साहित्यिक डॉन का कारनामा


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साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं को खरीदने के लिए अक्सर मैं दिल्ली के मयूर विहार इलाक़े में जाता हूं, जहां लोक शॉपिंग सेंटर के पास फुटपाथ पर तीन दुकानें लगती हैं. बिपिन के बुक स्टॉल पर मैं तक़रीबन डे़ढ दशक से जा रहा हूं. इस बीच वहां पत्र-पत्रिकाओं की तीन दुकानें सजने लगीं. जैसे ही मैं बिपिन की दुकान पर पहुंचता हूं, वहां मौजूद शख्स मुझे या तो हंस या कथादेश या फिर पाखी पकड़ा देगा. जब तक मैं मयूर विहार इलाक़े में रहा तो उसकी दुकान पर नियमित जाता रहा. उसके  बाद अब तो हफ्ते में एक बार ही जाना हो पाता है. वह भी इस वजह से कि इंदिरापुरम इलाक़े में कोई अच्छी दुकान नहीं है, जहां साहित्यिक पत्र-पत्रिकाएं उपलब्ध हों. यह एक बड़ी समस्या है, किस तरह से किसी खास पत्रिका या अ़खबार खरीदने के लिए दस-बारह किलोमीटर जाना और फिर लौटना पड़ता है. खैर, अगर मौक़ा मिला तो इस विषय पर फिर कभी विस्तार से लिखूंगा. अभी तो जब मैं मयूर विहार के बुक स्टॉल पर गया तो उसने मुझे हंस, शुक्रवार समेत कई पत्र-पत्रिकाएं पकड़ा दीं. घर लौटकर जब उन पत्र-पत्रिकाओं को उलटना-पलटना शुरू किया तो हंस के ताज़ा अंक पर छब्बीसवें वर्ष का पहला अंक लिखा देखकर चौंका. अगस्त दो हज़ार ग्यारह के अंक का मुखपृष्ठ गर्व से इसकी उद्घोषणा कर रहा था कि हमने अपने प्रकाशन के पच्चीस वर्ष पूरे कर लिए हैं. है भी यह गर्व की ही बात! जब हमारे देश में एक-एक करके सारी साहित्यिक पत्रिकाएं बंद हो रही थीं तो उस माहौल में हंस ने अपने आपको शान से ज़िंदा रखा. न केवल ज़िंदा रखा, बल्कि हिंदी साहित्यिक पत्रिकाओं को सेठाश्रयी पत्रिकाओं की भाषा, कलेवर और तेवर तीनों से मुक्त कर एक नया रास्ता गढ़ा. नए रास्ते पर चलना हमेशा से खतरनाक माना जाता है. राजेंद्र जी की इस बात के लिए तारी़फ करनी चाहिए कि उन्होंने हंस के लिए न केवल नया रास्ता तलाश किया, बल्कि निर्भीकता के साथ, आलोचनाओं के तीर झेलते हुए उसे नए रास्ते पर ही चलाए रखा.

हंस ने अपने प्रकाशन के शुरुआती वर्षों में ही उदय प्रकाश की तिरिछ, शिवमूर्ति की तिरिया चरित्तर, ललित कार्तिकेय की तलछट का कोरस, रमाकांत की कार्लो हब्शी का संदूक, चंद्र किशोर जायसवाल की हंगवा घाट में पानी रे और आनंद हर्षुल की उस बूढ़े आदमी के कमरे में आदि कहानियां छापकर हिंदी कथा साहित्य में हलचल मचा दी थी. कालांतर में भी हंस में ही छपी उदय प्रकाश की चर्चित कहानियां और अंत में प्रार्थना, पीली छतरी वाली लड़की, अरुण प्रकाश की जल प्रांतर, अखिलेश की चिट्ठी, स्वयं प्रकाश की अविनाश मोटू उ़र्फ…, सृंजय की कॉमरेड का कोट आदि कहानियों ने भी कथा साहित्य को झकझोर दिया था. तो हंस को पच्चीस साल पूरे करने पर बधाई और उसके संपादक की जिजीविषा और दृढ़ इच्छाशक्ति को सलाम.

हंस के छब्बीसवें वर्ष के पहले अंक को देखकर मैं थोड़ा नॉस्टेलिक भी हो गया. मुझे अपने कॉलेज के दिनों और अपने शहर जमालपुर की याद आ गई. हमारे शहर में रेलवे स्टेशन पर एएच व्हीलर का स्टॉल ही हमारे लिए उम्मीद की एकमात्र किरण हुआ करता था. अस्सी के दशक के अंत में जमालपुर का व्हीलर स्टॉल इलाहाबाद के पांडे जी का हुआ करता था. वह साहित्य प्रेमी थे, इस वजह से उनके स्टॉल पर साहित्यिक पत्र-पत्रिकाएं मिल जाया करती थीं. राजस्थान से निकलने वाली पत्रिका मधुमती तक उनके पास पहुंचती थी, पहल, वसुधा, इंद्रप्रस्थ भारती आदि तो आती ही थीं. मैंने पहली बार हंस वहीं से खरीदा था, महीना और साल ठीक से याद नहीं है. फिर तो हंस का हर अंक खरीदने लगा, पढ़ने लगा. मंडल आंदोलन के दौरान और उसके बाद राजेंद्र यादव के स्टैंड से घनघोर असहमतियां रहीं, लेकिन कभी हंस खरीदना बंद नहीं किया. जमालपुर में हंस की दस प्रतियां आती थीं, जो महीने की सात या फिर आठ तारी़ख को पहुंचती थीं. दिल्ली से प्रतियां वीपीपी से आया करती थीं. इस पद्धति में डाकघर जाकर वहां पैसे जमा करने के  बाद ही बंडल मिलता था. व्हीलर के हमारे पंडित जी के लिए हंस का बंडल भी अन्य किताबों के बंडल की तरह से होता था. जब व़क्त मिलता था तो किसी को भेजकर डाकघर से बंडल मंगवा लेते थे. लेकिन होता यह था कि पटना में हंस रेल से आता था, जो दो-तीन दिन पहले आ जाया करता था. वहां से मित्रों का फोन आना शुरू हो जाता था कि हंस में फलां लेख या फलां कहानीकार की कहानियां देखीं, जो हमारी बेचैनी बढ़ा दिया करती थीं.

मुझे याद है कि कई बार मैं खुद डाकघर जाकर हंस का बंडल छुड़वा कर व्हीलर के स्टॉल पर पहुंचाया करता था. बाद में हमने हंस को जल्दी पाने का एक विकल्प निकाला. हमने डाकिया को पटाया और उससे अनुरोध किया कि वह अपनी साइकिल पर हंस का बंडल डाकघर से उठा लाया करे और व्हीलर के पंडित जी को सौंप दे. फायदा यह हुआ कि हंस जिस दिन हमारे शहर के डाकघर में आता, उसी दिन हमें उपलब्ध हो जाता था, लेकिन फिर भी पटना से लेट ही मिलता था. हंस को खरीदने की यह बेचैनी अब तक बरक़रार है. महीने की 23-24 तारी़ख से ही राजेंद्र जी के प्राण लेने लग जाता हूं कि हंस जनहित में कब जारी हो रहा है. जनहित का मतलब है कि बिक्री के लिए दिल्ली के स्टॉलों पर कब पहुंच रहा है. कई बार तो ऐसा भी हुआ है कि हंस लेने राजेंद्र जी के दफ्तर या फिर घर तक पहुंच गया. हंस ने छब्बीसवें साल में क़दम रखते हुए जो पहला अंक निकाला है, उसमें हंस और साहित्यिक पत्रिकाओं पर अशोक वाजपेयी, रवींद्र कालिया, जनसत्ता के कार्यकारी संपादक ओम थानवी, पंकज बिष्ट, अखिलेश और शैलेंद्र सागर के लेख छपे हैं. लगभग सभी लेखों का केंद्रीय भाव एक ही है.

अशोक वाजपेयी ने लिखा है, इसे भी निसंकोच स्वीकार किया जाना चाहिए कि हिंदी में नारी विमर्श और दलित विमर्श की आज जो जगह है, लगभग केंद्रीय, उसे वह दिलाने में हंस ने बड़ी भूमिका निभाई है. ऐसा करके उसने न स़िर्फ हिंदी साहित्य में इन दोनों विमर्शों और उनसे जुड़ी और प्रेरित रचनात्मकता को स्थापित किया, बल्कि पोसा और बढ़ाया. वाजपेयी आगे लिखते हैं, यह नोट करना सुखद है कि पच्चीस वर्षों तक चलने के बाद भी हंस एक पठनीय पत्रिका है, वह आज भी प्रासंगिक बनी हुई है.

ज्ञानोदय के संपादक रवींद्र कालिया ने लिखा है,  हंस के अवदान को नज़रअंदाज़ किया ही नहीं जा सकता. हंस दीर्घजीवी न होता तो आज हिंदी कहानी बहुत पिछड़ चुकी होती. हिंदी कहानी को ज़िंदा रखने और बोल्डनेस को डिफेंड करने में राजेंद्र जी की अपूर्व भूमिका है. राजेंद्र जी ने यथास्थितिवाद पर लगातार प्रहार किए और दलित तथा नारी विमर्श को सामने लाने और निरंतर उसे गतिशीलता प्रदान करने में अपनी पूरी ऊर्जा लगा दी. तद्भव के संपादक अखिलेश भी यह मानते हैं कि हंस ने हिंदी साहित्य का एजेंडा बदल दिया. दलित, स्त्री, पिछड़ा और अल्पसंख्यक यदि आज समाज और साहित्य के सरोकार बने हैं तो इसके पीछे हंस का भी पसीना है.

तो हम यह देख रहे हैं कि हंस के बारे में हिंदी जगत की कमोबेश एक ही राय है. पिछले पच्चीस सालों में हंस ने हिंदी साहित्य को न केवल एक नई दिशा दी, बल्कि उसने दलित और स्त्री विमर्श के साथ-साथ तत्कालीन प्रासंगिक मुद्दों को उठाकर हिंदी साहित्यिक पत्रकारिता का एक नया इतिहास भी लिखा और साहित्यिक पत्रकारिता के कुछ नए मानक भी स्थापित किए. जिस तरह की खुली बहस से दूसरी पत्रिका के  संपादकों के हाथ-पांव फूल जाते थे, उसे राजेंद्र यादव ने हंस में ज़ोरदार तरीक़े से उठाया. खुद अपने संपादकीय में बिना किसी डर और लाग लपेट के यादव जी ने अपनी बातें कहकर बहस में सार्थक हस्तक्षेप किया. अपने प्रकाशन के शुरुआती दिनों से ही हंस ने साहित्यिक माहौल को गर्मागर्म बनाए रखा और जो मुर्दनीछाप शास्त्रीय क़िस्म का माहौल था, उसे सक्रिय करते हुए जुझारू तेवर भी प्रदान किए. इसके अलावा हंस ने कहानीकारों की कई पीढ़ियां भी तैयार कर दीं.

हंस ने अपने प्रकाशन के शुरुआती वर्षों में ही उदय प्रकाश की तिरिछ, शिवमूर्ति की तिरिया चरित्तर, ललित कार्तिकेय की तलछट का कोरस, रमाकांत की कार्लो हब्शी का संदूक, चंद्र किशोर जायसवाल की हंगवा घाट में पानी रे और आनंद हर्षुल की उस बूढ़े आदमी के कमरे में आदि कहानियां छापकर हिंदी कथा साहित्य में हलचल मचा दी थी. कालांतर में भी हंस में ही छपी उदय प्रकाश की चर्चित कहानियां और अंत में प्रार्थना, पीली छतरी वाली लड़की, अरुण प्रकाश की जल प्रांतर, अखिलेश की चिट्ठी, स्वयं प्रकाश की अविनाश मोटू उ़र्फ…, सृंजय की कॉमरेड का कोट आदि कहानियों ने भी कथा साहित्य को झकझोर दिया था. तो हंस को पच्चीस साल पूरे करने पर बधाई और उसके संपादक की जिजीविषा और दृढ़ इच्छाशक्ति को सलाम. ईश्वर से प्रार्थना इस बात की कि राजेंद्र यादव जी को लंबी उम्र मिले और हंस निर्बाध गति से निकलता रहे.

(लेखक IBN7 से जुड़े हैं)


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One Response to “साहित्यिक डॉन का कारनामा”

  • GGShaikh says:

    मित्र अनंत विजय,

    अभी-अभी ‘साहित्यिक डॉन का कारनामा’ चौथी दुनिया में पढ़ा.
    ‘हंस’ को लेकर आपका जो लगाव, उलट और स्नेह रहा है वैसी ही गर्मजोशी और धडकनों भरा सरोकार मेरा भी राजेंद्र जी और हंस से रहा है…वर्ष 1990 के आसपास ही जब मैंने हंस का अपने लिए पहला अंक बड़ौदा रेलवे-स्टेशन
    की बुक-स्टोल से ख़रीदा था तब से आजतक हंस पढ़ता चला आ रहा हूँ…अपने घर के पते पर हंस मुझे नियम से मिल भी रहा है, भले ही महीने की 15-20 के बाद सही.

    हंस का 25 सालां अंक अभी मुझे नहीं मिला है, इसी अंक के उपलक्ष में मैंने श्री पंकज बिष्ट का आलेख उनकी पत्रिका ‘समयांतर’ में पढ़ा है…जो हंस के इस नए अंक में भी शायद छपा है,और हंस पर पंकज जी का यह सारांस बेहद सटीक है…

    पंकज जी और राजेंद्र यादव जी की मंडली के बीच टकराव के कुछ-कुछ आसार नज़र आ रहे थे जिसका आखिरी मुद्दा रहे अज्ञेय…निर्मम तो रहे ही हैं पंकज जी पर उनके उठाए
    मुद्दे ( इन आखिरी सालों में मैं भी पंकज जी महसूस कर रहा था) इतने विषयपरक हैं कि शायद ही राजेंद्र जी से उसका कोई योग्य उत्तर देते बने…

    पर फिर भी यह सच है कि राजेंद्र जी का हंस संपादकीय कोई बहुत ज़्यादा बूढ़े डॉक्टर का प्रिस्क्रिप्शन नहीं है, आज भी उसकी धार बाकी है…यहाँ उठाई गई बातें और विषय आज भी
    मन को उतना ही छूते हैं जितना के पहले, जहाँ विचारों कि बंधकता तो बिलकुल नहीं…और हंस को पढ़ने का संकल्प भी भीतर सुरक्षित रहता है…

    तुम्हें पहली बार चौथी दुनिया में पढ़ा सो इतना लिखा…

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