झारखंड : भाजपा को गहरा झटका

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जमशेदपुर संसदीय उपचुनाव के नतीजे आ गए हैं. मुख्यमंत्री बनने की वजह से अर्जुन मुंडा ने यह सीट खाली की थी. चुनाव के नतीजे बाबूलाल मरांडी के हक़ में हैं और भारतीय जनता पार्टी की सिट्टी पिट्टी गुल हो गई है. इस सीट की जीत की अहमियत को समझते हुए ही भाजपा के आला नेतृत्व ने प्रदेश अध्यक्ष दिनेशानंद गोस्वामी को चुनाव में उतारा था. गोस्वामी के लिए सरकार और संगठन ने ताक़त लगाई, लेकिन मुश्किल से दूसरे नंबर पर आ पाए. बाबूलाल मरांडी के झारखंड विकास मोर्चा ने एक लाख 43 हज़ार मतों के अंतर से बाज़ी मार ली. झारखंड विकास मोर्चा के डॉ. अजय कुमार ने दो लाख 55 हज़ार मत पाकर ऐतिहासिक जीत दर्ज की. अब लोक सभा में झारखंड विकास मोर्चा के सदस्यों की संख्या दो हो गई है. भाजपा इस पराजय की पड़ताल की बात कह रही है. वास्तव में 17 मार्च, 2003 को भाजपा द्वारा लिए गए एक फैसले के कारण बाबूलाल मरांडी निरंतर बढ़ते जा रहे हैं. उस समय दिल्ली में भाजपा नेताओं ने झारखंड में जैसे तैसे सरकार को चला लेने की साज़िश को अंजाम दिया. भाजपा केंद्रीय नेतृत्व ने पांच निर्दलीयों की मदद से सरकार चलाने की बाध्यता को खत्म करने पर आमादा मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी की छुट्टी कर दी. साथ ही पार्टी विद डिफरेंस की नीति को तिलांजली देकर पार्टी इन पावर की नीति अपनाई गई. वेंकैया नायडू तब भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे. राजनाथ सिंह दिल्ली से बाबूलाल मरांडी को मुख्यमंत्री की कुर्सी से बेद़खल करने का आदेश लेकर रांची आए थे. आडवाणी के चहेते मरांडी आदेश पढ़कर भौचक्के रह गए थे, क्योंकि पिछली ही रात मरांडी की बात आडवाणी से हुई थी. आडवाणी के साथ मरांडी की एक तरह से सहमति बन गई थी कि निर्दलीयों के ब्लैकमेलिंग में फंसने की बजाय विधान सभा भंग करने का रास्ता चुना जाए. आडवाणी को मरांडी ने भरोसा दिलाया था कि विधान सभा भंग करने से राज्य में भाजपा को नैतिक बल मिलेगा. नैतिकता के आधार पर लड़े जाने वाली चुनाव में पार्टी को पर्याप्त बहुमत मिल जाएगा, लेकिन जो हुआ वह सामने है.

जमशेदपुर में जीत के लिए मरांडी ने दोहरी नीति अपनाई. शहरी मतदाताओं के बीच लोकप्रिय पूर्व आईपीएस अ़फसर अजय कुमार ने जहां शहरी मतदाताओं के दरवाज़ों पर दस्तक देकर झाविमो के लिए समर्थन जुटाया तो मरांडी गांव-गांव घूमकर खरसवां की अपील को दोहराते रहे. मुख्यमंत्री के गांव खरसवां जाकर मतदाताओं से कहते रहे कि विधान सभा चुनाव में नहीं सुने कोई बात नहीं, संसदीय चुनाव में सुन लो. जमशेदपुर का नतीजा बताता है कि भाजपा के खिला़फ मरांडी की बाज़ीगरी ने शहर और गांव दोनों में पलीता लगाया है.

घोषित तौर पर भ्रष्ट मंत्रियों की ज़िद के आगे झुकने के बजाय सरकार को छोड़ जनता के बीच जाकर चुनाव पर दृढ़ मरांडी ने दलील दी कि निर्दलीयों से छुटकारा नहीं लिया गया तो झारखंड की राजनीति के लिए आने वाला व़क्त बुरा होगा. इशारा महज़ 81 सदस्यों की विधान सभा में किसी एक दल को बहुमत पाने में आने वाली दिक्क़तों की तऱफ था. शुरू में ही इलाज नहीं होने से यह समस्या दस सालों से जस की तस बनी हुई है. नवंबर 2000 में सरकार बनने के बाद से कहने को भाजपा विधान सभा में सबसे बड़ी पार्टी रही है, लेकिन विडंबना यह है कि झारखंड में सरकार बनाने के लिए उसे हर बार राजनीतिक जोड़तोड़ का सहारा लेना पड़ा. उस समय केंद्र में वाजपेयी की सरकार थी. संगठन में आडवाणी की तूती बोलती थी. केंद्र में सत्तारुढ़ पार्टी की सरकार राज्य में भी बनी रहे इसके लिए राजनाथ सिंह संवादिया बनकर रांची आए. राजनाथ सिंह ने मरांडी को आदेश दिया कि वह अधीनस्थ मंत्री अर्जुन मुंडा को मुख्यमंत्री बनाने का रास्ता तैयार करें और उनकी ताजपोशी कर दें. आहत मरांडी ने अनुशासन के नाम पर मन मसोसकर इसे मान लिया. मुंडा को मरांडी ही झामुमो से भाजपा में लाए थे. अर्जुन मुंडा को मुख्यमंत्री बना दिया गया. निर्दलीय भी मान गए. मुख्यमंत्री बनने से पहले तक मुंडा ने न तो दिल्ली के केशव कुंज स्थित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का दफ्तर देखा था और न ही संघ के केंद्रीय नेताओं से उनका कोई वास्ता पड़ा था. फिर भी मुंडा के मुख्यमंत्री बनने के तुरंत बाद ही सारा खेल समझ में आ गया. नवनियुक्त मुख्यमंत्री ने एहसान का निपटारा करने के लिए संदेश लेकर रांची आए राजनाथ सिंह को मुख्यमंत्री के विशेष विमान से वाराणसी तक पहुंचवाया.

अब बाक़ी दलों की हालत को भी समझते हैं. कांग्रेस बरसों तक अलग झारखंड की मांग को दबाती रही. इसका खामियाज़ा उसे झारखंड बनने के दस साल बाद भी भुगतना पड़ रहा है. ठोस सांगठनिक आधार तैयार नहीं है. भाजपा से लोहा लेने के लिए कांग्रेस राज्य में मरांडी का पिछलग्गू बनकर चलने में ही खुद का भला समझती है. दरसल झारखंड मुक्ति मोर्चा के उदय के बाद से ही कांग्रेस राज्य की राजनीति में इतिहास के काल के गाल में समा गई थी. जमशेदपुर उपचुनाव में ज़मानत ज़ब्त कराने वाली कांग्रेस ने मरांडी का सहारा लेकर उबरने की कोशिश की थी और अलग उम्मीदवार उतारा था. यह कोशिश कांग्रेस पर भारी पड़ी है. आने वाला व़क्त बताएगा कि कोशिश से कांग्रेस क्या सबक़ लेती है. अलग राज्य बनाने की राजनीति में शामिल होकर भाजपा ने कोई तीस साल पहले झारखंड में कांग्रेस के स्पेस को हड़पा था. तब से असली लड़ाई झामुमो और भाजपा के बीच रही. भाजपा से मरांडी की विदाई के साथ ही झामुमो सुप्रीमो शिबू सोरेन का भाजपा से बैर खत्म सा हो गया. मरांडी से असली चुनौती आदिवासियों के मानस पटल पर बसे झामुमो को है.

मरांडी और सोरेन दोनों संथाल आदिवासी हैं. राज्य के आदिवासियों में संथालों की आबादी सर्वाधिक है. मरांडी के कांग्रेस के क़रीब जाते ही ब़ुजुर्ग हो चले सोरेन छिटककर भाजपा की तऱफ चले गए और आज की तारी़ख में बेटे हेमंत सोरेन को उपमुख्यमंत्री की कुर्सी दिलवाकर विरासत के हस्तांतरण का नज़ारा भांप रहे हैं. हाल के वर्षों में आदिवासियों के बीच चर्च और संघ के लिए जारी संघर्ष को किनारे करके उग्र वामपंथ ने नक्सलवाद के नाम पर जगह ज़रूर बना ली है, पर झारखंड में वामपंथी राजनीतिक दलों के लिए शुरू से ही कोई जगह नहीं रही है. इसकी बड़ी वजह अलग राज्य की लड़ाई में वामपंथी राजनीतिक दलों की भूमिका का गौण रहना है. पड़ोस के पश्चिम बंगाल में सत्तारू़ढ हुई ममता बनर्जी का अगर राज्य के बंगाली मतदाताओं पर कोई असर होता तो वह जमशेदपुर उपचुनाव में ज़रूर दिखता. ममता ने झामुमो से नाराज़ पूर्व सांसद सुमन महतो को तृणमूल कांग्रेस का टिकट देकर राजनीति का पासा चला था, लेकिन मिष्टी दोई के जमशेदपुर में क़ायम बेहतरीन बाज़ार से सुमन महतो की ज़ब्त हुई ज़मानत ने बता दिया है कि फिलहाल झारखंड में बंगाल के नेताओं की गोटी नहीं चलने वाली है. सा़फ है कि जमशेदपुर में मरांडी की झाविमो की जीत के निहितार्थ व्यापक हैं. इससे आने वाली राजनीति का प्रभावित होना तय है. टूटे मनोबल को जोड़ने के लिए भाजपा का आरोप है कि जमशेदपुर की जीत नक्सलियों से मरांडी के नापाक गठजोड़ का नतीजा है. नक्सलवाद के राज्यव्यापी असर को देखकर कहा जा सकता है कि मरांडी को इस आरोप का लाभ आगे भी मिलता रहे. जमशेदपुर संसदीय सीट पर नक्सलियों की सक्रियता का काला इतिहास रहा है. 2007 में नक्सलियों ने जमशेदपुर के सांसद सुनील महतो की हत्या कर दी थी. उपचुनाव का प्रचार शुरू करते व़क्तही मरांडी ने पुत्र अनूप मरांडी सहित 16 ग्रामीणों की नृशंस हत्या करने वाले नक्सलियों की फांसी की सज़ा मा़फ करने की मार्मिक अपील की थी. बाद में झारखंड विकास मोर्चा के प्रत्याशी की नक्सल नेता के साथ सहयोग पर बातचीत की हंगामेदार सीडी को भुनाने की कोशिश हुई.

जमशेदपुर में साझा उम्मीदवार खड़ा करने की बजाय सभी प्रमुख राजनीतिक दलों ने अलग-अलग उम्मीदवार खड़ा करके ज़मीन पर अपनी ताक़त आंक ली है. मरांडी के राजनीतिक चातुर्य के आगे बाक़ी दल बौने नज़र आ रहे हैं. बाबू लाल मरांडी ने असली दांव अर्जुन मुंडा को विधायक बनाने के तीन महीने पहले हुए खरसवां विधानसभा उपचुनाव के दौरान ही लगाया था. उसका मारक नतीजा जमशेदपुर संसदीय उपचुनाव में दिखा है. मुख्यमंत्री मुंडा खरसवां के रहने वाले हैं. मुख्यमंत्री के घर में घुसकर मरांडी ने विपक्ष को पूरी तरह से एकजुट कर दिखाया था. जमशेदपुर में जीत के लिए मरांडी ने दोहरी नीति अपनाई. शहरी मतदाताओं के बीच लोकप्रिय पूर्व आईपीएस अ़फसर अजय कुमार ने जहां शहरी मतदाताओं के दरवाज़ों पर दस्तक देकर झाविमो के लिए समर्थन जुटाया तो मरांडी गांव-गांव घूमकर खरसवां की अपील को दोहराते रहे. मुख्यमंत्री के गांव खरसवां जाकर मतदाताओं से कहते रहे कि विधान सभा चुनाव में नहीं सुने कोई बात नहीं, संसदीय चुनाव में सुन लो. जमशेदपुर का नतीजा बताता है कि भाजपा के खिला़फ मरांडी की बाज़ीगरी ने शहर और गांव दोनों में पलीता लगाया है.

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