बिहारः सुशासन का सच

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मुख्यमंत्री नीतीश कुमार नित नई घोषणाओं-योजनाओं की चर्चा और सूचना माध्यमों का इस्तेमाल करके मजबूरी से ज़ार-ज़ार हो रहे लोगों से पटे राज्य और सरकार की कमज़ोरियों से जनता का ध्यान बांटने में फिलव़क्त सफल दिखते हैं. इस सोची-समझी योजना में बिहार को विशेष राज्य का दर्जा मिलने का शिगू़फा भी शामिल है. नीतीश जानते हैं कि अंदर चाहे जैसा हो, बाहर लोकरंजक छवि दिखनी चाहिए. कूटनीति की इस कसौटी पर भी नीतीश खरे दिखते हैं. वह इस बात से पूरी तरह वाक़ि़फ हैं कि प्रदेश की आंतरिक स्थिति अच्छी नहीं है. बिजली, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य, उद्योग एवं कृषि आदि प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में विगत दो दशकों में स्थितियां लगातार बिगड़ी हैं. लालू प्रसाद एवं राबड़ी देवी की सरकारों का कार्यकाल प्रदेश को रसातल में ले जाने का काल था. पिछले 5 सालों में भी कुछ दिखावटी रंगरोगन के अलावा राज्य को विकास की पटरी पर लाने के लिए ज़रूरी आधारभूत संरचना विकसित नहीं हो पाई. ऐसे में नीतीश कुमार की यह राजनीतिक विवशता है कि वह अपनी कमज़ोरियों से जनता का ध्यान बंटाने के लिए प्रचार माध्यमों का सहारा लेकर प्रशंसा-स्तुति गान कराएं, हर असफलता के पीछे केंद्र के असहयोग का आरोप लगाए और उसमें जनता को भी भागीदार बनाएं.

क्या प्रदेश का आधे हिस्से का अधिकारी केवल एक पटना ज़िला है? डेढ़ खरब रुपये एक वर्ष में ख़र्च करके पटना में क्या उपलब्धि हासिल हुई? क्या यह इतनी छोटी रक़म थी, जो केवल पार्कों के निर्माण में ख़र्च हो गई? आख़िर कहां-कहां, क्या-क्या हुआ? नीतीश कुमार चाहे जितना पर्दा डालने का प्रयत्न करें, संचार माध्यमों में जय बोल-हरि बोल का कीर्तन कराए, लेकिन वह दिन दूर नहीं, जब यह पाखंड जनता की नज़रों में आएगा.

दरअसल, नीतीश कुमार स्वयं को छोड़कर किसी भी राजनेता या राजनीतिक कार्यकर्ता को ईमानदार नहीं मानते. शासन में उनका हस्तक्षेप न हो, इसलिए नीतीश कुमार ने उच्चाधिकारियों को अपने ढंग से कार्य करने की पूरी छूट दे रखी है. पदाधिकारी अपने हिसाब से नाप-तौल करने के बाद जो मन बनाते हैं, वही काम प्रदेश में होता है. राजनेताओं की हालत यह है कि कोई ज़रूरी और सही काम भी यदि नहीं हो रहा है तो वे पदाधिकारियों से पूछ नहीं सकते. यह प्रशासनिक स्वेच्छाचारिता प्रेसिडेंट रूल की याद दिलाती है. नीतीश कुमार को कौन बताए कि जनता का काम हो न हो, उससे इन पदाधिकारियों को क्या फर्क़ पड़ता है! कोई सरकार लोकप्रिय हो या अलोकप्रिय हो जाए, उससे उन्हें क्या मतलब, लेकिन राजनीतिक व्यक्तियों को फर्क़ पड़ता है. काम न होने पर जनता अपने प्रतिनिधियों को ही घेरती है. बड़े अ़फसरों से तो जनता को मिलने का अवसर ही नहीं मिलता. मौजूदा स्थिति तो यह है कि सत्तारूढ़ दल के विधायक भी अपनी इच्छा से डिप्टी कलेक्टर स्तर के अधिकारी से नहीं मिल सकते. जमालपुर के जदयू विधायक शैलेष कुमार इसके उदाहरण हैं, जिन्हें बिना अनुमति के कक्ष में प्रवेश कर जाने से नाराज़ अधिकारी ने बाहर का रास्ता दिखा दिया और मिलने से मना कर दिया. पदाधिकारी का कहना था कि समय लेकर आएं.

इससे सा़फ है कि प्रदेश में पदाधिकारियों के अहं की स्थिति और राजनीतिज्ञों की हैसियत क्या है. मुमकिन है कि नीतीश कुमार प्रशासनिक कार्य में राजनीतिक हस्तक्षेप को उचित न मानते हों. यह ठीक भी है, किंतु जब स्थिति निरंकुशता की बन आए तो क्या वहां भी जनप्रतिनिधि मूकदर्शक और असहाय बने रहेंगे? हालात यहां तक पहुंच गए हैं कि आज कोई राजनीतिक कार्यकर्ता तो क्या, विधायक और मंत्री भी ब्लॉक और थानों में कुछ नहीं बोल सकते. यदि कोई सिपाही किसी निर्दोष युवक को पकड़ कर थाने ले आए तो भी वे थानेदार से यह नहीं कह सकते कि लड़का बेक़सूर है, भला है, उसे छोड़ दीजिए. वहां वही होगा, जो पुलिस चाहेगी. यह दूसरी बात है कि वर्तमान स्थिति कुछ अच्छे और ईमानदार अधिकारियों के लिए आदर्श है, जो वास्तव में निष्ठापूर्वक जनहित में कार्य कर रहे हैं. नीतीश कुमार के भ्रष्टाचार मुक्त सुशासन के बीच प्राथमिक शिक्षकों की नियुक्ति में हुई धांधली को कोई क्यों नहीं रोक पाया? ऐसे-ऐसे शिक्षक बहाल हुए, जिनकी ककहरे से भेंट भी है या नहीं, बताना मुश्किल है. वे कक्षा में अंग्रेजी के दिन और महीनों के नाम तक बोर्ड पर नहीं लिख सकते. एक न्यूज़ चैनल ने ऐसे अनेक प्रमाण प्रसारित करके इन नियुक्तियों में हुए भ्रष्टाचार का पर्दा़फाश किया. क्या नीतीश कुमार को इस बात की ख़बर नहीं थी? जो नीतीश कुमार अपने छोटे-छोटे राजनीतिक विरोधियों की भी गतिविधियों की ख़बर लेते रहते है, उन्हें इस संगठित भ्रष्टाचार की भनक नहीं लगी, यह कैसे माना जा सकता है. क्या इसे प्रदेश की प्राथमिक शिक्षा पर कुठाराघात नहीं कहा जाएगा? जिस प्रदेश की प्राथमिक शिक्षा ही ध्वस्त हो जाएगी, उसका भविष्य कैसा होगा?

क़ानून और व्यवस्था की स्थिति निरंतर बिगड़ती जा रही है. गंभीर अपराधों की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है. अपहरण, बलात्कार एवं हत्या की घटनाओं में भी इज़ा़फा हुआ है. एक दम से स्वतंत्र पुलिस तंत्र को अब क्या कहना है, किस बात का रोना है? नीतीश बराबर यह कहते हैं कि केंद्र सहयोग नहीं कर रहा है, राज्य को उसका हक़ नहीं मिल रहा है. जब कांग्रेस ने इस आरोप के जवाब में बताया कि बिहार को उसके सभी हक़ मिल रहे हैं और वे पहले के मुक़ाबले अधिक हैं. इस पर नीतीश ने यह कहना शुरू किया कि केंद्र सरकार जो दे रही है तो क्या कोई एहसान कर रही है, यह तो बिहार का हक़ है. दरअसल केंद्र-राज्य के बीच संबंधों के संवैधानिक दृष्टिकोण से जो राज्य की हिस्सेदारी बनती है, वह मुख्यत: केंद्रीय करों के अंतरण की राशि के रूप में है. इसके अतिरिक्त जो प्रदेश का बजट होता है, उसमें योजना और ग़ैर योजना मद में केंद्र सरकार की ओर से सहायता प्रदान की जाती है, जिसे केंद्रीय सहायता कहते हैं. यदि विगत वितीय वर्षों में केंद्र की ओर से दी गई सहायता राशि पर ग़ौर किया जाए (इसमें राजग गठबंधन वाली वाजपेयी सरकार भी शामिल है, जिसमें नीतीश भी मंत्री थे) तो स्पष्ट होगा कि पूर्ववर्ती राजग सरकार के मुक़ाबले वर्तमान डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार ने लगातार सहायता राशि बढ़ाकर दी है. बिहार का बजट बढ़ाकर 25 हज़ार करोड़ रुपये से अधिक कर दिया गया, उसे भी केंद्र ने स्वीकृति प्रदान की. फिर भी नीतीश कुमार को शिकायत है कि केंद्र सहयोग नहीं करता. उन्हें तब यह शिकायत नहीं थी, जब वह केंद्र में मंत्री थे. विगत 5 वर्षों में विभिन्न लोक कल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से विभिन्न मंत्रालयों के अंतर्गत केंद्र ने बिहार को 3 लाख 71 हज़ार 609 करोड़ रुपये की राशि प्रदान की, जो केंद्रीय करों के अंतरण ऐर बजट में केंद्रीय सहायता के अतिरिक्त थी. सच्चाई यह है कि इस बड़ी धनराशि का सदुपयोग प्रदेश में हो नहीं सका. प्रत्येक योजना राशि बंदरबांट के बावजूद ख़र्च नहीं हो सकी, वापस लौटाई गई. ख़र्च की गई धनराशि का भी एक बड़ा हिस्सा भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया. यदि इस राशि का सदुपयोग हुआ होता तो आज बिहार की तस्वीर अलग होती थी और यह सब कुछ हुआ सुशासन के नाम से बहुप्रचारित सरकार में. ऐसी तमाम बातों-समस्याओं की तऱफआम जनता और ख़ास तौर से प्रबुद्धजनों का ध्यान न जाए, इसके लिए राज्य सरकार ने प्रचार माध्यमों और धन का खुलकर उपयोग (जिसे दुरुपयोग कहना अधिक मुनासिब होगा) किया. राशि के आवंटन में भी स्वेच्छाचारिता और अदूरद र्शिता का परिचय दिया जा रहा है. इसका प्रमाण उस आर्थिक प्रतिवेदन के खुलासे से मिला है, जो स्वयं राज्य सरकार द्वारा कराया गया आर्थिक सर्वेक्षण है. उसके मुताबिक़, वित्तीय वर्ष 2009-10 में ग़ैर योजना मद, केंद्र प्रायोजित योजनाओं एवं राज्य योजनाओं के अंतर्गत ख़र्च की गई कुल धनराशि लगभग 4 खरब (3 खरब, 99 अरब, 66 करोड़) रुपये में से लगभग आधी राशि (एक खरब, 56 अरब, 714 करोड़ रुपये) केवल पटना ज़िले में ख़र्च कर दी गई. क्या प्रदेश का आधे हिस्से का अधिकारी केवल एक पटना ज़िला है? डेढ़ खरब रुपये एक वर्ष में ख़र्च करके पटना में क्या उपलब्धि हासिल हुई? क्या यह इतनी छोटी रक़म थी, जो केवल पार्कों के निर्माण में ख़र्च हो गई? आख़िर कहां-कहां, क्या-क्या हुआ? नीतीश कुमार चाहे जितना पर्दा डालने का प्रयत्न करें, संचार माध्यमों में जय बोल-हरि बोल का कीर्तन कराए, लेकिन वह दिन दूर नहीं, जब यह पाखंड जनता की नज़रों में आएगा. जनता अब जाग रही है, लुभावनी बातें अब उसे नहीं बहला सकतीं.

(लेखक बिहार प्रदेश कांग्रेस कमेटी के बुद्धिजीवी प्रकोष्ठ के अध्यक्ष हैं)

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2 Responses to “बिहारः सुशासन का सच”

  • डॉ. दलसिंगार यादव says:

    मीडिया जिसे मौका देती है उसका लेखा जोखा भी रखती है। सब्ज़बाग का प्रचार ज़्यादा दिन नहीं चलता है। जनता एक निश्चित समय तक ही प्रतीक्षा करती है। जब हिसाब माँगना शुरू करती है तो नारे ताक पर रख कर मैदान में उतर पड़ती है। जनता को ज़्यादा दिन तक गुमराह नहीं किया जा सकता है।

  • डॉ. दलसिंगार यादव says:

    मीडिया जिसे मौका देती है उसका लेखा जोखा भी रखती है। सब्ज़बाग का प्रचार ज़्यादा दिन नहीं चलता है। लोग एक निश्चित समय तक ही प्रतीक्षा करती है। जब हिसाब माँगना शुरू करती है तो नारे ताक पर रख कर मैदान में उतर पड़ती है। जनता को ज़्यादा दिन तक गुमराह नहीं किया जा सकता है।

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