सामान्यत: भ्रष्टाचार को एक व्यक्ति के अपराध के रूप में देखा जाता है. इस भ्रष्टाचार से निपटने के लिए कई एजेंसियां भी बनाई गईं. मसलन, हर एक विभाग में विजिलेंस डिपार्टमेंट, केंद्रीय सतर्कता आयोग, केंद्रीय जांच ब्यूरो और उनके समकक्ष विभाग, जो दोषी लोगों के खिला़फ कार्रवाई करते हैं, लेकिन सबसे ब़डा सवाल यहां यह है कि आ़खिर जब कोई मामला सामने आता है तभी इस प्रकार की सक्रियता क्यों दिखाई देती है? इसके बावजूद, इस बात की क्या गारंटी है कि दोषी लोगों को समय पर उचित दंड मिल पाएगा.
होनोर डी बजेक की प्रसिद्ध कहावत है- हर बड़ी सफलता के पीछे एक बड़ा अपराध है. आज के भारत में यह कहावत पूरी तरह समीचीन है.यदि आज पूंजीपतियों को बॉम्बे प्लान बनाने के लिए कहा जाता तो वे एक ऐसा प्लान बनाते हैं, जो उस मा़फिया द्वारा लिखा, सुझाया गया होता है जिसने सोवियत संघ के टूटने के बाद लोगों की संपत्ति को लूटा था. औद्योगिक विकास के लिए निजी क्षेत्रों में जमशेदजी टाटा, जी.डी. बिड़ला आदि बड़े पूंजीपतियों ने का़फी काम किया. इससे भारत की औद्योगिक तस्वीर बदल गई. जीडी बिड़ला ने आत्मनिर्भरता पर ज़ोर दिया, लेकिन आज के दौर में अंबानी बंधु भारत की प्राकृतिक संपदा को निजी संपत्ति मान बैठे हैं.
ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल जैसी कोई भी संस्था स्विट्जरलैंड को दुनिया का भ्रष्ट देश मानने को तैयार नहीं होगी. ऐसे में भ्रष्टाचार और ईमानदारी, अली बाबा और चोर तथा गु़फा के रक्षकों में कितना फर्क़ रह जाता है. कई दशकों से स्विट्जरलैंड तीसरी दुनिया के देशों के भ्रष्ट कारोबारियों, अ़फसरों के लिए मु़फीद जगह रही है. यह काले धन का स्वर्ग रहा है. इसी तरह भारत में जहां हर कोई प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की ईमानदारी की बात कर रहा है, लेकिन उनके द्वारा बनाई गई ऐसी परिस्थितियों के बारे में कोई बात नहीं कर रहा है, जिसके कारण एक से ब़ढकर एक घोटाले हुए. ऐसे हालात में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह उस गु़फा के ईमानदार रक्षक हैं, जहां तमाम चोर अपनी दौलत जमा करते हैं.
एक कहावत है कि एक चोर ही चोर को पकड़ सकता है, यानी कोई ऐसा व्यक्ति ज़रूर होता है जिसे इस पूरी चोरी के बारे में जानकारी होती है. ज़्यादातर पुलिस अधिकारी और आईएएस अधिकारी दिल्ली में या किसी लोक उपक्रम या सरकारी महकमे के सतर्कता विभाग में जगह पाना चाहते हैं. चूंकि इन अधिकारियों को अपने विभाग की कार्यवाहियों के बारे में जानकारी होती ही नहीं है, जिसकी वजह से वे विजिलेंस व्यवस्था की न तो ठीक से मॉनिटरिंग कर पाते हैं और न ही अपना दायित्व ठीक ढंग से निभा पाते हैं. नतीजतन, इससे भ्रष्ट और भ्रष्टाचार को संरक्षण ही मिलता है. उन दिनों जब ट्रेन पठानकोट से आगे नहीं जाती थी, हम जैसे कुछ छात्र जो श्रीनगर जा रहे थे, जम्मू में रुके. कुछ छात्र जुआ खेलने लगे. अगली सुबह हमें मालूम पड़ा कि हमारा एक साथी 200 रुपये हार गया. 1964 में 200 रुपये बड़ी रक़म होती थी. जब मैं अपने दोस्त से इस बारे में ऐतराज़ जताता तो वह पंजाबी ज़ुबान में मुझसे कहता, क्या परेशानी हो रही है? मेरे पिता पूरी कर देंगे और बिना समय गंवाए मुझे मेरे पैसे दिलवा देंगे. उस घटना ने मेरे इरादे को और मज़बूत कर दिया कि ईमानदारी और निष्ठा के साथ कोई समझौता नहीं करूंगा. मेरे पिता और दादा ने जो सीख दी थी कि कभी भी ग़लत तरी़के से पैसे मत कमाना, और मज़बूत हुआ. तक़रीबन एक साल बाद जब मैं एक को-ऑपरेटिव हाउसिंग सोसायटी में अध्यक्ष के रूप में था, तब वहां के सदस्यों ने मुझ पर दबाव बनाया कि मैं रजिस्ट्रार कार्यालय में हो रही वित्तीय अनियमितता खासकर रिश्वत देने के मामले में अपनी सहमति ज़ाहिर करूं. मैंने कहा, मैं अपने सामने हो रही घूस़खोरी और सौदेबाज़ी को ज़्यादा दिनों तक सहन नहीं करूंगा. ऐसे में इस संस्था की अध्यक्षता मुझसे और नहीं होगी. अपनी इस चिंता के बाद मैं रजिस्ट्रार कार्यालय गया. वहां कार्यरत एक महिला आईएएस अधिकारी को मैंने अपनी स्थिति के बारे में समझाया और उन्हें सभी दस्तावेज़ सौंपे. दस दिनों बाद जब मैं वापस लौटा तो उन्होंने मुझसे कहा कि मुझे खुशी है कि तुम जैसे लोग आज भी हैं. आम लोगों में मौजूद स्वार्थ उन्हें कुछ भी गलत करने को मज़बूर कर देता है. लिहाज़ा वे ग़लत चीज़ों से समझौता कर लेते हैं बिना यह सोचे-समझे कि इसका परिणाम क्या होगा? ये वही लोग हैं जो व्यवस्था का दुरुपयोग करते हैं. सामाजिक आंदोलन का अभाव दुराचार को खुला निमंत्रण देता है. स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान राजनेताओं में महत्वाकांक्षा नहीं थी. उनका स्वार्थ महान कार्य के लिए था. इस वजह से उन्हें गिरफ्तार भी किया गया और उन्हें कारावास की सज़ा भी हुई, लेकिन मौजूदा शासन में हेराफेरी और लूटपाट करने की पूरी आज़ादी है. आज राजनेताओं में इच्छाशक्ति का अभाव है. राजनीति जनसेवा कम, उद्यम ज़्यादा हो गई है. जनता अपने प्रतिनिधियों का चुनाव शासन प्रक्रिया दुरुस्त करने के लिए करती है, लेकिन पारदर्शिता न होने की वजह से अराजकता ज़्यादा है. दरअसल, भ्रष्टाचार की मूल वजह हमारी त्रुटिपूर्ण चुनाव प्रणाली है. इस समस्या पर चर्चा करने की ज़रूरत है. आज भारत की सुप्रीम कोर्ट को चुनौती देना संभव नहीं है. इसके पास अदालत की अवमानना का अधिकार है, जिसका इस्तेमाल जजों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाने वालों के खिला़फ किया जा सकता है. अब से पहले न्यायपालिका में भ्रष्टाचार की बात इतनी मज़बूती से कभी महसूस नहीं की गई. समाज के अन्य अंग जैसे ट्रेड यूनियन भी एक सौदेबाज़ एजेंट की भूमिका में आ गए हैं. वे भी आज के प्रतिस्पर्धी अर्थव्यव्स्था के दायरे से बाहर नहीं निकल सकते हैं. नतीजतन, आर्थिक नीतियों में आए बदलाव की वजह से बिग़डी परिस्थितियों में सुधार के लिए कोई भी क़दम उठा पाने में ट्रेड यूनियन असफल साबित हो रही है. इसके साथ, यह न तो इस विधायी या प्रशासनिक संरचना में बदलाव ला पा रही है जिसकी वजह से आए दिन घोटाले पर घोटाले हो रहे हैं.
ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल जैसी कोई भी संस्था स्विट्जरलैंड को दुनिया का भ्रष्ट देश मानने को तैयार नहीं होगी. ऐसे में भ्रष्टाचार और ईमानदारी, अली बाबा और चोर तथा गु़फा के रक्षकों में कितना फर्क़ रह जाता है. कई दशकों से स्विट्जरलैंड तीसरी दुनिया के देशों के भ्रष्ट कारोबारियों, अ़फसरों के लिए मु़फीद जगह रही है. यह काले धन का स्वर्ग रहा है. इसी तरह भारत में जहां हर कोई प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की ईमानदारी की बात कर रहा है, लेकिन उनके द्वारा बनाई गई ऐसी परिस्थितियों के बारे में कोई बात नहीं कर रहा है, जिसके कारण एक से ब़ढकर एक घोटाले हुए. ऐसे में प्रधानमंत्री उस गु़फा के ईमानदार रक्षक हैं, जहां तमाम चोर अपनी दौलत जमा करते हैं.
ऐसा नहीं है कि इस मामले की पहुंच मीडिया तक नहीं है. लेकिन जिस तरह आज पूंजी का प्रवाह है, उसने मीडिया को भी अपने अधीन कर लिया है. ऐसे हालात में, टाइम्स ऑफ इंडिया जैसा अ़खबार भी एक संपादक की ज़रूरत महसूस नहीं करता, सिवाय एक प्रतीकात्मक और क़ानूनी आवश्यकता के. मौजूदा समय में पेड न्यूज शायद मीडिया के उद्देश्य पर अंतिम हमला है. किसी भी राज्य की राजधानी या प्रमुख शहर में जाएं, वहां प्रमुख रूप से पत्रकारों, राजनेताओं और नौकरशाहों को भूमि आवंटित की जाती है. इसमें पत्रकारों की सांठगांठ नौकरशाहों से होती है और वे उसकी सराहना करते नज़र आते हैं.
आर्थिक परिवर्तन के साथ एक नया शब्दकोश है नागरिक समाज. हर 600 भारतीयों के लिए एक ग़ैर सरकारी संगठन है. ग़ैर सरकारी संगठनों के दायरे का़फी फैल चुके हैं. यह एक धंधा बन चुका है, उनमें चारित्रिक और संगठनात्मक अभाव है. तमाम बहुराष्ट्रीय कंपनी और भ्रष्ट ठेकेदार इसके लिए लॉबी कर रहे हैं. नई आर्थिक नीतियों की वजह से यह संगठन फलफूल रहे हैं. सरकार सामाजिक क्षेत्र में विकास कार्यक्रमों को बढ़ावा देने के लिए उन्हें करोड़ों रुपये का दान दे रही है. भारत में शिक्षा व्यवस्था लगातार कमज़ोर होती जा रही है. सुविधाओं के नाम पर भारत की चिकित्सा परिषद और अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद के प्रमुख निकायों में भी कदाचार के मामले सामने आ रहे हैं. तकनीकी शिक्षा और प्रबंधन शिक्षा में विनियमितीकरण एक उदाहरण है. अधिक पैसे कमाने की लालच में आज कई लोग जेल में हैं. जिस खंभे पर हमारी संसद, न्यायपालिका, मीडिया, ट्रेड यूनियनें टिकी हैं वह धीरे-धीरे कमज़ोर होता जा रहा है. ऐसे में सिविल सोसायटी पर समाज में एक बेहतर वातावरण क़ायम रखने की ज़िम्मेदारी बढ़ जाती है. यहां महत्वपूर्ण बात यह है कि 1991 में जब नव उदारवाद का दौर शुरू हुआ और पूंजी का प्रवाह तेज़ हुआ. इसके फलस्वरूप नए आर्थिक युग की शुरुआत हुई, यह वही दौर था जब डॉ. मनमोहन सिंह तत्कालीन वित्तमंत्री थे. उसके बाद से ही हर क्षेत्र में भ्रष्टाचार में बेतहाशा वृद्धि हुई.
होनोर डी बजेक की प्रसिद्ध कहावत है- हर बड़ी सफलता के पीछे एक बड़ा अपराध है. आज के भारत में यह कहावत पूरी तरह समीचीन है. यदि आज पूंजीपतियों को बॉम्बे प्लान बनाने के लिए कहा जाता तो वे एक ऐसा प्लान बनाते हैं, जो उस मा़फिया द्वारा लिखा, सुझाया गया होता है जिसने सोवियत संघ के टूटने के बाद लोगों की संपत्ति को लूटा था. औद्योगिक विकास के लिए निजी क्षेत्रों में जमशेदजी टाटा, जी.डी. बिड़ला आदि बड़े पूंजीपतियों ने का़फी काम किया. इससे भारत की औद्योगिक तस्वीर बदल गई. जीडी बिड़ला ने आत्मनिर्भरता पर ज़ोर दिया, लेकिन आज के दौर में अंबानी बंधु भारत की प्राकृतिक संपदा को निजी संपत्ति मान बैठे हैं, जहां उनके विवाद उनकी मां सुलझा रही है. बेल्लारी के रेड्डी बंधु अपने अवैध खनन के बिजनेस से एक निर्वाचित सरकार को हिलाने का माद्दा रखने लगे हैं. एक राजनेता के बेटे ने रॉबिनहुड की तर्ज़ पर राज्य में नई योजना की शुरुआत की. योजना थी, हर एक योजना में एक घोटाला.
हम यह सच भूल गए हैं कि भारतीय राज्य ने अर्थव्यवस्था और भौगोलिक क्षेत्र के विकास के लिए सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को आधार बनाकर नीति तैयार की थी. लेकिन अब सार्वजनिक उपक्रमों को ही नज़रअंदाज़ किया जा रहा है. बाक़ायदा इसके लिए क़ानून तक बनाए जा रहे हैं. ऐसा भी नहीं है कि इस खालीपन को निजी कंपनियां भर रही हों. यहां फायदे का निजीकरण हो रहा और घाटे का राष्ट्रीयकरण. यही सोच सार्वजनिक संपत्ति को लूटने और घोटालों के लिए एक उपजाऊ ज़मीन तैयार कर रही है. नए आर्थिक परिपेक्ष्य में समाजवादी देशों ने पूंजीवाद के साथ एक प्रयोग किया, जिसका उदाहरण तत्कालीन सोवियत संघ सहित विश्व के कई देशों में देखने का मिला. इस संदर्भ में रशिया में आईएमएफ के रिकॅार्ड के बारे में नोबेल पुरस्कार विजेता और विश्व बैंक पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार युसू़फ स्टिगलिट्ज कहते हैं कि स्थिरता के लिए मैक्रोइकोनॅामिक्स पर ज़्यादा ज़ोर था. निजीकरण को पीछे धकेला गया, वह भी बिना किसी सही विनियामक फ्रेमवर्कके. पश्चिमी सलाहकार यह ग़लत सोचते हैं कि निजीकरण की वजह से संपत्ति के अधिकार की रक्षा की मांग उठेगी. उन्होंने यह भी कहा कि तीसरी दुनिया में निजीकरण असल में घूस़खोरी के रूप में ही पनपा.
भारत के संदर्भ में वित्तीय क्षेत्र में सुधार समिति के प्रमुख और शिकागो विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर रघुराम जी. राजन कहते हैं कि रूस के बाद सर्वाधिक अरबपतियों की संख्या भारत में है. राजन का कहना है कि बेशक, हमारे यहां प्रति व्यक्ति आय सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के मुक़ाबले कम है, लेकिन रूस की तुलना में असाधारण रूप से हमारी हालत इतनी लचर नहीं है. आय और धन के मामले में तुलनात्मक अध्ययन नहीं किया जा सकता. मिसाल के तौर पर ब्राजील में प्रति व्यक्ति आय ज़्यादा है, लेकिन सकल घरेलू उत्पाद में उनकी हालत अच्छी नहीं है. वहां केवल 18 अरबपति हैं, जर्मनी में तीन हैं, जबकि भारत में इनकी संख्या ज़्यादा है.
(लेखक एनसीओए के अध्यक्ष हैं और ऑल इंडिया पावर इंजीनियर्स फेडरेशन के सलाहकार हैं)
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