भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व अध्यक्ष राजनाथ सिंह की विदर्भ यात्रा पर अब सवाल उठाए जा रहे हैं. उनकी इस यात्रा को कुछ संगठन व्यक्तिगत यात्रा तक क़रार दे रहे हैं और पार्टी की नीति पर भी प्रश्नचिन्ह लग रहे हैं. भाजपा नेताओं की औद्योगिक इकाइयों द्वारा भी किसानों की ज़मीन हड़पने का आरोप लगाया जा रहा है. इससे राजनाथ की विदर्भ यात्रा विफल होती लग रही है. ग़ौरतलब है कि राजनाथ सिंह ने किसानों द्वारा आत्महत्या के लिए चर्चित यवतमाल एवं चंद्रपुर ज़िले का दौरा करके वहां के लोगों की व्यथा कथा सुनी थी. किसानों की समस्याओं की जानकारी लेने के बाद उन्होंने महाराष्ट्र और केंद्र सरकार से मांग की थी कि वे अपनी कृषि नीति का खुलासा करें. उन्होंने सरकार द्वारा किसानों की ज़मीन अधिग्रहीत करने पर भी सवाल उठाए और इन गंभीर मुद्दों पर राज्य एवं केंद्र में सत्तारूढ़ दल को ललकारा, परंतु अब उनकी यह यात्रा विवादों में पड़ती नज़र आ रही है. विदर्भ जन आंदोलन समिति ने राजनाथ की यात्रा पर कई सवाल उठाए हैं. समिति का कहना है कि राजनाथ सिंह को विदर्भ की ज़मीनी हक़ीक़त का पता नहीं है. उनकी ही पार्टी के कई नेताओं के कई प्रोजेक्ट किसानों की ज़मीन पर खड़े हैं. इसलिए राजनाथ सिंह को पहले अपनी पार्टी की नीति स्पष्ट करनी चाहिए. उन्हें पहले यह पता करना चाहिए कि उनकी पार्टी के नेताओं के प्रोजेक्ट कहां-कहां हैं और उनकी वस्तुस्थिति क्या है? उसके बाद ही उन्हें किसी और पर कोई आरोप लगाना चाहिए.
समिति का कहना है कि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी के उद्योग समूह पूर्ति द्वारा यवतमाल में बिजली उत्पादन प्रोजेक्ट शुरू करने की योजना है. यदि यह योजना साकार होती है तो इससे सैकड़ों किसानों का भूमिहीन होना तय है. इसके अलावा भाजपा शासित राज्य मध्य प्रदेश में महाराष्ट्र की सीमा पर अदानी समूह द्वारा बिजली प्लांट स्थापित किया जा रहा है, जिसे पानी पेंच से दिया जाएगा, जिससे नागपुर ज़िले को पेयजल की आपूर्ति की जाती है. यदि पेंच का पानी अदानी समूह के बिजली प्लांट को दिया जाएगा तो भविष्य में नागपुर की जलापूर्ति प्रभावित होना स्वाभाविक है. इससे क्षेत्र के खेतों को सिंचाई के लिए मिलने वाले पानी में भी कमी आने की आशंका है. ऐसी स्थितियों के बावजूद भाजपा के राष्ट्रीय नेता अपनी सुविधा के स्थानों पर जाकर किसानों के हितों की बात करते हैं और अपनी पार्टी के नेताओं द्वारा निजी प्रोजेक्ट स्थापित करने और सरकार द्वारा उनके लिए किसानों की ज़मीन अधिग्रहीत करने के मामलों को अनदेखा कर देते हैं. किसानों के हक़ का पानी निजी समूहों को देना राजनाथ सिंह को दिखाई नहीं देता.
विदर्भ जन आंदोलन समिति के अध्यक्ष किशोर तिवारी का कहना है कि भाजपा को पहले विदर्भ सहित मध्य भारत में प्रस्तावित 116 बिजली परियोजनाओं और उनसे प्रभावित होने वाले किसानों एवं ग्रामवासियों के बारे में अपनी नीति स्पष्ट करनी चाहिए. उन्होंने आरोप लगाया कि राजनाथ सिंह द्वारा यवतमाल एवं चंद्रपुर ज़िले का दौरा करके जो किसान-आदिवासी प्रेम प्रकट किया गया, वह मात्र दिखावा था. कोलुरा एवं बिजोरा में स्थित प्रोजेक्ट से कई किसान-आदिवासी प्रभावित हुए हैं. यह प्रोजेक्ट भाजपा के उत्तम इगले और मदन येरावार के हैं, इस संबंध में राजनाथ सिंह ने कुछ नहीं कहा. इसलिए उन्हें यवतमाल में बैठकर राहुल गांधी को सलाह देने के बजाय भाजपा की कार्यकारिणी में चर्चा करके किसानों के हित में एक ठोस कृषि नीति बनानी चाहिए. तिवारी ने आरोप लगाया कि महाराष्ट्र सहित मध्य भारत में प्रस्तावित 116 बिजली परियोजनाओं में से 40 से अधिक मध्य प्रदेश एवं छत्तीसगढ़ में स्थापित होने वाली हैं. इन परियोजनाओं को स्थापित करने के लिए नितिन गडकरी का पूर्ति उद्योग समूह विशेष रूप से सक्रिय है. विदर्भ के कपास उत्पादक किसान भी राजनाथ सिंह के कारण ही आज संकट में हैं. कपास उत्पादकों के सामने आज जो आर्थिक संकट है, उसके ज़िम्मेदार राजनाथ सिंह हैं. केंद्र में एनडीए सरकार के दौरान जब वह मंत्री थे, तब उनकी खुली आयात-निर्यात नीति और बीज प्रसंस्करण के क्षेत्र में विदेशी कंपनियों को मुक्त प्रवेश देने के कारण आज किसानों को कई तरह की दिक्क़तों का सामना करना पड़ रहा है. इसी नीति की वजह से किसानों को आत्महत्या के लिए मजबूर होना पड़ा. आज वही राजनाथ सिंह किसानों के हितों की बात कर रहे हैं, आत्महत्या करने वाले किसानों की विधवाओं के पुनर्वास की गुहार लगा रहे हैं.
तिवारी का कहना है कि यह किसानों का दुर्भाग्य है कि जिस व्यक्ति की नीतियों की वजह से वे संकट में हैं, वही आज उनके हितों की बात कहकर राजनीति कर रहा है. ऐसे में भला कैसे विश्वास किया जा सकता है कि भाजपा किसानों के संघर्ष में उनके साथ खड़ी होगी. राजनाथ सिंह ने चंद्रपुर ज़िले की वणी तहसील का दौरा किया और वेकोलि खदान से प्रभावित ग्रामवासियों की समस्याओं को सुना और समझा, मगर उन्होंने झरी तहसील जाकर रिलायंस प्रेजेंटेशन कंपनी द्वारा पीड़ित किसानों की समस्याएं सुनने की ज़रूरत नहीं समझी. रिलायंस ने यहां पिछले कई महीनों से बेहद कम राशि में किसानों की ज़मीन की खरीद शुरू कर दी है. किसानों का कहना है कि भाजपा सांसद हंसराज अहीर से भी उनकी उम्मीद खत्म हो गई हैं, क्योंकि जब भी जाओ, वह मात्र आश्वासन देकर टाल देते हैं. राजनाथ सिंह एक ओर यवतमाल-चंद्रपुर के किसानों की समस्याएं सुनने के लिए विदर्भ का दौरा कर रहे हैं, पर अमरावती जिले के किसानों को वह भूल गए. जब बुल इंडिया का सोफिया प्रोजेक्ट चल रहा था, तब राजनाथ सिंह को उनकी याद क्यों नहीं आई. तब उन्होंने किसानों की समस्याओं की ओर ध्यान देना ज़रूरी नहीं समझा. अब ऐसा क्या हो गया कि उन्हें विदर्भ के किसानों की याद सताने लगी. अगले साल उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव है. कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी वहां पूरे राज्य का दौरा करके किसानों, दलितों एवं ग़रीबों की दुआएं बटोर रहे हैं. ऐसे में विदर्भ आकर राजनाथ सिंह क्या बताना चाहते हैं? यह सवाल पार्टी कार्यकर्ता आपस में कर रहे हैं. इस समय राजनाथ सिंह को उत्तर प्रदेश के किसानों की अधिक चिंता होनी चाहिए. कहीं ऐसा तो नहीं है कि वह यह जताना चाहते हों कि उनके राष्ट्रीय अध्यक्ष का क्षेत्र विदर्भ है, जो किसानों की ओर ध्यान नहीं दे पा रहे हैं. शायद ऐसे में राजनाथ सिंह यह जताना चाहते हैं कि वह विदर्भ के किसानों की चिंता पार्टी अध्यक्ष से ज़्यादा कर रहे हैं. यह भी ध्यान देने योग्य तथ्य है कि राजनाथ सिंह के विदर्भ दौरे को पार्टी नेताओं ने भी खास तवज्जो नहीं दी. उनके साथ यवतमाल एवं चंद्रपुर के कार्यकर्ता ही देखे गए. पार्टी का कोई वरिष्ठ नेता उनके साथ दौरे पर नहीं गया, जबकि महाराष्ट्र पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष का गृहराज्य है और विदर्भ उनका क्षेत्र. इसके अलावा प्रदेशाध्यक्ष सुधीर मुनगंटीवार चंद्रपुर ज़िले के ही रहने वाले हैं. उनकी अनुपस्थिति चर्चा का विषय बनी हुई है. राजनाथ सिंह के दौरे पर उठे सवालों को लेकर पार्टी क्या रु़ख अपनाती है, यह भविष्य में ही पता चलेगा, मगर इससे यह ज़रूर साबित हो गया कि पार्टी में सब कुछ ठीक नहीं है.
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