प्रतिबंधित नक्सली संगठन भाकपा माओवादी ने ज़िले के विभिन्न प्रखंडों में सौ से अधिक लोगों की लगभग पांच हज़ार एकड़ भूमि पर आर्थिक नाकेबंदी लगा रखी है, जिसके कारण पिछले कई वर्षों से इस भूमि पर खेती नहीं हो पा रही है. माओवादियों के डर से प्रतिबंधित भूमि पर कोई भी व्यक्ति बटाई खेती करने के लिए भी तैयार नहीं है. जिन लोगों की भूमि पर खेती प्रतिबंधित की गई है, उनमें अधिकांश अपने-अपने गांव छोड़कर ज़िला मुख्यालय गया अथवा अन्य शहरों में रह रहे हैं. जो लोग गांव में रह रहे हैं, माओवादियों द्वारा खेती पर प्रतिबंध लगा देने के कारण उनकी आर्थिक स्थिति दयनीय हो गई है. बच्चों की पढ़ाई से लेकर शादी-विवाह तक के सारे कार्य ठप्प हैं. माओवादियों के डर से कोई इन लोगों की भूमि खरीदने के लिए तैयार नहीं है. प्रशासन भी इनकी मदद के लिए कोई कारगर क़दम नहीं उठा रहा है. गया के तत्कालीन जिलाधिकारी ने सभी अंचलाधिकारियों एवं थानाध्यक्षों को इस आर्थिक नाकेबंदी को गंभीरता से लेने और वहां खेती शुरू कराने का निर्देश दिया था. कुछ प्रखंडों में अंचलाधिकारियों और थानाध्यक्षों की सक्रियता से प्रतिबंधित भूमि पर खेती शुरू भी की गई, लेकिन इन अधिकारियों के जाते ही माओवादी पुन: हावी हो गए और उन्होंने किसानों एवं भू-स्वामियों पर फिर से आर्थिक नाकेबंदी लगा दी. शेरघाटी अनुमंडल पर इस प्रतिबंध का सबसे अधिक प्रभाव पड़ा है. इस अनुमंडल की तक़रीबन चार हज़ार एकड़ भूमि पर माओवादियों ने प्रतिबंध लगा रखा है. घोर नक्सल प्रभावित डुमरिया में एक हज़ार एकड़ से अधिक भूमि प्रतिबंधित है. नारायणपुर पंचायत के चोनहा गांव के पूर्व मुखिया मसूद अहमद खां उर्फ़ छोटे खां, पिपरा गांव के मेन सिंह एवं पिपरवार गांव के छट्ठन खान की कई एकड़ भूमि पर माओवादियों ने वर्षों से प्रतिबंध लगा रखा है. इसी प्रकार बांके बाज़ार प्रखंड के विभिन्न गांवों में क़रीब पांच सौ एकड़ भूमि प्रतिबंधित की गई है, जिनमें विशनपुर गांव में पूर्व ज़मींदार गया लाल एवं टोहा लाल और अंबाखार के पूर्व मुस्लिम ज़मींदार की ज़मीनें शामिल हैं. इमामगंज प्रखंड में क़रीब पांच सौ एकड़, गुरुआ प्रखंड में पांच सौ एकड़, आमस प्रखंड में तीन सौ एकड़ और बाराचट्टी प्रखंड में क़रीब दो सौ एकड़ भूमि पर नक्सलियों ने प्रतिबंध लगा रखा है, जिसके कारण वर्षों से उक्त ज़मीनें खाली पड़ी हैं. प्रतिबंधित की गई ज़मीनों का मालिकाना हक़ रखने वाले अधिकांश लोग बड़े भूपति और ज़मींदार रह चुके हैं.
प्रशासन भी इनकी मदद के लिए कोई कारगर क़दम नहीं उठा रहा है. गया के तत्कालीन जिलाधिकारी ने सभी अंचलाधिकारियों एवं थानाध्यक्षों को इस आर्थिक नाकेबंदी को गंभीरता से लेने और वहां खेती शुरू कराने का निर्देश दिया था.
माओवादियों ने इन पर ग़रीबों का शोषण और पुलिस के लिए मु़खबिरी करने का आरोप लगाकर उन्हें अपनी हिट लिस्ट में शामिल कर रखा है. माओवादियों के भय से इन लोगों ने अपना गांव ही छोड़ दिया और कोई इनकी ज़मीनें खरीदने के लिए तैयार नहीं है. ज़िले के टेकारी अनुमंडल का कोच प्रखंड भी पिछले दो दशकों से नक्सलियों की गिरफ़्त में है. यहां भी क़रीब एक हज़ार एकड़ भूमि पर माओवादियों ने प्रतिबंध लगा रखा है. इस प्रखंड के अमरा, कुरमावां, गौहरपुर, खबासपुर एवं कमलबिघा आदि गांवों में भी बड़े भूपतियों की क़रीब एक हज़ार एकड़ भूमि पर माओवादियों ने प्रतिबंध लगा रखा है. कुरमावां निवासी रंजीत सिंह और उनके परिवार की सैकड़ों एकड़ भूमि पर नक्सलियों ने वर्षों से प्रतिबंध लगा रखा था. पिछले साल उनकी भूमि को प्रतिबंध से मुक्त कर दिया गया था, लेकिन इस बार पुन: उनकी सारी भूमि पर लाल झंडा लगाकर नक्सली संगठन भाकपा माओवादी ने आर्थिक नाकेबंदी लगा दी. इस प्रकार ज़िले में क़रीब पांच हज़ार एकड़ भूमि पर खेती नहीं हो पा रही है. इस मामले में किसानों एवं भूपतियों को ज़िला प्रशासन की ओर से कोई सहयोग नहीं मिल रहा है. छोटे किसान आर्थिक नाकेबंदी के चलते भुखमरी की स्थिति में पहुंच गए हैं और उनके बच्चों की शादियां तक नहीं हो पा रही हैं.
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