राज्य सरकार के कृषि विभाग के अधिकारियों ने आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र से बड़ी-बड़ी कंपनियों के मूंग के बीज मंगवा कर किसानों के बीच उनका मुफ्त वितरण कराया. साथ ही खाद, कीटनाशक एवं खरपतवार नाशक भी वितरित किए गए. पौधे ख़ूब लहलहाए, उन्हें देखकर किसान हर्षित थे, लेकिन उन पौधों में दाने नहीं आए. जिन किसानों ने राजेंद्र कृषि विश्वविद्यालय, पूसा-समस्तीपुर के एसएमएल- 668 और सोना नामक बीज या अपने स्थानीय बीजों का प्रयोग किया, उनके पौधों में ख़ूब दाने आए. मुज़फ्फरपुर ज़िले के एक हज़ार किसान आज रो रहे हैं. मधुबनी, दरभंगा, सुपौल एवं बक्सर के किसानों ने बताया कि उनके यहां भी मूंग की फसल में दाने नहीं आए. राज्य के कृषि विभाग को अपनी इस नाकामी की पूरी जानकारी है, लेकिन वह छिपाने की कोशिश कर रहा है और किसानों की फसल क्षति का मुआवज़ा देने से भी इंकार कर रहा है. संयुक्त कृषि निदेशक राजेंद्र दास का कहना है कि रबी या खरीफ फसल में क्षतिपूर्ति अनुदान की व्यवस्था है, लेकिन गरमा फसल मूंग दाल में क्षतिपूर्ति की व्यवस्था सरकार ने नहीं की है. कृषि विभाग को किसने यह अधिकार दिया कि वह इतने बड़े पैमाने पर किसानों को अंधेरे में रखते हुए मूंग के बीज का ट्रायल कराए?
पिछले वर्ष की तुलना में कृषि क्षेत्र के लिए योजना व्यय की राशि दोगुनी कर दी गई है. इस साल का हिस्सा 846 करोड़ 86 लाख रुपये है, लेकिन इस राशि का ज़्यादा हिस्सा बीज कंपनियों को मिल जाता है और किसान रोते हैं. पिछले 6 वर्षों में यह साबित हो गया है कि कृषि और उससे जुड़े छोटे उद्योग ही बिहार की तकदीर बदल सकते हैं. 24 हज़ार करोड़ के योजना व्यय में कृषि का हिस्सा बहुत कम है, लेकिन उसका फायदा किसानों को कैसे पहुंचे, यह देखना सरकार का काम है, क्योंकि आज भी बिहार की 88 फीसदी आबादी गांवों में रहती है.
अभी कुछ महीने पहले ही मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने तत्कालीन केंद्रीय पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश को पत्र लिखकर ड्यूपौंट, पायोनियर एवं मोंसाटो आदि कंपनियों के बीजों के ट्रायल पर रोक लगवाने के लिए पत्र लिखा था. मक्के के बीज का ट्रायल रुक भी गया. नीतीश कुमार ने पत्र में लिखा था कि इन कंपनियों के जीएम एवं हाइब्रिड बीजों के कारण मक्के के पौधों में दाने नहीं आए थे, इनसे खेती बर्बाद होती है. हालांकि नीतीश कुमार ने उन कंपनियों को न तो काली सूची में डाला और न उन पर जुर्माना लगवाया. सच तो यह है कि ड्यूपौंट की सब्सिडियरी कंपनी पायनियर के महंगे धान के बीजों और अन्य कंपनियों के गेहूं और दलहन बीजों को भारी सब्सिडी देकर राज्य का कृषि विभाग किसानों को इन बीजों का वितरण करा रहा है. क्या यह नीतीश कुमार की जानकारी में नहीं है, क्या नीतीश कुमार इसके लिए ज़िम्मेदार लोगों को दंडित कराएंगे?
मक्के की बर्बादी
वर्ष 2010 में यहां के किसानों ने लगभग दो लाख एकड़ में ड्यूपौंट की सब्सिडियरी पायोनियर के पायोनियर-92, डी काल्ब कंपनी की सब्सिडियरी लक्ष्मी के लक्ष्मी डी काल्ब-198 और पिनकोल जैसी कंपनियों के बीजों का प्रयोग किया था, लेकिन उनमें दाने नहीं आए. किसानों ने इन बीजों को 180 रुपये से लेकर 285 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से ख़रीदा था. खाद, बीज, सिंचाई और मेहनताना सब मिलाकर लगभग 10 हज़ार रुपये प्रति एकड़ की लागत आई थी यानी 25 हज़ार रुपये प्रति हेक्टेयर की लागत. 80 प्रतिशत किसानों ने महाजनों से 5 रुपये प्रति सैकड़ा प्रति माह की दर से क़र्ज़ लेकर यह खेती की थी. उन्हें कंपनियों के एजेंटों ने यह भरोसा दिलाया था कि फसल इतनी होगी कि वे मालामाल हो जाएंगे. जिन किसानों ने राजेंद्र कृषि विश्वविद्यालय पूसा, सबौर कृषि विश्वविद्यालय भागलपुर या पतंग नगर कृषि विश्वविद्यालय द्वारा विकसित बीजों और रबी हाईस्टार्च, गंगा इलेवन, त्रिसुप्ता हेमंत, देवकी, राजेंद्र संकर मक्का-12, वसंती, गरमा सुआन या दियारा कंपोजिट, गंगा सफेद-2 या स्थानीय बीजों का प्रयोग किया था, उनमें दाने भरपूर आए थे.
शुरू में राज्य कृषि विभाग के अधिकारी एवं तत्कालीन कृषि मंत्री रेणु देवी ने मक्के के पौधों में दाना न आने की बात को ही झुठला दिया. बड़ी जद्दोज़हद के बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने विधानसभा में स्वीकार किया था कि 63 हज़ार हेक्टेयर (1 लाख 59 हज़ार एकड़) में मक्के की फसल में दाने नहीं आए. सरकार ने 10 हज़ार रुपये प्रति हेक्टेयर मुआवज़ा देने की घोषणा की थी. यह रकम लागत से आधी से भी कम थी, जबकि मुआवज़ा लागत के अतिरिक्त फसल की संभावित उपज के मूल्य के आधार पर दिया जाना चाहिए था. काफी किसानों को वह मुआवज़ा नहीं मिला. बटाईदार को तो एक पाई भी नहीं मिली. कृषि विभाग के जो अधिकारी इन बीजों के प्रयोग की छूट देने के लिए ज़िम्मेदार थे, उन्हें दंडित किया जाना चाहिए था, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई. ड्यूपौंट, मोंसाटों एवं डी काल्ब जैसी विशालकाय कंपनियां अपने टर्मिनेटर और हाईब्रिड बीजों के सहारे बाज़ार पर क़ब्ज़ा करना चाहती हैं. इन कंपनियों की वैश्विक आय का आधा खरपतवार नाशकों एवं अन्य रसायनों से आता है. ये कंपनियां राजनेताओं, नौकरशाहों एवं कृषि वैज्ञानिकों के एक तबके को बड़े पैमाने पर आर्थिक लाभ पहुंचा कर अपने पक्ष में फैसला कराने के लिए दुनिया भर में कुख्यात हैं. मक्के से शराब और एथनॉल बनाने में सहूलियत हो, इसके लिए जीएम बीजों का प्रयोग बढ़ाने की कई साजिशें पिछले एक दशक में उजागर हुई हैं. जीएम बीजों से उत्पादित अनाज खाने से बीमारियों की आशंका रहती है, इसलिए अमेरिका में इस प्रकार के अनाज का इस्तेमाल शराब और एथनॉल बनाने में किया जाता है. हालांकि इससे वैश्विक खाद्य संकट पैदा हो गया है.
बिहार में मक्का और दुर्लभ फल लीची से शराब बनाई भी जाने लगी है. पिछले साल एक हज़ार एकड़ में लगी लीची के हरे-भरे कच्चे फलों को तोड़कर शराब बनाई गई और इस साल तीन हज़ार एकड़ में लगी लीची की शराब बनाई गई. सरकार ने इसकी इजाज़त दी. काफी लोग इसके विरोध में खड़े हैं और कहते हैं कि मक्के को अनाज, पशुचारा और ग्लूकोज आदि बनाने के काम में लाया जाए. लीची से स्न्वैश बने, शराब नहीं. आलू के लिए कोल्ड स्टोरेज बनें. इसका उपयोग सब्जी और चिप्स बनाने में हो, शराब बनाने में नहीं. राजेंद्र कृषि विश्वविद्यालय एवं सबौर कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने विभिन्न इलाक़ों की मिट्टी के अनुकूल बीजों की तलाश एवं शोध करके उन्हें विकसित किया है, जिनकी प्रति हेक्टेयर उत्पादकता बड़ी कंपनियों के बीजों से ज़्यादा है. विडंबना यह है कि राज्य का कृषि विभाग इन बीजों को किसानों के बीच वितरित करने में बहुत कम दिलचस्पी लेता है. भारी सब्सिडी देकर बड़ी-बड़ी देसी-विदेशी कंपनियों के महंगे बीजों को बेचा या मुफ्त में बांटा जाता है. इस बात की गारंटी भी नहीं होती कि इन पौधों में दाने निकलेंगे भी या नहीं.
जिस पायोनियर ड्यूपौंट के मक्के के बीज से पिछले साल लगभग दो लाख एकड़ में लगे पौधों में दाने नहीं आए थे, उसी कंपनी के धान के महंगे बीज भारी सब्सिडी देकर बिकवाए गए. कई जगह गेहूं में क्रौप फेल्योर की शिकायत आ रही है. राजेंद्र कृषि विश्वविद्यालय पूसा के पास 15-20 प्रकार के धान के बीज हैं. भगवती नामक एक सुगंधित धान भी है, जिसकी पैदावार 24 क्विंटल प्रति एकड़ होती है. मूंग, अरहर मसूर, चना, मक्का एवं गेहूं के बेहतर बीज भी उपलब्ध हैं, लेकिन इस विश्वविद्यालय के केवल 4 हज़ार क्विंटल बीजों का प्रयोग कराया गया है. पिछले वर्ष की तुलना में कृषि क्षेत्र के लिए योजना व्यय की राशि दोगुनी कर दी गई है. इस साल का हिस्सा 846 करोड़ 86 लाख रुपये है, लेकिन इस राशि का ज़्यादा हिस्सा बीज कंपनियों को मिल जाता है और किसान रोते हैं. पिछले 6 वर्षों में यह साबित हो गया है कि कृषि और उससे जुड़े छोटे उद्योग ही बिहार की तकदीर बदल सकते हैं. 24 हज़ार करोड़ के योजना व्यय में कृषि का हिस्सा बहुत कम है, लेकिन उसका फायदा किसानों को कैसे पहुंचे, यह देखना सरकार का काम है, क्योंकि आज भी बिहार की 88 फीसदी आबादी गांवों में रहती है.
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