उत्तर प्रदेशः पीस पार्टी बनी खतरे की घंटी

अगले साल होने वाला विधानसभा चुनाव पीस पार्टी के लिए नया सवेरा ला सकता है. अपने छोटे से राजनीतिक जीवन में कई बड़े दलों के लिए मुसीबत बने पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. मोहम्मद अयूब का प्रदेश में डंका बज रहा है. पार्टी किसी के लिए ख़तरा तो किसी के लिए राहत साबित हो रही. दुनिया में स़िर्फ दो जातियों यानी अमीर और ग़रीब की धारणा वाले डॉ. अयूब हमेशा ग़रीबों की वकालत करते रहे हैं, लेकिन इसे इत्ते़फाक़ ही कहा जाएगा कि उनकी पार्टी में धन्ना सेठों की दस्तक सुनाई देती है. पीस पार्टी धन्ना सेठों के सहारे अपनी आर्थिक ज़रूरतें पूरी करना चाहती है, वहीं वोट बटोरने के लिए हिंदुओं और मुसलमानों को अपने साथ खड़ा देखना चाहती है. दोनों ही कौमों में वह राजनीतिक एवं सामाजिक रूप से पिछड़े वर्ग-समाज को साथ लेकर चलने पर विश्वास करती है. मुसलमानों में अंसारी और पसमांदा समाज, हिंदुओं में दलितों एवं पिछड़े वर्ग के अलावा अपरकास्ट होते हुए भी राजनीतिक रूप से पिछड़े वैश्य-कायस्थ समाज को वह अपनी ताक़त बनाना चाहती है. लक्ष्य किसी भी तरह 2012 के विधानसभा चुनाव में जीत हासिल करना है. इसके लिए प्रदेश के कोने-कोने में पार्टी की जनसभाएं और बैठकें हो रही हैं. लोगों को जोेड़ने का काम युद्ध स्तर पर चल रहा है. सत्ता में घुसपैठ का समीकरण बनाने को आतुर पीस पार्टी ने कई छोटे-छोटे दलों को साथ लेकर लोक क्रांति मोर्चा भी बना लिया है. मोर्चे में राष्ट्रीय लोकदल, लोक जनशक्ति पार्टी, भारतीय समाज पार्टी, इंडियन जस्टिस पार्टी, जनवादी पार्टी, भारतीय लोकहित पार्टी के अलावा अति पिछड़ा वर्ग महासंघ, मोमिन कांफ्रेंस जैसे संगठन भी शामिल हैं. डॉ. अयूब पूर्वांचल के बाद अब पश्चिमी उत्तर प्रदेश में ताबड़तोड़ जनसभाएं कर रहे हैं. जनसभाओं के लिए उन ज़िलों का चयन ख़ासकर किया जा रहा है, जिन्हें दीगर पार्टियों के दिग्गज अपना गढ़ समझते हैं. पिछले दिनों राष्ट्रीय लोकदल के अध्यक्ष चौधरी अजीत सिंह के वर्चस्व वाले बागपत में जनसभा करने के बाद बरेली, मेरठ, इटावा एवं बुलंदशहर आदि ज़िलों में सभाएं करके पार्टी ने यह भ्रम तोड़ दिया कि वह पूर्वांचल तक ही सीमित है. डॉ. अयूब की कुछ जनसभाओं से लगभग तय हो गया कि मुस्लिम वोटों के हिसाब से उपजाऊ ज़मीन माने जाने वाले पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इस बार कांग्रेस, भाजपा, सपा और बसपा के लिए पीस पार्टी की चुनौती आसान नहीं होगी. यही वजह है कि सपा और बसपा पीस पार्टी की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर रही हैं. समाजवादी पार्टी आरोप लगा रही है कि पीस पार्टी भाजपा और बसपा द्वारा खड़ा किया गया भस्मासुर है, जो मुसलमानों की एकता को तार-तार कर देना चाहता है.

पीस पार्टी की सबसे बड़ी ख़ासियत यह है कि वह मुस्लिमों से अधिक हिंदू प्रत्याशियों को चुनाव मैदान में उतारने को तरजीह देती है, ताकि मुसलमानों के साथ-साथ हिंदुओं के भी वोट उसे मिल जाए. यह समीकरण पीस पार्टी के लिए फायदे का सौदा साबित हो रहा है. पीस पार्टी उसी फार्मूले के तहत सत्ता के क़रीब पहुंचना चाहती है, जिस तरह बसपा आई थी. डॉ. अयूब का कहना है कि असली मक़सद जनता के सामने मज़बूत विकल्प पेश करना है. गठबंधन के नज़रिए से पीस पार्टी के लिए कोई दल अछूत नहीं है.

दरअसल, पीस पार्टी के अध्यक्ष डॉ. अयूब के बसपा का मुस्लिम चेहरा समझे जाने वाले दिग्गज नेता नसीमुद्दीन से अच्छे संबंध हैं. इसी बात का फायदा उठाकर सपा नेता पीस पार्टी को बसपा की देन बताते हैं. यही नहीं, वह यह भी साबित करने में जुटी है कि मायावती हिंदुत्व की भाजपा से भी बड़ी खेवनहार हैं. तर्क यह दिया जा रहा है कि जिस लखनऊ को इतिहास में नवाबों के शहर की उपमा से नवाजा गया था और देश-विदेश में इसकी यही पहचान थी, उस शहर की तस्वीर मायाराज में ऐसी हो गई है कि मानों यहां के मानस में बाबा साहब और कांशीराम आदि बसते हों. पहले लोग लखनऊ की जमीं पर क़दम रखते ही इमामबाड़ा, भूलभुलैया, पिक्चर गैलरी, चौक आदि देखना चाहते थे, लेकिन आज जो लखनऊ घूमने आता है, उसे अंबेडकर पार्क, समतामूलक चौराहा, परिवर्तन चौक, अंबेडकर मैदान एवं स्मृति विहार जैसे स्थान ज़्यादा आकर्षित करते हैं. इन नए दर्शनीय स्थलों ने लखनऊ की पुरानी यादों को समेटने में अहम भूमिका निभाई है. मायावती शासनकाल के कुछ बिंदु ऐसे हैं, जिनकी तारी़फ होनी चाहिए, लेकिन समाजवादी पार्टी उन पर भी राजनीति करती नज़र आ रही है. मायावती ने अपने क़रीब चार साल के शासन में कभी हिंदू-मुस्लिम कार्ड नहीं खेला. अयोध्या मसला हो या फिर बरेली के सांप्रदायिक दंगे अथवा अन्य कोई घटना, मायावती ने क़ानून व्यवस्था तोड़ने वालों पर ही सख्ती की. लेकिन विपक्ष का तो काम ही विरोध करना है, इसलिए सपा इसे सही कैसे ठहरा सकती है. वह तो अभी भी हिंदू-मुस्लिम और मंदिर-मस्जिद के विवाद में ही उलझी है. इसी सोच के तहत वह बसपा और भाजपा पर पीस पार्टी को संरक्षण देने का आरोप लगा रही है. उधर पीस पार्टी की बढ़त का ग्राफ जारी है. लोकसभा चुनाव में पीस पार्टी को एक फीसदी वोट मिला था, ज़िला पंचायत चुनाव में मऊ में अध्यक्ष पद पर इसका उम्मीदवार विजयी रहा और 72 ज़िला पंचायत सदस्य जीते. मुज़फ्फरनगर में पीस पार्टी का ब्लॉक प्रमुख जीता. पीस पार्टी दूसरे के लिए भले ही ख़तरा हो, लेकिन विरोध के स्वर इस पार्टी में भी फूटने लगे हैं. भ्रष्टाचारियों का नार्को टेस्ट कराने की बात करने वाले डॉ. अयूब अपने प्रत्याशियों की जीत के लिए किसी भी दल या व्यक्ति से समझौते को तैयार दिखते हैं. पिछले दिनों पूर्व डीजीपी यशपाल सिंह का पार्टी से जुड़ना काफी चर्चा में रहा. यशपाल सिंह की पत्नी गीता सिंह भू-माफिया के नाम से मीडिया में काफी चर्चा बटोर चुकी हैं. हाल में पूर्वांचल के बाहुबली नेता मुख्तार अंसारी के भाई अफजाल अंसारी के पार्टी से जुड़ने की चर्चा गर्म रही. मुसलमानों की हमदर्द बनकर सामने आई पीस पार्टी में इन दिनों इस बात को लेकर भी तनातनी है कि तमाम सीटों पर ब्राह्मण और क्षेत्रीय उम्मीदवारों को ही क्यों चुनावी मैदान में उतारा जा रहा है. इसके चलते कई मुस्लिम नेताओं ने, जो पार्टी के गठन के समय से जुड़े हुए थे, किनारा कर लिया है. इन सब बातों से बे़फिक्र पीस पार्टी रैली पर रैली कर रही है. उसे जहां एक ओर लोकजन शक्ति पार्टी के रामविलास पासवान का सहयोग हासिल है, वहीं ओमप्रकाश राजभर भी इन रैलियों में बराबर दिखते रहे, लेकिन दलितों, पिछड़ों और मुसलमानों को साथ लेकर आगे बढ़ने वाली पीस पार्टी द्वारा विधानसभा चुनाव के व़क्त इन्हीं वर्गों से किनारा कर लेने से वह आजकल कुछ नाराज़ हैं.

समाजवादी पार्टी की अल्पसंख्यक सभा के प्रांतीय अध्यक्ष हाजी रियाज़ अहमद आरोप लगाते हैं कि पीस पार्टी को रैलियों के लिए भाजपा और बसपा पैसा दे रही है. यह रकम प्रति माह 6 करोड़ रुपये के क़रीब होने की बात कही जा रही है. उनका कहना है कि एक सर्जन के पास इतना पैसा कहां से आ सकता है. इसके जवाब में पीस पार्टी के पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कोआर्डीनेटर मुहम्मद इसराइल कहते हैं कि पीस पार्टी की रैलियों में जुटी भीड़ देखकर सपा नेता बौखला गए हैं. वहीं डॉ. अयूब कहते हैं कि इल्ज़ाम लगता है कि हम भाजपा को फायदा पहुंचा रहे हैं. लोकसभा चुनाव में 21 सीटों पर हमारे उम्मीदवार लड़े, एक जगह भी भाजपा नहीं जीत पाई. पीस पार्टी के हौसलों का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वह आगामी विधानसभा चुनाव में 350 सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारने का दावा करती है. कुछ राजनीतिक दल पीस पार्टी की बढ़ती ताक़त को देखकर इससे गठजोड़ की कोशिश में हैं, लेकिन पार्टी अध्यक्ष डॉ. अयूब किसी बड़े दल से समझौता करके अपना कद कम नहीं करना चाहते. पार्टी ने कुछ छोटे-छोटे, क्षेत्रीय राजनीतिक दलों को अपने साथ जोड़ा है. पीस पार्टी की सबसे बड़ी ख़ासियत यह है कि वह मुस्लिमों से अधिक हिंदू प्रत्याशियों को चुनाव मैदान में उतारने को तरजीह देती है, ताकि मुसलमानों के साथ-साथ हिंदुओं के भी वोट उसे मिल जाए. यह समीकरण पीस पार्टी के लिए फायदे का सौदा साबित हो रहा है. पीस पार्टी उसी फार्मूले के तहत सत्ता के क़रीब पहुंचना चाहती है, जिस तरह बसपा आई थी. डॉ. अयूब का कहना है कि असली मक़सद जनता के सामने मज़बूत विकल्प पेश करना है. गठबंधन के नज़रिए से पीस पार्टी के लिए कोई दल अछूत नहीं है. उन्होंने भारतीय समाज पार्टी, जनवादी पार्टी, इंडियन जस्टिस पार्टी, लोकजन शक्ति पार्टी, भारतीय लोकहित पार्टी एवं मोमिन कांफ्रेंस के अपने साथ होने का दावा किया. पार्टी गठजोड़ ज़रूर कर रही है, लेकिन पश्चिमी उत्तर प्रदेश में ज़िलेवार प्रस्तावित रैलियों में वह अकेली ही रहेगी.

विरोधी मेरी हत्या करना चाहते हैं: अयूब

पीस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. अयूब पिछले दिनों फैज़ाबाद में एक सड़क हादसे में घायल हो गए, जिसमें उन्हें गंभीर चोटे आईं. पुलिस भले ही इसे हादसा बता रही हो, लेकिन अयूब इसे उन सांप्रदायिक शक्तियों की साजिश बताते हैं, जिनसे उन्हें जान का ख़तरा महसूस होता है, लेकिन वह हार मानने को तैयार नहीं है. पेश हैं बातचीत के मुख्य अंश:-

फैज़ाबाद सड़क हादसे से आपका मिशन 2012 प्रभावित हुआ है…

सड़क हादसे में मेरा घायल होना अकस्मात या संयोगवश नहीं, बल्कि  मेरी हत्या की साजिश रची गई थी. इस संबंध में ़फैज़ाबाद शहर कोतवाली में मुक़दमा दर्ज करा दिया गया है. जिस बिना नंबर वाली स्कार्पियों ने मेरी फार्चुनर गाड़ी को टक्कर मारी, वह लखनऊ से ही मेरे पीछे लगी थी.

आपके ख़िला़फ इस तरह की साजिश कौन रच सकता है?

पीस पार्टी मानववादी पार्टी है और सांप्रदायिकता, जातिवादी एवं भ्रष्टाचार की विरोधी है. यह साजिश ऐसी ही शक्तियों द्वारा रची गई. हमारी पार्टी के कार्यकर्ता हमेशा से सुरक्षा का मुद्दा उठाते रहे हैं, लेकिन सरकार ने इस ओर गंभीरता से नहीं सोचा.

आप इस मामले में सरकार से कैसा सहयोग चाहते हैं?

घटना की उच्चस्तरीय जांच और दोषियों को बेनकाब करने के लिए मैंने केंद्र और प्रदेश सरकार दोनों को पत्र लिखा है.

आपकी पार्टी में परिपक्व एवं कद्दावर नेताओं की कमी है, जबकि चुनाव प्रचार के लिए ऐसे नेताओं का होना ज़रूरी है…

जीत नेताओं से नहीं, विचारधारा से होती है. हमने पिछले चुनावों में बेहतर प्रदर्शन किया था और हमारा प्रदर्शन सुधरता जा रहा है. अगर जीत का आधार नेता ही होते तो भाजपा जैसे दल आज विपक्ष में न बैठे होते.

पार्टी जिन लोगों को टिकट दे रही है, उनमें कई बाग़ी हैं. कहीं वे आगे चलकर पाला न बदल लें…

नहीं, हम उन्हीं लोगों को टिकट दे रहे हैं, जो हमारी विचारधारा से इत्ते़फाक़ रखते हैं. कई राजनीतिक दलों के नेता हमारी पार्टी में आ रहे हैं. इसके पीछे हमारी लोकप्रियता है.

कहा जा रहा है कि पीस पार्टी के मैदान में आने से मुस्लिम वोटों का विभाजन होगा…

मुस्लिम वोटों की सियासत कर रहे दलों को भारी नुक़सान पहुंचेगा, ख़ासकर समाजवादी पार्टी को. यह भ्रम जानबूझ कर फैलाया जा रहा है. ऐसा कुछ होने वाला नहीं. ऐसी बातें वे ही दल कर रहे हैं, जिन्होंने कई दशकों तक मुसलमानों को वोट बैंक की तरह इस्तेमाल किया. हम अपना काम कर रहे हैं. इससे किसे फायदा होगा और किसे नुक़सान, यह देखना हमारा काम नहीं है. जनता जिसे चाहेगी, उसे चुनकर भेजेगी. राजनीति में कोई छोटा-बड़ा नहीं होता. कौन छोटा है और कौन बड़ा, यह दल नहीं, जनता तय करती है. अबकी जनता ने पीस पार्टी को देखने का मन बना लिया है. उत्तर प्रदेश में अगली सरकार हमारे दख़ल के बिना नहीं बन पाएगी.

यूडीएफ और नेलोपा भी मैदान में

पीस पार्टी की तर्ज पर कुछ अन्य मुस्लिम नेता भी अपनी ताक़त बढ़ाने को उतावले दिख रहे हैं. यूडीएफ के मुखिया डॉ. यूसुफ कुरैशी क़रीब सौ सीटों पर उम्मीदवार उतारने की तैयारी में हैं, जिनमें 60 पश्चिमी क्षेत्रों में और 40 पूर्वांचल में होंगे. अपनी कयादत-अपनी सियासत के नारे पर यूडीएफ मुस्लिम प्लस अन्य बिरादरियों की गणित समझा कर चुनावी समीकरण बनाने में जुटी है. नेशनल लोकतांत्रिक पार्टी के मोहम्मद अरशद भी काफी समय से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बैठकों का सिलसिला छेड़े हुए हैं. अपने साथ भारतीय समानता पार्टी, जनसत्ता पार्टी एवं वंचित जमात पार्टी जैसे दलों के होने की बात कहने वाले अरशद अक्सर पूर्व सपा नेता एवं सांसद अमर सिंह के लोकमंच के कार्यक्रमों में भी नज़र आ जाते हैं. क्षेत्रीय स्तर पर शुरू हुई छोटे दलों की सरगर्मियों से बड़े दलों की नींद उड़ गई है. समय की नज़ाकत भांप कुछ बड़े दल इनसे हाथ मिलाने को लालायित दिखते हैं. राहुल गांधी तो यह बात खुलकर कह चुके हैं. इसके बाद उत्तर प्रदेश कांग्रेस ने सा़फ कर दिया कि सियासी दोस्ती के लिए राष्ट्रीय लोकदल के लिए भी पार्टी ने दरवाजे खोल रखे हैं. प्रदेश इकाई ने गठबंधन करने का अधिकार पूरी तरह पार्टी महासचिव राहुल गांधी को दे दिया है.