महाराष्ट्र के सामाजिक न्याय मंत्री का नाम है शिवाजी राव मोघे. उनके कार्यकाल में महाराष्ट्र में नरबलि और अन्य अमानवीय, अनिष्ट, अघोरी प्रथा व जादू-टोना पर प्रतिबंध लगाने के लिए हाल में संपन्न विधान मंडल के मानसून सत्र में एक विधेयक लाया गया. हालांकि, मोघे को यहां एक बात स्पष्ट करनी चाहिए कि श्रद्धा और अंधश्रद्धा की सीमा रेखा कौन-सी है? क्या अब तक शिवाजी राव मोघे ने अपने निर्वाचन क्षेत्र में कितने लोगों को अंधश्रद्धा से मुक्त कराया? क्या इस बात का जवाब उनके पास है? इस बारे में उनकी दलील चाहे जो भी हो, लेकिन इतना ज़रूर है कि अंधविश्वास आज भी हमारे समाज में बदस्तूर क़ायम है, फिर भला महाराष्ट्र शासन के मंत्री अपवाद कैसे हो सकते हैं. वैसे अंधश्रद्धा निर्मूलन के लिए राज्य सरकार वर्ष 2004 से ही प्रयत्नशील है.
अगर देखा जाए तो समाज के कथित सुशिक्षित और प्रतिष्ठित लोग ही ज़्यादातर अंधविश्वास के घेरे में हैं. औरंगाबाद में खुल्ताबाद का मारुति, नागपुर टेकड़ी के गणपति, मुंबई का प्रसिद्ध सिद्धि विनायक मंदिर और शिरडी के सांईबाबा मंदिर में दिन-प्रतिदिन लोगों की भीड़ बढ़ रही है.
इस विधेयक का नाम महाराष्ट्र नरबलि व अन्य अमानवीय अनिष्ट, अघोरी प्रथा व जादूटोना प्रतिबंध अधिनियम 2011 है. पिछले 10 सालों में अघोरी व अनिष्ट प्रथा के स़िर्फ 109 आपराधिक मामले दर्ज किए गए हैं, जबकि हत्या, डकैती, बलात्कार के एक लाख आठ सौ छह मामले राज्य में हुए हैं. ये आंकड़े बिहार से भी ज़्यादा है. अंधश्रद्धा के विरोध में तत्कालीन मुख्यमंत्री सुशील कुमार शिंदे 2004 में अध्यादेश लाने वाले थे, लेकिन प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल डॉ. मोहम्मद फज़ल ने उस क्रांतिकारी अध्यादेश पर हस्ताक्षर करने से मना कर दिया था और राज्य सरकार को जनमत जानने की सलाह दी थी. डॉ. फज़ल को उस अध्यादेश से सामाजिक जीवन में किस तरह के बदलाव व उसके क्या दुष्परिणाम होते यह अच्छी तरह से पता था. इस दौरान राज्य में कई मुख्यमंत्री व मंत्री बदले, लेकिन सरकार इस दिशा में कुछ खास नहीं कर पाई.
इस साल विधानसभा के मानसून सत्र में राज्य सरकार अंधश्रद्धा निर्मूलन क़ानून पारित कराने पर अड़ी हुई है. हालंकि, अंधश्रद्धा के विरोध में पिछले 31 सालों से कुछ सामाजिक संगठन आंदोलन भी कर रहे हैं. ऐसे गांव जहां निराकार भगवान की पूजा होती है. उन जगहों पर जहां न तो कोई मंदिर-मस्जिद हो और न ही गिरिजाघर, जहां जन्म से लेकर अंतिम संस्कार तक में कोई धार्मिक अनुष्ठान न हो और उस गांव के पुजारी ब्राह्मण के घर में खाने के लाले पड़े हों. मौलवी और धर्मोपदेशक बेकार बैठे हों, जिस गांव में जादूटोना, करणी और भानामति पर कोई भी विश्वास नहीं करता हो, वहां अगर किसी बिल्ली ने रास्ता काट भी दे तो राहगीर रुकता नहीं है, जहां सब नास्तिक हों उनका ज्योतिष पर कोई यक़ीन न हो, वे पूर्णतः विज्ञानवादी हों, क्या ऐसा आदर्श गांव बनाने की कोशिश प्रो. श्याम मानव और डॉ. नरेंद्र दाभोलकर ने कभी की है?
अगर देखा जाए तो समाज के कथित सुशिक्षित और प्रतिष्ठित लोग ही ज़्यादातर अंधविश्वास के घेरे में हैं. औरंगाबाद में खुल्ताबाद का मारुति, नागपुर टेकड़ी के गणपति, मुंबई का प्रसिद्ध सिद्धि विनायक मंदिर और शिरडी के सांईबाबा मंदिर में दिन-प्रतिदिन लोगों की भीड़ बढ़ रही है. करोड़ों रुपयों का चढ़ावा मंदिर को मिल रहा है. ऐसा नहीं है कि उस भीड़ में स़िर्फ आम जनता ही होती है. यहां आने वाले लोगों में माननीय मंत्री से लेकर सांसद, विधायक भी होते हैं. इस साल आषाढ़ महीने में राज्य के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने पंढरपुर स्थित पांडुरंग भगवान से राज्य में अच्छी बारिश के लिए आाशीर्वाद मांगा. हक़ीक़त में श्रद्धा, अंधविश्वास यह व्यक्तिसापेक्ष मामला है. एक ही कुटुंब के कुछ लोग किसी एक पर श्रद्धा रखते हैं, तो उसी कुटुंब के बाक़ी लोग उस व्यक्ति को अविश्वासी समझते हैं, आ़खिर ऐसा क्यों है? इसका जवाब विज्ञान भी नहीं दे सकता.
शिवाजी राव मोघे से कुछ सवाल
- क्या यह क़ानून स़िर्फ हिंदू समाज के लोगों और उनके देवी-देवताओं और मंदिरों के लिए है?
- क्या हिंदुओं के सभी धार्मिक कर्मकांड और प्रथा का विरोध किया जाएगा?
- क्या मुस्लिम समुदाय के लोगों और उनके धार्मिक रीति-रिवाज़ों को इससे अलग रखा जाएगा?
- श्रद्धा, अंधश्रद्धा, प्रथा और अनिष्ट प्रथा की स्पष्ट व्याख्या इस विधेयक में क्यों नहीं है?
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