भारतीय इतिहास में तुर्की की एक अहम भूमिका रही है. भारत के विभाजन के केंद्र में भी इसका नाम रहा और इसके बाद भारत द्वारा धर्मनिरपेक्षवाद अपनाए जाने के पीछे भी वजह तुर्की ही था. प्रथम विश्व युद्ध के व़क्त जब ओटोमन सुल्तान की हार हुई, तब उसे अपने खलीफा पद पर भी ख़तरा मंडराता नज़र आया. उस व़क्त ऐसी अफवाहें थीं कि येरुशलम के मुफ्ती को नया खलीफा बनाया जाएगा. गांधी जी ने इस मौक़े को पहचाना और अंग्रेजों के ख़िला़फ एक ऐसे संघर्ष का आगाज़ किया, जिसमें हिंदू और मुसलमान एक होकर आगे आए. 1857 के संघर्ष के बाद ख़िला़फत आंदोलन ही पहला ऐसा आंदोलन था, जो इतना अधिक सफल हुआ था. यह आंदोलन भारत के कोने-कोने में फैला.
शायद किसी दिन भारत में एक ऐसी पार्टी होगी, जो धर्म के इन विवादित मुद्दों को अस्वीकार करने का साहस दिखाएगी. धर्मनिरपेक्षवाद ने कांग्रेस को और ज़्यादा धर्म के क़रीब ला दिया है. आज कांग्रेस को स्वतंत्र पार्टी या प्रजा सोशलिस्ट पार्टी की तरह और ज़्यादा आधुनिक होने की ज़रूरत है. इन पार्टियों के लिए कभी भी संप्रदायवाद-धर्मनिरपेक्षवाद एक सवाल नहीं रहा. ये बातें उनके लिए अप्रासंगिक थीं.
गांधी जी ने चौरी चौरा की घटना के बाद आंदोलन स्थगित कर दिया. इससे मुसलमान तो निराश हुए ही, कांग्रेस को भी नुक़सान हुआ. इसके बाद अंग्रेजों के ख़िला़फ फिर इतना बड़ा और संयुक्त (हिंदू-मुस्लिम) आंदोलन नहीं खड़ा किया जा सका. कांग्रेस ने जिन्ना की उस मांग को ठुकरा दिया, जिसमें उन्होंने कहा था कि मोती लाल नेहरू रिपोर्ट में मुसलमानों के अधिकारों की गारंटी की बात हो. अपनी मांग नामंजूर होने के कारण जिन्ना नाख़ुश होकर लंदन चले गए और वहां जाकर उन्होंने 6 सालों तक वकालत की. जब वह वापस आए, तब तक अल्पसंख्यकों के अधिकार की उनकी मांग एक अलग राष्ट्र में बदल चुकी थी. कांग्रेस मुसलमानों का विश्वास खो चुकी थी. 1946 में कांग्रेस एक भी मुस्लिम सीट नहीं जीत पाई. आगे सबने देश का विभाजन भी देखा. लेकिन थोड़ा पीछे जाएं तो देखते हैं कि 1923 में जब तुर्की में कमाल अता तुर्क आए तो उन्होंने खलीफा पद ही ख़त्म कर दिया. उन्होंने तुर्की को एक आधुनिक और धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बनाने पर जोर दिया. धर्मनिरपेक्षवाद से उनका तात्पर्य अल्पसंख्यकों के विश्वास की रक्षा की गारंटी या सभी धर्मों के साथ समान बर्ताव से नहीं था. उनका धर्मनिरपेक्षवाद असल में मानवतावाद था. वह राजनीतिक जीवन से धर्म को पूरी तरह से हटाना चाहते थे. वह सोचते थे कि धर्म ने ही तुर्की को पिछड़ा बनाया है. यहां आधुनिकीकरण का अर्थ धर्म को खारिज करना रह गया. तुर्की में सेना को संविधान और धर्मनिरपेक्षवाद की सुरक्षा का ज़िम्मा सौंप दिया गया. अब 90 साल बाद तुर्की में एक धार्मिक रूझान वाली पार्टी एकेपी (जस्टिस एंड डेवलपमेंट पार्टी) 2002 से लगातार तीन चुनाव जीत चुकी है और अपनी सरकार चला रही है. एकेपी ने धर्मनिरपेक्ष पार्टियों को दो-तिहाई बहुमत से हराया है. एकेपी एक इस्लामिक पार्टी है, लेकिन वह इस्लामिस्ट नहीं है. अपने पहले कार्यकाल में यह पार्टी तब विवादों में आई, जब इसने महिलाओं को सिर पर स्का़र्फ बांधने की बात कही, लेकिन बाद में एकेपी ने इंफ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में भारी निवेश करके ख़ुद को एक आधुनिक विचारों वाली पार्टी के रूप में स्थापित किया. एकेपी ने यह दिखाया है कि धर्मनिरपेक्ष न होते हुए भी देश की तरक्की और आधुनिकीकरण के लिए काम किया जा सकता है. तुर्की में धर्मनिरपेक्षवाद की जड़ें इतनी गहरी हैं कि अब इस पर वाद-विवाद के लिए कोई जगह ही नहीं बची है. अब यहां स़िर्फ एक ही चुनौती है, विकास और आधुनिकीकरण करने की.
भारत में एकेपी की तरह कोई ग़ैर धर्मनिरपेक्ष पार्टी नहीं है. एकेपी ने कभी भी खलीफा पद को फिर से स्थापित करने की कोशिश नहीं की. भाजपा के पास कुछ पुराने मुद्दे और पुराने सपने हैं, जिन्हें वह फिर से स्थापित करना चाहती है. दूसरी ओर आरएसएस है, जिसे बीसवीं शताब्दी में भी ख़ुद को एडजस्ट कर पाना मुश्किल लग रहा है. भारत का धर्मनिरपेक्षवाद एक नारा बन गया है. एक ऐसी रूढ़िवादी ताक़त, जिसके सहारे कांग्रेस मुस्लिम हितों की अनदेखी करती है. नेहरू और सुभाष चंद्र बोस अता तुर्क की तरह ज़रूर धर्मनिरपेक्ष थे. ये दोनों धर्म के किसी भी स्वरूप के ख़िला़फ थे. अब धर्मनिरपेक्षता का अर्थ धार्मिकता का अति प्रदर्शन हो गया है. जैसे सार्वजनिक समारोहों में दीप जलाना, इफ्तार पार्टी देना, स्वामियों-बाबाओं का सत्कार और नेताओं द्वारा शिरडी-सत्य साईं आश्रम एवं अजमेर शरीफ की दरगाह पर जाना.
अंधविश्वास, किवदंतियों की आलोचना और आधुनिकता को तरजीह देने वाली बातें नेहरू के बाद ही ख़त्म हो गईं. अब तो राजनीतिक गलियारों में हस्तरेखा विशेषज्ञ, ज्योतिषी और अंकशास्त्री को आसानी से घूमते हुए देखा जा सकता है. यहां तक कि अब तो कैबिनेट में फेरबदल भी ग्रहों की चाल अनुकूल न होने की वजह से स्थगित कर दिया जाता है. नए चुने गए मंत्री अपने ज्योतिषी से शपथ ग्रहण के लिए सटीक समय के बारे में सलाह लेते हैं. शायद किसी दिन भारत में एक ऐसी पार्टी होगी, जो धर्म के इन विवादित मुद्दों को अस्वीकार करने का साहस दिखाएगी. धर्मनिरपेक्षवाद ने कांग्रेस को और ज़्यादा धर्म के क़रीब ला दिया है. आज कांग्रेस को स्वतंत्र पार्टी या प्रजा सोशलिस्ट पार्टी की तरह और ज़्यादा आधुनिक होने की ज़रूरत है. इन पार्टियों के लिए कभी भी संप्रदायवाद-धर्मनिरपेक्षवाद एक सवाल नहीं रहा. ये बातें उनके लिए अप्रासंगिक थीं. वे भारत के सभी लोगों को भारतीय की तरह देखती थी, न कि हिंदू या मुसलमान की तरह.
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आज आधुनिकता व धरमनिर्पेक्षता का अर्थ केवल हिंदुत्व का विरोध रह गया है. और यह कहना की सबको एक समान मानकर व्यवहार करो सेकुलरिज्म के खिलाफ माना जाता है. जो जितनी ऊँची आवाज में हिन्दुओं को धमका सके,गाली दे सके और जितना अधिक झुककर इस प्रकार का व्यव्हार करने वालों का साथ दे सके वो उतना बड़ा सेकुलर है. आपकी बातें एक शताब्दी पूर्व के लिए शायद उचित होती लेकिन आज जैसी हालत है उसमे देश को बचाने, आगे बढ़ाने,तथा विदेशी कुचक्रों का प्रतिकार करने एवं ईसाईयों द्वारा योजना पूर्वक शांति के साथ हिन्दू विरोधी देश तोड़क षड्यंत्रों को पहचानने व उनका प्रतिकार करने का दायित्व केवल हिन्दुओं के कंधे पर है. झूठी उदारता से देश का सत्यानाश हो जायेगा. अतः मूर्खता छोडो और दिवा स्वप्नों की दुनिया से बाहर आओ.
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यह धर्म निरपेक्षता नहीं है क्योकि –
भ्रष्ट नेता+भ्रष्ट मंत्री+ भ्रष्ट संत+ भ्रष्ट अधिकारी+ भ्रष्टलुच्चे हिन्दू ,मुस्लमान.सिक्ख.इसाई.जैन.+ भ्रष्ट सरकारी कर्मचारी =धर्म निरपेक्षता
ये दस सर है कलयुगी धर्मनिरपेक्ष रावण के