न्यायालयों में न्याय होता है. कहा जाता है न्याय तो अंधा है, उसके लिए धनी-निर्धन सब बराबर हैं. न्याय के सामने किसी में भेदभाव नहीं होगा, पर वस्तुतः क्या यह सत्य है? पुस्तकों में जो भी क़ानून हैं वे ज़रूर सारे देश के लिए समान रूप से लागू हैं, पर उनका संचालन या नियमन किस ढंग से होता है, ज़रा ग़ौर कीजिए.
आपकी थोड़ी-सी ज़मीन है. आपके पड़ोसी ने मनमानी करके उसका कुछ हिस्सा दबा लिया है. अब आपको न्यायालय में पुकार करनी होगी. कोर्ट फीस भर कर आपने दावा दायर किया. वकील या बैरिस्टर को अच्छी फीस देकर आपने उसे आपकी तऱफ से दलील करने को तैनात किया. आप या आपके कई पड़ोसियों ने आपकी बात साबित करने के लिए महीनों दौड़-धूप की, कचहरी के चक्कर लगाए. आख़िर साल, दो साल या दस साल बाद मान लीजिए कि न्याय ही हुआ तो, आपकी ज़मीन जो आपके पड़ोसी ने दबा ली थी, वह आपको वापस मिल गई. इस सौदे में आपको जितनी हैरानी या परेशानी उठानी पड़ी वह तो अलग, पर कोर्ट-फी, वकील बैरिस्टर-फी और कचहरी आने-जाने के ख़र्च में आपको शायद ज़मीन की कुल क़ीमत से दुगुना ख़र्च कर देना पड़ा. अब आप ही बतलाइए, अगर आपके पास इतने साधन नहीं हैं कि आप यह ख़र्च कर सकें तो आपको मन मारकर बैठ जाना पड़ेगा. या हो सकता है मुक़दमा दायर करने के बाद भी विपक्षी के वकील बैरिस्टर जो तगड़ी फीस से तैनात किए हुए हैं, इतने ज़्यादा क़ाबिल हैं कि आपका सच्चा मुक़दमा भी झूठा साबित हो जाए. शायद नतीजा यही हो कि वह ज़मीन शुरू से ही आपके पड़ोसी की थी. आपकी कभी रही ही नहीं. आप व्यर्थ ही बकवास करते हैं. कहिए, असल कार्यरूप में आपसे आपका पड़ोसी, जो शायद आपकी तुलना में ज़्यादा समृद्ध है, एक टका ऊंचा रहा कि नहीं? इस उदाहरण में क्या न्याय समान रूप से मिल सका या मिल सकेगा?
संप्रति भारत में बालिग़ मताधिकार, ख़ासकर जब बहुसंख्यक प्रजा अनपढ़ या अनभिज्ञ है, कोई विशेष मायने नहीं रखता. यह तो अंधेरे में मारी हुई छलांग है. किसी पार्टी का नामज़द किया हुआ व्यक्ति ज़्यादा से ज़्यादा प्रचार करता है. जो इन अनपढ़ या अनभिज्ञ आदमियों को बहकाने में समर्थ होता है वही ज़्यादा वोट पाता है. पार्टी-पार्टी में भी फूट है. पार्टी ने एक व्यक्ति को नामज़द किया. पार्टी के कुछ दूसरे कार्यकर्ता किसी दूसरे व्यक्ति को नामज़द करना चाहते थे.
अगर आपने सकारण या अकारण किसी समृद्ध या धनिक को नाराज़ कर दिया तो वह फौरन आपको वकील से नोटिस दिलाकर कोर्ट में आपके विरुद्ध दावा दायर कर देगा. नतीजा होगा आप अपने काम धंधे से गए. ख़र्च होगा सो अलग. मजबूरन आप उसी धनिक के पास हाथ-पांव जोड़कर सुलह कर लेंगे. ऐसी है सामाजिक परिस्थिति, जिसमें न्याय का अधिकार सबको समान रूप से होते हुए भी सबको समान न्याय मिल नहीं रहा है.
मेरा अनुभव है, ऐसे महानुभाव भी मौजूद हैं, जो असल में देनदार हैं, पर झूठे झगड़े झंझट डालकर विपक्षी को म़ुकदमा दायर करने पर बाध्य कर देते हैं, और फिर बड़े गर्व से कहते हैं- क्या हुआ, अभी 10 वर्ष तो म़ुकदमेबाज़ी चलेगी. बाद में आख़िर डिग्री हो भी गई तो रुपये की अठन्नी भी उसके घर में आने वाली नहीं. अब ग़ौर कीजिए, एक-एक मुक़दमे को दस-दस वर्ष तक आदमी अपनी चालाकियों से चला सकता है तो उसके बाद न्याय मिला भी तो किस काम का? सब जगह अच्छे वकील बैरिस्टर, जो तगड़ी फीस लेते हैं, और जिसे कि स़िर्फ धनिक वर्ग ही देने में समर्थ है, न्याय की मशीन को तेज़ या धीरे चला सकते हैं.
ये सब तो दीवानी मुक़दमों की बात हुई. जिस देश में ग़रीबी इतनी ज़्यादा व्याप्त हो उसमें आश्चर्य नहीं है कि मजिस्ट्रेट या हाकिम थोड़े से प्रलोभन में न आ जाए. क़ानून की दृष्टि से वैसा प्रलोभन शायद अवैध न भी माना जाए, पर निश्चित ही वह ग़लत है. देखा गया है कि मजिस्ट्रेट के लड़के को, वे धनिक जिनके मुक़दमे उनके पास हैं, अच्छी खासी तनख्वाह पर रख लेते हैं या उन्हीं मजिस्ट्रेट को ओहदे से रिटायर होने पर उम्र भर तक अच्छी नौकरी देने का वचन या आश्वासन दे देते हैं. फिर क्यों न उस हाकिम की कचहरी में फैसला उनके अनुकूल हो? ऐसा बहुधा होता है. दुर्भाग्य से ये सब सुविधाएं एक ग़रीब को प्राप्त नहीं. उसे तो अपने अपराध से या कई बार तो बिना किसी अपराध के भी दंडित होना ही पड़ता है. ग़र्ज़ यही कि न्याय समान रूप से नहीं मिल पा रहा है और उसका नियमन हो नहीं सकेगा, जब तक कि संपूर्ण स्थिति वित्त वितरण की समानता की योजना द्वारा कार्यान्वित न हो जाए.
इसके अलावा यह भी कुछ अंशों में सत्य है कि क़ानून बनाने वाली संस्थाएं भी तो धनिकों या समृद्धों द्वारा ही नियंत्रित की जा रही हैं. संसद या लोकसभा को लीजिए. चुनाव होता है, एक मेंबर को चुनाव में पहले 500 रुपये तो डिपोजिट देने पड़ते हैं, बाद में कम से कम 15-20 हज़ार एक सीट के लिए ख़र्च हो ही जाते हैं. एक मेंबर साढ़े सात लाख नागरिकों का प्रतिनिधित्व करता है, लिहाज़ा इससे कम ख़र्च होने का सवाल ही नहीं है. इसी तरह राज्य विधान सभाओं की मेंबरी के चुनावों के लिए भी कम से कम 5 हज़ार रुपये तो ख़र्च होते ही हैं. (आजकल यह ख़र्च लाखों में होता है.)
अगर चुनाव में हार हो गई तो सब व्यर्थ ही है. जीत होने पर भी मेंबरों को जो मासिक भत्ता वग़ैरह मिलता है, वह मुश्किल से अपना ख़र्च वग़ैरह चलाने के लिए पर्याप्त हो पाता है. ऐसी परिस्थितियों में धनिकों या समृद्धों के सिवाय चुनाव लड़ने का साहस ही कौन कर सकता है? इन्हीं चुने हुए व्यक्तियों की लोकसभा या विधानसभा क़ानून बनाती है. स्वाभाविक है कि उनकी व्यक्तिगत आर्थिक परिस्थिति देश की आर्थिक परिस्थिति का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकती. उनके विचार, धारणा एवं निश्चय ही भिन्न प्रकार के होंगे. भारत में यह तो ठीक है कि चुनाव ज़्यादातर पार्टी के आधार पर होते हैं, इसलिए अपने क्षेत्र में कोई व्यक्ति लोकप्रिय हो और नितांत निर्धन हो, तो भी उसको चुनाव में चुने जाने का अवसर मिल सकता है. क्योंकि ख़र्च उसके बदले में वह पार्टी करती है जिसके द्वारा उसको नामज़द किया जाता है. कांग्रेस पार्टी या प्रजा-समाजवादी पार्टी, किसी को भी लीजिए, वही हाल उस पार्टी के अंदर के चुनावों का है. पार्टी में से अपने का नामज़द करा सकने में जो खर्च हैं उसे वहन करने की क्षमता ग़रीबों में शायद ही हो. घूम फिर कर नतीजा यही हुआ कि अगर क़ानून बनाने वाली संस्थाएं लोकसभा, विधानसभा इत्यादि को सही मायने में प्रतिनिधि संस्था बनाना है तो केवल बालिग़ मताधिकार दे देने से काम नहीं चलेगा. उन सब में समान वित्त-वितरण हो जाने पर ही वे सही अर्थ में चुनावों में भाग ले सकेंगे.
संप्रति भारत में बालिग़ मताधिकार, ख़ासकर जब बहुसंख्यक प्रजा अनपढ़ या अनभिज्ञ है, कोई विशेष मायने नहीं रखता. यह तो अंधेरे में मारी हुई छलांग है. किसी पार्टी का नामज़द किया हुआ व्यक्ति ज़्यादा से ज़्यादा प्रचार करता है. जो इन अनपढ़ या अनभिज्ञ आदमियों को बहकाने में समर्थ होता है वही ज़्यादा वोट पाता है. पार्टी-पार्टी में भी फूट है. पार्टी ने एक व्यक्ति को नामज़द किया. पार्टी के कुछ दूसरे कार्यकर्ता किसी दूसरे व्यक्ति को नामज़द करना चाहते थे. तो अब शिष्टाचार तो यह रह गया है कि पार्टी के अंदर ही वे दूसरे व्यक्ति, चुनाव में उस नामज़द व्यक्ति का खुलेआम विरोध करते हैं.
इस देश में अनुशासन भंग इतने अनुपात में बढ़ गए हैं कि उसकी सीमा ही नहीं, और उसका मूल कारण वही असमान-वित्त-वितरण ही है.
महावीर प्रसाद आर मोरारका का जन्म 12 अगस्त, 1919 को नवलगढ़ (झुंझनू) राजस्थान में हुआ था. उद्योगपति, स्वप्नदृष्टा और लेखक से कहीं अधिक वह उदात्त मानवीय मूल्यों के संवाहक थे. उनकी गणना भारत के प्रमुख उद्योगपतियों में की जाती है.
संप्रति भारत में बालिग़ मताधिकार, ख़ासकर जब बहुसंख्यक प्रजा अनपढ़ या अनभिज्ञ है, कोई विशेष मायने नहीं रखता. यह तो अंधेरे में मारी हुई छलांग है. किसी पार्टी का नामज़द किया हुआ व्यक्ति ज़्यादा से ज़्यादा प्रचार करता है. जो इन अनपढ़ या अनभिज्ञ आदमियों को बहकाने में समर्थ होता है वही ज़्यादा वोट पाता है. पार्टी-पार्टी में भी फूट है. पार्टी ने एक व्यक्ति को नामज़द किया. पार्टी के कुछ दूसरे कार्यकर्ता किसी दूसरे व्यक्ति को नामज़द करना चाहते थे.
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