आज के ज़माने में ईमानदारी की बात करने वालों को पागल या बुद्धू कहा जाता है. यह विचार लोग चाहे मज़ाक़ या गप्प मारते समय व्यक्त करते हों, पर महाराष्ट्र में ईमानदार अधिकारियों को शासन-प्रशासन द्वारा किस तरह प्रताड़ित किया जाता है, इसका उदाहरण हैं वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी संजय पांडे, जिन्हें राज्य सरकार दंडित कर रही है ईमानदारी से काम करने के लिए, अपने कर्तव्य का सही ढंग से पालन करने के लिए. यही कारण है कि राज्य का गृह मंत्रालय उनकी वरिष्ठता को ध्यान में रखकर न किसी पद पर नियुक्त कर रहा है और न उन्हें चार सालों से वेतन-भत्ता दिया जा रहा है. राज्य का गृह मंत्रालय कैट के निर्णय को भी नहीं मान रहा है. जब उनके द्वारा अपने पद से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति की मांग की गई तो उसे भी सरकार द्वारा नकार दिया गया. जहां संजय पांडे जैसे ईमानदार वरिष्ठ आईपीएस को प्रताड़ित किया जा रहा है, वहीं कई अधिकारी गले तक भ्रष्टाचार में डूबे होने के बाद भी पद की शोभा बढ़ा रहे हैं.
आश्चर्य की बात है कि जहां मिलावट़खोरों के कारण राज्य में एक अपर जिलाधिकारी को ज़िंदा जला दिया गया हो, वहां सरकार द्वारा मिलावट़खोरी करने वालों के खिला़फ अभियान छेड़ने वाले अधिकारी को प्रताड़ित किया जा रहा है. आज मिलावट़खोरी की समस्या पूरे राज्य में अपने पैर पसार चुकी है. हर क्षेत्र में मिलावट करने वाला माफिया सक्रिय है.
पुलिस-प्रशासन के सूत्रों की मानें तो संजय पांडे की ईमानदारी से गृह विभाग घबराता है. वह ऐसे अधिकारी हैं, जो किसी सरकारी या राजनीतिक दबाव के आगे नहीं झुकते हैं. उनका हर कार्य क़ानून के अनुरूप होता है. वर्ष 2007 में उनकी वरिष्ठता को नज़रअंदाज़ करके उन्हें खाद्य एवं औषधि विभाग में मुख्य विजिलेंस अधिकारी के पद पर नियुक्त किया गया था. उस पद पर रहते हुए पांडे ने मिलावट़खोरों के खिला़फ अभियान छेड़ दिया था. उनकी लगातार छापामार कार्रवाई से मिलावट़खोरी करने वाले व्यापारियों में हड़कंप मच गया था. कार्रवाई रोकने के लिए उन पर लगातार दबाव डाला जाने लगा, फिर भी उन्होंने अपना अभियान नहीं रोका, मगर व्यापारियों के दबाव के आगे खाद्य एवं औषधि मंत्रालय झुक गया. तत्कालीन खाद्य एवं औषधि मंत्री की स़िफारिश पर गृह विभाग ने पांडे को मुख्य विजिलेंस अधिकारी के पद से हटा दिया. बतौर सज़ा आज तक उन्हें कोई पद नहीं दिया गया. यहीं से उन्हें प्रताड़ित करने का दौर शुरू हुआ.
आश्चर्य की बात है कि जहां मिलावट़खोरों के कारण राज्य में एक अपर जिलाधिकारी को ज़िंदा जला दिया गया हो, वहां सरकार द्वारा मिलावट़खोरी करने वालों के खिला़फ अभियान छेड़ने वाले अधिकारी को प्रताड़ित किया जा रहा है. आज मिलावट़खोरी की समस्या पूरे राज्य में अपने पैर पसार चुकी है. हर क्षेत्र में मिलावट करने वाला मा़फिया सक्रिय है. अपर जिलाधिकारी सोनवणे को ज़िंदा जलाने का दुस्साहस मिलावटी तेल बेचने वाले तेल माफिया ने दिनदहाड़े किया, पर लगता है कि सरकार की आंख नहीं खुली. इसीलिए पांडे जैसे अधिकारी को ईमानदारी की सज़ा दी जा रही है और मिलावट़खोरी करने वाले माफिया को संरक्षण दिया जा रहा है. जब 2007 में खाद्य एवं औषधि विभाग के मुख्य विजिलेंस अधिकारी के पद से उन्हें हटाया गया, तब निराशा में संजय पांडे ने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (वीआरएस) देने की मांग की थी, मगर सरकार ने उनकी यह मांग ठुकरा दी. साथ ही सरकार ने 18 जून, 2007 से उनके वेतन-भत्ते पर रोक भी लगा दी. इस अन्याय के खिला़फ पांडे राज्य प्रशासकीय पंचाट (कैट) की शरण में चले गए.
लंबी सुनवाई के बाद कैट ने 9 मई, 2011 को अपना फैसला सुनाया. फैसले में गृह विभाग को स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि संजय पांडे को वरिष्ठता के आधार पर एक माह के अंदर विशेष पुलिस महानिदेशक के पद पर नियुक्त किया जाए, लेकिन फैसले को आए दो माह गुज़र जाने के बाद भी गृह विभाग ने कैट के आदेश पर कोई कार्रवाई नहीं की. पांडे ने फैसले की प्रति के साथ एक पत्र गृहमंत्री आर आर पाटिल और पुलिस महानिदेशक को भेजा, पर उसे भी नज़रअंदाज़ कर दिया गया. संजय पांडे ने पुन: कैट की चौखट पर जाने का निर्णय लिया है. राज्य सरकार का यह रवैया दर्शाता है कि उसकी नीयत में कहीं न कहीं खोट है. साथ ही कई सवाल भी उठते हैं, जैसे सरकार किन मिलावट़खोरों को बचाना चाहती थी, जिनके चलते एक ईमानदार अ़फसर को उसके पद से हटाना पड़ा, किसके कहने पर ऐसा किया गया, वहां से हटाने के बाद उसकी नियुक्ति किसी अन्य पद पर क्यों नहीं की गई, किस आधार पर उसके वेतन-भत्ते पर रोक लगा दी गई और अब कैट के फैसले के बाद भी उसकी नियुक्ति क्यों नहीं की जा रही है?
सरकार हमेशा यही कहती है कि वह भ्रष्टाचार को जड़ से मिटाने और प्रशासन में पारदर्शिता लाने के उपाय कर रही है, राज्य को भ्रष्टाचार मुक्त बनाना है. इसके बावजूद यदि संजय पांडे जैसे ईमानदार एवं कर्तव्यनिष्ठ अधिकारियों को महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी देने के बजाय प्रताड़ित किया जाएगा तो राज्य कैसे भ्रष्टाचार मुक्त बन सकेगा, प्रशासन में पारदर्शिता कैसे आ सकेगी? आज जब चारों ओर भ्रष्टाचार के खिला़फ आंदोलन हो रहे हैं. संतरी से लेकर मंत्री तक भ्रष्टाचार में लिप्त होने से जनता में आक्रोश बढ़ता जा रहा है. ऐसे में ईमानदार, योग्य एवं कर्तव्यनिष्ठ अधिकारियों की सख्त ज़रूरत है. यदि सरकार किसी ईमानदार अधिकारी को प्रताड़ित करती है तो जनता में क्या संदेश जाएगा. आदर्श घोटाले में राज्य के कई वरिष्ठ नेताओं के नाम आ चुके हैं, ज़मीन घोटालों में नेताओं के लिप्त होने की खबरें आएदिन अ़खबारों की सु़र्खियां बन रही हैं. ऐसी परिस्थितियों में तो जनता यही कहेगी, राजा है जब चोर, सिपाही क्या कर लेगा.
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