विकेंद्रीकरण संघीय व्यवस्था को एक मजबूत आधार प्रदान करता है, लेकिन पाकिस्तान में तो विकेंद्रीरण कहीं दिखता ही नहीं है. सवाल यह है कि क्या राज्य सभी शक्तियां अपने पास रखने का अधिकारी है और वह स्थानीय निकायों को कोई भी अधिकार देना अस्वीकार कर सकता है? 18वें संविधान संशोधन के अनुसार, अनुच्छेद 270-एए का क्लॉज-1 लोकल गवर्नमेंट ऑर्डिनेंस 2001 को निरस्त करता है. यह ऑर्डिनेंस 2002 के लीगल फ्रेमवर्क ऑर्डर के अंतर्गत लाया गया था, जबकि समवर्ती सूची को भूलकर अनुच्छेद 270-एए का क्लॉज-6 राज्य की स्वायत्तता को वैधानिक मान्यता प्रदान करता है. इस संशोधन द्वारा एक नया अनुच्छेद 140-ए लाया गया है. अनुच्छेद 140-ए के क्लॉज-1 में वही व्यवस्था है, जो जनरल मुशर्रफ के समय 2001 में लागू किए गए लोकल गवर्नमेंट आर्डिनेंस में थी. एक तरह से यह उसकी जेरॉक्स कॉपी है.
सबसे बड़ी समस्या तो उन लोगों की है, जो न लोकतंत्र की कीमत समझते हैं और न स्थानीय सरकार की बहाली के लिए आवाज उठाते हैं. बहुत कम लोगों ने स्थानीय सरकार न होने के विरुद्ध आंदोलन किया है. आज आवश्यकता इस बात की है कि पाकिस्तान में किसी भी प्रकार की स्थानीय शासन प्रणाली लाई जाए, ताकि जनता जमीनी स्तर पर लोकतंत्र की तलाश कर सके.
अनुच्छेद 140-ए के क्लॉज-1 के अनुसार, प्रत्येक राज्य स्थानीय सरकार प्रणाली कायम करेगा और कोई भी राज्य प्राचीन व्यवस्था को पुन: लागू नहीं करेगा. इसके साथ-साथ राज्य के लिए यह बाध्यकारी है कि वह राजनीतिक, प्रशासनिक और आर्थिक अधिकार निर्वाचित स्थानीय सरकार को हस्तांतरित करे. अनुच्छेद 140-ए के क्लॉज-1 के प्रभाव में आने के बाद स्थानीय सरकार बनाने का अधिकार केंद्र के स्थान पर राज्य को दे दिया गया. हालांकि अनुच्छेद 140-ए का क्लॉज-2 पाकिस्तान के चुनाव आयोग को सशक्त करता है, ताकि राज्य के अंतर्गत होने वाले स्थानीय निकाय के चुनावों पर केंद्र का दबदबा रहे, क्योंकि चुनाव आयोग पर केंद्र सरकार का नियंत्रण है. अत: परोक्ष रूप से स्थानीय निकायों के चुनावों पर केंद्र का ही नियंत्रण होगा. अनुच्छेद 140-ए के क्लॉज-1 में एक शब्द छूटा हुआ है और वह है लेजिस्लेट. अगर स्टेब्लिस्ट से पहले इस शब्द को जोड़ दिया जाता तो विवाद ही समाप्त हो जाता, लेकिन ऐसा नहीं किया गया. जिस स्थानीय सरकार की स्थापना राज्य सरकार द्वारा की गई है, उसका ढांचा मुशर्रफ के समय एनआरबी (नेशनल रिकंस्ट्रक्शन ब्यूरो) ने तैयार किया था. बाद में राज्य सरकार ने इसे कानूनी आधार प्रदान करने के लिए एनआरबी की अनुशंसा का ही सहारा लिया और इसी के कारण स्टेब्लिस्ट शब्द रखने को सही ठहराया गया और लेजिस्लेट शब्द को नहीं रखा गया.
सितंबर 2009 में होने वाला स्थानीय निकाय चुनाव नहीं हो सका. अप्रैल 2010 में संसद ने 18वां संशोधन पारित किया और जुलाई 2010 में एनआरबी को समाप्त कर दिया गया. अत: राज्य में कैसी स्थानीय सरकार बनाई जाए, इसकी कोई भी रूपरेखा अब उपलब्ध नहीं है. दूसरी तरफ राज्य में पुन: स्थानीय सरकार की बहाली के लिए केंद्र सरकार न कोई कानून बना रही है और न कोई अध्यादेश जारी कर रही है. इसके साथ-साथ राज्य सरकारें भी स्थानीय निकायों के लिए कोई कानून नहीं बना रही हैं, जिसके कारण स्थानीय निकाय चुनाव नहीं हो पा रहे हैं और स्थानीय स्तर पर लोकतंत्र की स्थापना नहीं हो पा रही है. स्थानीय सरकार की जो प्रणाली मुशर्रफ के समय लाई गई थी और 2001 से 2009 तक चलती रही, उसमें कई समस्याएं हो सकती हैं. पहली समस्या तो यही है कि इस व्यवस्था के तहत स्थानीय निकायों के चुनाव पार्टी स्तर पर नहीं होने हैं, जबकि राज्य और केंद्र के चुनाव पार्टी स्तर पर होते हैं. ऐसे में स्थानीय सरकार के लिए जिन लोगों को चुना जाएगा, उनकी पकड़ जनता पर अधिक होगी और सभी पार्टियों को जनता तक अपनी पहुंच बनाने के लिए इन जीते हुए लोगों का सहारा लेना पड़ेगा. एक तरह से केंद्र और राज्य में राजनीति करने वाले नेताओं को ऐसे लोगों पर निर्भर रहना पड़ेगा, जो उन्हें स्वीकार नहीं. यही कारण है कि सरकार स्थानीय निकायों के चुनाव कराने के लिए कोई कदम नहीं उठा रही है. दूसरी समस्या यह है कि जिला प्रबंधक ही स्थानीय स्तर पर सामाजिक समस्याओं के निदान के लिए कार्य करेगा. अत: जनता के बीच उसकी पैठ अधिक होगी. इसके कारण राष्ट्रीय नेताओं की स्थिति कमजोर हो जाएगी. साथ ही साथ जिला स्तर पर शक्ति का एक अन्य केंद्र बन जाएगा, जिसके कारण जिला और राज्य सरकार के बीच शक्ति का संतुलन बिगड़ जाएगा. तीसरी समस्या यह है कि स्थानीय सरकार को टैक्स लगाने और राजस्व वसूलने का अधिकार होगा, जिसके चलते धन के मामले में वह आत्मनिर्भर हो जाएगा. इन संसाधनों का उपयोग स्थानीय सरकार अपने क्षेत्र के विकास के लिए करेगी, जिससे जनता पर उसका प्रभाव बढ़ेगा और बड़े नेताओं के लिए समस्या उत्पन्न हो जाएगी, क्योंकि जनता पर उनकी पकड़ कमजोर हो जाएगी. स्थानीय सरकार से राजनीतिक दल एवं नेता और अधिक लाभ उठा सकते हैं. राज्य स्तर पर शक्ति का केंद्रीयकरण असंतोष को बढ़ावा दे रहा है और साथ ही चारों राज्यों के विभाजन की मांग को भी जन्म दे रहा है. स्थानीय सरकार इसे कम कर सकती है. इसके साथ-साथ स्थानीय सरकार की उपस्थिति राज्यों के बीच के आपसी विवादों को भी कम करेगी.
सबसे बड़ी समस्या तो उन लोगों की है, जो न लोकतंत्र की कीमत समझते हैं और न स्थानीय सरकार की बहाली के लिए आवाज उठाते हैं. बहुत कम लोगों ने स्थानीय सरकार न होने के विरुद्ध आंदोलन किया है. आज आवश्यकता इस बात की है कि पाकिस्तान में किसी भी प्रकार की स्थानीय शासन प्रणाली लाई जाए, ताकि जनता जमीनी स्तर पर लोकतंत्र की तलाश कर सके. एक बार ये लोग स्थानीय स्तर पर लोकतंत्र को जान लें, फिर राष्ट्रीय स्तर पर भी लोकतंत्र की कीमत समझ जाएंगे.
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