इलाहाबाद हाइकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट का फैसला किसानों के हौसले बुलंद

सार्वजनिक विकास के नाम पर किसानों की ज़मीन हथियाने के सरकारी मंसूबों पर पानी फिरता नज़र आ रहा है. इलाहबाद हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट से ग्रेटर नोएडा के किसानों की ज़मीन के बारे में जो फैसले आए हैं, वे इंसाफ़ के इतिहास में मील का पत्थर साबित होने की ताक़त रखते हैं. देश के आम आदमी को लगने लगा है कि आज जबकि हर तऱफ भ्रष्टाचार का राज है, ऐसे में जो काम राजनीतिक दलों को करना चाहिए, वह इंसाफ़ की निगहबान अदालतों ने कर दिखाया. उत्तर प्रदेश सरकार ने ग्रेटर नोएडा के किसानों की ज़मीन ज़बरदस्ती छीन लेने की कोशिश की थी, उस पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लगाम लगा दी है और देश की सबसे बड़ी अदालत ने उस फैसले को सही ठहराया है. सुप्रीम कोर्ट के हुक्म से गौतम बुद्ध नगर ज़िले के साबेरी गांव की ज़मीन उसके मालिक किसानों को वापस मिल चुकी है. पतवाड़ी, बिसरख, हैबतपुर, इटेड़ा, रोज़ा याक़ूबपुर और ऐमनाबाद के किसानों की ज़मीनों को शीघ्र ही सुप्रीम कोर्ट की न्याय की कसौटी से गुज़रना पड़ेगा और उम्मीद है कि वे भी जल्दी ही किसानों को वापस मिल जाएंगी. पतवाड़ी के मामले में तो हाईकोर्ट का फैसला भी आ चुका है. यह अलग बात है कि बिल्डरों और ग्रेटर नोएडा अथॉरिटी की ओर से अपील ज़रूर की जाएगी और अंतिम फैसला आने में थोड़ा वक़्त लग सकता है, लेकिन इस बीच बिल्डर लॉबी निराश है और जिन लोगों को उसने सब्ज़बाग़ दिखाकर फ्लैट बुक किए थे, उनकी आंखों के सामने अंधेरा छा गया है. अब समाचार माध्यमों के ज़रिए यह प्रचार किया जा रहा है कि ज़मीन अधिग्रहण पर रोक लगाकर अदालत ने हज़ारों मध्यवर्गीय लोगों के सपनों को रौंद दिया है, लेकिन यह सभी जानते हैं कि लोगों के सपनों को रौंदने का काम बिल्डरों ने ही किया और इस काम के लिए अधिकारियों और नेताओं की भरपूर मदद मिली. आशंका इस बात की है कि बिल्डरों, अधिकारियों और नेताओं का यह गठजोड़ पैसे की ताक़त का इस्तेमाल करके मीडिया के ज़रिए अदालतों को भी अर्दब में लेने की कोशिश कर सकता है, लेकिन जनसामान्य को पूरा भरोसा है कि देश की न्यायिक व्यवस्था ऐसी हर कोशिश को नाकाम कर देगी.

ग्रेटर नोएडा के किसानों की लड़ाई अभी शुरू हुई है. किसानों का कहना है कि जिस ज़मीन का मुआवज़ा उन्हें 711 रुपये प्रति वर्ग मीटर के हिसाब से मिला है, उसी ज़मीन को उनके सामने 11 हज़ार रुपये में बेचा गया. 11 हज़ार रुपये में वह ज़मीन लेने के लिए बिल्डर अ़फसरों-नेताओं को रिश्वत भी दे रहा है और इस तरह उस ज़मीन की क़ीमत क़रीब 18 हज़ार रुपये प्रति वर्ग मीटर पड़ रही है. ज़ाहिर है, यह फ़र्क़ बहुत बड़ा है और इसमें घोर नाइंसा़फी के बीज मौजूद हैं. किसानों की लड़ाई इसी नाइंसा़फी के खिला़फ है.

ग्रेटर नोएडा के मामले में जो फैसला हुआ है, वह देश में विकास के नाम पर ज़मीनें हथियाने की सरकारी कोशिशों पर लगाम लगाएगा. इलाहाबाद हाईकोर्ट का रु़ख इसलिए भी प्रशंसनीय है कि ऐसी ही हालत में पश्चिम बंगाल के नंदीग्राम और सिंगुर में खून की होली खेली गई थी. वहां किसानों की ज़मीनें छीनकर जिस तरह उद्योगपतियों को देने की कोशिश की गई थी, उत्तर प्रदेश में मामला उससे कम संगीन नहीं था. आशंका जताई जा रही थी कि ग्रेटर नोएडा में भी खूऩखराबा हो सकता है. भट्टा-पारसौल में उसका ट्रेलर देखा भी जा चुका था, लेकिन अदालती हस्तक्षेप ने साफ़ कर दिया है कि अब न्याय होगा. बिल्डरों और सरकार की कोशिश यह है कि किसानों को विकास विरोधी साबित कर दिया जाए, लेकिन उनके इस अभियान की भी हवा निकल चुकी है. ग्रेटर नोएडा एक्सटेंशन के जिस भी गांव में वहां के लोगों से बातचीत की गई, सबने कहा कि वे विकास के खिला़फ नहीं हैं, वे विकास के  नाम पर अपने पुरखों की ज़मीन देने को भी तैयार हैं, लेकिन उन्हें उस ज़मीन के बदले सम्मानजनक मुआवज़ा मिलना चाहिए. सादुलापुर के रणवीर प्रधान ने कहा कि शुरू में कोशिश की गई थी कि ज़मीन अधिग्रहण की प्रक्रिया के दौरान ही न्याय हो जाए, लेकिन उस वक़्त अधिकारियों ने ध्यान नहीं दिया, आबादी निस्तारण में मनमानी की और किसानों की मर्ज़ी के खिला़फ ज़मीन अथॉरिटी के नाम करा ली. किसान अथॉरिटी के दफ्तर के चक्कर काट रहे थे, इसी बीच खतौनी में ज़मीन के मालिकाना हक़ का रिकॉर्ड बदल दिया गया और ज़मीन के मालिक के रूप में किसानों का नाम काटकर ग्रेटर नोएडा अथॉरिटी का नाम डाल दिया गया. हैरान-परेशान किसानों ने इलाक़ाई विधायक से न्याय की इस लड़ाई में साथ खड़े होने की अपील की, लेकिन उन्होंने साफ़ मना कर दिया और कहा कि मुख्यमंत्री ने उन्हें ज़मीन के किसी विवाद से दूर रहने का आदेश दे रखा है.

रणवीर प्रधान का कहना है कि उसके बाद उन्होंने ग्रामीण पंचायत मोर्चा नामक संगठन के गठन का फैसला किया, सभी लोगों से बात की और अदालत की शरण में जाने की योजना बनाई. सभी किसानों ने चंदा किया और इलाहाबाद पहुंच गए. पतवाड़ी में रणवीर की क़रीब 40 बीघा ज़मीन है और अब वह बाक़ी गांवों की ज़मीन की पैरवी में लगे हुए हैं. पतवाड़ी के टीकम सिंह ने बताया कि इस इलाक़े में सरकार के सामने खड़े होने के बारे में तो लोग सोचते भी नहीं थे, लेकिन जबसे उन्होंने दादरी में स्वर्गीय प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह के आंदोलन को देखा, तबसे लोगों को लगने लगा कि सरकार के खिला़फ भी मोर्चा लिया जा सकता है. रोज़ा याक़ूबपुर गांव का फैसला 20 जुलाई को आना था, गांव के किसान और आसपास के गांवों के लोग प्रधान अजय नागर के  निवास पर एकत्र थे, लेकिन क़रीब दो बजे जब पता चला कि 26 जुलाई की तारी़ख पड़ गई है तो वहां मौजूद नौजवान किसान प्रदीप ने छूटते ही कहा कि फैसला टल जाने से डर लगने लगा है. उसने साफ़ कहा कि बिल्डर लॉबी और सरकार किसानों के खिला़फ जुट गई है, कहीं कुछ अनहोनी न हो जाए. याक़ूबपुर के किसानों के बीच जाकर कई ऐसी बातें पता चलीं, जो किसी को भी हैरान कर सकती हैं. इन गांवों में जब ज़मीन अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू हुई तो किसानों के बीच कोई विरोध नहीं था. भूमि अधिग्रहण अधिनियम 1894 की धारा 4 के तहत जब नोटिस जारी हुआ तो क़ानून के हिसाब से किसानों ने अपनी आपत्तियां दर्ज कराईं. आबादी के लिए ज़मीन छोड़ने की अर्ज़ी दी गई, लेकिन अधिकारियों ने अर्ज़ी को जल्दी निपटाने पर ज़ोर दिया. बात आगे बढ़ती, उसके पहले ही अधिकारियों ने धारा 6 की घोषणा कर दी. इसका मतलब यह हुआ कि सरकार ने ज़मीन अधिग्रहण का काम पूरा कर लिया था. बाद में धारा 8 लगाकर अधिग्रहण की प्रक्रिया समाप्त होने की घोषणा कर दी जाती. यह ग़लत था. इस जल्दबाज़ी के लिए उन्होंने अधिनियम की धारा 17 का सहारा लिया, जिसके तहत सरकार के पास यह अधिकार है कि वह त्वरित आधार पर ज़मीन का अधिग्रहण कर ले.

इलाहाबाद हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने इसी धारा 17 के इस्तेमाल के औचित्य पर सवाल उठाकर फैसला किया, लेकिन इस बीच किसानों के ऊपर जो गुज़रा, वह किसी भी तानाशाह को शर्मिंदा कर दे. जब अधिकारियों ने धारा 4 की आपत्तियां सुनने से इंकार कर दिया तो किसानों ने गुहार लगाई. उनको लालीपॉप पकड़ा दिया गया. अधिकारियों ने किसानों से कहा कि उन्हें अपनी ज़मीन लीज़ बैक कर लेनी चाहिए. लीज़ बैक का मतलब यह है कि जितनी ज़मीन का अधिग्रहण हुआ है, उसी के अनुपात में डेवलपमेंट के खर्च के मद में ज़मीन काटकर किसान को उसकी ज़मीन का एक सम्मानजनक हिस्सा वापस कर दिया जाता है. जब किसान लीज़ बैक कराने पहुंचे तो उन्हें उनके हक़ का आधा-तिहाया देकर चलता कर दिया गया. इस सरकारी दादागीरी के खिला़फ लोग लामबंद हुए और जमकर विरोध हुआ, लेकिन सत्ता की ताक़त का इस्तेमाल करने का मन बना चुकी सरकार ने किसानों पर डंडे बरसाए. हद तो तब हो गई, जब 2000 से भी ज़्यादा किसानों के खिला़फ एफआईआर दर्ज कर ली गई और उन पर आपराधिक जांच शुरू हो गई. ज़ाहिर है, इस इलाक़े में सरकार ठीक उसी तरह काम कर रही थी, जिस तरह पूरे देश में इंदिरा गांधी और संजय गांधी की टोली ने 1975-76 में किया था. धैर्य का घड़ा भर चुका था और किसानों ने मोर्चा ले लिया. उनकी उसी जद्दोजहद का नतीजा आज सबके सामने है, सरकार की मनमानी के खिला़फ जनता का बिगुल बज चुका है और माटी के पूतों से उनकी रोजी-रोटी छीनने वालों की नींद मुश्किल दौर से गुज़र रही है.

ग्रेटर नोएडा के किसानों की लड़ाई अभी शुरू हुई है. किसानों का कहना है कि जिस ज़मीन का मुआवज़ा उन्हें 711 रुपये प्रति वर्ग मीटर के हिसाब से मिला है, उसी ज़मीन को उनके सामने 11 हज़ार रुपये में बेचा गया. 11 हज़ार रुपये में वह ज़मीन लेने के लिए बिल्डर अ़फसरों-नेताओं को रिश्वत भी दे रहा है और इस तरह उस ज़मीन की क़ीमत क़रीब 18 हज़ार रुपये प्रति वर्ग मीटर पड़ रही है. ज़ाहिर है, यह फ़र्क़ बहुत बड़ा है और इसमें घोर नाइंसा़फी के बीज मौजूद हैं. किसानों की लड़ाई इसी नाइंसा़फी के खिला़फ है. रोज़ा याक़ूबपुर की पंचायत में मौजूद किसान प्रदीप ने जब कहा कि फैसले टलने से मन में शंका हो रही है तो वह कोई अपनी बात नहीं कह रहा था. यह बात देश के आम आदमी के ज़ेहन में हमेशा से रही है. आम आदमी को मालूम है कि जिस तरह पिछले दिनों विभिन्न न्यूज चैनलों के हर बुलेटिन में कुछ ऐसे लोगों की तकली़फें दिखाई गईं, उससे अदालत का दिल भी पसीज सकता है. मीडिया के जानकारों को मालूम है कि आजकल के टीवी चैनलों की ख़बरों की डायनामिक्स क्या है. इसलिए इलाहाबाद हाईकोर्ट को यह ध्यान रखना होगा कि जिन बिल्डरों ने लोगों से पैसा लेकर और सब्ज़बाग़ दिखाकर फ़्लैट बुक किए हैं, वे अपना मुनाफ़ा कुछ कम करें और किसानों को उनकी ज़मीन की सही क़ीमत देकर अपना प्रोजेक्ट पूरा करें. कोई भी मध्यवर्गीय व्यक्ति, जिसने फ़्लैट बुक कराया है, वह नहीं चाहेगा कि किसानों का गला रेतकर उसके घर के सपने को पूरा किया जाए. होना यह चाहिए कि जिन बिल्डरों ने एक-एक हज़ार प्रतिशत लाभ कमाने का मन बनाया था, वे उसे थोड़ा कम कर दें और किसानों से सीधे ज़मीन खरीद कर अपना प्रोजेक्ट पूरा करें.

पूरे ग्रेटर नोएडा में जितने भी किसानों से बातचीत की गई, सबका यही कहना था कि उनकी ज़मीन अब खेती लायक़ नहीं रह गई है, इसलिए वे खेती तो कर नहीं सकते. ज़मीन में चारों तऱफ गड्‌ढे हैं या फिर कंक्रीट बिखरी पड़ी है. हमें स़िर्फ अपनी ज़मीन की सही क़ीमत मिलनी चाहिए,  इससे ज़्यादा कुछ नहीं. ज़ाहिर है कि फ्लैट बुक करने वालों का कहीं कोई ऩुकसान नहीं होगा, हां बिल्डरों का मुनाफ़ा हज़ार प्रतिशत से घटकर पांच सौ प्रतिशत पर सीमित हो सकता है. पांच गुना लाभ कोई कम नहीं होता, वैसे भी इंसाफ़ का तक़ाज़ा है कि ऐसा होना चाहिए. इस फैसले का संदेश यह है कि जिन उद्योगपतियों ने पूरे देश में एसईजेड के नाम पर हज़ारों एकड़ ज़मीन अपने नाम करा ली थी, उनके ऊपर भी जागरूक लोगों की नज़र जानी चाहिए. उस ज़मीन का इस्तेमाल वे लोग अपने शौक़ पूरे करने के लिए कर रहे हैं. एसईजेड की ज़मीनों की भी समीक्षा की जानी चाहिए. वे ज़मीनें भी 1894 के उसी अधिनियम का इस्तेमाल करके ली गई थीं, जिसके तहत ग्रेटर नोएडा के किसानों की ज़मीनें ली गईं. यह अलग बात है कि उनमें से ज़्यादातर ज़मीनें आज उद्योगपतियों की ऐशगाह बन गई हैं. कहीं फ़ार्म हाउस बने हैं तो कहीं रिजॉर्ट खड़े हो गए हैं. उन सब पर भी न्याय का डंडा चलना चाहिए.

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