे अफसरों की लूट का शिकार होना पड़ रहा है. कांग्रेस निशंक सरकार को घेरने और उसकी हवा निकालने में जुटी है. केंद्रीय मंत्री हरीश रावत कहते हैं कि चार वर्ष का समय खो चुके मुख्यमंत्री निशंक अब शिलान्यास के ज़रिए प्रायश्चित कर रहे हैं. नेता प्रतिपक्ष हरक सिंह रावत का मानना है कि निशंक राज्य के भ्रष्ट मुख्यमंत्रियों की सूची में पहले स्थान पर पहुंच चुके हैं. ॠषिकेश का भूमि घोटाला और देहरादून ज़िला पंचायत अध्यक्ष मधु चौहान प्रकरण इसका ताजा नमूना है. भाजपा राज्य की पांचों संसदीय सीटें कांग्रेस को पहले ही सौंप चुकी है और अगर वह अब भी न चेती तो नतीजे अप्रत्याशित हो सकते हैं. इसलिए पार्टी हाईकमान को अपने दाग़ी नेताओं पर आत्ममंथन ज़रूर करना चाहिए.

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