महाराष्‍ट्रः हर्षवर्द्धन को हाईकोर्ट की फटकार

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मुंबई हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति एस सी धर्माधिकारी ने सहकारिता मंत्री हर्षवर्धन पाटिल के होश उड़ा दिए हैं. स़िर्फ हर्षवर्धन पाटिल ही ऐसे मंत्री नही हैं. अगर आप मंत्रियों के वातानुकूलित कक्ष के पास से गुजरें तो आपको हर जगह एक जैसा अनुभव होगा. अधिकतर मंत्री विलासी प्रवृत्ति के होते हैं. उनकी इस प्रवृत्ति से आम आदमी अचंभित और हैरान-परेशान होता है, परंतु सत्ताधीशों को इस संदर्भ में कोई अफसोस नहीं होता. यदि कोई ज़रूरतमंद व्यक्ति किसी कारण उनके सामने अधिक देर तक खड़ा रहे तो चिड़चिड़ाहट उनके चेहरे पर साफ नज़र आने लगती है. इस संबंध में आम आदमी क्या सोचता है, इसकी उन्हें ज़रा भी परवाह नहीं होती. आम आदमी के काम भी अधिकतर साधारण होते हैं, लेकिन अधिकारी-कर्मचारी जानबूझ कर उनके काम में अड़ंगे डालते हैं. ऐसे में भुक्तभोगी के पास संबंधित मंत्रालय और मंत्री की शरण में जाने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता. ऐसा भी नहीं है कि मंत्रियों के दरबार में उसे न्याय मिल ही जाता हो. यह बात अलग है कि ग्रामीण सीधे-सादे होते हैं, ज़्यादा चालाक नहीं होते, लेकिन हमेशा उनकी बात सुने बिना टालमटोल करके आगे निकल जाना भी न्याय नहीं है. नैसर्गिक न्याय आम आदमी का अधिकार है. अगर वह सत्ताधीशों से अपमानित होकर न्यायालय की तऱफ भागता है और अदालत मंत्री विशेष पर मुकदमा चलाने का आदेश देती है तो सरकार हाय-तौबा करने लगती है कि अदालत अपनी सीमा पार कर रही है. ऐसा ही हुआ हर्षवर्द्धन पाटिल के मामले में.

हर्षवर्धन पाटिल के सामने सहकारिता विभाग से संबंधित मामले आते हैं. यह रोज की बात है. फरियादी अपने वकील से विचार-विमर्श कर अपना पक्ष उनके सामने रखता है. एक दिन 46 मामलों की सुनवाई होनी थी. दोपहर 2 बजे का समय दिया गया था, लेकिन मंत्री डेढ़ घंटे देर से आए. आते ही उन्होंने शिकायतकर्ताओं से कहा कि आज समय कम है, इसलिए आप एक-एक मिनट में अपनी बात कह सकते हैं. 

हर्षवर्धन पाटिल के सामने सहकारिता विभाग से संबंधित मामले आते हैं. यह रोज की बात है. फरियादी अपने वकील से विचार-विमर्श कर अपना पक्ष उनके सामने रखता है. एक दिन 46 मामलों की सुनवाई होनी थी. दोपहर 2 बजे का समय दिया गया था, लेकिन मंत्री डेढ़ घंटे देर से आए. आते ही उन्होंने शिकायतकर्ताओं से कहा कि आज समय कम है, इसलिए आप एक-एक मिनट में अपनी बात कह सकते हैं. जैसे स्कूल में बच्चों की हाजिरी ली जाती है, वैसे ही 46 मामलों का निपटारा पाटिल ने एक झटके में कर दिया. मंत्री का ऐसा न्याय देखकर शिकायतकर्ता अचंभित रह गए. एक शिकायतकर्ता ने मंत्री के इस रवैये के ख़िला़फ हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटा दिया. अदालत ने उसकी पूरी बात सुनी और नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा कि शिकायतकर्ताओं की सुनवाई करने की यह कोई नैसर्गिक न्याय प्रक्रिया नहीं है. यदि ऐसा होगा तो सब कुछ ख़त्म हो जाएगा. न्यायमूर्ति धर्माधिकारी ने मंत्रालय में होने वाली सुनवाई के तरीक़े के प्रति नाराजगी व्यक्त की. इस पर हर्षवर्धन पाटिल ने सफाई दी कि उस दिन पुणे में मुख्यमंत्री का कार्यक्रम था और वहां उपस्थिति अनिवार्य होने की वजह से वह सुनवाई के लिए ज़्यादा समय नहीं दे सके.

अब सवाल यह उठता है कि अगर मुख्यमंत्री का कार्यक्रम था भी, तो वह कम से कम सप्ताह भर पहले तय किया होगा. ऐसे में सुनवाई टाली जा सकती थी या फिर अगर देर से शुरू भी हुई तो उसे पर्याप्त समय दिया जाना चाहिए था. दूसरी बात यह है कि मंत्रालय कोई भी हो, संबंधित मंत्रियों, उनके सचिवों के आसपास परिचितों और उनके निर्वाचन क्षेत्र के लोगों का जमावड़ा लगा रहता है. चूंकि जमावड़े का हर सदस्य मंत्री से चिपका रहता है, इसलिए उनसे पूरा स्टाफ परिचित रहता है. इस बीच अगर गड़चिरोली, कोंकण या सोलूर-सांगली से कोई ज़रूरतमंद आदमी आ जाता है तो उस पर मंत्रियों की चमचामंडली टूट पड़ती है. यह एक कटु सत्य है. मंत्रालय में जो मंत्री बैठे हैं, वे केवल अपने निर्वाचन क्षेत्र के लिए नहीं हैं, उन पर 288 विधानसभा क्षेत्रों की जवाबदेही है, लेकिन पिछले 15-20 सालों से मंत्रियों ने अपने दायित्व भुला दिए हैं. यह राज्य का दुर्भाग्य नहीं तो क्या है? अपने निर्वाचन क्षेत्र का लालन-पालन और संवर्धन करना चाहिए, लेकिन शेष 287 निर्वाचन क्षेत्रों की उपेक्षा करके नहीं. मंत्रियों के एंटी चेंबर्स स़िर्फ बातें करने के लिए नहीं हैं.

मंत्रालय में मंत्रियों की उपस्थिति भी एक बड़ा सवाल है. वे बुधवार को कैबिनेट की बैठक के पूर्व मंत्रालय जाते हैं और फिर एक दिन बाद. क्या राज्य सरकार ने कामकाज निपटाने के लिए मात्र 3 दिनों का सप्ताह तय किया है? उत्पाद शुल्क मंत्री गणेश नाईक और अन्न एवं औषधि विभाग के मंत्री मनोहर नाईक मंत्रालय के सामने स्थित अपने बंगलों से अपना कारोबार संभालते हैं, वे स़िर्फ कैबिनेट की बैठक के लिए मंत्रालय की सीढ़ियां चढ़ते हैं. ये दोनों मंत्री राष्ट्रवादी कांग्रेस के हैं. पिछले 12 सालों में मनोहर नाईक विधानसभा में कितनी बार बोले होंगे, यह शोध का विषय है. मंत्रालय में मंत्रियों की अनुपस्थिति एक गंभीर मुद्दा है और इस पर अंकुश लगना ज़रूरी है. सरकार में शामिल राजनीतिक दलों द्वारा अपने मंत्रियों को इस बारे में सख्त हिदायत दी जानी चाहिए, लेकिन कोई भी दल ऐसा करता नज़र नहीं आता. मनोहर नाईक बंजारा समाज के हैं और बंजारा समाज का समर्थन राकांपा को मिलता रहा है. कहीं यह समर्थन हाथ से फिसल न जाए, इसलिए अखिल भारतीय राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के प्रमुख शरद पवार अपने चहेते मनोहर नाईक को जरा भी नाराज़ नहीं करना चाहते.

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