ओलंपिक 2012 : डाओ प्रायोजक बना, विवाद शुरू

जैसे ही यह खबर आई कि डाओ कंपनी को भी लंदन ओलंपिक का प्रायोजक बनाया गया है, भारत में इस बात को लेकर भोपाल गैस पी़ड़ित संगठनों ने विरोध शुरू कर दिया, लेकिन एक दिलचस्प तथ्य यह भी है कि भारत सरकार की ओर से अब तक इस मुद्दे पर कोई भी बयान नहीं आया है. 2012 ओलंपिक खेलों में डाओ केमिकल्स स्टेडियम के आसपास 70 लाख पौंड के आर्टवर्क का खर्च उठाएगी. दरअसल, डाओ केमिकल्स ही वह अमेरिकी कंपनी है जिसने यूनियन कार्बाइड को खरीदा है. और यूनियन कार्बाइड ही वह कंपनी है जो 1984 में भोपाल में हुए गैस रिसाव की वजह से हज़ारों लोगों की मौत के लिए ज़िम्मेदार है और जिसके मुखिया वारेन एंडरसन की तलाश आज भी जारी है, ताकि उसे न्यायालय के दरवाज़े तक लाया जा सके और भोपाल गैस पी़ड़ितों को इंसा़फ दिलाया जा सके.

हालांकि, किसी खेल के लिए प्रायोजक का चुनाव करना मेज़बान देश का मामला है और यह उसका अधिकार भी है. डाओ को लेकर जो समस्याएं भोपाल के लोगों को हैं, वह ज़रूरी नहीं कि मेज़बान देश को भी हो. ऐसे में लंदन ओलंपिक पर या ब्रिटेन की सरकार पर सवाल ख़डा करना मुश्किल है. लेकिन, हैरत की बात यह है कि भारत सरकार ने अब तक इस मुद्दे पर अपना मुंह बंद ही रखा है. क्यों सरकार भोपाल गैस पी़ड़ितों की भावनाओं का ख्याल रखते हुए एक बार भी औपचारिक तौर पर अपना विरोध दर्ज कराने से परह़ेज कर रही है?

दिसंबर 1984 की उस काली रात ने भोपाल को क़ब्रिस्तान में बदल डाला था. मौत का एक ऐसा खेल हुआ था, जिसे हज़ारों भोपालवासी अभी तक नहीं भूल पाए हैं. गैस रिसाव की वजह से भोपाल के कुछ इलाक़ों का भूजल अब भी प्रदूषित है. आज भी यहां के बच्चे जन्म से ही कई विकारों के साथ पैदा हो रहे हैं. दुनिया की औद्योगिक दुर्घटना के इतिहास में यह अब तक की सबसे बड़ी दुर्घटना मानी जाती है. बाद में इसी यूनियन कार्बाइड को डाओ केमिकल्स ने खरीद लिया था. लेकिन वह अब तक वह भोपाल से अपना कारोबार शुरू नहीं कर सका है. चूंकि कई याचिकाएं अदालत में विचाराधीन है और साथ ही मुआवज़े का मामला भी अभी तक अटका हुआ है. डाओ के मुताबिक़ यूनियन कार्बाइड ने 1989 में 47 करोड़ डॉलर के मुआवज़े के बारे में जो समझौता किया था, वह अंतिम है. इस राशि के हिसाब से एक मृतक के परिवार के हिस्से में मात्र 1,400 पौंड की राशि आएगी. दूसरी ओर, गैस पी़ड़ितों के समर्थन में अभियान चला रहे लोगों का कहना है कि शहर का भूमिगत पानी अभी भी ज़हरीला है, जिसकी वजह से बच्चे विकलांग पैदा हो रहे हैं और हमारी परेशानी अभी भी समाप्त नहीं हुई है. भोपाल गैस पीड़ितों के मुताबिक़ डाओ को ओलंपिक का प्रायोजक बनाने का अर्थ हमारी भावनाओं का मज़ाक़ उ़डाने के बराबर है. यह बात कुछ ऐसी ही है जैसे कि मृतकों की क़ब्रों पर नाच का आयोजन किया जा रहा हो.

ओलंपिक खेलों में दुनिया भर के देश हिस्सा लेते हैं. अगर लंदन ओलंपिक में डाओ जोन्स कंपनी की मदद ली जा रही है तो इससे भोपाल के लोगों को बहुत दुख पहुंचेगा. हम भारत सरकार और भारतीय ओलंपिक एसोसिएशन से अपील करेंगे कि भारत को इस पर कड़ा विरोध जताना चाहिए. भारत आज दुनिया की बड़ी शक्ति है, उसे अपनी बात अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रखनी चाहिए.

– असलम शेर खान, पूर्व हॉकी खिलाड़ी

ओलंपिक में हॉकी में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुके और भोपाल के रहने वाले असलम शेर खान इस मुद्दे को विवाद नहीं, बल्कि भावनाओं का मामला बताते हैं. खान कहते हैं कि अगर लंदन ओलंपिक में डाओ की मदद ली जा रही है तो इससे भोपाल के लोगों को बहुत दुख पहुंचेगा. हम भारत सरकार और भारतीय ओलंपिक एसोसिएशन से अपील करेंगे कि भारत को इस पर कड़ा विरोध जताना चाहिए. भोपाल गैस पी़ड़ित संगठन के एक कार्यकर्ता सतीनाथ सारंगी कहते हैं कि आज भी लोग यूनियन कार्बाइड हादसे की वजह से मारे जा रहे हैं. बहुत से बच्चे आज भी विकृतियों के साथ पैदा होते हैं. डाओ केमिकल्स इन सब ज़िम्मेदारियों को लेने से इनकार करता आया है, जो हो रहा है वह मानवता के लिए बहुत ग़लत है. हम भोपाल, दिल्ली और हो सके तो लंदन में विरोध प्रदर्शन करेंगे. हालांकि, किसी खेल के लिए प्रायोजक का चुनाव करना म़ेजबान देश का मामला है और यह उसका अधिकार भी है. डाओ को लेकर जो समस्याएं भोपाल के लोगों को हैं, वह ज़रूरी नहीं कि मेज़बान देश को भी हों. ऐसे में लंदन ओलंपिक पर या ब्रिटेन की सरकार पर सवाल ख़डा करना मुश्किल है. लेकिन, हैरत की बात यह है कि भारत सरकार ने अब तक इस मुद्दे पर अपना मुंह बंद ही रखा है. क्यों सरकार भोपाल गैस पीड़ितों की भावनाओं का ख्याल रखते हुए एक बार भी औपचारिक तौर पर अपना विरोध दर्ज कराने से परहेज़ कर रही है?

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