कश्मीर प्रचारक ग़ुलाम नबी फाई की अमेरिका में गिरफ्तारी को लेकर कई सवाल खड़े हो गए हैं. फाई को अमेरिका ने इसलिए पकड़ा है, क्योंकि वह तथाकथित रूप से यह बताने में विफल रहा कि वह पाकिस्तन सरकार और उसकी खु़फ़िया एजेंसी आईएसआई के लिए काम कर रहा था. सवाल यह भी है कि भारतीय उदारवादी जानबूझकर या अनजाने में कहीं आईएसआई की यूजफुल इडियट्स यानी कठपुतली तो साबित नहीं हो रहे. यूजफुल इडियट्स विशेषण मूल रूप से पश्चिमी देशों में सोवियत संघ से सहानुभूति रखने वाले उन लोगों के लिए इस्तेमाल किया जाता था जो यह समझते थे कि सोवियत संघ उनका दोस्त है. वास्तव में सोवियत संघ केवल कठपुतली की तरह उनका इस्तेमाल करता था. इससे ज़्यादा उनका कोई महत्व नहीं था.
यह सोचने की भी आवश्यकता नहीं कि अमेरिका को फाई के आईएसआई के साथ संबंधों और उसकी गतिविधियों में हिस्सा लेने के बारे में अचानक पता चला है. वे बहुत पहले से इस बारे में जानते थे और सही व़क्तका इंतज़ार कर रहे थे, ताकि उसे बेनक़ाब किया जा सके. एक न्यूज चैनल ने खोजी अभियान चलाया, ताकि यह पता लगा सके कि फाई द्वारा आयोजित कश्मीर सम्मेलनों में किन लोगों ने हिस्सा लिया.
उन लोगों के विषय में पूरी ईमानदारी से जांच की जानी चाहिए, जिन्होंने आईएसआई के सहयोग से फाई द्वारा प्रायोजित वार्षिक कश्मीर सम्मेलनों में हिस्सा लिया. यह सोचने की भी आवश्यकता नहीं कि अमेरिका को फाई के आईएसआई के साथ संबंधों और उसकी गतिविधियों में हिस्सा लेने के बारे में अचानक पता चला है. वे बहुत पहले से इस बारे में जानते थे और सही व़क्तका इंतज़ार कर रहे थे, ताकि उसे बेनक़ाब किया जा सके. एक न्यूज चैनल ने खोजी अभियान चलाया, ताकि यह पता लगा सके कि फाई द्वारा आयोजित कश्मीर सम्मेलनों में किन लोगों ने हिस्सा लिया. यह बात सामने आई है कि फाई अमेरिकी राजनेताओं, जिनमें डैन बार्टन भी शामिल हैं, से लॉबिंग करता था. भारत को सदैव गुमराह करने वाले बार्टन अब कह रहे हैं कि वह नहीं जानते थे कि आईएसआई फाई को धन उपलब्ध करा रही थी. फाई के विषय में हम अच्छी तरह जानते हैं कि कश्मीर को लेकर उसकी सहानुभूति पाकिस्तानी आक़ाओं के कारण थी.
आईएसआई से मिले धन की बदौलत वह भारत में पांचवी शक्ति (स्तंभ) बनाने की कोशिश कर रहा था. फाई के कृपापात्रों के रूप में जिन लोगों के नाम सामने आ रहे हैं उनमें जम्मू-कश्मीर में सरकारी वार्ताकार और पत्रकार दिलीप पड़गांवकर, प्रसिद्ध लेखक व पत्रकार कुलदीप नैयर, न्यायमूर्ति राजिंदर सच्चर और नक्सली समर्थक गौतम नवलखा का नाम भी शामिल है. क्या ये सभी लोग देशद्रोही हैं या केवल नासमझी में फाई का साथ दिया. ये सभी बुद्धिजीवी और जानकार हैं और यह मानते हैं कि जो कुछ कह रहे हैं या कर रहे हैं, सही है. देश का बच्चा-बच्चा जानता है कि फाई पाकिस्तान के हाथ की कठपुतली है, जो भारत से कश्मीर को हर हाल में अलग करना चाहता है, लेकिन हमारे इन बुद्धिजीवियों ने फाई का कृपापात्र बनने से कोई परहेज़ नहीं किया. अब जबकि यह समझ गए हैं कि स्टार नाश्ता कराकर और बिजनेस क्लास में स़फर करा कर फाई ने उनका इस्तेमाल किया है तो वे स्वयं को ठगा-सा महसूस कर रहे हैं.
गिरफ्तारी का नाटक
फाई को अकस्मात गिरफ्तार किया जाना भारत के लिए कोई अमेरिकी पुरस्कार नहीं है. यह अमेरिका और पाक के बीच चल रही अंदरूनी खींचतान का नतीजा है. अमेरिका आईएसआई को दरकिनार कर उस पर दबाव बनाना चाहता है, ताकि तालिबान को ठिकाने लगाते हुए अ़फगानिस्तान के मुद्दे से छुटकारा पा सके. वह चाहता है कि मुल्ला उमर जैसे चरमपंथी पर किसी तरह नकेल कस सके. पाकिस्तान सरकार और वहां की सेना अमेरिका से एक अलग खेल खेल रही है, ताकि सैन्य व अन्य तरह की सहायता हासिल कर सके. जिस तरह अमेरिका फाई के विषय में सब कुछ जानता था. उसी तरह वह डेविड कोलमैन हेडली के बारे में भी सब कुछ जानता था. वह जेहादी के रूप में डबल एजेंट था. हम अमेरिकी सोच से भलीभांति परिचित हैं. अमेरिका केवल उसी सीमा तक इन दोनों पर कार्रवाई करेगा, जिस सीमा तक वे उसके हितों को पूरा करने के लिए पाक पर दबाव बनाते रहेंगे. पड़गांवकर और कुलदीप नैयर को आत्म परीक्षण करना चाहिए कि क्या वे नहीं जानते थे कि आईएसआई कठपुतली की तरह उनका इस्तेमाल कर रही है. उन्हें सोचना चाहिए कि उन्होंने क्या ग़लत किया है. क्या भारतीय क़ानून दुश्मन देश की खुफ़िया एजेंसी से धन लेने की इजाज़त देता है? क्या उनके खिला़फ मुक़दमा नहीं चलाया जाना चाहिए? चाहे अरुंधति रॉय हों या कोई अन्य मानवाधिकार कार्यकर्ता, समस्या यही है कि उनके विचारों का इस्तेमाल अलगाववादी विचारधारा को घोषित करने के लिए किया जाता है. दूसरे शब्दों में कहें तो ऐसे मानवाधिकार कार्यकर्ता आईएसआई के लिए यूजफुल इडियट्स साबित होते हैं, जो स्वयं यह सोचते हैं कि कश्मीर में मानवाधिकार की लड़ाई लड़ रहे हैं. लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से अलगाव और फूट को ही बढ़ावा देते हैं, जबकि सच्चाई यही है कि पाकिस्तान और आईएसआई भारत को सैंकड़ों घाव देकर लहूलुहान करने की षड़यंत्रकारी रणनीति पर अमल कर रहे हैं. उदारवादियों के साथ समस्या यही है कि जब भारतीय सरकार के हाथों मानवाधिकार उल्लंघन की कोई घटना होती है तो वे शोर मचाने लगते हैं, लेकिन जब तथाकथित आज़ादी को लेकर ऐसा किया जाता है तो वे खामोश रहते हैं. इसी कारण उन्हें आईएसआई की कठपुतली कहा जाता है. भारत के खिला़फ शोर मचाना और जिहादियों की गतिविधियों का चुपचाप रहकर अप्रत्यक्ष समर्थन करना देशद्रोह से कम नहीं है.
कश्मीरियों के नाम पर स्वार्थ सिद्धि
यदि यह मान भी लें कि इन विवेकशील उदारवादियों ने अपने बयानों को संतुलित करना सीख लिया है और वाक़ई कश्मीर की आज़ादी और स्वायत्ता चाहते हैं, तब भी वे यह नहीं बता पाते कि उन्हें कैसी आज़ादी चाहिए? जो कश्मीरियों के हितों पर बयानबाज़ी करते हैं, वे केवल अपने हितों को पूरा करने के लिए ऐसा कर रहे हैं. वे केवल आईएसआई का मुखौटा हैं, जिनकी रावलपिंडी स्थित मुख्यालय में ज़ोर-शोर से अगवानी की जाती है. जब तथाकथित कश्मीर समर्थक ये नेता राज्य के अन्य हिस्सों की भयावह स्थिति पर कुछ नहीं बोलते तो कोई आश्चर्य नहीं होता है. पाक अधिकृत कश्मीर (पीओके) और गिलगिट बलतिस्तान की हालत किसी से छुपी नहीं है. जब उदारवादी नेता आज़ादी की मांग करते हुए कश्मीरी युवाओं की भावनाओं को हवा देने की कोशिश करते हैं तथा बार-बार कश्मीर को पाकिस्तान में मिलाने के बयान देते हैं तो उनकी पाक समर्थक मानसिकता खुलकर सामने आ जाती है. गिलानी, मीरवाइज़ और यासीन मलिक जैसे लोग कश्मीरियों के प्रतिनिधि नहीं हैं. वे केवल आईएसआई का मुखौटा हैं. जब भी वे वार्ता का राग अलापने लगें, भारत को स्पष्ट रूप से कह देना चाहिए, अपने आक़ाओं से बात कराओ. हिज्बुल मुजाहिदीन और लश्करे तैयबा की घाटी में बढ़ती सक्रियता से खुलासा हुआ है कि पाकिस्तानी सेना और जिहादियों का गठजोड़ ही आतंकी घटनाओं को नियंत्रित कर रहा है. दहशतगर्दों को खुलेआम धन उपलब्ध करा रहा है. भारत को नुक़सान पहुंचाने के लिए कश्मीर पाक का खिलौना बन गया है. आम कश्मीरी उसकी इस साज़िश का शिकार हो रहे हैं. यदि भारत सीमा पार से होने वाली घुसपैठ को रोकने के लिए मज़बूत मशीनरी बना लेता है तो आतंकी घटनाओं में निश्चित रूप से कमी आएगी. कश्मीर में गत वर्ष आंदोलनों के दौरान पथराव की घटनाएं हुईं और दर्जनों लोग मारे गए. यदि आईएसआई और फर्ज़ी नाम से उसकी गतिविधियों को चलाने वाली संस्थाओं का उन घटनाओं में हाथ नहीं होता तो इतना हो-हल्ला नहीं मचता. यह पाकिस्तानी खुफ़िया एजेंसी की सफलता है कि उसने अपने मुखौटों के ज़रिए युवाओं के हाथों में पत्थर थमाए. एक तऱफ आईएसआई कश्मीर में हिंसा की आग भड़काने का काम कर रही है, वहीं भारत सहित विश्व भर में दुष्प्रचार का काम भी कर रही है.
वामपंथी उदारवादी धड़े की सोच पर सवालिया निशान
इन सब बातों से यह प्रश्न पैदा हो गया है कि भारत का वामपंथी उदारवादी धड़ा सोच-समझकर आईएसआई को उसका लक्ष्य हासिल करने में मदद तो नहीं कर रहा है? भले ही वे कुछ भी कहें, लेकिन उनमें से कुछ की गतिविधियों से यह बात प्रमाणित होती है. अब जबकि आईएसआई- फाई कनेक्शन का खुलासा हो गया है, उनकी यूजफुल इडियट्स की भूमिका भी उजागर हो गई है. पड़गांवकर और नैयर जैसे बुद्धिजीवियों की आईएसआई प्रायोजित सम्मेलनों में हिस्सा लेने के लिए नहीं, बल्कि वहां अपने विचार व्यक्त करने के लिए आलोचना की जानी चाहिए. इन भारतीय वक्ताओं ने इन पक्षपातपूर्ण सम्मेलनों में हिस्सा लेकर देश की छवि धूमिल की है. भारतीय मीडिया का एक समूह (प्रवीण स्वामी और सीमा सिरोही जैसे लोग) ने फाई और उसके उपक्रमों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. लगभग एक दशक से वे उसकी सहायता कर रहे हैं.
फाई की साज़िश के खुलासे के बाद इन हाई प्रोफाइल लोगों के फैसले और बुद्धिमत्ता पर सवालिया निशान लग गया है. यह हमारे हित में है कि चाहे कश्मीर हो या देश हित के मुद्दे उनकी भूमिका को राष्ट्र विरोधी क़रार दिया जाए. फाई प्रकरण भारत के अनेक मीडिया दिग्गजों, बुद्धिजीवियो, वक्ताओं और विशेषज्ञों के लिए सबक़ है. उन्हें राष्ट्रविरोधी तत्वों के किसी कार्यक्रम, सभा-सम्मेलनों में हिस्सा लेने या अन्य किसी लालच का शिकार होने से पहले खूब सोच-विचार कर लेना चाहिए. विशेष रूप से पाकिस्तान और चीन से जुड़े मुद्दों के संदर्भ में. ग़ुलाब नबी फाई के खिला़फ एफबीआई ने जो चार्जशीट दा़खिल की है, भारत सरकार उसे लेकर अब तक खामोश है. सरकार को और क्या करना चाहिए? उसे लंदन और ब्रूसेल्स स्थित दो मुख्य कश्मीर केंद्रों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए. उसे ब्रिटिश सरकार और ईयू पार्लियामेंट पर दबाव बनाकर उनके खिला़फ जांच करवा कर बंद करवाना चाहिए. साथ ही उसे आईएसआई के पैसों पर पलने वाले कश्मीरी अलगाववादी नेताओं के खिला़फ सख्त कार्रवाई करनी चाहिए. भारत के लिए यह सुनहरा अवसर है जब वह स्थानीय, राष्ट्रीय और अंतरर्राष्ट्रीय स्तर पर कश्मीर मुद्दे पर अपना रु़ख कड़ाई से पेश करे. फुटबॉल मैच की भाषा में कहें तो यह स्ट्राइकर के लिए खुला अवसर है, जब उसे गेंद गोल पोस्ट में डालनी है. भारत को इस बार नहीं चूकना चाहिए. हालांकि हम अक्सर देखते हैं कि सुनहरे अवसरों को गंवा दिया जाना है. डर है कि इस बार भी कहीं ऐसा ही न हो.
आज़ादी ज़्यादा दूर नहीं
कश्मीर की आज़ादी ज़्यादा दूर नहीं है. आज़ादी चाहिए तो केवल पाक प्रायोजित आतंकवाद से, कुप्रशासन से, भ्रष्टाचारियों से, दाग़ी राजनेताओं, अ़फसरों से, दुष्प्रचार से. और आज़ादी चाहिए ढोंगी धर्मनिरपेक्षवादियों अरुंधती रॉय, पड़गांवकर, कुलदीप नैयर, गौतम नवलखा और राजिंदर सच्चर जैसे लोगों से.
सत्यमेव जयते
क्या हमारे उदारवादी सदैव आईएसआई के हाथों की कठपुतली बने रहेंगे? जिस तरह युधिष्ठिर ने कुरुक्षेत्र के मैदान में ग़़फलत में अश्वथामा की मौत की खबर फैला दी थी, क्या वे भी ऐसा ही करते रहेंगे? भारत सरकार ने कश्मीर में सुशासन स्थापित करने को लेकर देश के अन्य हिस्सों और विश्व की नज़र में अपनी विश्वसनीयता खो दी है. यदि अब भी वह राष्ट्रविरोधी तत्वों से सख्ती से नहीं निपट पाती तो आतंकवाद को और बढ़ावा मिलेगा. हालांकि इस मुद्दे पर उसे खामोश रहने की वर्तमान नीति को छोड़ कर प्रिंट मीडिया और टीवी चैनलों पर पाकिस्तान के खिला़फ प्रचार युद्ध तेज़ कर उसे जीतने की कोशिश करनी चाहिए. पूरी सरकार को गंभीरता से प्रयास करने चाहिए और दुश्मनों के दुष्प्रचार का उन्हीं की भाषा में जवाब देना चाहिए. उसे कश्मीरी अलगाववादी नेतृत्व को बेनक़ाब करना चाहिए. कुर्सियों पर बैठ कर राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर कोरी बयानबाज़ी करने वाले मुखौटा धर्मनिरपेक्षवादियों को भी उनकी जगह दिखानी होगी. भारत से सुविधाएं हासिल कर आलीशान ज़िंदगी गुज़ारने वाले और देश की पीठ में छुरा घोंपने वाले जिहाद समर्थकों से सावधान रहने की आवश्यकता है. इसके साथ ही भारत सरकार को राष्ट्रविरोधी तत्वों से वैचारिक स्तर पर मुक़ाबला जीतने और उन्हें ठिकाने लगाने के लिए संयमित, संगठित प्रयास करने होंगे. सत्यमेव जयते ही भारत का वर्षों से राष्ट्रीय उद्देश्य है. अंत में सत्य की ही विजय होती है, लेकिन उसे सबके सामने लाने की आवश्यकता होती है. क्या सरकार इसमें सफल हो पाएगी?
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