अमेरिका-चीन संबंध

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पाकिस्तान में जब अलक़ायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन मारा गया तो अमेरिका की नज़रें कुछ समय के लिए पाकिस्तान के प्रति टेढ़ी हो गईं. तब चीन ने इशारे-इशारे में कह दिया कि वह पाकिस्तान का बाल बांका नहीं होने देगा. इसके अलावा जब कोरियाई प्रायद्वीप में उत्तर कोरिया और दक्षिण कोरिया आपस में लड़ रहे थे तो अमेरिका दक्षिण कोरिया की मदद में जुटा था, जबकि चीन उत्तर कोरिया का कवच बना बैठा था. न जाने इस तरह के कितने उदाहरण हैं, जिनसे यह प्रतीत होता है कि अमेरिका और चीन के बीच ज़बरदस्त कटुता है. लेकिन हकीक़त कुछ और है. दोनों देशों के कूटनीतिक रिश्ते दुनिया को बरगला रहे हैं. यदि इतिहास पर नज़र डालें तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि अमेरिका और चीन के बीच के रिश्ते काफी मधुर रहे हैं. आज भले दिखावे के लिए दोनों देश एक-दूसरे की समय-समय पर खिंचाई कर दें, लेकिन इनके  बीच की प्रगाढ़ता कुछ और ही बयां कर रही है. संदेश यह है कि भारत समेत दुनिया के अन्य तमाम देश यह ग़लत़फहमी कतई न पालें कि चीन और अमेरिका के रिश्ते तल्ख हैं और इस तल्खी का उन्हें लाभ मिल सकता है. नोबेल पुरस्कार विजेता अमेरिकी राजनयिक हेनरी किसिंजर ने अपनी किताब में ख़ुलासा किया है कि 1971 के बांग्लादेश युद्ध में अमेरिका चाहता था कि पाकिस्तान का साथ देने के लिए चीन अपनी सेना भेजे. इसके लिए उसने चीन से पहल भी की थी. अमेरिका की पेशकश थी कि पाकिस्तान का साथ देने की स्थिति में रूस अगर चीन पर हमला करता है तो चीन की ओर से अमेरिका भी मैदान में उतर जाएगा. जबकि रूस उस व़क्त भारत का दोस्त था. किसिंजर की किताब ऑन चाइना में हुए इस ख़ुलासे को पाकिस्तानी मीडिया अमेरिका को पाकिस्तान का पुराना और व़फादार दोस्त बताने के लिए बढ़ा-चढ़ाकर प्रचारित कर रहा है. किताब में इस बात का भी उल्लेख है कि 1971 में बांग्लादेश और पाकिस्तान युद्ध के दौरान पाकिस्तान के समर्थन में सैन्य मदद मांगने के  लिए किसिंजर ख़ुद चीन से मिले थे. उन्होंने चीन से यह वादा किया था कि यदि रूस युद्ध में आता है तो चीन और पाकिस्तान के  साथ अमेरिका भी खड़ा हो जाएगा. यह पहला मौक़ा था, जब चीन-रूस और अमेरिकी रिश्तों के बीच युद्ध को लाने का ख़तरा उठाया गया था. उस व़क्त अमेरिका के राष्ट्रपति रहे रिचर्ड निक्सन के विरोधी हमेशा उन पर पाकिस्तान की ओर झुके होने का आरोप भी लगाते थे.

विश्व के हालात अब ऐसे हो रहे हैं कि न अमेरिका अकेली विश्व शक्ति बना रह सकता है और न वह पीछे हट सकता है. यह अमेरिका के लिए चुनौतीपूर्ण समय है. चीन शक्ति के रूप में अमेरिका का मुक़ाबला करने के लिए विश्व में सबसे प्रबल दावेदार है. चीन के जटिल इतिहास की रोशनी में अमेरिका के लिए यह चुनौती और भी मुश्किल हो जाती है.

अब इस ख़ुलासे को पाकिस्तानी मीडिया अमेरिका को पाकिस्तान का पुराना दोस्त बताते हुए भुना रहा है. पाकिस्तानी मीडिया इस बात पर जोर दे रहा है कि हम पाकिस्तानी अपने दुश्मन और दोस्त के बीच फर्क़ करना भी नहीं जानते. हम यह भी भूल जाते हैं कि हमारे दोस्तों की भी अपने मुल्क की आंतरिक राजनीति के चलते कुछ मजबूरियां हैं. उस व़क्तअंतरराष्ट्रीय माहौल भी पूर्वी पाकिस्तान के बंगालियों के पक्ष में था. ऐसे हालात में भी अमेरिका और चीन खुलकर पाकिस्तान की मदद नहीं कर पा रहे थे. हालांकि कभी चीन को अमेरिका का दोस्त बताने वाले हेनरी किसिंजर की चीन के बारे में राय अब बदल गई है. किसिंजर मानते हैं कि चीन इस समय अमेरिका के सामने एक बड़ी चुनौती है. यूं तो अमेरिका और चीन के बीच रिश्ते पिछले 40 सालों से एक जैसे रहे हैं, लेकिन अब समीकरण बदल रहा है. वैश्विक आर्थिक मंदी के बाद चीन में ऐसे लोगों की तादाद बढ़ी है, जो मानते हैं कि अब दुनिया में विश्व शक्ति की धुरी बदल चुकी है. चीन अब बड़ी शक्ति बनकर उभरा है और अंतरराष्ट्रीय मामलों में चीन के दख़ल में यह बात दिखनी चाहिए. इसे लोगों को अमेरिका की ग़लती के रूप में नहीं देखना चाहिए, क्योंकि पिछले दो हज़ार वर्षों में से 1800 वर्षों पर चीन का दबदबा रहा है, जबकि पिछले 40 वर्षों पर ही अमेरिका का दबदबा है.

विश्व के हालात अब ऐसे हो रहे हैं कि न अमेरिका अकेली विश्व शक्ति बना रह सकता है और न वह पीछे हट सकता है. यह अमेरिका के लिए चुनौतीपूर्ण समय है. चीन शक्ति के रूप में अमेरिका का मुक़ाबला करने के लिए विश्व में सबसे प्रबल दावेदार है. चीन के जटिल इतिहास की रोशनी में अमेरिका के लिए यह चुनौती और भी मुश्किल हो जाती है. बकौल किसिंजर, चीन को लेकर अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा की रणनीति भी साफ है. अमेरिका को चाहिए कि वह चीन के  साथ अपनी समझ को बढ़ाए और ऐसे रिश्ते स्थापित करे, जिनमें दोनों देशों को लगे कि सब कुछ ठीक हो रहा है. 23 सितंबर, 2008 को तत्कालीन चीनी प्रधानमंत्री वन चापो ने न्यूयार्क में कहा था कि अमेरिका के  राष्ट्रपति चुनाव के बाद व्हाइट हाउस का स्वामी चाहे कोई बने, लेकिन चीन-अमेरिका के रिश्ते पहले से मधुर रहे हैं और रहेंगे. यह ऐतिहासिक धारा उल्टा नहीं बह सकेगी. वन चापो ने पिछले वर्ष चीन-अमेरिका संबंधों के विकास का सिंहावलोकन किया और दोनों देशों के बीच राजनीति एवं अर्थ-व्यापार के क्षेत्रों में निरंतर मज़बूत हुए सहयोग के  तथ्य और आंकड़े पेश किए. यही नहीं, उन्होंने मैत्री की कई कहानियां भी सुनाईं, जिससे वहां मौजूद लोगों में मित्रता की स्नेहपूर्ण याद ताजा हो गई. चीन और अमेरिका प्रतिद्वंद्वी नहीं है, दोनों सहयोग के साझीदार हैं और हमेशा दोस्त बने रह सकते हैं.

इस दौरान उन्होंने यह भी स्पष्ट किया था कि चीन तेजी से आर्थिक प्रगति कर रहा है, इसका अर्थ यह नहीं है कि इससे अमेरिका को क्षति पहुंचेगी, बल्कि वह भी चीन के विकास से लाभ पा सकता है. अमेरिका और चीन दोनों एक साथ विकसित हो सकते हैं. चीन की हार्दिक अभिलाषा है कि चीन-अमेरिका मैत्रीपूर्ण सहयोग भिन्न सांस्कृतिक पृष्ठभूमि में बड़े देशों के मेलमिलाप से सह अस्तित्व होने और समान विकास के  रास्ते पर आगे चलने की मिसाल बनेगा. वन चापो ने कहा कि उन्हें इसलिए चीन-अमेरिका संबंधों पर पक्का विश्वास हुआ है, क्योंकि दोनों देशों के बीच व्यापक समान हित मौजूद हैं. सहयोग के क्षेत्र द्विपक्ष के दायरे से कहीं अधिक विस्तृत हैं और उसका सारे विश्व पर अहम प्रभाव पड़ रहा है. इसलिए दोनों पक्षों को समानता वाली वार्ता के ज़रिए एक-दूसरे के प्रति आशंकाओं को दूर करना चाहिए, आपस में विश्वास बढ़ाना चाहिए. चीन और अमेरिका अब एक-दूसरे से सीख रहे हैं और एक-दूसरे के प्रशंसक बन गए हैं. अमेरिकी श्रम मंत्री एलैइन लान चाओ ने कहा कि चीन-अमेरिका संबंधों की मज़बूती विश्व शांति और स्थिरता के लिए बहुत ज़रूरी है. इसलिए अमेरिका को चीन के साथ संपर्क और सहयोग बनाए रखना चाहिए.

बहरहाल, ताजा हालात तो यही बयां कर रहे हैं कि अमेरिका और चीन के पास दिखाने के दांत अलग और खाने के दांत अलग हैं. आज पूरी दुनिया में यह संदेश फैला है कि चीन की आर्थिक एवं तकनीकी प्रगति से अमेरिका चिढ़ रहा है और दोनों देशों के बीच संबंध ठीक नहीं हैं, लेकिन ऐसा नहीं है. ज़रूरत पड़ने पर दोनों एक साथ खड़े हो सकते हैं. दिलचस्प यह भी है कि भारत विरोधी पाकिस्तान की मदद करने की इनमें होड़ लगी हुई है. इसलिए ख़ासकर भारत को चीन और अमेरिका यानी दोनों से ही सचेत रहने की ज़रूरत है.

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