झरियाः पहचान बनाने की जद्दोजहद

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वर्ष 1952 में झरिया में आयोजित साहित्य सम्मेलन में राष्ट्र कवि रामधारी सिंह दिनकर ने अपनी कविता हाहाकार की ये पंक्तियां पढ़ी थीं. आधी सदी बाद ये पंक्तियां झरिया पर सटीक बैठ रही हैं. झरिया के नीचे लगी आग और इसके विस्थापन को लेकर यहां हाहाकार मचा हुआ है. राष्ट्र के औद्योगिक विकास में मेरुदंड की भूमिका निभाने वाला झरिया कोयलांचल आज अपनी पहचान बचाने के लिए जद्दोजहद कर रहा है. झरिया छोटा नागपुर-संथाल परगना प्रभाग का एक हिस्सा रहा है. यह एक वनांचल था, यहां आबादी का़फी कम थी. यहां के निवासी मुख्यत: खेती और जंगलों पर निर्भर थे. मछुआरे भी यहां का़फी थे. 1774 में देश के विभिन्न भागों में कोयला खनन शुरू हुआ. कुछ वर्षों बाद कोयला समन्वेषकों की नज़र इस क्षेत्र पर पड़ी. 1839 में सर्वप्रथम लेफ्टिनेंट हेरंगटन ने यहां कोयला होने की पुष्टि की. 1858 में मेसर्स बोरोडेली वाड्‌स एंड कंपनी ने लीज पर यहां से कोयला निकालने के लिए आवेदन किया, वह अस्वीकृत हो गया, क्योंकि सरकार को जानकारी नहीं थी कि कोयला कहां-कहां है. 1865 में भू-वैज्ञानिक टी डब्ल्यू एच ह्यूज द्वारा यहां का सर्वेक्षण कराया गया. 1890 में ईस्ट इंडिया रेलवे की तऱफ से टी एच वार्ड ने पुन: सर्वेक्षण किया और अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी. वार्ड की रिपोर्ट आने के बाद 1893-94 में कोयला खनन शुरू हुआ, परंतु कोयले को क्षेत्र से बाहर भेजने की कोई व्यवस्था नहीं थी. इसलिए ईस्ट इंडिया रेलवे ने बराकर के कतरास और कुसुंडा से पाथरडीह तक रेलवे लाइन बिछाने का काम किया.

नए युग की भवानी, आ गई वेला प्रलय की,

दिगंबरी! आज अंबर में किरण का तार डोला.

रेलवे लाइन बन जाने के बाद कई निजी कंपनियों ने भी लीज पर ज़मीन लेकर कोयला खनन शुरू कर दिया. 1894 में झरिया कोल फील्ड का कुल उत्पादन केवल 1500 टन था, जो महज़ 7 सालों बाद 1901 में बढ़कर 2,00,000 टन हो गया. 1906 में झरिया क्षेत्र ने कोयला उत्पादन के मामले में रानीगंज को पछाड़ दिया, जहां कई वर्ष पहले से उत्पादन कार्य हो रहा था. अब झरिया पूरे देश में जाना जाने लगा. प्रथम विश्व युद्ध (1914-18) के दौरान कोयले की मांग में बढ़ोत्तरी हो गई, जिससे कोयलांचल में गतिविधियां तेज़ हो गईं. यहां 112 कोयला कंपनियां स्थापित हुईं. रेलवे का विकास होने लगा. झरिया स्टेशन तो पहले ही बन चुका था. धनबाद-टाटानगर रेलवे लाइन पर प्रमुख स्टेशन बनने लगे. शहर में आबादी बढ़ने लगी. जलापूर्ति सुनिश्चित करने के उद्देश्य से 1914 में झरिया जल परिषद की स्थापना हुई. जन स्वास्थ्य एवं स्वच्छता की समस्या के चलते 1920 में बिहार सरकार द्वारा बिहार और उड़ीसा सेटलमेंट एक्ट 1920 के तहत झरिया माइंस बोर्ड ऑफ हेल्थ का भी गठन हुआ. द्वितीय विश्वयुद्ध के समय भी झरिया के कोयले की मांग और बढ़ गई. झरिया का कोयला विदेशों में भी का़फी मात्रा में भेजा जाने लगा था. द्वितीय विश्व युद्ध से पहले ही यहां टेलीफोन, बिजली एवं पानी जैसी आधारभूत सुविधाएं मौजूद थीं, लेकिन युद्ध के समय इन्हें और मज़बूत किया गया. 1951 में झरिया वाटर बोर्ड की स्थापना की गई. आधिकारिक तौर पर सर्वप्रथम 1959-60 में नेशनल कोल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन द्वारा सुदामडीह और मुनीडीह में उत्खनन कार्य शुरू किया गया. अक्तूबर 1971 में खदानों का राष्ट्रीयकरण किया गया, जिसकी पृष्ठभूमि में श्रमिकों को क़ानूनी हक़ से वंचित रखना, इस्पात उद्योग आदि के लिए कोकिंग कोल की मांग पूरी न करना, सुरक्षा नियमों का पालन न करना और कोयला निकालने के लिए ग़लत तरीक़े अपनाना जैसे मुद्दे प्रमुख थे.

कोयले ने झरिया को विश्व के मानचित्र पर अहम स्थान दिलाया, लेकिन यही कोयला परेशानी का सबब भी बना. कोयला व्यवसायिक ऊर्जा का प्रमुख स्रोत है. विभिन्न लघु उद्योगों से लेकर विद्युत, इस्पात एवं सीमेंट आदि के उत्पादन में कोयले की मुख्य भूमिका होती है. झरिया का कोयला विशिष्ट होने के कारण इस्पात उद्योग के लिए संजीवनी है.

कोयले ने झरिया को विश्व के मानचित्र पर अहम स्थान दिलाया, लेकिन यही कोयला परेशानी का सबब भी बना. कोयला व्यवसायिक ऊर्जा का प्रमुख स्रोत है. विभिन्न लघु उद्योगों से लेकर विद्युत, इस्पात एवं सीमेंट आदि के उत्पादन में कोयले की मुख्य भूमिका होती है. झरिया का कोयला विशिष्ट होने के कारण इस्पात उद्योग के लिए संजीवनी है. देश में प्राइम कोकिंग कोयले का 90 प्रतिशत उत्पादन झरिया करता है, जो विभिन्न धातुकर्मीय उद्योगों की महत्वपूर्ण ज़रूरतों को पूरा करता है. इसी कोयले ने झरिया के जीवन को नकारात्मक रूप से का़फी प्रभावित किया. झरिया कोयलांचल से बीती एक सदी में गहन वन, कल-कल करतीं सरिताएं और कलरव करते वन्य प्राणी लुप्त हो गए. शेष रह गई जलती-धंसती बंजर ज़मीन. रिस रहे रसायन, उड़ती धूल, भूमिगत खान से निकलती गैसों के कारण बंजर भूमि क्षेत्र में वृद्धि होती चली गई. कोयला खनन, परिवहन और संबंधित उद्योगों ने न केवल पर्यावरण को दूषित किया, बल्कि विविध प्राकृतिक आपदाओं को भी न्योता दिया. कोयला खदानों के विस्तार के कारण यहां क्षेत्र का संकुचन हुआ है. 1920 के दशक में यहां 60 प्रतिशत ज़मीन कृषि कार्य के लिए सुलभ थी, 70 के दशक में यह 45 प्रतिशत और वर्तमान में 30 प्रतिशत हो गई. इसी कोयले के कारण झरिया विस्थापन के मुहाने पर भी खड़ा हो गया है. आज झरिया विषम परिस्थितियों से ग़ुजर रहा है.

यहां से लोगों का रैन-बसेरा हटाने की मर्मांतक कहानी लिखी जा चुकी है. विस्थापन की तलवार लटक रही है. यहां के लोगों को विस्थापित करने का गीत लिखा जा चुका है, अब केवल उसे गुनगुनाना बाक़ी है.

विस्थापन की विभीषिका और आरएसपी कॉलेज

ऐतिहासिक शिक्षण संस्थान राजा शिव प्रसाद कॉलेज (आरएसपी कॉलेज) विस्थापन की ज़द में आ ही गया. पिछले पांच वर्षों से जिस आग का पता डीजीएमएस, बीसीसीएल प्रबंधन, ज़िला प्रशासन, जरेडा और सिंफर जैसे तमाम सरकारी तंत्रों को था, वह भूमिगत ज्वाला अब आरएसपी की चौखट को चूमने ही वाली है. आरएसपी कॉलेज के साथ ही मानभूम ज़िले के पहले माध्यमिक स्कूल राज हाईस्कूल, माडा स्थित विशाल जलागार एवं माडा कॉलोनी का भी विस्थापन लगभग तय है. बीती 7 जुलाई को धनबाद ज़िले के उपायुक्त सुनील कुमार वर्णवाल की अध्यक्षता में हुई बैठक में इस भूमिगत आग के बढ़ते खतरों को देखते हुए कॉलेज एवं राज हाईस्कूल को अति शीघ्र किसी सुरक्षित जगह पर शिफ्ट करने का निर्णय लिया गया. ज़मीन के नीचे लगी आग का दायरा निरंतर बढ़ रहा है. कहा जा रहा है कि यह आग कॉलेज के मुख्य भवन से महज़ 45 मीटर की दूरी तक पहुंच गई है. यदि इस आग को रोकने के त्वरित उपाय नहीं किए गए तो चंद महीनों में यह कॉलेज को लील जाएगी. झरिया पुनर्वास प्राधिकार (जरेडा), भारत कुकिंग कोल लिमिटेड (बीसीसीएल), केंद्रीय खनन एवं ईंधन अनुसंधान संस्थान (सिंफर) और खान सुरक्षा महानिदेशालय (डीजीएमएस) के अधिकारियों के साथ हुई इस बैठक में डीसी वर्णवाल ने बीसीसीएल को 10 दिनों के भीतर कॉलेज स्थानांतरण के लिए नई ज़मीन चिन्हित करके रिपोर्ट देने का निर्देश दिया. साथ ही आग की वास्तविक स्थिति, रफ्तार और खतरे सहित इससे जुड़ी विभिन्न चीज़ों की अद्यतन रिपोर्ट मांगी है. दूसरी ओर ज़िला शिक्षा पदाधिकारी (डीईओ) को भी राज हाईस्कूल के स्थानांतरण के लिए स्थान चिन्हित करने का निर्देश दिया गया. आरएसपी कॉलेज को आग से खतरे की आशंका पांच वर्ष पूर्व ही व्यक्त कर दी गई थी, लेकिन प्रशासन, बीसीसीएल और विनोबा भावे विश्वविद्यालय प्रबंधन की उदासीनता के चलते मामला ढीला पड़ा रहा. कॉलेज को बचाने के लिए तमाम दिखावे हुए, काग़ज़ी घोड़े दौड़े, बैठकें हुईं, प्रस्ताव लाए गए, फैसले हुए, आत्मदाह की धमकी दी गई और ट्रेंच कटिंग का खाका तैयार किया गया, लेकिन ज़मीनी कार्रवाई नदारद रही. 2006 में कुस्तौर क्षेत्र के मुख्य महाप्रबंधक ने कॉलेज की ओर तेज़ी से बढ़ रही आग की सूचना देकर आगाह किया था. 12 जुलाई, 2008 को डीजीएमएस कार्यालय में एक बैठक भी तत्कालीन सांसद चंद्रशेखर दूबे की अध्यक्षता में हुई थी, जिसमें तत्कालीन डीजी एम एम शर्मा, डीसी अजय कुमार सिंह, बीसीसीएल सीएमडी ए के पॉल, तत्कालीन निदेशक एवं वर्तमान सीएमडी टी के लाहिड़ी, सिंफर के निदेशक अमलेंदु सिन्हा समेत कई अधिकारी मौजूद थे. सितंबर 2009 में आरएसपी कॉलेज के तत्कालीन प्राचार्य डॉ. एस के अग्रवाल ने कॉलेज पर मंडरा रहे खतरे के बारे में धनबाद के उपायुक्त और विनोबा भावे विश्वविद्यालय के कुलपति को त्राहिमाम्‌ संदेश भेजा था. तत्कालीन कुलपति डॉ. अरविंद कुमार ने राज्यपाल को पत्र लिखकर इस खतरे से अवगत कराया था. 27 सितंबर, 2009 को उपायुक्त अजय कुमार सिंह की अध्यक्षता में जरेडा की भी एक बैठक हुई थी. उक्त सभी बैठकों में आरएसपी कॉलेज को बचाने के लिए अविलंब उपाय करने की बातें कही गईं. इसके लिए 60 मीटर गहरी ट्रेंच काटकर मिट्टी भराई की योजना बनी. ट्रेंच कटिंग कार्य के लिए बोका पहाड़ी को खाली करना आवश्यक था, लेकिन यह क्षेत्र न खाली हुआ और न ट्रेंच कटिंग कार्य शुरू हो पाया.  राजा शिव प्रसाद कॉलेज और राज हाईस्कूल महज़ शिक्षण संस्थान नहीं हैं, बल्कि धरोहर हैं. कॉलेज की स्थापना 1951 में स्वर्गीय राजा शिव प्रसाद की स्मृति में उनके पुत्र राजा काली प्रसाद सिंह ने की थी. धनबाद ज़िले का यह पहला महाविद्यालय है. यहां लाखों छात्रों ने शिक्षा ग्रहण की. यहां से शिक्षा पाकर कई छात्रों ने झरिया का नाम न केवल राज्य, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर रोशन किया. धनबाद के सांसद पशुपति नाथ सिंह, पश्चिम बंगाल (बांकुड़ा) के सांसद वासुदेव आचार्य, बिहार सरकार के पूर्व मंत्री ओम प्रकाश लाल, झारखंड सरकार के पूर्व मंत्री एवं राज्य जनता दल (यूनाइटेड) के अध्यक्ष जलेश्वर महतो, पूर्व विधायक गौर हरिजन, बोकारो औद्योगिक क्षेत्र विकास प्राधिकार (बियाडा) के पूर्व अध्यक्ष विजय झा, धनबाद ज़िला भाजपा के वर्तमान अध्यक्ष हरि प्रकाश लाटा, श्रमिक नेता ए के झा, प्रो. कामता प्रसाद सिंह, सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस एस बी सिन्हा, झारखंड उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति रमेश कुमार मरेठिया, पूर्व रजिस्ट्रार जनरल ब्रह्मेश्वर पांडेय, ज़िला सत्र न्यायाधीश दिलकेश्वर पांडेय, साहित्यकार प्रो. राजेश्वर वर्मा ललित, कथाकार कृष्णचंद चौधरी, प्रसिद्ध व्यवसायी कैलाश गुप्ता, झारखंड सिख वेलफेयर सोसायटी के अध्यक्ष सेवा सिंह, संतोष अग्रवाल, समर श्रीवास्तव, परशुराम सिंह, शिव प्रकाश लाल एवं रामदेव पांडेय जैसे प्रसिद्ध अधिवक्ता भी यहां के छात्र रह चुके हैं. कॉलेज के छात्रों ने जयप्रकाश नारायण के संपूर्ण क्रांति आंदोलन में भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था. कॉलेज परिसर में स्थित राज स्कूल का अपना एक अलग महत्व है. यह मानभूम ज़िले का पहला माध्यमिक स्कूल है. 1866 में राजा दुर्गा प्रसाद ने इसकी स्थापना की थी. जिन दिनों यह विद्याल बना, उन्हीं दिनों कोलकाता में रवींद्र नाथ ठाकुर द्वारा विश्व भारती की स्थापना हुई थी. 1902 में राज स्कूल को कोलकाता विश्वविद्यालय से आंशिक मान्यता प्राप्त हुई. यह विद्यालय देश के स्वाधीनता संग्राम का भी गवाह बना. यहां छात्रावास की भी सुविधा थी. कालांतर में विद्यालय के इसी दो मंज़िले छात्रावास में राजा शिव प्रसाद कॉलेज की स्थापना हुई. आज शिक्षा के इन दोनों मंदिरों पर संकट के बादल गहरा गए हैं. इससे कॉलेज के लगभग साढ़े छह हज़ार और राज स्कूल के ढाई हज़ार छात्रों का भविष्य खतरे में पड़ गया है.

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