आईएसआई का उदारवादी नेटवर्क

  • Sharebar

कश्मीर के बारे में दुनिया के किसी भी व्यक्ति को अपनी राय रखने का अधिकार है, चाहे वह किसी भी देश का रहने वाला हो, लेकिन जब वह व्यक्ति अपनी राय रखने के लिए पैसे लेता है तो इस पर अ़फसोस होता है. दिलीप पडगांवकर, कुलदीप नैयर, जस्टिस राजेंद्र सच्चर और गौतम नौलखा भारत के वे लोग हैं, जिनका हर कोई न केवल सम्मान करता है, बल्कि उन्हें ओपेनियन मेकर भी कहा जाता है. ये लोग ग़ुलाम नबी फाई द्वारा आयोजित सेमिनारों में लगातार भाग लेते रहे और वहां पर कश्मीर के बारे में अपने विचार व्यक्त करते रहे. हो सकता है कि उन्हें यह न मालूम हो कि फाई के पास इन सेमिनारों को आयोजित करने के लिए जो पैसे आ रहे हैं, वे आईएसआई या पाकिस्तानी सरकार की तऱफ से आ रहे हैं, लेकिन उनका कर्तव्य था कि वे इन सेमिनारों में भाग लेने से पहले फाई के बारे में जांच-प़डताल कर लेते, ताकि वे आज अपनी ओर उठ रही संदेह की नज़र से बच जाते. कश्मीर में जन्म लेने वाला एक व्यक्ति अमेरिका में रहते हुए आईएसआई के समर्थन से भारत विरोधी गतिविधियों में लिप्त रहता है और किसी को कानोंकान खबर नहीं होती. वह अंतरराष्ट्रीय सेमिनार कराता है, भारत के वरिष्ठ पत्रकारों और बुद्धिजीवियों को उसमें आमंत्रित करता है, लेकिन किसी को ज़रा भी संदेह नहीं होता. वह कश्मीरी मुहिम को आगे ब़ढाने में अपनी पूरी जान लगा देता है, अमेरिकी विधि विशेषज्ञों को समय-समय पर फंड उपलब्ध कराता है, कश्मीर के बारे में अमेरिकी नीति को प्रभावित करने की कोशिश करता है, तब भी किसी को उस पर संदेह नहीं होता. लेकिन अचानक जब वह एफबीआई द्वारा हिरासत में लिया जाता है और अमेरिका की एक अदालत में 43 पृष्ठों के हल़फनामे के साथ उसके खिला़फ एक आपराधिक मामला दर्ज किया जाता है तो सबके कान ख़डे हो जाते हैं.

जांच के दौरान यह बात भी सामने आई कि ग़ुलाम नबी फाई ने अमेरिका में रहते हुए अपने आक़ाओं से संपर्क करने के लिए ज़्यादातर अमेरिका स्थित पाकिस्तानी दूतावास का इस्तेमाल किया, लेकिन अमेरिका में पाकिस्तान के राजदूत ने इससे इंकार किया है. अब हुर्रियत कांफ्रेंस के चरमपंथी ग्रुप के चेयरमैन सैयद अली शाह गिलानी के साथ-साथ पाकिस्तान सरकार भी खुलकर फाई के समर्थन में आ गई है और कश्मीर से संबंधित उनकी कोशिशों को सही साबित करने का प्रयास कर रही है.

मैं बात कर रहा हूं 62 वर्षीय ग़ुलाम नबी फाई की, जिन्हें अमेरिका की सुरक्षा जांच एजेंसी एफबीआई ने बीते 19 जुलाई की सुबह वर्जीनिया के फेयर फैक्स स्थित उनके आवास से इन आरोपों के तहत गिरफ्तार किया कि वह पिछले 25 वर्षों से अमेरिका में एक पाकिस्तानी एजेंट के रूप में काम कर रहे हैं और उन्होंने विदेशी एजेंट के रूप में अपना रजिस्ट्रेशन न कराकर अमेरिकी क़ानून का उल्लंघन किया है. वह गुप्त रूप से न स़िर्फ पाकिस्तान सरकार की खु़फिया एजेंसी आईएसआई के संपर्क में थे, बल्कि उससे खु़फिया तरीक़े से हज़ारों-लाखों डॉलर मंगवा कर अमेरिका में कश्मीर से संबंधित पाकिस्तानी रणनीति को आगे ब़ढाने का भी काम कर रहे थे. वह इन पैसों का इस्तेमाल सेमिनारों का आयोजन करने में करते थे, ताकि कश्मीर के बारे में लोगों के विचार और नज़रिए को बदला जा सके. पाकिस्तान के बारे में हम सब जानते हैं कि वह भारत से आमने-सामने के युद्ध में कभी नहीं जीत सकता, इसलिए उसकी पूरी कोशिश दूसरे तरीक़ों से भारत के खिला़फ मोर्चा खोलने की रहती है. 1989 में आईएसआई ने इसी उद्देश्य को हासिल करने के लिए त्रिकोणीय योजना बनाई, जिसके तहत पूरी दुनिया में सियासी चालबाज़ी, आतंकवाद और दुष्प्रचार के माध्यम से भारत के विरुद्ध माहौल बनाना था. अमेरिका में ग़ुलाम नबी फाई की गतिविधियां भी इसी का एक भाग हैं.

लेकिन आश्चर्य इस बात का है कि कश्मीर जैसे मुद्दे पर कोई व्यक्ति अमेरिका में लगातार अंतरराष्ट्रीय सेमिनार और कांफ्रेंस करता है और हमारे देश के कई नामी पत्रकार और बुद्धिजीवी बिना कुछ सोचे-समझे उसमें भाग लेते हैं, स़िर्फ इसलिए कि उनके लिए अमेरिका आने-जाने, वहां ठहरने का पूरा प्रबंध होने के साथ-साथ उनकी जेबों में कुछ पैसे भी आ जाते हैं. इन लोगों के नाम सुनकर आप भी दंग रह जाएंगे. भारत से जो लोग फाई द्वारा आयोजित सेमिनारों में अक्सर भाग लेते रहे हैं, उनमें कुछ के नाम इस प्रकार हैं-दिलीप पडगांवकर, जो इस समय जम्मू-कश्मीर के लिए केंद्र सरकार द्वारा गठित एक टीम के सदस्य और प्रसिद्ध अंग्रेजी अ़खबार टाइम्स ऑफ इंडिया के संपादक भी हैं, दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश राजेंद्र सच्चर, नामी पत्रकार कुलदीप नैयर और प्रसिद्ध समाजसेवी गौतम नौलखा. दिलीप पडगांवकर अंग्रेजी के जिस अ़खबार से जु़डे हुए हैं, उसने कुछ दिनों पहले पाकिस्तान के प्रसिद्ध अ़खबार जंग के साथ मिलकर अमन की आशा नामक एक अभियान शुरू किया था, जिसका उद्देश्य भारत-पाक की जनता को अमन का पैग़ामदेना और दोनों देशों के बीच की क़डवाहट को दूर करना था. इसी तरह कुलदीप नैयर को जितने सम्मान की नज़र से भारत में देखा जाता है, उसी तरह पाकिस्तान में भी उनका ब़डा सम्मान किया जाता है. वह सांस्कृतिक गतिविधियों के माध्यम से भारत-पाक के बीच बेहतर संबंध बनाने के लिए हमेशा प्रयासरत रहे हैं. लेकिन अब जबकि फाई के कारण उन पर भी शक की सुई घूम रही है तो क्या इस बात की जांच की ज़रूरत नहीं है कि ये लोग भारत-पाक से संबंधित जिस अभियान में जुटे रहे हैं, कहीं उसमें भी तो आईएसआई या पाकिस्तान सरकार द्वारा गुप्त रूप से पैसे नहीं लगाए जा रहे हैं.

तीसरे व्यक्ति हैं गौतम नौलखा, जिनके बारे में उस समय ज़्यादा जानने को मिला, जब वह प्रसिद्ध समाजसेवी बिनायक सेन के समर्थन में खुलकर सामने आए थे, क्योंकि बिनायक सेन को कुछ दिनों पहले छत्तीसग़ढ की एक अदालत में माओवादियों से संबंध रखने के आरोप में उम्रक़ैद की सज़ा सुनाई गई थी, लेकिन बाद में सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के बाद उन्हें रिहा कर दिया गया. उस समय गौतम नौलखा हर मंच पर सरकार और अदालत की क़डी आलोचना करने में लगे हुए थे, लेकिन आज फाई के कारण वह भी संदेह के घेरे में आ चुके हैं. अब जब इन सबसे स़फाई मांगी जा रही है तो सब एक स्वर में कह रहे हैं कि उन्हें फाई के गुप्त उद्देश्य के बारे में जानकारी नहीं थी. शायद ये लोग फाई के फेसबुक प्रोफाइल के झांसे में आ गए, जिसमें ग़ुलाम नबी फाई ने लिखा है कि वह कश्मीर समस्या का शांतिपूर्वक तरीक़े से हल चाहते हैं, जिसमें तीनों पक्ष भारत, पाकिस्तान और कश्मीरी जनता शामिल हों. लेकिन अब जाकर पता चला कि वह स़िर्फ पाकिस्तान सरकार के एजेंट के रूप में काम कर रहे थे और भारत के खिला़फ अमेरिकी विधि विशेषज्ञों के साथ-साथ वहां की जनता को भी गुमराह करने की कोशिश कर रहे थे.

ऐसा नहीं है कि अमेरिकी प्रशासन को ग़ुलाम नबी फाई की इन गतिविधियों की जानकारी अब हुई है, बल्कि पहले भी वह इस सिलसिले में फाई से जवाब-तलब कर चुका है. पहली बार मार्च 2007 में एफबीआई ने ग़ुलाम नबी फाई से आईएसआई से उनके संपर्क के बारे में पूछताछ की थी. उस समय फाई ने जवाब दिया था कि उन्होंने कभी भी किसी ऐसे व्यक्ति से मुलाक़ात नहीं की, जिसने अपनी पहचान आईएसआई के सदस्य के रूप में की हो. उसके बाद मार्च 2010 में अमेरिका के जस्टिस डिपार्टमेंट ने एक नोटिस भेजकर फाई को सलाह दी थी कि वह उसके साथ अपना रजिस्ट्रेशन विदेशी एजेंट के रूप में करा लें, लेकिन तब भी फाई ने एक लिखित जवाब में कहा था कि न तो वह और न उनकी संस्था कश्मीरी अमेरिकन काउंसिल पाकिस्तान या किसी दूसरे देश की किसी भी गतिविधि में शामिल है और न उन्होंने अपनी ओर से किसी विदेशी संस्था या सरकार को किसी तरह की सेवा प्रदान की है. मार्च 2011 में एक बार फिर एफबीआई के साथ पूछताछ के दौरान फाई ने पाकिस्तान सरकार के किसी भी प्रतिनिधि के साथ अपना संबंध होने से इंकार किया था, लेकिन एफबीआई की जांच के दौरान इस बात का पता चला कि फाई को 20 साल से ज़्यादा अरसे से पाकिस्तान सरकार द्वारा गुप्त रूप से आर्थिक सहायता दी जा रही है. एफबीआई के मुताबिक़, जून 2008 से लेकर अब तक ग़ुलाम नबी फाई ने पाकिस्तान सरकार के चार प्रतिनिधियों के साथ चार हज़ार बार संपर्क किया. यही नहीं, बल्कि फाई पाकिस्तान सरकार के चारों प्रतिनिधियों को गुप्त रूप से कश्मीरी अमेरिकन काउंसिल के बजट को चलाने के लिए अपनी रिपोर्टें भेजते रहे, ताकि वहां से उन्हें स्वीकृति मिल सके. इस सिलसिले में एफबीआई को एक दस्तावेज़ भी मिला है, जिसका शीर्षक है वित्तीय वर्ष 2009 के लिए केएसी/कश्मीर सेंटर का प्लान ऑफ एक्शन. इस दस्तावेज़ के ज़रिए पाकिस्तान सरकार से अमेरिका के कांग्रेसी कार्यकर्ताओं को देने के लिए एक लाख डॉलर की भी मांग की गई है.

एफबीआई द्वारा दाखिल किए गए हल़फनामे में यह भी कहा गया है कि ग़ुलाम नबी फाई को ज़हीर अहमद और दूसरे फंडिंग नेटवर्क के ज़रिए 1990 से अब तक पाकिस्तान सरकार द्वारा चार मिलियन डॉलर भेजे गए. अमेरिकी अदालत में फाई के खिला़फ लगाए गए आरोप सही साबित होने पर उन्हें पांच साल की क़ैद की सज़ा हो सकती है.जांच के दौरान यह बात भी सामने आई कि ग़ुलाम नबी फाई ने अमेरिका में रहते हुए अपने आक़ाओं से संपर्क करने के लिए ज़्यादातर अमेरिका स्थित पाकिस्तानी दूतावास का इस्तेमाल किया, लेकिन अमेरिका में पाकिस्तान के राजदूत ने इससे इंकार किया है. अब हुर्रियत कांफ्रेंस के चरमपंथी ग्रुप के चेयरमैन सैयद अली शाह गिलानी के साथ-साथ पाकिस्तान सरकार भी खुलकर फाई के समर्थन में आ गई है और कश्मीर से संबंधित उनकी कोशिशों को सही साबित करने का प्रयास कर रही है. अब देखना यह है कि अमेरिकी सरकार फाई के खिला़फ क्या कार्रवाई करती है और भारत सरकार का क्या रवैया रहता है.

कौन है फाई

ग़ुलाम नबी फाई का जन्म जम्मू-कश्मीर के ब़डगाम ज़िले के एक छोटे से गांव वादवां में हुआ. 1971 में श्रीनगर के प्रताप कॉलेज से ग्रेजुएशन की शिक्षा हासिल करने के बाद फाई ने अलीग़ढ मुस्लिम विश्वविद्यालय से फिलॉस्फी में एमए किया. इसके बाद वह इस्लामिक शिक्षा हासिल करने के लिए सऊदी अरब चले गए, जहां उन्होंने मक्का की उम्मलक़ुरा यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया. कश्मीर में प़ढाई के दौरान ही उनका संपर्क जम्मू-कश्मीर की जमाते इस्लामी से हुआ और वह जमात के संस्थापक मौलाना सादुद्दीन के इतने क़रीबी हो गए कि उन्होंने उन्हें अपना निजी सचिव बना लिया. बाद में मौलाना ने उनके लिए सऊदी अरब में छात्रवृत्ति का भी प्रबंध कर दिया. 1983 में ग़ुलाम नबी फाई कुछ दिनों के लिए भारत वापस आए और फिर सऊदी अरब जाकर अध्यापन करने लगे. वह सऊदी अरब में बहुत कम दिनों तक रहे और वहां से अमेरिका चले गए, जहां उन्होंने पैन सिल्वेनिया की टैंपल यूनिवर्सिटी से मास कम्युनिकेशन में डॉक्ट्रेट की डिग्री हासिल की और वहीं पर प़ढाने लगे. उसी दौर में ग्रीन कार्ड मिलने के बाद फाई को बाक़ायदा अमेरिका की नागरिकता मिल गई. इसके बाद उन्होंने भारत का दोबारा रु़ख नहीं किया. इसका एक कारण यह भी था कि (हुर्रियत कांफ्रेंस के नेताओं के मुताबिक़) भारत सरकार ने उनका पासपोर्ट रद्द कर दिया था. अमेरिका में रहते हुए उन्होंने अमेरिका और यूरोप में हुर्रियत कांफ्रेंस के लिए काम करना शुरू कर दिया था. 1990 में उन्होंने वाशिंगटन डीसी में कश्मीरी अमेरिकन काउंसिल के नाम से एक एनजीओ की स्थापना की, जो कश्मीर सेंटर के नाम से प्रसिद्ध है और वह उसके निदेशक हैं.

चौथी दुनिया के लेखों को अपने ई-मेल पर प्राप्त करने के लिए नीचे दिए गए बॉक्‍स में अपना ईमेल पता भरें::

Leave a Reply

कृपया आप अपनी टिप्पणी को सिर्फ 500 शब्दों में लिखें