किसान आंदोलन चौथी दुनिया और सुप्रीम कोर्ट

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वर्तमान हालात में जन सरोकारों से जुड़ी पत्रकारिता का स्वरूप क्या हो सकता है? इसकी एक मिसाल चौथी दुनिया की उन रिपोर्टों में देखने को मिलती है, जो देश भर में चल रही जल, जंगल और ज़मीन की लड़ाई से संबंधित हैं. दरअसल, पिछले दो सालों के दौरान लिखी गईं उक्त रिपोट्‌र्स आने वाले समय में समस्याओं की चेतावनी दे रही थीं. पहले शांतिपूर्ण आंदोलन कर रहे किसान, मज़दूर और आदिवासी जब दिल्ली आए, तब भी चौथी दुनिया ने अपनी रिपोर्ट में यह लिखा कि अगर इस तरह के शांतिपूर्ण आंदोलनों की मांग सरकार जल्द से जल्द नहीं मानेगी तो फिर इसे संभालना मुश्किल हो सकता है. चौथी दुनिया ने पिछले दो सालों के दौरान अपनी रिपोट्‌र्स में हमेशा इस बात का ज़िक्र किया कि सवा सौ साल पुराने भूमि अधिग्रहण क़ानून को बदलने की ज़रूरत है. लेकिन इस पर बहस तब शुरू हुई, जब अलीगढ़, मथुरा, आगरा, नोएडा, हरियाणा, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ या कहें कि पूरे देश के किसान जबरन भूमि अधिग्रहण के ख़िला़फ सड़क पर उतर आए. पुलिसिया डंडा चला, गोली चली, लाशों पर राजनीति शुरू हुई.

सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी इस देश में सवा सौ साल से चले आ रहे काले क़ानून (भूमि अधिग्रहण क़ानून) की प्रासंगिकता पर भी कई सवाल खड़े करती है? इस टिप्पणी से जो एक बात साफ-साफ ज़ाहिर होती है, वह यह कि राज्य सरकारें इसी काले क़ानून की आड़ में किसानों की ज़मीन ज़बरदस्ती ले रही हैं.

बहरहाल, चौथी दुनिया सुप्रीम कोर्ट के माननीय न्यायाधीश न्यायमूर्ति पी सथाशिवम एवं न्यायमूर्ति ए के पटनायक को धन्यवाद देता है. भूमि अधिग्रहण के मसले पर इन माननीय न्यायाधीशों की टिप्पणी से चौथी दुनिया की उन रिपोट्‌र्स की सत्यता की ही पुष्टि होती है, जिनमें यह साफ-साफ लिखा गया था कि सरकार प्रॉपर्टी डीलर का काम कर रही है. उन रिपोट्‌र्स को बल मिलता है, जिनमें ये सवाल उठाए गए थे कि आख़िर यह भूमि अधिग्रहण किसके हित में हो रहा है और इस देश में और कितने सिंगुर और नंदीग्राम बनेंगे. दरअसल, भूमि अधिग्रहण से संबंधित एक याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति पी सथाशिवम एवं न्यायमूर्ति ए के पटनायक ने उत्तर प्रदेश सरकार को फटकार लगाते हुए कहा कि अब देश को और नंदीग्राम नहीं चाहिए. नोएडा को नंदीग्राम नहीं बनने देंगे. सरकारें किसानों की कृषि योग्य ज़मीन बिल्डरों को देती रहे और हम आंखें मूंदे बैठे रहें, अब ऐसा नहीं होगा. पीठ ने कहा कि हम आंखें मूंद कर बैठे नहीं रहेंगे. आप एक पक्ष से खेती लायक़ ज़मीन लेकर दूसरे को दे देते हैं, यह ख़त्म होना चाहिए. अगर ऐसा नहीं हुआ तो हमें इसमें दख़ल देना पड़ेगा. यह एकपक्षीय विकास है. पीठ ने सवाल किया कि इस जमीन पर बनने वाले मकान किसके फायदे के लिए हैं, इन्हें कौन बना रहा है, इनकी क़ीमत क्या है? कोर्ट ने खेतिहर ज़मीन के अधिग्रहण पर सवाल उठाते हुए पूछा कि क्या सरकार के पास और कोई बंजर ज़मीन नहीं थी.

ज़ाहिर है, सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी इस देश में सवा सौ साल से चले आ रहे काले क़ानून (भूमि अधिग्रहण क़ानून) की प्रासंगिकता पर भी कई सवाल खड़े करती है? इस टिप्पणी से जो एक बात साफ-साफ ज़ाहिर होती है, वह यह कि राज्य सरकारें इसी काले क़ानून की आड़ में किसानों की ज़मीन ज़बरदस्ती ले रही हैं. सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह कि ऐसे अधिग्रहण सरकारी कार्यों के लिए कम, निजी कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए अधिक हो रहे हैं. बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी में उम्मीद की एक किरण ज़रूर दिख रही है. एक ऐसी किरण, जो किसानों के जीवन को अंधेरे में डूबने से बचा सकती है. हम सब को भी विश्वास रखना चाहिए और प्रार्थना करनी चाहिए कि उम्मीद की यह किरण और प्रखर हो.

हमने कब, क्या कहा

पिछले दो सालों के दौरान चौथी दुनिया ने जल, जंगल और ज़मीन के लिए देश भर में चल रहे आंदोलनों को प्रमुखता से प्रकाशित किया. इनमें उन मुद्दों को उठाया गया था, जिनकी पुष्टि सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणी भी करती है. चौथी दुनिया की कुछ ऐसी ही चुनिंदा ख़बरें:

यह विद्रोह की आहट है- अगस्त, 2010

पंद्रह अगस्त के दिन हमारे देश के हर शहर में जश्न मनाया जा रहा था. उधर अलीगढ़, मथुरा, हाथरस, आगरा, महामायानगर और गौतमबुद्ध नगर में तिरंगे की जगह किसान हाथ में लाठी लेकर पुलिस-प्रशासन से जूझ रहे थे. पुलिस की लाठियां खा रहे थे, गोलियों का सामना कर रहे थे. किसान भूमि अधिग्रहण से इतने नाराज़ हैं कि अलीगढ़ की आग पूरे उत्तर प्रदेश में फैल गई. बलिया से लेकर वाराणसी, भदोही, मिर्जापुर और इलाहाबाद में भी किसान भूमि अधिग्रहण से नाराज़ हैं. फिरोज़ाबाद में 1775 एकड़ ज़मीन के अधिग्रहण के ख़िला़फ 29 गांवों के किसान आंदोलन कर रहे हैं. किसान आंदोलन विद्रोह का रूप ले रहा है और उत्तर प्रदेश इसका केंद्र बन गया है.

किसान आंदोलन: ज़मीन जाएगी तो नक्सली बनेंगे- सितंबर, 2010

किसान के लिए ज़मीन स़िर्फ ज़मीन का एक टुकड़ा नहीं होती. ज़मीन किसान की पहचान है, ज़मीन किसान के जीने का सहारा है, शायद इसीलिए मथुरा से दिल्ली के जंतर-मंतर पहुंचे बुद्ध सिंह ज़मीन को धरती मां कह रहे हैं. उत्तर प्रदेश सरकार बुद्ध सिंह की 20 बीघा ज़मीन का अधिग्रहण करना चाहती है, हाईटेक सिटी बनाने के लिए. बुद्ध सिंह के साथ आए कई किसान यह भी कह रहे थे कि अगर सरकार ज़बरदस्ती ज़मीन पर क़ब्ज़ा करती है तो उनके पास नक्सली बनने के अलावा और कोई विकल्प नहीं बचेगा.

सरकार प्रॉपर्टी डीलर बन गई है- सितंबर, 2010

किसान आंदोलन की यह आग आगरा, मथुरा और अलीगढ़ के रास्ते पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में फैल गई. किसानों के इस उग्र विरोध के पीछे सरकार का अक्खड़ रवैया है, जो 10,000 करोड़ रुपये के यमुना एक्सप्रेस-वे प्रोजेक्ट के लिए उनकी ज़मीनों को औने-पौने दामों पर अधिग्रहीत करना चाहती है, लेकिन यह तो केवल शुरुआत है. अलीगढ़, मथुरा और आगरा क्षेत्र के किसानों का विरोध प्रदर्शन देखने के बाद यही लगता है कि उत्तर प्रदेश में किसान आंदोलन का नया दौर शुरू होने वाला है.

यह गूजर नहीं, किसान आंदोलन है- जनवरी, 2011

गूजरों का आंदोलन कोई आकस्मिक आंदोलन नहीं है. वे किसी हत्याकांड के विरोध में आंदोलन नहीं कर रहे हैं. गूजर कई सालों से रोज़ी-रोटी के सवाल को लेकर आंदोलन कर रहे हैं. यह आंदोलन दिल्ली से सटे इलाक़ों और राजस्थान में फैला है. गूजरों की मांग यह है कि उन्हें अनुसूचित जनजाति का दर्जा मिले और सरकारी नौकरियों में आरक्षण. अब सवाल यह है कि गूजर अपने पारंपरिक व्यवसाय को छोड़कर सरकारी नौकरियां करना क्यों चाहते हैं.

एक और किसान आंदोलन- फरवरी, 2011

फिरोज़ाबाद रोड स्थित वायुसेना कैंप के निकट वायुसेना की यूनिट खोलने के लिए टूंडला ब्लॉक की पांच ग्राम पंचायतों पचोखरा, देवखेड़ा, छिकाऊ, हिम्मतपुर और गढ़ी हरराय की 1785 एकड़ यानी 10 हज़ार बीघा ज़मीन अधिग्रहीत की जाएगी. इन पंचायतों के अंतर्गत 29 गांव आते हैं, जिनकी कुल आबादी 85 हज़ार है. सबसे अधिक पचोखरा पंचायत प्रभावित होगी, जिसकी 1475 एकड़ उपजाऊ भूमि अधिग्रहीत होगी. इस ख़बर से क्षेत्र के किसानों में खलबली मच गई है, लेकिन वे संगठित हैं. उनका कहना है कि वे अपनी जान दे देंगे, पर भूमि का अधिग्रहण नहीं होने देंगे.

एकता परिषद : इस चेतावनी को स़िर्फ रैली न समझें- मार्च, 2011

वर्ष 2007 में जब 25 हज़ार लोग ग्वालियर से पैदल चलकर दिल्ली आए, तब तत्कालीन ग्रामीण विकास मंत्री ने इन्हें आश्वासन दिया. 2009 में जब एक बार फिर ये लोग दिल्ली आए, तब भी इन्हें आश्वासन ही मिला. नतीजतन, इस बार 15 हज़ार लोग जब दिल्ली आए, तो स़िर्फ चेतावनी देने. चेतावनी इस बात की कि अगर नई भूमि सुधार नीतियों का पालन ठीक से नहीं किया गया, अगर नेशनल लैंड रिफॉर्म काउंसिल को सक्रिय नहीं किया गया तो हम लाखों की संख्या में दिल्ली आकर बैठ जाएंगे.

स़िर्फ नोएडा नहीं, पूरे देश में किसान हिंसक हो सकते हैं- मई, 2011

सरकार भूमि अधिग्रहण से संबंधित सवा सौ साल पुराने क़ानून में संशोधन की दिशा में कोई क़दम नहीं उठाती और राहुल गांधी उसी क़ानून के तहत होने वाले भूमि अधिग्रहण का विरोध करते हैं. भट्टा-पारसौल में भूमि अधिग्रहण के ख़िला़फ आंदोलन कर रहे किसानों पर फायरिंग होती है. अगर राहुल गांधी किसानों के सच्चे हितैषी होते तो गांव भट्टा जाने के बजाय वह सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय जाते और भूमि अधिग्रहण क़ानून के संशोधित विधेयक को पारित कराते, मगर उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया.

पूर्वांचल: जान देंगे, ज़मीन नहीं- जून, 2011

भट्टा-पारसौल में भूमि अधिग्रहण मामले की आग ठंडी भी नहीं हो पाई थी और सरकारी नुमाइंदे पूर्वांचल के चंदौली ज़िले के कटेसर और कोडोपुर गांव में ज़मीन अधिग्रहण के लिए पहुंच गए. पुरखों की ज़मीन हाथ से जाते देख किसान सड़क पर उतर आए. कटेसर के किसान रामलखन की पूरी चार बीघा ज़मीन जा रही थी. विरोध स्वरूप वह एक चिता पर बैठ गए और बोले, जान दे दूंगा, लेकिन ज़मीन देकर अपने हाथ-पैर नहीं कटाऊंगा.

मेवात किसान आंदोलन- जुलाई, 2011

हरियाणा सरकार ने इंडस्ट्रियल मॉडल टाउनशिप (रोजका) बनाने के नाम पर मेवात के किसानों से 1600 एकड़ ज़मीन का अधिग्रहण किया है, लेकिन किसानों का मानना है कि उन्हें अपेक्षाकृत बहुत ही कम मुआवज़ा दिया जा रहा है और अब ये किसान इसी मुद्दे को लेकर पिछले कई महीने से अपनी लड़ाई लड़ रहे हैं. बहरहाल, यह लड़ाई हरियाणा से चलकर दिल्ली तक पहुंच गई है. 16 जून को हज़ारों मेवाती किसान, महिलाएं जंतर-मंतर पहुंचे. इस उम्मीद में कि वह राहुल गांधी उनकी बात को सुनेंगे, जो भट्टा-पारसौल में जाकर किसानों के दर्द पर मरहम लगाते हैं.

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