गत दिनों राजस्थान में दारा सिंह की फ़र्ज़ी मुठभेड़ में मौत के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सख्त लहजे का प्रयोग करते हुए कहा है कि फ़र्ज़ी मुठभेड़ों में संलिप्त पुलिस वालों को फांसी पर लटका देना चाहिए. दारा सिंह एक संदिग्ध डाकू था, जिसकी राजस्थान पुलिस ने 23 अक्टूबर को एक फ़र्ज़ी मुठभेड़ के दौरान गोली मारकर हत्या कर दी थी. बीते 8 अगस्त को इस मामले की सुनवाई करते हुए न्यायाधीश मारकंडे काटजू और न्यायाधीश चंद्रमोली कुमार प्रसाद की एक पीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि पुलिस को क़ानून का संरक्षक माना जाता है और इनसे यह आशा की जाती है कि वह लोगों की जान की सुरक्षा करेगी, न कि वह उनकी जान ही ले लेगी. दोनों न्यायाधीशों ने यह भी कहा कि पुलिस द्वारा की जाने वाली फ़र्ज़ी मुठभेड़ दयाहीन और अमानवीय हत्या के अलावा कुछ भी नहीं है, जिसे रेयरेस्ट ऑफ द रेयर अपराध माना जाएगा, और इसके लिए दोषी पुलिसवालों को मौत की सज़ा दी जानी चाहिए, उन्हें फांसी पर लटका देना चाहिए. सुप्रीम कोर्ट ने दारा सिंह की फ़र्ज़ी मुठभेड़ के मामले में शामिल राजस्थान के दो आईपीएस अधिकारियों, अतिरिक्त डीजीपी अरविंद जैन और एसपी अरशद को चेतावनी दी है कि वह या तो आत्मसर्मपण कर दें या फिर सीबीआई द्वारा अपनी गिरफ्तारी की प्रतीक्षा करें.
यह भी महज़ इत्तेफ़ाक़ है कि जिस दिन नई दिल्ली में, सुप्रीम कोर्ट का फ़र्ज़ी मुठभेड़ के मामले में उपरोक्त बयान सामने आ रहा था, ठीक इसी दिन कश्मीर के पुंछ ज़िले के सोरनकोट सेक्टर में दो विशेष पुलिस अधिकारियों द्वारा फ़र्ज़ी मुठभेड़ का एक और खेल खेला जा रहा था. टेरीटोरियल आर्मी की 156वीं बटालियन के दो पुलिस अधिकरियों नूर हसन और अब्दुल मजीद ने कश्मीर के युवक अबु उस्मान को एक फ़र्ज़ी मुठभेड़ में मार गिराया, और दावा किया कि उन्होंने लश्करे-तैयबा के डिवीज़नल कमांडर की हत्या कर दी है.
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी पुलिस वालों के मुंह पर न केवल एक बड़ा तमाचा है, बल्कि उनके लिए एक सीख भी है. पुलिस वाले आख़िर सुधरने का नाम क्यों नहीं लेते? देश के उच्च वर्ग से लेकर छोटे से बड़े आदमी तक अगर पुलिस के बारे में इनकी राय जानने की कोशिश की जाए, तो सबका जवाब पुलिस के प्रति नकारात्मक ही होगा. शायद ही कोई ऐसा आदमी हो जो पुलिस की तारीफ़ करे, और फिर ऐसे में पुलिस द्वारा अंजाम दी जाने वाली फ़र्ज़ी मुठभे़डों के मामलों ने तो मानो आग में घी का काम किया. इन फ़र्ज़ी मुठभेड़ों में न केवल बदमाशों, डाकुओं और लुटेरों की जानें गईं, बल्कि देश के बहुत से निर्दोष नागरिक भी मारे गए हैं. इस पर भी हाल यह है कि सैकड़ों फ़र्ज़ी मुठभेड़ों को अंजाम देने के बाद कुछ पुलिस वाले ख़ुद को एंकाउंटर स्पेशलिस्ट कहलाना अधिक पसंद करते हैं. ऐसा नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस द्वारा की जाने वाले फ़र्ज़ी मुठभेड़ों के बारे में पहली बार इस तरह के सख़्त लहजे का प्रयोग किया हो. देश के न्यायालय पहले भी पुलिस को इस मामले में लताड़ लगा चुके हैं, लेकिन पुलिस है कि उसे कुछ फ़र्क़ ही नहीं पड़ता. दरअसल इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि पुलिस कुछ मामलों में अदालत का सामना ही नहीं करना चाहती. उसे जब यह अहसास हो जाता है कि फलां सरग़ना, डकैत या खूंखार अपराधी के मामले में अदालती कार्यवाही लंबी हो सकती है, शायद वह अपराधी अदालत द्वारा बरी भी हो जाए, तो वह फिर फ़र्ज़ी मुठभेड़ के कारनामे को अंजाम देती है. चंदन की लकड़ी और हाथी दांत के देश के सबसे बड़े तस्कर वीरप्पन की कथित फ़र्ज़ी मुठभेड़ के मामले में भी शायद पुलिस की यही मानसिकता काम कर रही थी. इन मामलों में कुछ बातें ऐसी भी सामने आई हैं, जब देश के लोगों की आम राय भी कुछ ऐसी ही बनती दिखाई देती है कि फलां मुजरिम को कब तक जेल की सलाख़ों के पीछे रखा जाएगा. कब तक अदालतों में उसके ख़िलाफ़ गवाहों-सबूतों को पेश करने की कार्यवाही चलती रहेगी, जबकि सैंकड़ों आंखों ने इसे जुर्म करते हुए देखा है. 2008 के मुंबई हमले में शामिल पाकिस्तानी आतंकवादी आमिर क़साब के मामले को इसकी ताज़ा मिसाल के तौर पर देखा जा सकता है. यह भी महज़ इत्तेफ़ाक़ है कि जिस दिन नई दिल्ली में, सुप्रीम कोर्ट का फ़र्ज़ी मुठभेड़ के मामले में उपरोक्त बयान सामने आ रहा था, ठीक इसी दिन कश्मीर के पुंछ ज़िले के सोरनकोट सेक्टर में दो विशेष पुलिस अधिकारियों द्वारा फ़र्ज़ी मुठभेड़ का एक और खेल खेला जा रहा था. टेरीटोरियल आर्मी की 156वीं बटालियन के दो पुलिस अधिकरियों नूर हसन और अब्दुल मजीद ने कश्मीर के युवक अबु उस्मान को एक फ़र्ज़ी मुठभेड़ में मार गिराया, और दावा किया कि उन्होंने लश्करे-तैयबा के डिवीज़नल कमांडर की हत्या कर दी है. बाद में जब इस मामले ने तूल पकड़ा तो राज्य सरकार के साथ-साथ केंद्र सरकार भी हरकत में आई. रक्षामंत्री ए.के. एंटनी ने सेनाध्यक्ष जनरल वी.के. सिंह को आदेश दिया कि वह ख़ुद घटनास्थल पर जाकर मामले की जांच करें और पूरे मामले की रिपोर्ट उन्हें सौंपें.
भारत में फर्ज़ी मुठभेड़ों की शुरुआत
भारत में फर्ज़ी मुठभेड़ों की शुरुआत 1990 के दशक में मुंबई में हुई, जिसका सिलसिला 2000 के मध्य तक चलता रहा. इस दौरान सैकड़ों फ़र्ज़ी मुठभेड़ों को अंजाम दिया गया और इन्हें अंजाम देने वाले पुलिस अधिकारियों को एंकाउंटर स्पेशलिस्ट के नाम से याद किया जाने लगा. पुलिस का यह मानना था कि एंकाउंटर करके वह न्याय प्रक्रिया में तेज़ी ला रही है. हालांकि बाद में यह सोच नकारात्मक होती चली गई. मुंबई को चूंकि अंडरवर्ल्ड का गढ़ माना जाता है, लिहाज़ा बाद में कुछ ऐसी घटनाएं भी सामने आईं कि पुलिस वालों ने अंडरवर्ल्ड से पैसे लेकर किसी व्यक्ति की फर्ज़ी एंकाउंटर में हत्या कर दी, तो अदालत ने भी अपनी टिप्पणी में यही कहा कि पुलिस अब जनता की रक्षक न होकर एक पेशेवर क़ातिल बन चुकी है. इस संबंध में बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले को देखा जा सकता है.
इसी तरह 1984 से 1995 के बीच पंजाब में आतंकवाद जिस समय हावी हो रहा था, उस समय भी पुलिस ने एंकाउंटर के नाम पर सैकड़ों निर्दोष लोगों की हत्या की. यही परिस्थिति पिछले कुछ सालों से जम्मू और कश्मीर में भी है, लेकिन चूंकि वहां पर फौज और सुरक्षाकर्मियों को विशेष अधिकार प्राप्त हैं, इसलिए फर्ज़ी मुठभेड़ की घटनाओं में संलिप्त फौजियों या पुलिस वालों के ख़िलाफ़ कोई सख्त सज़ा का प्रावधान नहीं है. फर्ज़ी मुठभेड़ को अंजाम देने का पहलू यह भी है कि पुलिस विभाग को स्पेशल सेल, एस.टी.एफ., एसआईटी आदि के अस्तित्व को बरक़रार रखने, फिर उनके लिए सरकार की तऱफ से आवंटित लाभ को प्राप्त करने, मीडिया में अपने नाम और झूठी शान को बरक़रार रखने, अपनी बहादुरी की दुकान चलाने के लिए भी ऐसी फ़र्ज़ी मुठभेड़ों को अंजाम देना पड़ता है. फौज के संबंध में भी ऐसे कुछ मामले सामने आ चुके हैं, जिनमें फौज के कुछ जवानों या अधिकारियों ने भारत सरकार से मैडल प्राप्त करने या फिर पदोन्नति प्राप्त करने के लिए मासूमों की जानें ली हैं, और मीडिया और अन्य सूत्रों से देश को गुमराह किया है.
फ़र्ज़ी एंकाउंटर का खेल कैसे खेला जाता है
आम तौर पर जब पुलिस को लंबे समय के बाद यह महसूस होता है कि मीडिया में उसकी चर्चा नहीं हो रही है, नेताओं की ओर से उन पर टिप्पणी की जा रही है या फिर पुलिस पर कोई बड़ा सवालिया निशान लगाया जा रहा है, तो ऐसे में वह किसी बड़ी मुठभेड़ को अंजाम देती है. इसके लिए एक बड़ा स्टेज तैयार किया जाता है. पुलिस अधिकारियों द्वारा पूरी कहानी पहले से तैयार कर ली जाती है. पुलिस की स्पेशल सेल के काम का तरीक़ा यह होता है कि वह साधारण वेतन पर कुछ लड़कों को बतौर मुख़बिर अपने साथ जोड़ लेते हैं, फिर उन्हें मोबाइल फोन और सुरक्षा देते हैं. पुलिस के ये मुख़बिर इन इलाक़ों के बेरोज़गार नौजवानों से दोस्ती बढ़ाते हैं, फिर एक गु्रप तैयार करके फ़र्ज़ी डकैती को अंजाम देने की योजना बनाई जाती है. इसके लिए पुलिस उन्हें क्षेत्रीय स्तर पर आसानी से मिलने वाले हथियार भी उपलब्ध कराती है. इसके बाद पुलिस के ये मुख़बिर नौजवानों के इस गु्रप को चोरी की हुई कोई गाड़ी दे देते हैं, जिन पर सवार होकर यह गु्रप इस कथित डकैती को अंजाम देने के लिए रवाना हो जाता है, लेकिन ये जवान जब वहां पहुंचते हैं तो अचानक वहां पहले से तैनात पुलिस का सामना उनसे होता है, मुठभेड़ होती है, और ये नौजवान मारे जाते हैं. इसके बाद मीडिया वालों को बुलाकर इसका पूरी तरह प्रचार किया जाता है कि फलां जगह की पुलिस ने एक बड़े बदमाश को मुठभेड़ के दौरान मार गिराया है. उनके परिवार वालों को भी डरा कर चुप करा दिया जाता है या फिर पैसे देकर भी मृतकों के परिजनों का मुंह बंद करने की कोशिश की जाती है. इन मामलों की सच्चाई हमारे सामने तब आती है जब इस फ़र्ज़ी मुठभेड़ में किसी प्रभावशाली या अमीर आदमी के घर का कोई सदस्य मारा जाता है, और फिर उसने पुलिस के ख़िलाफ़ अदालत में मुक़दमा दायर कर दिया हो. हैरत की बात तो यह है कि इस तरह के अधिकतर मामलों में पुलिस वाले साफ़ बचकर निकल गए और अदालत में उनके ख़िलाफ़ कोई जुर्म साबित नहीं हो सका. इस संबंध में पुलिस इंस्पेक्टर दयानायक, इंस्पेक्टर प्रफुल्ल भोंसले, सहायक सब इंस्पेक्टर (एआईसी) रविंद्र आगरे, असिस्टेंट इंस्पेक्टर ऑफ पुलिस सचिन हिंदुरॉय वाजे़, पुलिस इंस्पेक्टर विजय सालेस्कर, इंस्पेक्टर मोहन चंद शर्मा आदि के नाम महत्वपूर्ण हैं. इनमें से कुछ या तो पुलिस अधिकारियों की आपसी रंजिश का शिकार हुए, या फिर किसी आतंकवादी घटना में मारे गए. पुलिस के किसी नामवर एंकाउंटर स्पेशलिस्ट को इसके ही किसी जूनियर अ़फसर ने किसी बड़ी घटना के दौरान गोली मार कर हत्या कर दी, ताकि वह ख़ुद शौहरत और इज़्ज़त के साथ साथ प्रमोशन पा सके. बाटला हाउस एंकाउंटर में मारे गए इंस्पेक्टर मोहन चंद शर्मा की मौत को लेकर कुछ लोगों की ओर से ऐसे आरोप लगाए जा चुके हैं.
विभिन्न राज्यों में फर्ज़ी मुठभेड़ों की संख्या
- राज्य - कुल एंकाउंटर
- उत्तर प्रदेश -120
- मणिपुर -61
- पश्चिम बंगाल -23
- तमिलनाडु -15
- मध्य प्रदेश -15
- जम्मू कश्मीर-14
- झारखंड-13
- उ़डीसा -12
- छत्तीसग़ढ-1
- दिल्ली -6
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