जम्‍मू-कश्‍मीरः पंचायत चुनाव ने उम्‍मीद जगाई

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हाल में जम्मू-कश्मीर में संपन्न हुए पंचायत चुनाव से राज्य में एक नई बयार देखने को मिली. बड़ी तादाद में घरों से निकल कर लोगों ने मतदान करके न स़िर्फ लोकतंत्र में अपनी आस्था व्यक्त की, बल्कि चुनाव बहिष्कार करने वालों को स्पष्ट संकेत भी दे दिया. इस चुनाव में सबसे ख़ास बात यह रही कि पंच और सरपंच समेत कई पदों पर नौजवान उम्मीदवार चुने गए, जो राज्य में नई पीढ़ी की बदलती सोच को दर्शाता है. शांतिपूर्ण चुनाव और राज्य के लोगों की बढ़-चढ़कर भागीदारी इस बात का स्पष्ट इशारा है कि कश्मीर की फिज़ा में बदलाव आ रहा है. भारतीय लोकतंत्र के प्रति लोगों की आस्था बढ़ी है, लेकिन अभी सबसे बड़ी चुनौती राज्य की जनता की उन उम्मीदों पर खरा उतरना है, जो उसने नवगठित पंचायतों एवं प्रतिनिधियों से लगाई है.

कश्मीर में आज भी ऐसे कई इलाक़े हैं, जहां विकास का नामोनिशान तक नहीं है. अगर कुछ है तो पिछले दो दशकों से राज्य में चल रही आतंकवाद की मनहूस छाया, जिसने हज़ारों मासूमों की जान ले ली और कइयों के सुहाग उजाड़ दिए. कश्मीर के कुछ ऐसे भी गांव हैं, जहां पुरुष आतंकवाद की भेंट चढ़ चुके हैं और गांव में रह गईं उनकी विधवाएं और मासूम बच्चे. सीमावर्ती इलाक़ा कुपवाड़ा से तक़रीबन 25 किलोमीटर दूर करालपुरा ब्लॉक का ऐसा ही एक गांव हैं दर्दपुरा.

कश्मीर में आज भी ऐसे कई इलाक़े हैं, जहां विकास का नामोनिशान तक नहीं है. अगर कुछ है तो पिछले दो दशकों से राज्य में चल रही आतंकवाद की मनहूस छाया, जिसने हज़ारों मासूमों की जान ले ली और कइयों के सुहाग उजाड़ दिए. कश्मीर के कुछ ऐसे भी गांव हैं, जहां पुरुष आतंकवाद की भेंट चढ़ चुके हैं और गांव में रह गईं उनकी विधवाएं और मासूम बच्चे. सीमावर्ती इलाक़ा कुपवाड़ा से तक़रीबन 25 किलोमीटर दूर करालपुरा ब्लॉक का ऐसा ही एक गांव हैं दर्दपुरा. पहाड़ों के बीच बसा तक़रीबन दस हज़ार की आबादी वाला यह गांव जितना ख़ूबसूरत है, इसकी वास्तविकता उतनी ही भयानक है. जम्मू-कश्मीर में जब आतंकवाद की शुरुआत हुई तो पाकिस्तान सीमा से सटे होने की वजह से इस गांव को घुसपैठ के तौर पर इस्तेमाल किया जाने लगा, जिसे रोकने के लिए सुरक्षाबलों ने गांव में अपना डेरा डाल दिया. सरहद पार से घुसपैठ की कोशिश और सुरक्षाबलों द्वारा रोकने के लिए चलाई गईं गोलियों ने दर्दपुरा के कई नौजवानों को मौत के मुंह में धकेल दिया तो कई लोग बारूदी सुरंग के शिकार होकर विकलांग हो गए. अपनों को खोने का गम और विकलांगता ने उनकी ज़िंदगी को बोझ बना दिया. ऐसे समय में राजनीतिक दलों की उपेक्षा और विकासात्मक परियोजनाओं के अभाव ने दर्दपुरा के लोगों के ज़ख्मों को और भी गहरा कर दिया. यही वजह है कि इस गांव में बुनियादी सुविधाओं का हमेशा अभाव रहा है. टूटी-फूटी सड़कों और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी ने दर्दपुरा के लोगों को अपनों के बीच अजनबी बना दिया. इलाज के लिए गांव में कोई सरकारी अस्पताल तक नहीं है. बीमारों की जान बचाने के लिए करालपुरा या फिर कुपवाड़ा तक जाना पड़ता है. इस दूरी को तय करने के लिए सार्वजनिक परिवहन की व्यवस्था तक नहीं है. अगर कहीं से इंतज़ाम कर भी लिया तो सड़कें इस कदर खस्ताहाल हैं कि मरीज़ व़क्त पर अस्पताल नहीं पहुंच पाते हैं.

कुछ ऐसा ही हाल जन वितरण प्रणाली का है. ज़रूरतमंदों तक राशन पहुंचाने की यह सरकारी योजना दर्दपुरा तक पहुंचते-पहुंचते दम तोड़ती नज़र आती है. पहाड़ी क्षेत्रों में जन वितरण प्रणाली सालों से बंद पड़ी है और लोगों को राशन लाने के लिए लंबा सफर तय करना पड़ता है. बर्फबारी के दौरान जब दर्दपुरा के अधिकतर हिस्से देश के अन्य भागों से कट जाते हैं तो ऐसे में वहां के लोग किस तरह गुजारा करते होंगे, इसका अंदाज़ा सहज ही लगाया जा सकता है. इस संबंध में वहां के नौजवान सरपंच गुलाम मोहीउद्दीन का तर्क है कि केंद्र और राज्य सरकार द्वारा विकास के लिए कई परियोजनाएं चलाई जाती हैं, लेकिन तालमेल की कमी की वजह से उनमें से अधिकतर परियोजनाएं काग़ज़ों तक सिमट कर रह जाती हैं. इस संबंध में आला सरकारी अधिकारियों को कई बार अवगत भी कराया गया, लेकिन मामला आज भी जस का तस बना हुआ है.

दर्दपुरा के हालात को अपनी कविता के माध्यम से बयां करने वाले शायर मीर दर्दपुरी के शब्दों में यहां के निवासी सीमा से सटे होने का ख़ामियाजा भुगत रहे हैं. आतंकवादियों और सुरक्षाबलों की गोलियां दर्दपुरा के नौजवानों को लीलती रही हैं. परिणामस्वरूप गांव में रह गए बूढ़े, विकलांग और उनमें सबसे ज़्यादा विधवाएं. यही कारण है कि घाटी में दर्दपुरा को विधवाओं का गांव के नाम से भी जाना जाता है. आय का साधन छिन जाने के बाद बच्चों की भूख को शांत करने के लिए इन विधवाओं को भीख तक मांगनी पड़ी. इसकी वजह एक तऱफ जहां इलाक़े की ज़मीन का पथरीला होना है, वहीं यहां पर पानी के स्रोत भी सीमित हैं. ऐसे में खेती करना आसान नहीं है. अलबत्ता पशुपालन से कुछ आमदनी हो जाती है, लेकिन यह इतना काफी नहीं होता कि घर के सभी सदस्यों के पेट की आग को शांत किया जा सके. ऐसा ही कष्टप्रद जीवन जीते हुए यहां की पीढ़ी जवान हुई है. नई नस्ल की आंखों में कई सपने भी पले-बढ़े हैं, लेकिन देश के अन्य भागों की तरह बेरोज़गारी यहां भी विकराल समस्या बनी रही. समस्याओं की ऐसी लंबी-चौड़ी सूची अकेले दर्दपुरा की नहीं है, बल्कि कश्मीर के कई सुदूर क्षेत्रों में ऐसे ही हालात देखने को मिल जाएंगे.

बहरहाल, पंचायत चुनाव में कश्मीर के ग्रामीणों का बढ़-चढ़कर हिस्सा लेना यह भी साबित करता है कि वे अपने क्षेत्र का विकास चाहते हैं, जहां कम से कम उन्हें बुनियादी सुविधाएं तो मयस्सर हो सकें. लेकिन प्रश्न उठता है कि क्या उनका ख्वाब पूरा करने में पंचायत एक माध्यम बन सकती है या एक बार फिर उन्हें मायूसी ही हाथ लगेगी? (चरखा)

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