राहुल जी, गांव में आपने क्या सीखा

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बापू जब मोहनदास करमचंद गांधी थे, नौजवान वकील थे और दक्षिण अफ्रीका में वकालत करने गए तो उनके साथ एक हादसा हुआ. गोरों ने उन्हें प्रथम श्रेणी में बैठने के लायक़ नहीं समझा और ज़बरदस्ती गाड़ी से धक्का देकर बाहर फेंक दिया. जब वह हिंदुस्तान वापस आए, उनके मन में हिंदुस्तान में कुछ काम करने की इच्छा जागी. उन्हें लगा कि वह हिंदुस्तान में कुछ नया कर सकते हैं. उथल-पुथल उनके मन में मची हुई थी कि काम करना है, क्या करना है और कैसे करना है. वह सलाह लेने के लिए उस समय के एक बड़े राष्ट्रीय नेता गोपाल कृष्ण गोखले के पास गए. उन्होंने गोखले को अपने मन के भीतर चल रहे द्वंद्व से परिचित कराया. गोखले ने नौजवान मोहनदास करमचंद गांधी की बात को बहुत ग़ौर से सुना, उनका चेहरा देखा और एक छोटी सी सलाह दी कि अगर हिंदुस्तान में कुछ काम करना चाहते हो तो पहले हिंदुस्तान को समझो. गांधी ने पूछा कि हिंदुस्तान को समझने का मतलब क्या है. गोखले ने जवाब दिया कि हिंदुस्तान को समझने का मतलब है हिंदुस्तान में ग़रीबी के कारण, हिंदुस्तान की ग़ुलामी के कारण, हिंदुस्तान में पिछड़ेपन के कारण, हिंदुस्तान में किसी भी चीज़ का विरोध न करने की आदत के पीछे का कारण, हिंदुस्तान में समाज के तनाव, हिंदुस्तान में समाज के भीतर पनप रहे अंतर्विरोध, क्या है हिंदुस्तान, क्या वह हिंदुस्तान असली है जो बंबई और दिल्ली में दिखाई देता है या जो गवर्नर और वायसराय की पार्टी में दिखाई देता है या असली हिंदुस्तान कहीं अलग है?

गांधी ने पूछा, आखिर असलियत क्या है? गोखले ने कहा, यही तो मैं चाहता हूं कि तुम किसी से सुनकर इसे न समझो. खुद देखो और महसूस करो और समझो कि असली हिंदुस्तान क्या है और इस यात्रा के दौरान तुम्हें अपने काम करने का सही मक़सद, सही रास्ता मिल जाएगा. गांधी गोखले के पास से आए और उन्होंने दो साल के अंदर लगभग पूरे हिंदुस्तान को, हिंदुस्तान के गांवों को यानी हर जगह अपनी आंखों से जाकर देखा, महसूस किया, बातचीत की कि आखिर इन चीज़ों का कारण क्या है.

गांधी ने पूछा, आखिर असलियत क्या है? गोखले ने कहा, यही तो मैं चाहता हूं कि तुम किसी से सुनकर इसे न समझो. खुद देखो और महसूस करो और समझो कि असली हिंदुस्तान क्या है और इस यात्रा के दौरान तुम्हें अपने काम करने का सही मक़सद, सही रास्ता मिल जाएगा. गांधी गोखले के पास से आए और उन्होंने दो साल के अंदर लगभग पूरे हिंदुस्तान को, हिंदुस्तान के गांवों को यानी हर जगह अपनी आंखों से जाकर देखा, महसूस किया, बातचीत की कि आखिर इन चीज़ों का कारण क्या है. गांधी को जवाब मिला, कारण ग़ुलामी है. अंग्रेजों की ग़ुलामी है, जिसकी वजह से हिंदुस्तान के लोगों की तरक्क़ी के लिए, इनकी खुशी के लिए कोई इनिशिएटिव लिया ही नहीं जाता है. यहां का पैसा विदेश में जाता है, यहां का बनाया हुआ माल विदेश में जाता है. विदेश से कच्चा माल यहां आता है और यहां पक्के माल में परिवर्तित होकर फिर विदेश चला जाता है. दो साल में गांधी इस नतीजे पर पहुंचे कि हिंदुस्तान की संपूर्ण आज़ादी ही हिंदुस्तान की समस्याओं का इलाज है और वहां से गांधी की यात्रा शुरू हुई, जो बापू में तब्दील हुई, जिसने हिंदुस्तान को ग़ुलामी के खिला़फ खड़ा कर दिया. उन दिनों के क्रांतिकारी रहे हों या अहिंसक आंदोलन के लोग, सभी के ऊपर गांधी का प्रभाव पड़ा. बापू का प्रभाव पड़ा. एक पार्टी जो स़िर्फ समाज सुधार का काम करती थी, एक राष्ट्रीय पार्टी सचमुच लोगों के दिल की पार्टी बन गई. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, जिसने आज़ादी की लड़ाई में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया. लोग टूटे, छिटके, अंतर्विरोध आए, लेकिन आज़ादी की वह लड़ाई नहीं रुकी.

आज राहुल गांधी कह रहे हैं कि वह जब पिछले तीन दिनों में गांवों में गए या शायद इससे पहले भी तीन-चार दिनों के लिए गए तो उन्होंने बहुत कुछ सीखा और वह सीखा, जो न उन्हें दिल्ली सिखा पाई और न संसद. यह बहुत ईमानदाराना वक्तव्य कहा जाएगा, लेकिन क्या यह सचमुच ईमानदाराना वक्तव्य है? क्या तीन दिन, पांच दिन, दस दिन या पंद्रह दिन में हिंदुस्तान की समस्याओं को समझा जा सकता है, हिंदुस्तान को जाना जा सकता है? आज़ादी के समय हिंदुस्तान की समस्या छूआछूत थी, ग़रीबी थी, बेरा़जगारी थी, पिछड़ापन और ग़ुलामी थी, हिंदुस्तानियों का दमन थी. आंखों में कोई सपना नहीं था. आज भी ये समस्याएं हैं, लेकिन कम परिमाण में हैं. समस्याओं का प्रकार बदल गया है. राहुल गांधी इस देश के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार हैं. शायद वह अगले कुछ महीनों में प्रधानमंत्री बन भी जाएं, पर अगर राहुल गांधी इस यात्रा में कुछ चीज़ों को नहीं समझ पाए तो उनकी यह यात्रा किसी पब्लिक रिलेशन कंपनी द्वारा सुझाई गई यात्रा में तब्दील होकर रह जाएगी. आखिर राहुल गांधी को क्या सीखना है?

राहुल गांधी को सीखना है कि जिन गांवों से होकर वह जा रहे थे, जिन पगडंडियों से होकर वह गुज़र रहे थे, वे अभी तक पक्की क्यों नहीं हुईं, आज़ादी के साठ साल बाद भी हिंदुस्तान के गांवों को सड़कों से क्यों नहीं जोड़ा जा सका? राहुल गांधी को यह सीखना है कि वह जिन खेतों से गुज़र रहे थे, क्या उन खेतों की फसलें मंडियों तक सही समय पर पहुंच पाती हैं, क्या किसानों को उनकी फसल की सही क़ीमत मिल पाती है, क्या उनकी फसलों को सिंचाई के लिए पर्याप्त जल मिल पाता है, क्या किसानों को सही समय पर और सही मात्रा में बीज तथा खाद उपलब्ध हो पाते हैं? जिन गांवों में राहुल गांधी खाना खा रहे हैं, जहां वह चाय पी रहे हैं, उन्हें यह जानना चाहिए कि इन गांवों में पीने के पानी की समस्या है क्या? आखिर यह क्या और कैसे हो गया कि आज़ादी के साठ साल के अंदर ही अधिकांश गांवों से पीने का पानी समाप्त हो गया. राहुल गांधी को यह भी समझना चाहिए कि जिन गांवों से होकर वह निकल रहे हैं, वहां दलितों और सवर्णों या दलितों और पिछड़ों के बीच कोई अंतर्विरोध तो नहीं है, उनके बीच कोई वैमनस्य तो नहीं है? राहुल गांधी जिन गांवों से होकर निकल रहे हैं, वहां पिछड़ों और सवर्णों के बीच तनाव कहीं कोई खतरनाक स्थिति तो पैदा नहीं कर रहा है, उन गांवों में बाल विवाह तो नहीं हो रहे हैं?

सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह है कि इन गांवों में रह रहे नौजवान जिनके प्रतिनिधि होने का दावा राहुल गांधी करते हैं और जिन्हें राजनीति में लाने की बात वह करते हैं, उनमें से कितनों के पास रोजगार है? हमने टेलीविजन पर जो भीड़ देखी, राहुल गांधी के साथ चलते हुए जो लोग देखे, वे पूरे कपड़े पहने हुए लोग थे. क्या राहुल गांधी इन पूरे कपड़े पहने हुए लोगों से आगे जाकर गांव के दूसरे हिस्सों में रहने वाले उन परिवारों की व्यथा को समझ पाए, जिनके पास पहनने को पूरे कपड़े नहीं हैं, खाने को नहीं है? उन्हें पूरा खाना भी नहीं मिलता, न्यूट्रीशन की बात तो छोड़ ही दीजिए. वहां बच्चों का ड्राप आउट कितना है, क्या वहां प्राइमरी स्कूल हैं? और अगर हैं तो उनकी हालत क्या है? क्या वहां बच्चे पढ़ने जाते हैं और शिक्षक उन्हें पढ़ाता है? जिन गांवों से वह गुज़रे, क्या वहां उन्होंने कोई प्राइमरी हेल्थ सेंटर देखा, क्या उन्होंने सोचा कि अगर यहां के लोग बीमार पड़ते हैं तो इलाज कहां कराते हैं? और अगर यह सब नहीं है तो इसका कारण क्या है? पिछले साठ सालों से, जबसे देश आज़ाद हुआ, इसके लिए ज़िम्मेदार कौन है? वह कौन सी मानसिकता ज़िम्मेदार है, जो देश के 80 प्रतिशत लोगों तक विकास का लाभ नहीं पहुंचने दे रही है? गांव वालों के मन में क्या कोई आशा है, जो इस मुल्क को नए सिरे से बनाने में काम आ सके? अगर राहुल गांधी इन बुनियादी बातों को नहीं समझ पाए तो उनका इन गांवों में या किसी और गांव में घूमना बेकार है. पर अगर राहुल गांधी सचमुच इन चीज़ों को समझ पाए तो हमारा मानना है कि देश को एक नया समझदार नौजवान नेतृत्व शायद मिल जाए. कांग्रेस के लोग इसका जवाब यह कहकर दे सकते हैं कि हमारा तो कम से कम एक नेता गांवों में जा रहा है, विपक्ष के लोग क्या कर रहे हैं. दिल्ली, लखनऊ, पटना, चंडीगढ़ किसी भी राजधानी में बैठकर, आलीशान बंगलों में बैठकर वे केवल ग़रीब जनता की बात करते हैं. कांग्रेस का आरोप सही है, लेकिन आरोप लगाने से आपकी अपनी कमियां नहीं छुप जातीं. क्यों ऐसा है कि जब राहुल गांधी गांव में जाने की बात करते हैं तो सारे नेता उनके साथ चल पड़ते हैं, क्यों नहीं वे अपने-अपने क्षेत्रों के गांवों में जाते हैं?

कांग्रेस, जिसने देश को आज़ाद कराने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, अगर वह ज़रा भी ज़िम्मेदारी का एहसास करती है तो यह देश के लिए भले की बात है, मगर वह ज़िम्मेदारी ईमानदाराना होनी चाहिए, विश्वास वाली होनी चाहिए. अन्यथा कांग्रेस नए सिरे से लोगों के बीच आशा पैदा कर फिर से उसे तोड़ने का काम करेगी. कांग्रेस पहले भी कई बार लोगों की आशा तोड़ चुकी है. देश का नागरिक होने के नाते हमारा फर्ज़ है कि कांग्रेस और विपक्ष दोनों को बार-बार याद दिलाएं कि उनका देश के प्रति भी कोई फर्ज़ है और देश से मतलब अमीरों और मध्यम वर्ग या उच्च मध्यम वर्ग से नहीं है, देश का मतलब ग़रीबों से है, वंचितों से है, अल्पसंख्यकों से है. राहुल गांधी ने क्या इन गांवों में अल्पसंख्यकों की हालत देखी, उनके पास रोजगार के कोई साधन देखे, उनकी शिक्षा की संस्थाएं देखीं? अगर देखीं तो हमारी मांग है कि इन सारे सवालों पर राहुल गांधी को मीडिया के सामने आकर अपनी फाइंडिंग्स, अपनी जानकारी शेयर करनी चाहिए, ताकि देश के लोगों को यह भरोसा हो कि जो नौजवान सीखने की बात ईमानदारी से कहकर निकला, उसने सचमुच ईमानदारी से सीखने की कोशिश की.

संतोष भारतीय

संतोष भारतीय चौथी दुनिया (हिंदी का पहला साप्ताहिक अख़बार) के प्रमुख संपादक हैं. संतोष भारतीय भारत के शीर्ष दस पत्रकारों में गिने जाते हैं. वह एक चिंतनशील संपादक हैं, जो बदलाव में यक़ीन रखते हैं. 1986 में जब उन्होंने चौथी दुनिया की शुरुआत की थी, तब उन्होंने खोजी पत्रकारिता को पूरी तरह से नए मायने दिए थे.

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संतोष भारतीय चौथी दुनिया (हिंदी का पहला साप्ताहिक अख़बार) के प्रमुख संपादक हैं. संतोष भारतीय भारत के शीर्ष दस पत्रकारों में गिने जाते हैं. वह एक चिंतनशील संपादक हैं, जो बदलाव में यक़ीन रखते हैं. 1986 में जब उन्होंने चौथी दुनिया की शुरुआत की थी, तब उन्होंने खोजी पत्रकारिता को पूरी तरह से नए मायने दिए थे.

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