पिछले दिनों केंद्र सरकार ने सभी राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों को एक पत्र लिखकर यह सा़फ कर दिया कि बांस पेड़ नहीं, बल्कि घास की श्रेणी में आते हैं. अत: इन्हें काटने के लिए वन विभाग से विशेष अनुमति लेने की ज़रूरत नहीं होगी. सरकार की इस पहल से उन लोगों को राहत पहुंची है, जो बांस उत्पाद के माध्यम से रोज़गार हासिल कर रहे हैं. बांस से बने सामान वास्तव में इको फ्रेंडली होते हैं. इसे प्लास्टिक के विकल्प के रूप में भी देखा जा रहा है. यही वजह है कि देश और विदेशों में बांस से बने सामानों की मांग में तेज़ी से वृद्धि हो रही है. बढ़ती मांग ने ही झारखंड के आदिवासियों को रोज़गार उपलब्ध कराया है, जिससे न स़िर्फ वे आत्मनिर्भर हो रहे हैं, बल्कि रोज़ी-रोटी की तलाश में होने वाले पलायन में भी कमी आई है. रोज़गार के अभाव में राज्य से आदिवासियों की एक बड़ी संख्या परिवार सहित पश्चिम बंगाल, असम, पंजाब और दिल्ली जाकर घरों एवं खेतों में काम करने के लिए मजबूर है, लेकिन अब धीरे-धीरे हालात बदलने लगे हैं. बांस से बनने वाले सामानों ने उन्हें घर में ही रोजगार का साधन उपलब्ध कराना शुरू कर दिया है. इस काम में आदिवासी महिलाएं बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रही हैं और परिवार की आमदनी में अपना बहुमूल्य योगदान दे रही हैं.
वैज्ञानिक आधार पर बांस को ग्रामिनीई कुल का बीजपत्री पौधा माना जाता है. विश्व के लगभग सभी हिस्सों में इसकी प्रजातियां पाई जाती हैं. अकेले भारत में ही बांस की 24 प्रजातियां मौजूद हैं. महत्वपूर्ण बात यह है कि अन्य पेड़-पौधों को जहां सूखे, कीटों एवं बीमारियों का खतरा रहता है, वहीं बांस हर हाल में आसानी से फलता-फूलता है. यह ज़मीन पर सबसे त़ेज बढ़ने वाला पौधा है.
दुमका ज़िले के शिकारीपाड़ा प्रखंड के लवाडीह गांव की बसंती टुडू आज प्रतिमाह दस हज़ार रुपये कमा रही है. उसका पति सुभाष हंसदा ज़िले का सिद्धहस्त बांस कारीगर माना जाता है. उसे हाल में राज्य के मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा ने सर्वश्रेष्ठ शिल्पकार के रूप में सम्मानित भी किया. इस रोज़गार से जुड़ने से पहले दोनों खदान में पत्थर तोड़ने का काम करते थे, लेकिन उससे होने वाली आमदनी से घर के आवश्यक खर्च भी पूरे नहीं हो पाते थे. अत्यधिक श्रम के कारण इन्हें टीबी की बीमारी हो गई और आय का साधन छिन गया. इसी दौरान आदिवासियों के बीच काम करने वाली स्वयंसेवी संस्था ईवैंजेलिकल सोशल एक्शन फोरम (ईसाफ) ने इन्हें बांस के माध्यम से रोज़गार हासिल करने की जानकारी दी और प्रशिक्षण के लिए केरल के त्रिचूर भेजा. तीन माह के प्रशिक्षण कार्यक्रम में इन्होंने बांस के माध्यम से कई तरह की वस्तुएं बनाना सीखा. वहां से लौटकर आने के बाद इन दोनों ने अपने गांव में समूह बनाकर यह काम शुरू किया और घासीपुर, रामपुर, लखीकुंडी, पिपरा, बरगाछी एवं केंदुआ जैसे पिछड़े क्षेत्रों के आदिवासी परिवारों को भी प्रशिक्षित किया. ये राज्य के वे इलाक़े हैं, जहां के लोगों की आय का एकमात्र साधन खेती है, लेकिन बेरोज़गारी के दिनों में परिवार के लिए दो जून की रोटी का जुगाड़ करना मुश्किल हो जाता है. ऐसे में काम की तलाश में दूसरे राज्यों की तऱफ पलायन करना इनकी मजबूरी है. आज शिकारीपाड़ा प्रखंड में 20 समूह काम कर रहे हैं, जिनसे क़रीब दो सौ महिलाएं और पुरुष जुड़े हुए हैं. इनके द्वारा बांस की सहायता से बनाए गए डस्टबीन, सजावटी सामान और फर्नीचर की मांग आज महानगरों के अलावा विदेशों में भी खूब हो रही है.
आदिवासियों में बढ़ती रुचि को देखते हुए ईसाफ ने राज्य के अन्य ज़िलों गिरिडीह, पाकुड़, साहेबगंज, जामताड़ा और राज्य से सटे पश्चिम बंगाल के मोहम्मदा बाज़ार में भी अपने प्रशिक्षण केंद्र खोले हैं, जहां लगभग दो हज़ार परिवारों को घर बैठे रोजगार हासिल हो रहा है. संस्था यह कार्य सेल्फ हेल्प ग्रुप और नाबार्ड के सहयोग से अंजाम दे रही है. ईसाफ के बिजनेस मैनेजर सुधीर कुमार के अनुसार, इस वर्ष आठ केंद्रों से क़रीब 17 लाख रुपये के उत्पाद बिक चुके हैं. संस्थान महानगरों में लगने वाले मेलों में भी इन उत्पादों को प्रदर्शित करता है, जिसके अच्छे परिणाम सामने आए हैं और कई अंतरराष्ट्रीय कंपनियों ने ऑर्डर भी दिए हैं. फैब इंडिया चेन्नई और नार्वे आदि तक यहां के उत्पाद निर्यात किए जाते हैं. बांस व्यवसाय से जुड़कर आदिवासी कई अनूठी चीज़ें बनाने लगे हैं. वे हुनरमंद हो चुके हैं, अपनी और अपने बच्चों की ज़िंदगी संवार रहे हैं. वे अपने द्वारा बनाए गए सामानों को इस संस्था के हाथ बेच देते हैं. इस प्रकार उन्हें बिक्री संबंधी दिक्क़तों का भी सामना नहीं करना पड़ता. कारीगर लाल टुडू के अनुसार वह एक बांस से कई प्रकार की चीज़ें बनाने में महारथ हासिल कर चुका है और यह काम वह एक सप्ताह में पूरा कर लेता है. डेनियल मोहली और उर्मिला मोहली काम की तलाश में दर-दर भटकने से कहीं ज़्यादा अच्छा इस काम को मानते हैं. एक परिवार से जितने सदस्य इस काम से जुड़ेंगे, आमदनी उतनी ही ज़्यादा होगी. महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रशिक्षण केंद्र के बग़ल में ही बच्चों की शिक्षा के लिए विशेष प्रबंध किए गए हैं. एक तऱफ आदिवासी जीविकोपार्जन करते हैं, वहीं बाल शिक्षा केंद्र में उनके बच्चे भविष्य के बेहतर सपने बुनते हैं.
वैज्ञानिक आधार पर बांस को ग्रामिनीई कुल का बीजपत्री पौधा माना जाता है. विश्व के लगभग सभी हिस्सों में इसकी प्रजातियां पाई जाती हैं. अकेले भारत में ही बांस की 24 प्रजातियां मौजूद हैं. महत्वपूर्ण बात यह है कि अन्य पेड़-पौधों को जहां सूखे, कीटों एवं बीमारियों का खतरा रहता है, वहीं बांस हर हाल में आसानी से फलता-फूलता है. यह ज़मीन पर सबसे त़ेज बढ़ने वाला पौधा है. झारखंड में 23,605 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में जंगल है, जो कुल क्षेत्रफल का 30 प्रतिशत है. इनमें से 843 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में बांस पाया जाता है. बांस का काम मुख्यत: महली जनजाति द्वारा किया जाता है, जिसकी आबादी राज्य में अन्य जनजातियों के मुक़ाबले ज़्यादा है, लेकिन आर्थिक रूप से यह का़फी पिछड़ी मानी जाती है. ऐसे में बांस न स़िर्फ इनके लिए रोज़गार का एक बेहतर विकल्प बन रहा है, बल्कि राज्य की आय का प्रमुख स्रोत भी साबित हो सकता है. (चरखा)
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