राष्ट्रीय सुरक्षा और वैश्विक प्रयास की जरुरत

ऐसा कहा जाता है कि भारत के पास राष्ट्रीय सुरक्षा का सिद्धांत नहीं है और यहां रणनीतिक दुविधाग्रस्तता की स्थिति बनी रहती है. सुरक्षा विशेषज्ञ जॉर्ज तनहाम ने भी ऐसा अनुभव किया है कि भारत के पास रणनीतिक सोच की संस्कृति का अभाव है. के सुब्रमण्यम के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड द्वारा इस तरफ संकेत करने के बाद राष्ट्रीय सुरक्षा के संदर्भ में गंभीरता से सोचा जाने लगा है. कई विश्लेषकों का विश्वास है कि भारत का राष्ट्रीय सुरक्षा प्रबंधन प्रतिक्रियात्मक रहा है. कारगिल समिति की रिपोर्ट में भी राष्ट्रीय सुरक्षा की लचर व्यवस्था की ओर इशारा किया गया था. इसके बाद मंत्री समूह की एक रिपोर्ट में राष्ट्रीय सुरक्षा प्रबंधन में परिवर्तन की बात कही गई, लेकिन आलोचकों का मानना है कि मुश्किल से ही कोई सकारात्मक परिवर्तन दिखाई पड़ता है. वे संकेत करते हैं कि जिस सुरक्षा परिषद का गठन राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रभावी प्रबंधन करने के लिए किया गया था, सरकार उसका इस्तेमाल न के बराबर कर रही है.

हथियारों एवं मादक पदार्थों की तस्करी, आतंकवाद, घुसपैठ, अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा संकट, पर्यावरण, सांप्रदायिकता और अन्न संकट आदि ऐसी समस्याएं हैं, जो किसी सीमा से बंधी नहीं हैं और इनसे निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता है. अंतरराष्ट्रीय सहयोग के बिना कोई भी देश अपनी सीमा सुरक्षित नहीं रख सकता और इसके लिए ज़रूरी है विभिन्न देशों के बीच परस्पर सहयोग.

विश्लेषकों का मानना है कि सरकार को राष्ट्रीय सुरक्षा प्रबंधन के लिए अधिक गंभीर होने की आवश्यकता है. न केवल पारदर्शी नीति आवश्यक है, बल्कि एक अच्छी संस्थागत संरचना की भी जरूरत है. राष्ट्रीय सुरक्षा कोई ऐसा काम नहीं है, जिसके लिए महज खानापूर्ति की जाए. राष्ट्रीय सुरक्षा एक पूर्णकालिक काम है और इसके लिए राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की नियुक्ति अलग से होनी चाहिए, न कि प्रधानमंत्री के मुख्य सचिव को ही इस पद पर आसीन कर देना चाहिए, जिसके पास ऐसे ढेर सारे काम हैं. इसके अलावा सेना की विभिन्न शाखाओं के बीच समन्वय के लिए चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ की आवश्यकता है. सूचना और संचार क्रांति के इस दौर में यह ज़रूरी है कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए इसका अधिकाधिक इस्तेमाल किया जाए. ऐसे में जबकि हम अपने यहां शिक्षित समाज के निर्माण की पैरोकारी करते नज़र आते हैं, हमें नवीन तकनीकों का उपयोग अपनी सुरक्षा व्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए करना चाहिए, ताकि कोई भी देश अथवा आतंकवादी संगठन हमारी महत्वपूर्ण और गोपनीय सूचनाओं को चुराकर राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा उत्पन्न न कर दे. जसवंत सिंह और बाद में के सी पंत की अध्यक्षता वाली इंफॉर्मेशन टास्क फोर्स ने भी राष्ट्रीय सुरक्षा के इस पहलू की ओर विशेष ध्यान देने की बात कही है. अमेरिका के प्रथम राष्ट्रपति जार्ज वाशिंगटन ने कहा था कि यदि आप शांति चाहते हो तो युद्ध के लिए तैयार रहो. अत: यद्यपि हम शांति के मसीहा हो सकते हैं, फिर भी हमें अपनी सामरिक तैयारियों को चुस्त- दुरुस्त रखना चाहिए. इसका मतलब यह है कि न केवल हमें सूचना देने वाली संस्थाओं पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है, बल्कि सेना के प्रशिक्षण पर ध्यान देना भी उतना ही ज़रूरी है, ताकि हमारे जवान सुरक्षा संबंधी नई चुनौतियों का सामना कर सकें. हम एक परमाणु संपन्न देश हैं और हमने इसका पहले उपयोग न करने की नीति बनाई है, फिर भी हमें सावधान रहना होगा और इसका कहीं दुरुपयोग न हो जाए, इस पर विशेष ध्यान देना होगा. इसके लिए कंट्रोल, कमांड, कम्युनिकेशन, इंटेलिजेंस और इंफॉर्मेशन (सी3आई2) का श्रेष्ठ प्रबंधन करने की भी आवश्यकता है, ताकि रक्षक को भक्षक बनने से रोका जा सके.

इसके बाद अगर किसी देश को राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रबंधन सही तरीके से करना है तो यह जरूरी है कि वह रक्षा उत्पादों के मामले में आत्मनिर्भर हो. भारत अपने रक्षा सौदों के लिए रूस या पूर्व के सोवियत संघ पर निर्भर रहा है. जबकि राष्ट्रीय सुरक्षा प्रबंधन को प्रभावी बनाने के दृष्टिकोण से रक्षा सौदों के लिए किसी एक देश पर निर्भर रहने के बजाय अलग-अलग देशों से समझौता करना चाहिए. वैसे भारत ने इस ओर ध्यान दिया है और इसने जर्मनी, फ्रांस, अमेरिका, इजरायल, ब्रिटेन एवं नीदरलैंड के साथ रक्षा सौदे करना प्रारंभ कर दिया है. ऐसा कहा जाता है कि किसी भी देश को रक्षा उपकरणों के उत्पादन के मामले में यथासंभव आत्मनिर्भर होना चाहिए. हमारे लिए यह खुशी की बात है कि भारत ने विजन-2020 के अंतर्गत 2020 तक आवश्यक रक्षा उपकरणों के 70 प्रतिशत हिस्से का उत्पादन देश के भीतर ही करने का लक्ष्य रखा है. ध्यान देने वाली बात यह है कि आज राष्ट्रीय सुरक्षा का संबंध केवल शत्रु देशों की ओर से खतरे तक ही सीमित नहीं है, बल्कि कई अन्य कारक भी हैं, जो राष्ट्रीय सुरक्षा को प्रभावित करते हैं. यह समय जटिल परस्पर निर्भरता का है, जैसा कि सुरक्षा विशेषज्ञ जोसेफ नेय और रॉबर्ट कोहेन ने कहा है. आजकल सुरक्षा को मेरी सुरक्षा या आपकी सुरक्षा के रूप में परिभाषित नहीं किया जा सकता. इस समय एक साथ कई तरफ से सुरक्षा संबंधी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, इसलिए आज परस्पर सहयोग वाली सोच की आवश्यकता है.

हथियारों एवं मादक पदार्थों की तस्करी, आतंकवाद, घुसपैठ, अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा संकट, पर्यावरण, सांप्रदायिकता और अन्न संकट आदि ऐसी समस्याएं हैं, जो किसी सीमा से बंधी नहीं हैं और इनसे निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता है. अंतरराष्ट्रीय सहयोग के बिना कोई भी देश अपनी सीमा सुरक्षित नहीं रख सकता और इसके लिए ज़रूरी है विभिन्न देशों के बीच परस्पर सहयोग. आवश्यकता इस बात की भी है कि ये देश न केवल द्विपक्षीय संबंधों को बढ़ावा दें, बल्कि बहुपक्षीय संबंध स्थापित करने का भी प्रयास करें. हालांकि आजकल ऐसे कई प्रयास हो रहे हैं और गुट निरपेक्ष आंदोलन, जी-15, जी-24, जी-77, आशियान, सार्क एवं अपेक जैसे कई संगठन भी बन गए हैं, जिन्होंने विश्व के अनेक देशों को एक मंच प्रदान किया है. इन अंतरराष्ट्रीय संगठनों को और अधिकारों-शक्तियों की आवश्यकता है, ताकि ये दो देशों के बीच के विवाद को शांतिपूर्ण ढंग से निपटा सकें. इसके साथ ही प्रत्येक देश को चाहिए कि वह अपने संसाधनों और कूटनीतिक संबंधों का भी उपयोग करके शांति बहाली का प्रयास करता रहे. भारत को भी विभिन्न देशों में रहने वाले भारतवंशियों और उनके संसाधनों का इस्तेमाल उन देशों के साथ कूटनीतिक संबंधों को बेहतर बनाने के लिए करना चाहिए. भारत को यह समझना चाहिए कि जब तक पाकिस्तान के साथ उसका विवाद रहेगा, तब तक उसके राष्ट्रीय सुरक्षा प्रबंधन को मजबूत आधार प्राप्त नहीं होगा. न केवल भारत, बल्कि दक्षिण एशिया के सभी देशों को इस ओर ध्यान देना होगा और भारत-पाकिस्तान के बीच के विवाद के शांतिपूर्ण समाधान के लिए प्रयास करना होगा, तभी दक्षिण एशिया में चल रहे शीत युद्ध को समाप्त किया जा सकता है. विकास कार्यों के लिए इस क्षेत्र के संसाधनों का सही तरीके से इस्तेमाल भी तभी किया जा सकता है, जबकि यहां शांति बहाल हो. यह भी कहा जाता है कि अपनी सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने के लिए किसी भी राष्ट्र को अपने निकटतम सहयोगियों का एक संगठन बनाना चाहिए. भारत इसके लिए रूस, चीन, फ्रांस और इजरायल के साथ गुट बना सकता है. साथ ही उसी समय अमेरिका से अपने रणनीतिक संबंध बेहतर कर सकता है. भारत, चीन और रूस के बीच पहले से ही इस पर चर्चा हो रही है. ऐसे प्रभावशाली राष्ट्रीय सुरक्षा प्रबंधन के लिए एक उत्तरदायी सरकार, ठोस राष्ट्रीय सुरक्षा नीति, सहभागी नागरिक समाज, मजबूत अर्थव्यवस्था, न्यायपूर्ण समाज, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और मजबूत संस्थाओं की आवश्यकता है. अच्छी बात यह है कि इस समय सब ठीकठाक ही दिख रहा है. फिलहाल राष्ट्रीय सुरक्षा को कोई ज़्यादा खतरा नहीं है और आशा है कि भविष्य में भी स्थितियां सामान्य रहेंगी.

(लेखक आईएएस अधिकारी हैं. आलेख में व्‍यक्‍त विचार उनके अपने हैं और इनका सरकार के विचारों से कोई संबंध नहीं है)

सौमित्र मोहन

लेखक पश्चिम बंगाल के वरिष्ठ आईएएस अधिकारी हैं
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सौमित्र मोहन

लेखक पश्चिम बंगाल के वरिष्ठ आईएएस अधिकारी हैं

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